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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

DevanagariSanskritpublished918 pages

औपनिषदिक नामक चौदहवें अधिकरण में अद्भुतोत्पादन नामक दूसरा अध्याय समाप्त ।

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७५० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौदहवां अधिकरण

(१) अनिष्टै रद्भुतोत्पातैः परस्योद्वेगमाचरेत् । आराज्यायेति निर्वादः समानः कोप उच्यते ॥

इति औपनिषदिके चतुर्दशेऽधिकरणे प्रलम्भनेऽद्भुतोत्पादनं नाम द्वितीयोऽध्यायः; आदितः षट्चत्वारिंशदधिकशततमः ।

—: ० :—


मरे हुए छोटे बच्चों को श्मशान भूमि में ही अभिषव करके उनके शरीर से निकली हुई चर्बी को पैर, जूते आदि में लेप करके बिना थकावट ही सौ योजन तक जाया जा सकता है ।

( १ ) इस प्रकार विजिगीषु राजा को चाहिए कि इन आश्चर्यजनक अद्भुत तथा अनिष्टकारक उत्पातों से वह अपने शत्रु को अच्छी तरह बेचैन करे । यद्यपि इस प्रकार का व्यापार अनिष्टकारी, और कलंकित कर देने वाला होता है, फिर भी पारस्परिक वैमनस्य बढ़ जाने के कारण, उसको उपयोग में लाना ही पड़ता है । इसलिए यहाँ पर इसका निरूपण किया गया ।

औपनिषदिक नामक चौदहवें अधिकरण में अद्भुतोत्पादन नामक दूसरा अध्याय समाप्त ।

—: ० :—

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प्रकरण १७८ | # प्रलम्भने भैषज्यमन्त्रप्रयोगः अध्याय ३ |


(१) मार्जारोष्ट्रवृकवराहश्वाविद्वागुलीनप्तृकाकोलुकानामन्येषां वा निशाचराणां सत्त्वानामेकस्य द्वयोर्बहूनां वा दक्षिणानि वामानि वाक्षीणि गृहीत्वा द्विधा चूर्णं कारयेत् । ततो दक्षिणं वामेन वामं दक्षिणेन समभ्यज्य रात्रौ तमसि च पश्यति । (२) एकाम्लकं वराहाक्षि खद्योतः कालशारिबा । एतेनाभ्यक्तनयनो रात्रौ रूपाणि पश्यति ॥ (३) त्रिरात्रोपोषितः पुष्ये शस्त्रहतस्य शूलप्रोतस्य वा पुंसः शिरः-कपाले मृत्तिकायां यवानावाप्याविक्षीरेण सेचयेत्, ततो यवविरूढमालामा-बध्य नष्टच्छायारूपश्चरति । (४) त्रिरात्रोपोषितः पुष्येण श्वमार्जारोलूकवागुलीनां दक्षिणानि वामानि चाक्षीणि द्विधा चूर्णं कारयेत् । ततो यथास्वमभ्यक्ताक्षो नष्ट-च्छायारूपश्चरति ।


प्रलम्भन योग में औषधि तथा मंत्र का प्रयोग

( १ ) रात में घूमनेवाले : बिल्ली, ऊँट, भेड़िया, सूअर, साही, बागुली, नप्ता, कौआ और उल्लू अथवा रात्रि में विचरण करने वाले इसी प्रकार के दूसरे प्राणी, इनमें से एक, दो या अनेकों की दोनों आँखों को निकाल कर उनका अलग-अलग चूर्ण बनाया जाय । तदनन्तर बाईं आँखों से बना चूर्ण दाईं आँख पर और दाईं आँख से बना चूर्ण बाईं आँख पर अञ्जन कर देने से मनुष्य भी रात के समय घोर अंधकार में प्रत्येक वस्तु को देख सकता है ।

( २ ) एक बड़हल ( अम्ल क ), सूअर की आंख, जुगूनू और काली शारिवा नामक औषधि को एक साथ मिलाकर आंख में लगाने से रात में सभी चीजें दिखाई देती हैं ।

( ३ ) तीन रात तक उपवास करने वाला व्यक्ति पुष्य नक्षत्र में हथियार से मारे हुए अथवा फाँसी पर चढ़ाये गये आदमी की खोपड़ी में मिट्टी भर कर उसमें जौ बो दे और उसको भेंड़ के दूध से सींचता जाय । जब वे जौ उग आते हैं तब उनकी माला पहिन कर चलने वाले व्यक्ति की न तो छाया दिखाई देती है और न रूप ही ।

( ४ ) अथवा तीन रात तक उपवास करने वाला व्यक्ति पुष्य नक्षत्र में कुत्ता,

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७५२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौदहवां अधिकरण

(१) त्रिरात्रोपोषितः पुष्येण पुरुषघातिनः काण्डकस्य शलाकामञ्जनीं च कारयेत्, ततोऽन्यतमेनाक्षिचूर्णेनाभ्यक्ताक्षो नष्टच्छायारूपश्चरति । (२) त्रिरात्रोपोषितः पुष्येण कालायसीमाञ्जनीं शलाकां च कारयेत्; ततो निशाचराणां सत्त्वानामन्यतमस्य शिरःकपालमञ्जनेन पूरयित्वा मृतायाः स्त्रिया योनौ प्रवेश्य दाहयेत्; तदञ्जनं पुष्येणोद्धृत्य तस्यामञ्जन्यां निदध्यात् । तेनाभ्यक्ताक्षो नष्टच्छायारूपश्चरति । (३) यत्र ब्राह्मणमाहिताग्निं दग्धं दह्यमानं वा पश्येत्, तत्र त्रिरात्रोपोषितः पुष्येण स्वयम्मृतस्य वाससा प्रसेवं कृत्वा चिताभस्मना पूरयित्वा तमाबध्य नष्टच्छायारूपश्चरति । (४) ब्राह्मणस्य प्रेतकार्ये या गौर्मार्यते, तस्या अस्थिमज्जाचूर्णपूर्णाऽहिभस्त्रा पशूनामन्तर्धानम् ।


बिल्ली, उल्लू और बागुली इन चारों जानवरों की दोनों आंखों का अलग-अलग चूर्ण बनाये । तदनन्तर दाईं आंखों से बने चूर्ण को दाईं आंख पर और बाईं आंखों से बने चूर्ण को बाईं आंख पर लगाने वाले व्यक्ति की छाया और काया नहीं दिखाई देती है ।

( १ ) अथवा तीन रात तक उपवास करने के बाद पुष्य नक्षत्र में जिस बाण से कोई व्यक्ति मारा गया हो उसी वाण के लोहे की एक सलाई और सुरमादानी बनवा कर कुत्ता, बिल्ली, उल्लू और बागुली इनमें से किसी की भी दाईं-बाईं आँख का अलग-अलग चूर्ण बनाकर उसी सलाई तथा सुरमादानी के द्वारा आँखों में लगाने वाला पुरुष रूप तथा छाया से रहित होकर विचरण कर सकता है ।

