भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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पृष्ठ 848

द्वादश लम्बक ७९९ तब वे अत्यन्त चकित राजकर्मचारी बोले कि 'प्रातःकाल ही चलकर उस वृक्ष का साक्ष्य (गवाही) लेंगे। तब उन्होंने दुष्टबुद्धि और धर्मबुद्धि दोनों को जमानत लेकर छोड़ दिया और वे अपने-अपने घर चले गये ॥२२३-२२४॥ दुष्टबुद्धि ने घर जाकर अपने पिता से सब सच्चा-झूठा समाचार सुनाया और कहा कि 'तुम उस वृक्ष के अन्दर बैठकर मेरा साक्षी (गवाह) बनो'॥२२५॥ 'अच्छा' इस प्रकार कहे हुए अपने पिता को ले जाकर दुष्टबुद्धि ने उस वृक्ष के खोखले में रात को ही उसे बैठा दिया और अपने घर चला आया ॥२२६॥ प्रातःकाल न्यायाधीक्षों के साथ वे दोनों भाई उस वृक्ष से जाकर पूछने लगे कि 'यहाँ से उन दीनारों को कौन ले गया? ॥२२७॥ 'उन दीनारों को धर्मबुद्धि ले गया'-ऐसा उस वृक्ष के कोटर में बैठे हुए उसके पिता ने स्पष्ट कहा। न्यायाधिकारी इस बात को असम्भव जानकर समझ गये कि दुष्टबुद्धि ने अवश्य ही इसके भीतर किसी को छिपा रखा है ॥२८२९॥ ऐसा सोचकर उन्होंने उस वृक्ष के कोटर में धूँआँ किया जिसके तीव्र होने पर उसमें निकलता हुआ दुष्टबुद्धि का पिता पृथ्वी पर गिरकर मर गया ॥३० ॥ यह देखकर न्यायाधिकारियों ने दुष्टबुद्धि से आधे दीनार धर्मबुद्धि को दिलवाये और उसका हाथ तथा जीभ काटकर वहाँ से निकाल दिया। साथ ही उस धर्मबुद्धि का उन्होंने सम्मान किया ॥२३१-३२॥ इस प्रकार अन्याय की बुद्धि से किया हुआ काम अशुभ और अनर्थफल देनेवाला होता है। इसलिए किसी भी काम को न्याय-बुद्धि से करना चाहिए। जैसा कि बगुले ने न्योले से किया ॥२३३॥ साँप और बगुले की कथा बहुत समय से वहीं पर एक साँप बगुले के घोंसले में आकर उत्पन्न हुए नवागंतुक उसके बच्चों को खा जाता था। इस कारण बगुला बहुत दुःखी था ॥२३४॥ एक मछली के कथनानुसार बगुले ने न्योले के बिल से लेकर साँप के बिल तक मछली का माँस बिखेर दिया ॥२३५॥ नेवला अगले दिन से निकलकर मछली का माँस खाते-खाते अन्धकार साँप के बिल तक चला आया और उपाय समझकर उसने साँप के बच्चों के साथ साँप को भी मार डाला ॥२३६॥