कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
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द्वादश लम्बकः ७२१ हे राजन्! इस प्रकार की स्त्री के हृदय में छल-कपट के बिना सरल बात का लेश भी नहीं रहता इसलिए ऐश्वर्य चाहनेवाले व्यक्ति को अर्थग्राध्य मूनि जंघक के समान भीषण विलासिनी स्त्रियों से प्रेम नहीं करना चाहिए ॥१७६॥ मरुभूति के मुंह से इस प्रकार आत्म-श्रास की कथा सुनकर और उस पर विश्वास करके नरवाहनदत्त गोमुख आदि मन्त्रियों के साथ हँसने लगा ॥१७७॥ महाकवि श्रीमत्सोमदेवभट्ट-विरचित कथामरित्सागर के शशित्वप्रभ लम्बक का प्रथम तरंग समाप्त द्वितीय तरंग विक्रमसिंह और कुमुदिका वेश्या की कथा इस प्रकार मरुभूति द्वारा वेश्याओं के कृत्रिम प्रेम की कथा सुनाये जाने पर बुद्धिमान् गोमुख ने राजा विक्रमसिंह और कुमुदिका वेश्या की कथा इस प्रकार कही—॥१॥ प्रतिष्ठान नगर में विक्रमसिंह नाम का राजा था जिस विशाखान नाम के अनुसार पराक्रम में भी सिंह के समान बनाया था ॥२॥ उस राजा की शशिकला नाम की रानी थी जो उच्च वंश में उत्पन्न और सर्वांग सुन्दरी थी ॥३॥ एक बार अपने नगर से निष्कासित उसके पाँच दुष्ट भाई-बन्धुओ ने मिलकर उस पर किया। उन पांचों के नाम इस प्रकार थे-महाट, वीरबाहु, सुबाहु, सुभट और राजा प्रतापसिंह। (छठा स्वयं विक्रमसिंह था।) ये सभी महा बलवान् थे ॥४-५॥ जब राजा के मन्त्री उनके साथ सन्धि आदि करके उन्हें शान्त करने का यत्न कर रहे थे तभी राजा विक्रमसिंह मन्त्री के परामर्श का अनादर कर युद्ध के लिए बाहर निकल पड़ा ॥६॥ दोनों सेनाओं के बीच पत्थर की वर्षा शुरू होने पर वीरता के घमण्ड के साथ राजा स्वयं हाथी पर चढ़कर सेना में आ लगा। केवल धनुष लेकर शत्रु की सेना को कुचलते देख विक्रमसिंह के ऊपर पाँचों भ्रातृगण आदि राजा एक साथ ही टूट पड़े ॥७-८॥ शत्रुओं की भारी सेना के व्यूह में घुस जाने पर उस समय राजा विक्रमसिंह की सेना वशी में भाग निकली ॥९॥ जब उसके रथ घोड़े टूट ... नामक मन्त्री ने उससे कहा-'हमारी सेना के अन्दर बच रहें। इस समय विजय नहीं होगी ॥१०॥ ९१