( २ ) अथवा तीन रात तक उपवास करने के बाद पुष्य नक्षत्र में फौलाद के लोहे की सुरमादानी-सलाई बना दी जाय और रात में घूमने वाले किसी भी जानवर की खोपड़ी को अञ्जन से भरकर उसे किसी मरी हुई स्त्री की योनि में डाल कर जला दिया जाय । तदनन्तर पुष्य नक्षत्र में उस अञ्जन को उक्त लोहे की सुरमादानी में भर दिया जाय और उसी सलाई से उस अंजन को आँखों में लगाने से भी रूप तथा छाया से रहित होकर विचरण किया जा सकता है ।

( ३ ) अथवा जहाँ पर कोई अग्निहोत्री ब्राह्मण जलाया गया हो या जलाया जा रहा हो, उस स्थान पर तीन रात तक उपवास करने के बाद पुष्य नक्षत्र में अपनी मृत्यु से मरे हुए किसी व्यक्ति के वस्त्र से एक थैली बनाकर उसमें उसी मनुष्य की चिता की राख भर दी जाय और उस पोटली को अपने किसी अंग पर बाँध दिया जाय, ऐसा करने से वह पुरुष छाया-रूप से रहित यथेच्छ कहीं भी विचरण कर सकता है ।

( ४ ) ब्राह्मण के श्राद्धकार्य में जो गाय मारी जाय उसकी हड्डी और मज्जा

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प्र० १७८ : अ० ३ ] भैषज्यमन्त्रप्रयोग ७५३

(१) सर्पदष्टस्य भस्मना पूर्णा प्रचलाकभस्त्रा मृगाणामन्तर्धानम् ।
(२) उलूकबागुलीपुच्छपुरीषजान्वस्थिचूर्णपूर्णाऽहिभस्त्रा पक्षिणामन्तर्धानम् ।
(३) इत्यष्टावन्तर्धानयोगाः ।
(४) बलिं वैरोचनं वन्दे शतमायं च शम्बरम् ।
भण्डीरपाकं नरकं निकुम्भं कुम्भमेव च ॥
देवशं नारदं वन्दे वन्दे सावणिगालवम् ।
एतेषामनुयोगेन कृतं ते स्वापनं महत् ॥
यथा स्वपन्त्यजगराः स्वपन्त्यपि चमूखलाः ।
तथा स्वपन्तु पुरुषा ये च ग्रामे कुतूहलाः ॥
भण्डकानां सहस्रेण रथनेमिशतेन च ।
इमं गृहं प्रवेक्ष्यामि तूष्णीमासन्तु भाण्डकाः ॥
नमस्कृत्वा च मनवे बद्ध्वा शूनकफेलकाः ।
ये देवा देवलोकेषु मानुषेषु च ब्राह्मणाः ॥
अध्ययनपारगाः सिद्धा ये च कैलासतापसाः ।
एते च सर्वसिद्धेभ्यः कृतं ते स्वापनं महत् ॥
अतिगच्छति च मय्यपगच्छन्तु संहताः ।
अलिते वलिते मनवे स्वाहा ॥
(५) एतस्य प्रयोगः—त्रिरात्रोपोषितः कृष्णचतुर्दश्यां पुष्ययोगिन्यां


के चूर्ण से भरी हुई साँप की केंचुल को यदि किसी पशु पर बाँध दिया जाय तो उसको भी कोई नहीं देख पाता है ।

(१) यदि सर्प से कटे हुए किसी जानवर की राख को मोरपेंच की बनी हुई थैली में भर दिया जाय और वह थैली किसी जंगली जानवर के अङ्ग पर बाँध दी जाय तो वह जानवर दृष्टि से अन्तर्धान हो जाता है ।

(२) यदि उल्लू तथा बागुली दोनों की पूँछ, विष्ठा, टाँग और हड्डियों के चूर्ण को साँप की केंचुल में भर दिया जाय तो वह सभी पक्षियों के अंतर्धान का योग है ।

(३) यहाँ तक अंतर्धान होने के संबंध में आठ प्रकार के योगों का निरूपण किया गया है ।

(४) प्रस्वापन मंत्र : ( 'बलिं वैरोचनम्' आदि ये जो मंत्र दिये गये हैं इनका संबंध आगे बताये गये चार प्रकार के प्रस्वापन ( सबको सुला देने वाले ) योगों से है । अर्थ की दृष्टि से ये मंत्र सर्वथा सुबोध हैं और अर्थ की अपेक्षा उनका उपयोग उनके मूलपाठ में ही है ।

(५) उक्त मंत्रों के प्रयोग का प्रकार : तीन रात तक उपवास करने के

४८ कौ०

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७५४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौदहवां अधिकरण

श्वपाकीहस्ताद्बिलखावलेखनं क्रीणीयात् । तन्माषैः सह कण्डोलिकायां कृत्वा असङ्कीर्ण आदहने निखानयेत् । द्वितीयस्यां चतुर्दश्यामुद्धृत्य कुमार्या पेषयित्वा गुलिकाः कारयेत् । तत एकां गुलिकामभिमन्त्रयित्वा यत्रैतेन मन्त्रेण क्षिपति, तत्सर्वं प्रस्वापयति ।

(१) एतेनैव कल्पेन श्वाविधः शल्यकं त्रिकालं त्रिश्वेतमसङ्कीर्ण आदहने निखानयेत् । द्वितीयस्यां चतुर्दश्यामुद्धृत्यादहनभस्मना सह यत्रैतेन मन्त्रेण क्षिपति, तत्सर्वं प्रस्वापयति ।

सुवर्णपुष्पीं ब्रह्माणीं ब्रह्माणं च कुशध्वजम् । सर्वांश्च देवता वन्दे वन्दे सर्वांश्च तापसान् ॥ वशं मे ब्राह्मणा यान्तु भूमिपालाश्च क्षत्रियाः । वशं वैश्याश्च शूद्राश्च वशतां यान्तु मे सदा । स्वाहा । अमिले किमिले वसुजारे प्रयोगे फक्के वयुद्धे विहाले दन्त-कटके स्वाहा । सुखं स्वपन्तु शुनका ये च ग्रामे कुतूहलाः । श्वाविधः शल्यकं चैतत्त्रिश्वेतं ब्रह्मनिर्मितम् ॥ प्रसुप्ताः सर्वसिद्धा हि एतत्ते स्वापनं कृतम् । यावद् ग्रामस्य सीमान्तः सूर्यस्योद्गमनादिति ॥ स्वाहा ।

(२) एतस्य प्रयोगः—श्वाविधः शल्यकानि त्रिश्वेतानि । सप्तरात्रो- पोषितः कृष्णचतुर्दश्यां खादिराभिः समिधाभिरग्निमेतेन मन्त्रेणाष्टशत-


बाद कृष्ण पक्ष के पुष्य नक्षत्र में किसी चण्डाल की स्त्री के हाथ से चूहे का एक टुकड़ा खरीद लिया जाय । उसको उड़दों के साथ एक डिब्बे में बन्द कर किसी खुले श्मशान में गढ़ा खोदकर उसमें गाड़ दिया जाय । अगली चतुर्दशी को उस डिब्बे को गढ़े से निकाल कर किसी कुमारी के द्वारा उसको पिसवा दिया जाय और उस चूर्ण की गोलियां बना दी जांय । उसके बाद एक-एक गोली को उक्त मंत्रों से अभिमंत्रित कर जिस स्थान पर फेंक दिया जाय उस स्थान के सभी प्राणी सो जाते हैं । यह पहिला योग है ।

