कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंनवम लम्बक ५९९ तब राजा ने आगे दौड़कर सामने आये हुए समरबल को शक्ति से आहत करके पाश से खींचकर बाँध लिया ॥२२३॥ उसी प्रकार दूसरे समरशूर राजा के हृदय को बाण से बींधकर वैसे ही बाँध लिया ॥२२४॥ तीसरे राजा समरजित को उसके अंगरक्षक वीर ने बाँधकर उसके पास लाकर सौंप दिया ॥२२५॥ समरबाल के सेनापति देवबल ने इसी प्रकार बाणों से आहत चौथे राजा प्रतापचन्द्र को बाँधकर अपने राजा को भेंट कर दिया ॥२२६॥ यह देखकर प्रतापसेन नाम का पाँचवाँ राजा क्रोध से भरकर रणभूमि में समरबाल से भिड़ गया ॥२२७॥ समरबाल ने उसके बाणों को काटकर तीन बाणों से उसके ललाट का भेदन कर दिया ॥२२८॥ और फिर, गले में डाले हुए पाश से काल के समान समरबाल ने उसे खींचकर अपने वश में कर लिया ॥२२९॥ इस प्रकार, क्रम से उन पाँचों राजाओं के बँध जाने पर मरण से बची हुई उसकी सेना इधर-उधर भाग गई ॥ २३० ॥ तदनन्तर, इन राजाओं के अनन्त धन, रत्न और सोना के अतिरिक्त बहुत-सी रानियाँ समरबाल को मिलीं। उन सब रानियों में राजा प्रतापसेन की महारानी यशोधेखा सबसे बड़ी और सुन्दरी थी ॥२३१-२३२॥ तदनन्तर, अंगरक्षक वीर, सेनापति देवबल और राजा समरबाल विजय करके अपने नगर में पहुँचे। वहाँ जाकर राजा ने अपने सेनापति और अंगरक्षक को पट्ट बाँध करके उन्हें रत्नों से भर दिया ॥२३३॥ राजा समरबाल ने प्रतापसेन की महारानी यशोधेखा को क्षात्र धर्म से जीत लेने के कारण अपने अन्तःपुर की एक रानी बना लिया ॥२३४॥ 'मैं इसके बाहुबल से जीती गई हूँ'—ऐसा समझकर वह रानी यशोधेखा चंचल होकर भी राजा समरबाल के पास स्थिर हो गई। काम और मोह से प्रवृत्त स्त्रियों की सर्व भावना विचित्र होती है ॥२३५॥ कुछ दिनों के बाद रानी यशोलेखा की प्रार्थना पर समरबाल ने प्रतापसेन आदि विनय से विनम्र उन पाँचों राजाओं को छोड़ दिया और उनका सत्कार करके उन्हें अपने-अपने राज्य में भेज दिया ॥२३६-२३७॥