भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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दशम लम्बक ७३५

वह ईश्वरवर्मा अर्थदत्त के इस प्रकार समझाने और आशा दिखाने पर, किसी प्रकार पिता के पास लाया गया ॥१३१॥ उसका पिता एकमात्र पुत्र के स्नेह के कारण उसे फिर यमजिह्वा कुट्टनी के पास ले गया ॥१३२॥ पूछने पर ईश्वरवर्मा ने सुन्दरी के कूप में गिरने और धनक्षय आदि का सारा वृत्तान्त अर्थदत्त के मुंह से पिता को सुना दिया ॥१३३॥ तब यमजिह्वा बोली कि मैं ही इसकी अपराधिनी हूँ जो मैंने वेश्याओं की माया इसे नहीं सिखाई ॥१३४॥ मकरकटी ने कूप के अन्दर जाल बँधवा दिया था उसी पर सुन्दरी गिरी और मरी नहीं ॥१३५॥ तो अब इसका भी उपाय है ऐसा कहकर कुट्टनी ने अपने 'आल' नामक बन्दर को वहाँ बुलवाया ॥१३६॥ उसके आगे अपना एक हजार दीनार रखकर बन्दर से वह बोली कि इसे निगल जा। वह शिक्षित बन्दर देखते ही उसे निगल गया ॥१३७॥ 'बेटा इसे बीस दीनार दो इसे पच्चीस दो इसे साठ दो और इसे सौ दो' इस प्रकार भिन्न भिन्न प्रकार के व्यय मार्गों में यमजिह्वा द्वारा दिलाये हुए दीनारों को उस बन्दर ने उगलकर दे दिया ॥१३८-१३९॥ आल नामक बन्दर की यह युक्ति दिखाकर कुट्टनी फिर बोली-'बेटा ईश्वरवर्मा तुम इस बन्दर के बच्चे को ले लो। और फिर उस सुन्दरी के घर में पहले की भाँति रहना प्रारम्भ कर दो। और, व्यय के लिए इसी प्रकार समय-समय पर बन्दर से धन माँगा करना ॥१४०-१४१॥ तब वह सुन्दरी चिन्तामणि के समान इस बन्दर को अपना सर्वस्व देकर भी तुमसे लेना चाहेगी ॥१४२॥ इस प्रकार, उसका धन लेकर और इससे दो दिनों का व्यय निकलवाकर तुम शीघ्र ही उससे दूर चले जाना' ॥१४३॥ ऐसा कहकर उस यमजिह्वा ने उस बन्दर को ईश्वरवर्मा के लिए दे दिया। और, उसके पिता ने भी दो करोड़ रुपय का धन उसे दिया ॥१४४॥ यह सब लेकर ईश्वरवर्मा फिर से कांचनपुर गया और दूत के द्वारा पहले उस (सुन्दरी वेश्या को) सूचित करके उसके घर पर गया ॥१४५॥

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