भारतकोश
कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् (हिन्दी अनुवाद सहित)

कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् (हिन्दी अनुवाद सहित)

Kaushitaki Brahmana Upanishad with Hindi Translation

स्वामी महेश्वरानन्द गिरि द्वारा

स्रोत: मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली · मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished56 पृष्ठ

पृष्ठ 9, कुल 56 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 9

७ ज्ञान) रूप अप्सरायें और ब्रह्मज्ञान में वहन करने वाली नदियां होती हैं।।११।। तं ब्रह्माहाभिधावत मम यशसा विरजा वा अयं नदीं प्रपन्नवानय जिगीष्यतीति ।।१२।। ब्रह्म को जानने वाला आगे बढ़ता है, उस समय ब्रह्मा अपने सेवकों से कहता है—मेरे यश से तुम दौड़कर उससे मिलो, वह विरजा नाम की नदी को फलांग चुका है अब वह कभी भी जरा युक्त नहीं होगा ।।१२।। तं पञ्चशतान्यप्सरसां प्रतिधावन्ति शतं मालाहस्ताः शतमान्जनहस्ताः शतं चूर्णहस्ताः शतं वासोहस्ताः शतं कणाहस्तास्तं ब्रह्मालंकारेणालंकुर्वन्ति स ब्रह्मालंकारेणालंकृतो ब्रह्म विद्वान् ब्रह्मैवाभिप्रैति ।।१३।। पांच सौ अप्सरायें उसे मिलने को सामने जाती हैं। उनमें से सौ अप्सराओं के हाथों में मालाएं होती हैं, एक सौ अप्सराओं के हाथों में अंजन होता है, एक सौ अप्सराओं के हाथों में चूर्ण होता है, एक सौ अप्सराओं के हाथों में वस्त्र होता है और एक सौ अप्सराओं के हाथों में जवाहरात होते हैं। वे उसको ब्रह्म के अलंकार से सुशोभित बनाती हैं। ब्रह्म के अलंकारों से अलंकृत और ब्रह्म को जानने वाला ऐसा वह ब्रह्म के समीप जाने लगता है।।१३।। स आगच्छत्यारं हदं तन्मनसात्येति तमृत्वा संप्रतिविदो मज्जन्ति स आगच्छति मुहूर्तान्येष्टिहांस्ते ।।१४।। प्रथम वह अर नाम के सरोवर के पास आता है, मन से इस सरोवर का अतिक्रमण करता है। जो वर्तमान समय को जानते हैं वे इस सरोवर के पास आते ही उसमें डूब जाते हैं। पश्चात् वह यज्ञ की इष्टि के