भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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द्वादश लम्बक ७१७ उस सुन्दरी ने ईश्वरवर्मा को फिर सब साधनों से युक्त देखकर मित्र के साथ उसका स्वागत-अभिनन्दन किया और उसे गले से लगाकर पूर्ववत् प्रेम प्रदर्शित किया ॥१४६॥ ईश्वरवर्मा ने भी उस समय की उचित बातों से उसे विश्वास दिलाकर अपने मित्र अर्थदत्त से कहा कि 'जाओ' बन्दर को ले आओ ॥१४७॥ 'अच्छा' कहकर अर्थदत्त बन्दर को ले आया। पहले से ही एक हजार दीनारों को निगले हुए बन्दर से ईश्वरवर्मा ने कहा- 'बेटा आज दो सौ भोजन-पानी के लिए और एक सौ पान-इत्र आदि के लिए, इस प्रकार तीन सौ दीनार दो ॥१४८-१४९॥ एक सौ माता मकरकटी को ब्राह्मणों को बाँटने के लिए और हजार में से शेष सौ सुन्दरी को दे दो ॥१५०॥ ईश्वरवर्मा से इस प्रकार कहे गये बन्दर ने उसी प्रकार उगल-उगलकर पहले निगले हुए दीनारों का उन-उन व्ययों के लिए दे दिया ॥१५१॥ इस प्रकार, ईश्वरवर्मा से कहा गया बन्दर एक पक्ष तक व्यय के लिए प्रतिदिन दीनार देता रहा ॥१५२॥ यह देखकर मकरकटी और सुन्दरी ने सोचा-ओह ! ईश्वरवर्मा का बन्दर के रूप में यह चिन्तामणि मित्र है ॥१५३॥ जो प्रतिदिन इसे एक हजार दीनार देता है यदि इसे ही यह हम दे दे तो हमारा मनोरथ ही सिद्ध हो जाय ॥१५४॥ माता से सुन्दरी ने इस प्रकार विचार करके एकान्त में भोजन के बाद गपशप में बैठे हुए ईश्वरवर्मा से उस बन्दर की माँग की ॥१५५॥ यदि मुझ पर तेरी कृपा या सच्चा प्रेम है तो इस बन्दर को मुझे दे दो। यह सुनकर ईश्वरवर्मा बनावटी हँसी हँसता हुआ बोला—॥१५६॥ यह मेरे पिता का सर्वस्व है इसलिए इसे मैं नहीं दे सकता। इस प्रकार कहते हुए ईश्वरवर्मा से सुन्दरी ने कहा- मैं तुम्हें पाँच करोड़ मुद्रा देती हूँ तुम मुझे दे दो। तब ईश्वरवर्मा गाढ़ा निश्चय करके बोला—'यदि तू मुझे अपना सर्वस्व दे दे या सारा नगर भी दे दे तो भी मैं इसे नहीं दे सकता। करोड़ों से क्या होता है ॥१५७-१५८॥ यह सुनकर सुन्दरी बोली—'मैं अपना सर्वस्व तुम्हें दे दूँगी। तुम यह बन्दर दे दो। भले ही माता उस पर कुपित हो ॥१५९॥