(१) ऊपर बताये नियम के अनुसार किसी चाण्डालिनी के हाथ से साही के ऐसे कांटे खरीदे जांय, जो तीन जगह से सफेद और तीन जगह से काले हों । उन कांटों को पूर्ववत् किसी खुले श्मशान में गाड़ दिया जाय । १५ दिन के बाद अगली चतुर्दशी को उसे उखाड़ कर श्मशान की राख के साथ उपर्युक्त मंत्रों से अभिमंत्रित करके जिस स्थान पर वह कांटा फेंका जायेगा वहाँ के सभी प्राणी सो जायेंगे । यह दूसरा योग है । तीसरे प्रस्वापन योग के लिए 'सुवर्णपुष्पीं' आदि मंत्रों का विधान है—

(२) प्रयोग-विधि : पूर्वोक्त विधि के अनुसार तीन स्थानों से सफेद साही के

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प्र० १७८ : अ० ३ ] भैषज्यमन्त्रप्रयोग ७५५

सम्पातं कृत्वा मधुघृताभ्यामभिजुहुयात् । तत एकमेतेन मन्त्रेण ग्रामद्वारि गृहद्वारि वा यत्र निखन्यते, तत्सर्वं प्रस्वापयति ।

बलिं वैरोचनं वन्दे शतमायं च शम्बरम् ।
निकुम्भं नरकं कुम्भं तन्तुकच्छं महासुरम् ॥
अर्मालवं प्रमीलं च मण्डोलूकं घटोबलम् ।
कृष्णकंसोपचारं च पौलोमीं च यशस्विनीम् ॥
अभिमन्त्रयित्वा गृह्णामि सिद्धार्थं शवशारिकाम् ।
जयतु जयति च नमः शलकभूतेभ्यः स्वाहा ।
सुखं स्वपन्तु शुनका ये च ग्रामे कुतूहलाः ।
सुखं स्वपन्तु सिद्धार्थं यमर्थं मार्गयामहे ॥
यावदस्तमयादुदयो यावदर्थं फलं मम ॥ इति स्वाहा ।

**(१) एतस्य प्रयोगः—**चतुर्भक्तोपवासी कृष्णचतुर्दश्याम सङ्कीर्ण आदहने बलिं कृत्वा एतेन मन्त्रेण शवशारिकां गृहीत्वा पोत्रीपोट्टलिकां बध्नीयात् । तन्मध्ये श्वाविधः शल्यकेन विद्ध्वा यत्रैतेन मन्त्रेण निखन्यते, तत्सर्वं प्रस्वापयति ।

(२) उपैमि शरणं चार्गिण दैवतानि दिशो दश ।
अपयान्तु च सर्वाणि वशतां यान्तु मे सदा ॥ स्वाहा ।

**(३) एतस्य प्रयोगः—**त्रिरात्रोपोषितः पुष्येण शर्करा एकविंशति-


कांटों को श्मशान भूमि में गाड़ दिया जाय । तदनन्तर सात रात्रि तक उपवास रखने के बाद कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को खैर आदि की समिधाओं से उक्त मंत्रों द्वारा शहद तथा घी मिलाकर उससे १०८ बार अग्नि में हवन किया जाय । उसके बाद श्मशान में गड़े हुए उन कांटों को उखाड़ कर उनको उक्त मंत्रों द्वारा अभिमंत्रित कर घर, गाँव या दरवाजा, जहाँ पर भी गाड़ दिया जाता है वहाँ के सब लोग निद्राग्रस्त हो जाते हैं । यह तीसरा योग है । चौथे प्रस्वापन योग के लिए ‘बलिं वैरोचनम्’ आदि मंत्रों का उपयोग किया जाय ।

(१) प्रयोग-विधि : चार रात तक उपवास करने के बाद कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को खुले हुए श्मशान के मैदान में पशुबलि देकर एक मरी हुई मैना को कपड़े की पोटली में बाँध लिया जाय । उसके बीच में साही का एक काँटा छेद कर उपर्युक्त मंत्र को पढ़ते हुए उस पोटली को जिस स्थान में भी गाड़ दिया जाय वहीं के सब प्राणी सो जायेंगे । यह चौथा योग है ।

( २ ) द्वार खोलने का मंत्र : बंद दरवाजा खोलने के लिए ‘उपैमि शरणम्’ आदि मंत्र का प्रयोग किया जाय ।

( ३ ) प्रयोग-विधि : तीन रात तक उपवास करने के बाद पुष्य नक्षत्र काल

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७५६कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ चौदहवां अधिकरण

सम्पातं कृत्वा मधुघृताभ्यामभिजुहुयात् । ततो गन्धमाल्येन पूजयित्वा निखानयेत् । द्वितीयेन पुष्येणोद्धृत्यैकां शर्करामभिमन्त्रयित्वा कवाटमाहन्यात् । अभ्यन्तरं चतसृणां शर्कराणां द्वारमपाव्रियते । (१) चतुर्थभक्तोपवासी कृष्णचतुर्दश्यां भग्नस्य पुरुषस्यास्थ्ना ऋषभं कारयेत्; अभिमन्त्रयेच्चैतेन, द्विगोयुक्तं गोयानमाहृतं भवति; ततः परमाकाशे विक्रामति । (२) सदा रविरविः सगण्डपरिघाति सवं भणाति । चण्डालीकुम्भोत्तम्बकटुकसारीघः सनारीभगोऽसि स्वाहा । (३) तालोद्घाटनं प्रस्वापनं च । (४) त्रिरात्रोपोषितः पुष्येण शस्त्रहतस्य शूलप्रोतस्य वा पुंसः शिरःकपाले मृत्तिकायां तुवरीरावास्योदकेन सेचयेत् । जातानां पुष्येणैव गृहीत्वा रज्जुकां वर्तयेत् । ततः सज्ज्यानां धनुषां यन्त्राणां च पुरस्ताच्छेदनं ज्याच्छेदनं करोति ।


में बहुत-सी खोपड़ियों या कंकड़ियों को लेकर उनके ऊपर अग्नि में शहद और घी से इक्कीस वार आहुति डाल कर हवन किया जाय । उसके बाद गंधमाल्य से उनकी पूजा करके एक गढा खोद कर उसमें उन्हें गाड़ दिया जाय । दूसरे पुष्य नक्षत्र में उन्हें उखाड़ कर उनमें से एक कंकड़ी को उपर्युक्त मन्त्र द्वारा अभिमंत्रित करके बंद दरवाजे पर मार दिया जाय । उसके मारने से चार कंकड़ी के बराबर किवाड़ में छेद हो जायेगा । इसी प्रकार सारे दरवाजे पर छेद करके उसको तोड़ा या खोला जा सकता है ।

( १ ) चार रात तक उपवास करने के बाद कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को किसी पुरुष की टूटी हुई हड्डी पर बैल की मूर्ति बनायी जाय । तदनन्तर उपर्युक्त विधि एवं उपर्युक्त मंत्र के द्वारा होम-पूजा आदि करके उस मूर्ति को अभिमंत्रित किया जाय । ऐसा करने से दो बैलों से जुती हुई गाड़ी वहाँ उपस्थित हो जाती है । उसके द्वारा वह साधक आकाश या पृथ्वी पर कहीं भी घूम सकता है ।

