कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
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'हे तीनों लोकों के एकमात्र प्रदीप शरण में आए हुए मेरी रक्षा करो। मेरे इस दुःख-रूपी अंधेरे को नष्ट करो। दया करो' ।।३४।। इत्यादि स्तुति वाक्यों द्वारा भक्ति-भाव से सूर्य की प्रार्थना करते हुए चन्द्रस्वामी ब्राह्मण को आकाशवाणी सुन पड़ी—।।३५।। 'हे चन्द्रस्वामिन् मैं तुझसे प्रसन्न हूँ। तू मारा नही जायगा और मेरी कृपा से पुत्र आदि के साथ तेरा मिलन भी होगा' ।।३५।। दिव्य वाणी द्वारा इस प्रकार कहा गया चन्द्रस्वामी विश्वासपूर्वक वहाँ भीलों द्वारा लाये गये भोजन फल आदि ग्रहण कर वहीं ठहरा रहा ।।३६।। उधर वह महीपाल छोटी बहन के साथ जंगल में बैठा-बैठा पिता के न आने पर किसी सार्थवाह¹ से अशुभ आशंका से रोने लगा ।।३७।। इतने में ही उस मार्ग से व्यापारियों का एक दल आ निकला। उस दल के प्रधान सार्थवाह¹ ने उस बालक से सारा समाचार पूछा ।।३८।। वह व्यापारी उस बालक को शुभ लक्षणोंवाला जानकर धीरज बँधाया और उसे बहन के साथ अपने घर ले गया ।।३९।। वहीं पर बनिये के घर में पुत्र के समान स्नेह को प्राप्त करता हुआ वह महीपाल बाल्यावस्था में ही स्नान सन्ध्या अग्निहोत्र आदि क्रिया में निपुण होने के कारण वैश्य के घर में नित्य-क्रिया करता हुआ रहने लगा ।।४०।। एक बार तारापुर के तारावर्म नामक राजा का मंत्री किसी कार्यवश उसी मार्ग से वहाँ आया ।।४१।। वह श्रेष्ठ ब्राह्मण मंत्री अनन्तस्वामी हाथी घोड़े नौकर चाकर आदि के साथ उसी अपने मित्र व्यापारी के घर विश्राम के लिए ठहर गया ।।४२।। उस घर में ठहरे हुए उसने सुन्दर आकृतिवाले जप अग्निहोत्र आदि में लगे हुए महीपाल को देखा और उसका परिचय पूछा ।।४३।। उस सन्तानहीन मन्त्री ने व्यापारी से उसका परिचय पाकर और उसे ब्राह्मण जानकर, उसे अपना पोष्य-पुत्र बनाने के लिए उसकी बहन के साथ उसे माँग लिया ।।४४।। तब वह मन्त्री अनन्तस्वामी व्यापारी से उन बालकों को लेकर, तारापुर चला आया ।।४५।। वहाँ विधिवत् पुत्र बनाया हुआ महीपाल विद्या और धन से भरे हुए उसके घर में सुखपूर्वक रहने लगा ।।४६।। इसी बीच भीलों का राजा सिंहदंष्ट्र उस ग्राम में आकर और चन्द्रस्वामी के पास जाकर बोला—।।४७।।
१ सौदागरों का मुखिया सरदार। ८१