भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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दशम लम्बक १९९ उसके साथ रमण करके और उसे धन देकर वह बोली—'यदि फिर कभी आयेगा तो तुझे इससे भी अधिक धन दूँगी' ॥४६॥ तब वहाँ से निकलकर, वहाँ का वृत्तान्त सुनाकर और पाया हुआ राज-धन घट को देकर उसे घर भेज दिया और स्वयं फिर राजकन्या के भवन में जा घुसा। काम और लोभ से खिंचा हुआ कौन पुरुष हानि की चिन्ता करता है ॥४७-४८॥ वहाँ वह कर्पर, रतिकर्म से थका हुआ और नशे में उन्मत्त होकर राजकुमारी के साथ ऐसा सो गया कि बीती हुई रात को भी वह न जान सका। प्रातःकाल अन्तःपुर के रक्षकों द्वारा पकड़ा जाकर राजा के सामने वह उपस्थित किया गया। राजा ने भी क्रोध से उसके वध की आज्ञा दे दी ॥४९-५०॥ जब वधिक उसे फाँसी देने के लिए ले जा रहे थे उसी समय रात को न आये हुए उसकी खोज करता हुआ घट वहाँ आ पहुँचा ॥५१॥ फाँसी पर लटकाने के लिए जाते हुए कर्पर ने अपने मित्र घट को आया हुआ देखकर अपने इंगित से कहा कि तुम राजकन्या को यहाँ से ले जाकर उसकी रक्षा करना ॥५२॥ घट ने भी अपने इंगित से उसे स्वीकृति दे दी। तब वधिकों ने उस बेचारे को शीघ्र ही फाँसी के स्थान पर ले जाकर और पेड़ पर लटकाकर मार डाला ॥५३॥ तब घट भी घर जाकर दिन-भर सोचता रहा और रात आने पर सुरंग फोड़कर राजकुमारी के भवन में घुसा ॥५४॥ वहाँ अकेली और बँधी हुई राजकुमारी को देखकर वह बोला—'मैं मारे गये कर्पर का मित्र घट हूँ। उसी के प्रेम से तुझे भगा ले जाने के लिए यहाँ आया हूँ। इसलिए, आओ। जबतक तुम्हारा पिता तुम्हारा कुछ अनिष्ट नहीं करता तबतक भाग चलें' ॥५५-५६॥ उस (घट) के ऐसा कहने पर प्रसन्न वह राजकन्या उसकी बात को मानकर भागने के लिए तैयार हो गई। घट ने भी उसके बन्धन खोल दिये ॥५७॥ तब अपना शरीर छद्मवेश किये हुई राजकन्या के साथ वह चोर, सुरंग के मार्ग से निकलकर अपने घर आ गया ॥५८॥ प्रातःकाल गड्ढे में छिपी सुरंग के मार्ग से भगाई गई अपनी कन्या का समाचार जानकर राजा ने सोचा—॥५९॥ 'अवश्य ही फाँसी पर लटकाये गये उस पापी का कोई साहसी बन्धु है जिसने इस प्रकार मेरी कन्या का अपहरण कर लिया है' ॥६०॥