( २ ) ताला तोड़ने तथा सुला देने का मंत्र : 'सदा रविरविः' आदि मंत्र के प्रयोग की वही विधि है, जो दरवाजा खोलने वाले मंत्र के प्रसंग में बतायी गयी है ।

( ३ ) उक्त मंत्र को विधिवत् सिद्ध करके ताला तोड़ा जा सकता है और सुलाया भी जा सकता है ।

( ४ ) धनुष की डोरी काटने का प्रयोग : तीन रात तक उपवास करने के बाद पुष्यनक्षत्र काल में किसी ऐसे पुरुष की खोपड़ी में, जो हथियार से मारा गया हो या शूली पर चढ़ाया गया हो, मिट्टी भर कर उसमें तोर या अरहर बो

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प्र० १७८ : अ० ३ ] भैषज्यमन्त्रप्रयोग ७५७

(१) उदकाहिभस्त्रामुच्छ्वासमृत्तिकया स्त्रियाः पुरुषस्य वा पूरयेत्, नासिकाबन्धनं मुखग्रहश्च ।

(२) वराहवस्तिमुच्छ्वासमृत्तिकया पूरयित्वा मर्कटस्नायुनावबध्नीयाद्, आनाहकारणम् ।

(३) कृष्णचतुर्दश्यां शस्त्रहताया गोः कपिलायाः पित्तेन राजवृक्षमयीममित्रप्रतिमामञ्जयात्, अन्धीकरणम् ।

(४) चतुर्भक्तोपवासी कृष्णचतुर्दश्यां बलिं कृत्वा शूलप्रोतस्य पुरुषस्यास्थ्ना कीलकान्कारयेत् । एतेषामेकः पुरीषे मूत्रे वा निखात आनाहं करोति; पादेऽस्यासने वा निखातः शोषेण मारयति; आपणे क्षेत्रे गृहे वा वृत्तिच्छेदं करोति ।

(५) एतेन कल्पेन विद्युद्दग्धस्य वृक्षस्य कीलका व्याख्याताः ।


दिया जाय और उसको जल से निरंतर सींचा जाय । जब उसमें अंकुर निकल आयें तो दूसरे पुष्यनक्षत्र काल में उसको उखाड़ कर उसकी रस्सी बनवाई जाय । उस रस्सी के द्वारा धनुष की डोरी और यंत्रों का भी छेदन किया जा सकता है ।

( १ ) जल में रहने वाले सांप की केंचुल को किसी स्त्री या पुरुष की चिता के ऊपर की मिट्टी से भर लिया जाय । यह योग जिस पर भी प्रयोग किया जाय उसका मुँह और नाक बंद हो जाते हैं ।

( २ ) इसी तरह सूअर की आंत में चिता के ऊपर की मिट्टी भर कर उसे किसी बन्दर की नाड़ी से बाँध दिया जाय तो उस योग के प्रयोग से पाखाना रुका रह जाता है ।

( ३ ) यदि कृष्ण चतुर्दशी की तिथि में हथियार से मारी गयी कपिला के पित्ते को अमलतास की शलाका से शत्रु की प्रतिमा की आंखों पर अंजन की तरह लगाया जाय तो शत्रु अंधा हो जाता है ।

( ४ ) चार रात तक उपवास करने के बाद कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी में विधिपूर्वक बलि देकर फांसी से मरे हुए किसी आदमी की हड्डी से बहुत-सी कीलें बनवायी जाँय । उनमें से एक कील को जिसके भी पेशाब या पाखाने में गाड़ दिया जाता है उसका पाखाना-पेशाब बंद हो जाता है । यदि किसी के जूते या आसन में इस कील को गाड़ दिया जाय तो वह व्यक्ति सूख-सूख कर मर जाता है । जिसकी दूकान, खेत या घर में यह कील गाड़ दी जाय उसकी आजीविका नष्ट हो जाती है ।

( ५ ) इसी प्रकार वज्र पड़े पेड़ की लकड़ी से बनाई गई कीलों के सम्बन्ध में भी समझना चाहिए ।

७५८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौदहवां अधिकरण

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७५८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौदहवां अधिकरण

(१) पुनर्नवमवाचीनं निम्बः काकमधुश्च यः। कपिरोम मनुष्यास्थि बद्ध्वा मृतकवाससा ॥ निखन्यते गृहे यस्य पिष्ट्वा वा यं प्रपाययेत् । सपुत्रदारः सधनस्त्रीन्पक्षान्नातिवर्तते ॥ (२) पुनर्नवमवाचीनं निम्बः काकमधुश्च यः। स्वयंगुप्ता मनुष्यास्थि पदे यस्य निखन्यते ॥ द्वारे गृहस्य सेनाया ग्रामस्य नगरस्य वा। सपुत्रदारः सधनस्त्रीन् पक्षान्नातिवर्तते ॥ (३) अजमर्कटरोमाणि मार्जारनकुलस्य च। ब्राह्मणानां श्वपाकानां काकोलूकस्य चाहरेत् ॥ एतेन विष्ठावक्षुण्णा सद्य उत्सादनकारिका। (४) प्रेतनिर्मालिका किण्वं रोमाणि नकुलस्य च ॥ वृश्चिकाल्यहिकृत्तिश्च पदे यस्य निखन्यते। भवत्यपुरुषः सद्यो यावत्तन्नापनीयते ॥ (५) त्रिरात्रोपोषितः पुष्येण शस्त्रहतस्य शूलप्रोतस्य वा पुंसः शिरः- कपाले मृत्तिकायां गुञ्जा आवास्योदकेन च सेचयेत्। जातानाममावास्यायां

(१) दक्षिण की ओर पैदा होने वाला पुनर्नवा तथा जिसका फल कौओं के लिए स्वादुकर होता है, ऐसा काकमधु, नीम, बन्दर के बाल और मनुष्य की हड्डी, इन सबको मरे हुए आदमी के कपड़े में बाँध कर जिसके घर में गाड़ दिया जाता है अथवा जिसको पीस कर पिला दिया जाता है वह पुरुष डेढ़ मास के भीतर ही समस्त धन-जन के सहित विनष्ट हो जाता है।

(२) दक्षिण की ओर पैदा होने वाला पुनर्नवा, काकमधु, नीम, धमासा (स्वयंगुप्ता) और मनुष्य की हड्डी, इन सबको जिसके घर, सेना, गाँव, नगर या दरवाजे पर गाड़ दिया जाता है वह व्यक्ति डेढ़ मास के भीतर समस्त जन-धन के सहित विनष्ट हो जाता है।

(३) बकरा, बन्दर, बिल्ली, नेवला, ब्राह्मण, चाण्डाल, कौआ और उल्लू, इन सबके बालों को इकट्ठा करके तथा जिसको मारना हो उसका पाखाना इन बालों के साथ मिलाकर उसका स्पर्श कराते ही उस व्यक्ति की तत्काल मृत्यु हो जाती है।

