भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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नवम लम्बक ६४५ हे ब्रह्मदेव मुझे स्वप्न में भगवान् भास्कर ने आदेश दिया है कि मैं तुम्हें सत्कृत करके छोड़ दूँ। तुम्हारा वध न करूँ ॥४८॥ इसलिए, उठो और जहाँ चाहो जाओ। ऐसा कहकर भील ने चन्द्रस्वामी को मोती और कस्तूरी देकर जंगल में मार्ग बतलानेवाले सेवकों के साथ आदरपूर्वक विदा कर दिया ॥४९॥ तब वह चन्द्रस्वामी छोटी बहन के साथ अपने पुत्र महीपाल को ढूँढ़ता हुआ उन्हें जंगल में न पाकर घूमते-घामते समुद्र के किनारे जलपुर नामक नगर में जा पहुँचा। वहाँ जाकर वह किसी ब्राह्मण के घर में अतिथि के रूप में ठहर गया ॥५०-५१॥ वहाँ पर भोजन के उपरान्त अपना वृत्तान्त सुनाते हुए चन्द्रस्वामी से गृह के स्वामी ब्राह्मण ने कहा—॥५२॥ 'पिछले दिनों में कनकवर्मा नाम का एक व्यापारी बनिया यहाँ आया था। उसने जंगल में छोटी बहन के साथ एक ब्राह्मण बालक को प्राप्त किया। वह उन दोनों अति सुन्दर बच्चों को लेकर यहाँ से नारिकेल-द्वीप में गया है किन्तु उसने उस बालक का नाम नहीं बताया' ॥५३-५४॥ यह सुनकर और वे अवश्य ही मेरे बालक हैं ऐसा सोचकर चन्द्रस्वामी ने नारिकेल- द्वीप जाने का विचार किया ॥५५॥ किसी प्रकार रात्रि व्यतीत कर उसने प्रातःकाल ही नारिकेल-द्वीप जाते हुए वणिक विष्णुवर्मा से अपना साथ-मेल बैठाया ॥५६॥ और, उसी के साथ नाव में बैठकर चन्द्रस्वामी बच्चों के प्रेम से समुद्र-मार्ग द्वारा नारिकेल-द्वीप को गया ॥५७॥ वहाँ पर कनकवर्मा को पूछते हुए उसे वहाँ के व्यापारी बनियों ने बताया कि कनकवर्मा नाम का व्यापारी जंगल से मिले हुए दो सुन्दर ब्राह्मण-बालकों को लेकर यहाँ आया अवश्य था किन्तु इस समय वह उन बच्चों के साथ यहाँ से कटाह-द्वीप को चला गया ॥५८-५९॥ व्यापारियों से इस प्रकार सुनकर चन्द्रस्वामी जलयान द्वारा कटाह-द्वीप जाते हुए व्यापारी दानवर्मा के साथ कटाह-द्वीप को गया ॥६०॥ वहाँ भी उसे ब्राह्मण से ज्ञात कि कनकवर्मा यहाँ से कर्पूर-द्वीप को चला गया। उसी क्रम से कर्पूर सुवर्ण और सिंहल-द्वीपों में वैश्यों के साथ जाने पर भी वह कनकवर्मा को न पा सका ॥६१-६२॥