भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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षष्ठम लम्बक ८८३ इसलिए यदि तुम कहीं से भी मेरे लिए, नीले कमलों की माला न लाये तो तुम मेरे पति नहीं और मैं तुम्हारी पत्नी नहीं' ॥२२७॥ अब वह पति बेचारा नीले कमल के पुष्पों के लिए राजा के तालाब में गया। उसमें जाने पर वहाँ के रक्षकों द्वारा कौन है इस प्रकार पूछे जाने पर उसने कहा 'मैं बकवा हूँ। तब वे यह सुनकर और उसे बाँधकर प्रातःकाल राजा के पास ले गये। वहाँ राजा के पूछने पर वह बकवे की बोली में बोला। तब भी राजा से बार-बार आग्रहपूर्वक पूछे जाने पर, उसके सच्चा वृत्तान्त सुना देने पर वह दयालु राजा द्वारा छोड़ दिया गया और घर आ गया ॥२२८-२३० ॥ किसी ब्राह्मण ने एक मूर्ख वैद्य से कहा- मेरे कुबड़े पुत्र का कूबड़ अन्दर कर दे। यह सुनकर वैद्य ने उससे कहा-'मुझे शत पैसे दे। यदि यह काम न करूँ तो इसके दसगुने (सौ पैसे) तुझ दूँगा ॥२३१ २३२ ॥ इस शर्त पर ब्राह्मण से दस पैसे लेकर उसके वैद्य ने स्वेद आदि उपचार करके उस पुत्र की चिकित्सा की ॥२३३॥ लेकिन सम्भव वह उसे ठीक न कर सका और उसके दसगुने अधिक पैसे उसे उस कुबड़े के पिता को लौटाने पड़े। भला कौन व्यक्ति कुबड़े को सीधा कर सकता है। इस प्रकार, असंभव कार्य करने की प्रतिज्ञा की डींग हाँकनेवाले मूर्खों के मार्ग में बुद्धिमान् व्यक्ति को नहीं पड़ना चाहिए ॥२३४ २३५॥ प्राज्ञमुख मन्त्री गोमुख से रात्रि में यह कथा सुनकर, युवराज नरवाहनदत्त अच्छी शिक्षा से प्रसन्न होकर उस पर बहुत सन्तुष्ट हुआ ॥२३६॥ इस कथा से मनोरंजन होने के कारण शक्तियशा के लिए उत्सुक होने पर भी अपने समान वय के मित्रों के साथ नरवाहनदत्त पलंग पर लेटकर नींद में सो गया ॥२३७॥ महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के शक्तियश लम्बक का षष्ठ तरंग समाप्त सप्तम तरंग रात बीतने और प्रातःकाल होने पर, प्राणप्यारी शक्तियशा के लिए उत्सुक नरवाहनदत्त उसका ध्यान करता हुआ व्याकुल हो गया ॥१॥