(४) मुर्दे पर डाली गई माला, सुराबीज और नेवले के बाल इन सबको यदि बिच्छू, भौंरा और सांप, इन तीनों की खाल के साथ मिलाकर किसी के स्थान पर गाड़ दिया जाय तो वह पुरुष तब तक नपुंसक बना रहता है, जब तक कि उसके स्थान से उन गड़ी हुई चीजों को न निकाला जाय।

(५) तीन रात तक उपवास करने के बाद पुष्य नक्षत्र में हथियार से मारे हुए

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प्र० १७८ : अ० ३ ] भैषज्यमन्त्रप्रयोग ७५९

पौर्णमास्यां वा पुष्ययोगिन्यां गुञ्जावल्लीर्ग्राहयित्वा मण्डलकानि कारयेत् । तेष्वन्नपानभाजनानि न्यस्तानि न क्षीयन्ते ।

(१) रात्रिप्रेक्षायां प्रवृत्तायां प्रदीपाग्निषु मृतधेनोः स्तानानुत्कृत्य दाहयेत् । दग्धान् वृषमूत्रेण पेषयित्वा नवकुम्भमन्तर्लेपयेत्; तं ग्राममपसव्यं परिणीय तत्र न्यस्तं नवनीतमेषां तत्सर्वमागच्छतीति ।

(२) कृष्णचतुर्दश्यां पुष्ययोगिन्यां शुनो लग्नकस्य योनौ कालायसीं मुद्रिकां प्रेषयेत्; तां स्वयं पतितां गृह्णीयात्; तया वृक्षफलान्याकारितान्यागच्छन्ति ।

(३) मन्त्रभैषज्यसंयुक्ता योगा मायाकृताश्च ये । उपहन्यादमित्रांस्तैः स्वजनं चाभिपालयेत् ॥

इति औपनिषदिके चतुर्दशेऽधिकरणे प्रलम्भने भैषज्यमन्त्रप्रयोगो नाम तृतीयोऽध्यायः; आदितः सप्तचत्वारिंशदधिकशततमः ।

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या फांसी लगे व्यक्ति की खोपड़ी में मिट्टी भर कर उसमें रत्ती ( गुंजा ) बो दिये जांय और उन्हें निरंतर सींचा जाय । जब उसमें लताएँ निकल आवें तब पुष्य नक्षत्र की अमावस्या या पूर्णमासी को उन गुंजा की बेलों को उखाड़ कर उनका गोल घेरा बना दिया जाय । उस घेरे के बीच में रखी हुई खाने-पीने की सामग्री कभी खतम ही नहीं होती है ।

( १ ) रात में जिस समय कोई तमाशा हो रहा हो तब, मशाल की आग से मरी हुई गाय के झुलसे हुए थनों को काट कर उन्हें बैल के पेशाब के साथ पीसने के बाद एक कोरे घड़े के भीतर चारों ओर लीप दिया जाय । उस घड़े को बाईं ओर से गाँव की परिक्रमा करा के जिस जगह पर रखा जाय, गाँव भर का सारा मक्खन उस घड़े में खिंचा चला आता है ।

( २ ) पुष्य नक्षत्र की कृष्ण चतुर्दशी में किसी कामासक्त कुतिया की योनि में लोहे की एक अंगूठी लगा दी जाय और जब वह अंगूठी अपने आप गिर पड़े तो उसे ले लिया जाय । उसके बाद उस अंगूठी के द्वारा जिस पेड़ का फल बुलाना हो फौरन अपने पास चला आता है ।

( ३ ) मंत्र, ओषधि और माया से युक्त ऊपर जिन योगों का निरूपण किया गया है, उनसे शत्रु का नाश और स्वजनों का उपकार करना चाहिए ।

औपनिषदिक नामक चौदहवें अधिकरण में भैषज्यमन्त्रप्रयोग नामक तीसरा अध्याय समाप्त ।

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प्रकरण १७९स्वबलोपघातप्रतीकारः
अध्याय ४

(१) स्वपक्षे परप्रयुक्तानां दूषिविषगराणां प्रतीकारे श्लेष्मातककपित्थदन्तिदन्तशठगोजीशिरीषपाटलीबलास्योनाकपुनर्नवाश्वेतावरणक्वाथयुक्तं चन्दनसालावृकीलोहितयुक्तं तेजनोदकं राजोपभोग्यानां गुह्यप्रक्षालनं स्त्रीणां सेनायाश्च विषप्रतीकारः ।

(२) पृषतनकुलनीलकण्ठगोधापित्तयुक्तं मषीराजिचूर्णं सिन्दुवारितवरणवारणीतण्डुलीयकशत्पर्वाग्रपिण्डीतकयोगो मदनदोषहरः ।

(३) शृगालविन्नामदनसिन्दुवारितवरणवारणवल्लीमूलकषायाणामन्यतमस्य समस्तानां वा क्षीरयुक्तं पानं मदनदोषहरम् ।


शत्रु द्वारा किये गये घातक प्रयोगों का प्रतीकार

( १ ) शत्रु द्वारा किये गये दूषक तथा विष आदि के घातक प्रयोगों का प्रतीकार इस प्रकार करना चाहिए : लहसोड़ा ( श्लेष्मातक ), कैथा ( कपित्थ ), जमालघोटा ( दंती ); जम्भीरी नीबू ( दंतशठ ), गोभी ( गोजी ); सिरस ( शिरीष ), काली पाढरी या पाटल ( पाटली ), खरैंटी ( बला ), सोनापाठा ( स्योनाक ); पुनर्नवा, शराव और वरनावृक्ष का काढ़ा बना कर चंदन, सालावृकी ( बंदरिया या सियारिन या कुतिया ) के खून से सानकर बांस के पानी ( तेजनोदक ) से राजा के उपयोग में आने वाली स्त्रियों की योनि, स्तन आदि गुप्तांगों को साफ कराया जाय और सेना में प्रयुक्त विष का प्रतीकार किया जाय ।

( २ ) दागीमृग ( पृषतन ), नेवला, मोर और गोह के पित्ते को काले संभालू ( मषी ) तथा राई के चूर्ण में मिलाकर बनाये गये योग से पागल बना देने वाले विषों का प्रतीकार किया जाय । संभालू, बरना, दूब ( बारुणी ), चौलाई, बाँस का अग्रभाग ( शतपर्वाग्र ) और मैनफल, इन सब चीजों का योग भी उन्मादजन्य दोषों का उपशमन करने वाला होता है ।

( ३ ) शृगालविन्ना औषधि, धतूरा ( मदन ), संभालू ( सिंधुवारित ), बरना ( वरण ) और गजपीपल ( वारणवल्लीमूल ) इन सबकी जड़ों को मिलाकर अथवा उनका अलग-अलग काढा, दूध के साथ पीने से उन्माद पैदा करने वाले विषयोगों को शांत कर देता है ।

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प्र० १७९ : अ० ४ ] घातक प्रयोगों का प्रतीकार ७६१

( १ ) कैडर्यपूतिलतैलमुन्मादहरं नस्तःकर्म । ( २ ) प्रियङ्गुनक्तमालयोगः कुष्ठहरः । ( ३ ) कुष्ठलोध्रयोगः पाकशोषण्नः । ( ४ ) कट्फलद्रवन्तीविलङ्गचूर्णं नस्तःकर्म शिरोरोगहरम् । ( ५ ) प्रियङ्गुमञ्जिष्ठातगरलाक्षारसमधुकहरिद्राक्षौद्रयोगो रज्जूदक-विषप्रहारपतननिःसंज्ञानां पुनःप्रत्यानयनाय । ( ६ ) मनुष्याणामक्षमात्रं, गवाश्वानां द्विगुणं, चतुर्गुणं हस्त्युष्ट्राणाम् । ( ७ ) रुक्मगर्भश्चैषां मणिः सर्वविषहरः । ( ८ ) जीवन्तीश्वेतामुष्ककपुष्पवन्दाकानामक्षीबे जातस्य अश्वत्थस्य मणिः सर्वविषहरः ।


( १ ) कायफल ( कैडर्य ), कांटेदार कंजरुआ ( पूति ) और तिल इन तीनों के तेल को नासिका में डालने से उन्माद शांत हो जाता है ।

( २ ) मेंहदी या कांगनी ( प्रियंगु ) और करंज ( नक्तमाल ), इन दोनों का योग कुष्ठ-रोग को दूर कर देता है ।

( ३ ) कूट और लोध से बनाया गया योग पाकरोग ( बाल आदि का पकना ) और क्षयरोग को दूर कर देता है ।

( ४ ) कायफल ( कट्फल ), मूषकपर्णी ( द्रवंत्ती ) और बायविडंग ( विडंग ), इन तीनों के चूर्ण को नासिका में डालने से शिर के समस्त रोग दूर हो जाते हैं ।

( ५ ) प्रियंगु, मजीठ, तगर; लाख, महुआ, हल्दी और शहद इन सब चीजों का चूर्णयोग रस्सी, दूषित जल, विष, चोट तथा गिर जाने से हुई बेहोशी को दूर करने में लाभदायक है ।

( ६ ) प्रतीकार के लिए दी जाने वाली उक्त औषधियों की मात्रा मनुष्यों के लिए एक अक्ष ( सोलह माष ), गाय तथा घोड़ों को उससे दुगुनी और हाथी तथा ऊँटों को उससे चौगुनी देनी चाहिए ।

( ७ ) बेहोशी को दूर करने वाला जो योग ऊपर बताया गया है उसको यदि सोने के पत्तर में रखकर उसका तावीज बनाकर धारण किया जाय तो किसी भी प्रकार का विष असर नहीं करने पाता है ।

( ८ ) गिलोय ( जीवन्ती ), सफेद संभालू, काली पाढ़री, पुष्प ( औषधि ) और अमरवेल ( बन्दा ), इन सब को मणि ( ताबीज ); अथवा सहिजन या नीम के पेड़ में पैदा हुए पीपल के पत्ते को ताबीज में रख कर बाँध दिया जाय तो सभी प्रकार के विष शांत हो जाते हैं ।

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७६२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौदहवां अधिकरण

(१) तूर्याणां तैः प्रलिप्तानां शब्दो विषविनाशनः ।
लिप्तध्वजं पताकां वा दृष्ट्वा भवति निर्विषः ॥
(२) एतैः कृत्वा प्रतीकारं स्वसैन्यानामथात्मनः ।
अमित्रेषु प्रयुञ्जीत विषधूमाम्बुदूषणान् ॥

इति औपनिषदिके चतुर्दशेऽधिकरणे स्वबलोपघातप्रतीकारो नाम चतुर्थोऽध्यायः; आदितोऽष्टचत्वारिंशदुत्तरशततमः ।
समाप्तमिदमौपनिषदिकं चतुर्दशमधिकरणम् ।
—: ० :—


(१) गिलोय आदि औषधियों से चुपड़े गये वाद्यों का शब्द विष को नष्ट करने वाला होता है । इसी प्रकार इन्हीं औषधियों से लिप्त ध्वजाओं को देखकर भी विष का प्रभाव जाता रहता है ।

(२) विजिगीषु राजा को चाहिए कि उक्त सभी प्रकार की औषधियों द्वारा वह अपनी सेना की तथा अपनी रक्षा करके विषैले धुंए का और विषाक्त पानी का प्रयोग सदा अपने शत्रुओं पर करता रहे ।

औपनिषदिक नामक चौदहवें अधिकरण में स्वबलोपघातप्रतीकार नामक चौथा अध्याय समाप्त
—: ० :—

पन्द्रहवाँ अधिकरण

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पन्द्रहवाँ अधिकरण

तन्त्रयुक्ति

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प्रकरण १८०
अध्याय १

तन्त्रयुक्तयः


(१) मनुष्याणां वृत्तिरर्थः, मनुष्यवती भूमिरित्यर्थः, तस्याः पृथिव्या लाभपालनोपायः शास्त्रमर्थशास्त्रमिति ।

(२) तद् द्वात्रिंशद्युक्तियुक्तम्—अधिकरणं, विधानं, योगः, पदार्थः, हेत्वर्थः, उद्देशः, निर्देशः, उपदेशः, अपदेशः, अतिदेशः, प्रदेशः, उपमानम्, अर्थापत्तिः, संशयः, प्रसङ्गः, विपर्ययः, वाक्यशेषः, अनुमतम्, व्याख्यानम्, निर्वचनं, निदर्शनम्, अपवर्गः, स्वसंज्ञा, पूर्वपक्षः, उत्तरपक्षः, एकान्तः, अनागतावेक्षणम्, अतिक्रान्तावेक्षणम्, नियोगः, विकल्पः, समुच्चयः, ऊह्यमिति ।

(३) यमर्थमधिकृत्योच्यते तदधिकरणम्—‘पृथिव्या लाभे पालने च यावन्त्यर्थशास्त्राणि पूर्वाचार्यैः प्रस्थापितानि प्रायशस्तानि संहृत्यैकमिद-मर्थशास्त्रं कृतम्’ ( अधि० १. अध्या० १ ) इति ।


अर्थशास्त्र की युक्तियाँ

( १ ) मनुष्यों की जीविका को अर्थ कहते हैं । मनुष्यों से युक्त भूमि को भी अर्थ कहते हैं । इस प्रकार की भूमि को प्राप्त करने और उसकी रक्षा करने वाले उपायों का निरूपण करने वाला शास्त्र अर्थशास्त्र कहलाता है ।

( २ ) वह अर्थशास्त्र बत्तीस प्रकार की युक्तियों से समन्वित है; जिनकी नामावली इस प्रकार है : १. अधिकरण २. विधान ३. योग ४. पदार्थ ५. हेत्वर्थ ६. उद्देश्य ७. निर्देश ८. उपदेश ९. अपदेश १०. अतिदेश ११. प्रदेश १२ उपमान १३. अर्थापत्ति १४. संशय १५. प्रसंग १६. विपर्यय १७. वाक्यशेष १८. अनुमत १९. व्याख्यान २०. निर्वचन २१. निदर्शन २२. अपवर्ग २३. स्वसंज्ञा २४. पूर्वपक्ष २५. उत्तरपक्ष २६. एकांत २७. अनागतावेक्षण २८. अतिक्रांतावेक्षण २९. नियोग ३०. विकल्प ३१. समुच्चय और ३२. ऊह्य ।

( ३ ) अधिकारपूर्वक कहे गये अर्थ का नाम अधिकरण है, ग्रन्थारंभ में जैसे सम्पूर्ण पृथिवी को प्राप्त करने तथा पालन करने का कथन कर संपूर्ण शास्त्र को एक अधिकरण बताया गया है । इसी प्रकार अपने-अपने अर्थों को अधिकारपूर्वक निरूपण करने वाले विनयाधिकारिकः अध्यक्षप्रचार आदि अधिकरण हैं ।

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७६६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ पन्द्रहवां अधिकरण

(१) शास्त्रस्य प्रकरणानुपूर्वी विधानम्—‘विद्यासमुद्देशः, वृद्धसंयोगः, इन्द्रियजयः, अमात्योत्पत्तिः' (अधि० १. अध्या० १) इत्येवमादिकमिति ।

(२) वाक्ययोजना योगः—‘चतुर्वर्णाश्रमो लोकः' (अधि० १. अध्या० ४) इति ।

(३) पदावधिकः पदार्थः—‘मूलहरः' इति पदम् । ‘यः पितृपैतामहमर्थ-मन्यायेन भक्षयति स मूलहरः' ( अधि० २. अध्या० ९ ) इत्यर्थः ।

(४) हेतुरर्थसाधको हेत्वर्थः—‘अर्थमूलौ हि धर्मकामौ' ( अधि० १. अध्या० ७ ) इति ।

(५) समासवाक्यमुद्देशः—‘विद्याविनयहेतुरिन्द्रियजयः' ( अधि० १. अध्या० ६ ) इति ।

(६) व्यासवाक्यं निर्देशः—‘कर्णत्वगक्षिजिह्वाघ्राणेन्द्रियाणां शब्दस्पर्श-रूपरसगन्धेष्वविप्रतिपत्तिरिन्द्रियजयः' (अधि० १ अध्या० ६) इति ।

(७) एवं वर्तितव्यमित्युपदेशः—‘धर्मार्थाविरोधेन कामं सेवेत न निः-सुखः स्यात्' (अधि० १, अध्या० ७ ) इति ।


(१) प्रकरण के अनुसार शास्त्र की आनुपूर्वी का कथन करना विधान कहलाता है, जैसे : विद्यासमुद्देश, वृद्धसंयोग, इन्द्रियजय और अमात्योत्पत्ति आदि ।

(२) वाक्य-योजना को योग कहते हैं, जैसे : ‘चतुर्वर्णाश्रमो लोकः’ चारों वर्णाश्रम के लोग ।

(३) केवल पद के अर्थ को पदार्थ कहते हैं, जैसे : ‘मूलहर’ यह एक पद है उसका यह अर्थ कि ‘पैतृक सम्पत्ति को अन्याय से नष्ट कर दे या अपहरण कर ले’ । यह ‘मूलहर’ पद का अर्थ है ।

(४) अर्थ को सिद्ध करने वाला हेतु हेत्वर्थ कहलाता है, जैसे धर्म और काम अर्थ पर ही निर्भर है ।

(५) संक्षिप्त वाक्य का कथन उद्देश कहलाता है, जैसे विद्या और विनय इन्द्रियजय पर निर्भर है ।

(६) विस्तृत वाक्य का कथन करना निर्देश कहलाता है, जैसे : नाक, त्वचा, आँख, जीभ, कान को शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध आदि की ओर से बचाना ही इन्द्रियजय है ।

(७) ‘इस प्रकार का व्यवहार करना चाहिए’ ऐसा कहना उपदेश कहलाता है, जैसे : धर्म और अर्थ के अनुसार ही कार्य करना चाहिए, इसके प्रतिकूल चलने वाला सुखी नहीं रहता है ।

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प्र० १८० : अ० १ ] अर्थशास्त्र की युक्तियाँ ७६७

(१) एवमसावाहैत्यपदेशः—'मन्त्रिपरिषदं द्वादशामात्यान् कुर्वीतेति मानवाः, षोडशेति बार्हस्पत्याः, विंशतिमित्यौशनसाः, यथासामर्थ्यमिति कौटिल्यः' (अधि० १. अध्या० १५) ।

(२) उक्तेन साधनमतिदेशः—'दत्तस्याप्रदानमृणादानेन व्याख्यातम्' (अधि० ३. अध्या० १६) इति ।

(३) वक्तव्येन साधनं प्रदेशः—'सामदानभेददण्डैर्वा यथापत्सु व्याख्यास्यामः' (अधि० ७. अध्या० १४) इति ।

(४) दृष्टेनादृष्टस्य साधनमुपमानम्—'निवृत्तपरिहारान् पितेवानुगृह्णीयात्' (अधि० २. अध्या० १) इति ।

(५) यदनुक्तमर्थादापद्यते सार्थापत्तिः—'लोकयात्राविद् राजानमात्मद्रव्यप्रकृतिसम्पन्नं प्रियहितद्वारेणाश्रयेत' (अधि० ५. अध्या० ४) नाप्रियहितद्वारेणाश्रयेतेत्यर्थादापन्नं भवतीति ।


( १ ) 'अमुक व्यक्ति ने इस विषय में ऐसा कहा है' इस प्रकार दूसरे के मत को प्रकट करना अपदेश कहलाता है; जैसे : मनु के अनुयायी विद्वानों का कहना है कि मंत्रि-परिषद् में बारह अमात्य होने चाहिए । बृहस्पति के अनुयायियों के मत से उनकी संख्या सोलह, उशना के अनुयायियों के मत से बीस और कौटिल्य के मत से सामर्थ्य के अनुसार अमात्यों की संख्या होनी चाहिए ।

( २ ) कही हुई बात से, न कही हुई बात को सिद्ध कर देना अतिदेश कहलाता है जैसे; दी गई वस्तुओं को न लौटाने पर ऋणदान-विषयक नियमों को समझ लेना चाहिए ।

( ३ ) आगे कही जाने वाली बात से न कही गई बात को सिद्ध कर देना प्रदेश कहलाता है; जैसे : साम, दान, भेद और दण्ड के द्वारा वैसा ही करना चाहिए, जैसे आपत्प्रकरण अध्याय में आगे कहा जायेगा ।

( ४ ) देखी हुई वस्तु से न देखी हुई वस्तु को सिद्ध करना उपमान कहलाता है; जैसे : यदि पुरवासी उस परिहार द्रव्य को चुकता कर दें तो राजा को पिता के समान उन पर अनुग्रह करना चाहिए ।

( ५ ) न कही हुई जो बात अर्थ से ही प्राप्त हो जाय उसे अर्थापत्ति कहते हैं, जैसे लोक व्यवहार में पटु व्यक्तियों को चाहिए कि वे आत्मद्रव्य-प्रकृतिसंपन्न राजा का आश्रय उसके प्रिय और हितैषी लोगों के द्वारा प्राप्त करने की चेष्टा करें । अर्थात् 'अप्रिय और अहितकर लोगों के द्वारा आश्रय न लें', यह आशय उक्त सूत्र में अर्थापत्ति के द्वारा ही जाना जा सकता है ।

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७६८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ पन्द्रहवाँ अधिकरण

(१) उभयतो हेतुमानर्थः संशयः–‘क्षीणलुब्धप्रकृतिमपचरितप्रकृतिं वा’ (अधि० ७. अध्या० ५) इति । (२) प्रकरणान्तरेण समानोऽर्थः प्रसङ्गः–‘कृषिकर्मप्रदिष्टायां भूमाविति समानं पूर्वेण’ ( अधि १. अध्या० ११ ) इति । (३) प्रतिलोमेन साधनं विपर्ययः–‘विपरीतमतुष्टस्य’ ( अधि० १. अ० १६ ) इति । (४) येन वाक्यं समाप्यते, स वाक्यशेषः–‘छिन्नपक्षस्येव राज्ञश्चेष्टानाशश्चेति’ ( अधि० ८. अध्या० १) । तत्र शकुनेरिति वाक्यशेषः । (५) परवाक्यमप्रतिषिद्धमनुमतम्–‘पक्षावुरस्यं प्रतिग्रह इत्यौशनसो व्यूहविभागः’ (अधि० १०. अध्या० ६) इति । (६) अतिशयवर्णना व्याख्यानम्–‘विशेषतश्च सङ्घानां सङ्घधर्मिणां च राजकुलानां द्यूतनिमित्तो भेदः तन्निमित्तो विनाश इत्यसत्प्रग्रहः पापिष्ठतमो व्यसनानां तन्त्रदौर्बल्यात्’ (अधि० ८. अध्या० ३) इति । (७) गुणतः शब्दनिष्पत्तिर्निर्वचनम्–‘व्यस्यत्येनं श्रेयस इति व्यसनम्’ (अधि० ८. अध्या० १) इति ।


( १ ) एक ही बात जब दोनों विरोधी पक्षों की ओर से समान लगे तो उसे संशय कहते हैं; जैसे : क्षीण-क्षुब्ध-प्रकृति और अपचरित प्रकृति, इन दोनों राजाओं में से पहिले किस राजा पर आक्रमण करना चाहिए ?

( २ ) दूसरे प्रकरण के साथ अर्थ की समानता होना प्रसंग कहलाता है, जैसे : खेती के लिए निर्दिष्ट भूमि के संबंध में पूर्ववत् नियम समझना चाहिए ।

( ३ ) विपरीत बातों से किसी वस्तु का निर्देश करना विपर्यय कहलाता है, जैसे : इससे विपरीत भाव होने पर उसको अपने से प्रसन्न समझे ।

( ४ ) जिससे वाक्य की समाप्ति हो उसे वाक्यशेष कहते हैं; जैसे : पंख-कटे पक्षी की तरह राजा की समस्त चेष्टायें नष्ट हो जाती हैं । यहाँ पर ‘पक्षी’ ( शकुनि ) पद वाक्यशेष है ।

( ५ ) प्रतिषेध न किया हुआ दूसरे का वाक्य अनुमत कहलाता है, जैसे : पक्ष, उरस्य और प्रतिग्रह इस प्रकार का व्यूह-विभाग उशना आचार्य ने किया है ।

( ६ ) सिद्ध अर्थ का अनेक युक्तियों के द्वारा समर्थन करना व्याख्यान कहलाता है, जैसे : और विशेषतः एकमत होकर एक साथ रहने वाले राजकुलों का द्यूत के कारण मतभेद हो जाने से दोनों का नाश हो जाता है । दुर्जन लोगों का साथ या सत्कार तथा मद्यपान अन्य सभी व्यसनों से बड़ा व्यसन है; क्योंकि उससे राजा का सारा शासनतन्त्र दुर्बल हो जाता है ।

( ७ ) अर्थान्वयपूर्वक किसी शब्द की सिद्धि करना निर्वचन कहलाता है; जैसे :

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प्र० १८० : अ० १ ] अर्थशास्त्र की युक्तियाँ ७६९

(१) दृष्टान्तो दृष्टान्तयुक्तो निदर्शनम्–‘विगृहीतो हि ज्यायसा हस्तिना पादयुद्धमिवाभ्युपैति’ (अधि० ७. अध्या० ३) इति । (२) अभिप्लुतव्यपकर्षणमपवर्गः–‘नित्यमासन्नमरिबले वासयेदन्य-त्राभ्यन्तरकोपशङ्कायाः’ ( अधि० ९. अध्या० २) इति । (३) परैरसंमितः शब्दः स्वसंज्ञा–प्रथमा प्रकृतिस्तस्य भूम्यनन्तरा द्वितीया भूम्येकान्तरा तृतीया (अधि० ६. अध्या० २) इति । (४) प्रतिषेद्धव्यं वाक्यं पूर्वपक्षः–‘स्वाम्यमात्यव्यसनयोरमात्यव्यसनं गरीयः’ (अधि० ८. अध्या० १) इति । (५) तस्य निर्णयनवाक्यमुत्तरपक्षः–‘तदायत्तत्वात्, तत्कूटस्थानीयो हि स्वामी’ (अधि० ८. अध्या० १)। (६) सर्वत्रायतमेकान्तः–‘तस्मादुत्थानमात्मनः कुर्वीत’ (अधि० १. अध्या १९) इति ।

व्यसन शब्द का अर्थ ही यह है कि जो कल्याण मार्ग से भ्रष्ट कर दे—व्यस्यति एनं श्रेयसः इति व्यसनम् ।

( १ ) दृष्टांत देकर किसी बात का स्पष्टीकरण करना निदर्शन कहलाता है । जैसे : किसी शक्तिशाली से लड़ना ऐसा ही है, जैसे हाथी पर चढ़े हुए व्यक्ति से जमीन पर खड़े होकर युद्ध करना ।

( २ ) किसी नियम का सामान्यतया व्यापक निरूपण करते हुए उसके विषय को संकुचित बना देना अपवर्ग कहलाता है, जैसे अपने राज्य के सीमांत प्रदेश में शत्रु-सेना को रहने दिया जाय, किन्तु यदि राज्य-क्रांति होने की संभावना हो तो उसको कदापि न टिकने दिया जाय ।

( ३ ) दूसरों के द्वारा संकेत न किये गये शब्द-प्रयोग को स्वसंज्ञा कहते हैं, जैसे : विजिगीषु के राष्ट्र के समीप जो राष्ट्र हो उसे प्रथमा प्रकृति, उसके बाद जो राष्ट्र हो उसे द्वितीया प्रकृति और उसके बाद भी जो राष्ट्र हो उसे तृतीया प्रकृति कहते हैं।

( ४ ) प्रतिषेध किया जाने वाला वाक्य पूर्वपक्ष कहलाता है, जैसे : स्वामी और अमात्य-संबंधी विपत्ति में अमात्य संबंधी विपत्ति अधिक अनिष्टकर है ।

( ५ ) पूर्वपक्ष का निषेध करने वाला वाक्य उत्तरपक्ष कहलाता है, जैसे : अमात्य आदि प्रकृतियों का उत्थान-पतन राजा पर ही निर्भर होता है, क्योंकि सातों प्रकार की प्रकृतियों में राजा ही प्रधान ( कूटस्थानीय ) होता है ।

( ६ ) जो अर्थ किसी भी देश-काल में न छोड़ा जा सके उसको एकांत कहते हैं, जैसे राजा को चाहिए कि वह सदा अपने को उन्नतिशील बनाने का यत्न करता रहे ।

४९ कौ०