कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में कुप्याध्यक्ष सत्रहवां अध्याय समाप्त ।
प्र० ३३ : अ० १७ ] कुप्य का अध्यक्ष १६९
(१) विदलमृत्तिकामयं भाण्डम् । (२) अङ्गारतुषभस्मानि मृगपशुपक्षिव्यालवाटाः काष्ठतृणवाटाश्चेति । (३) बहिरन्तरश्च कर्मान्ता विभक्ताः सर्वभाण्डिकाः । आजीवपुररक्षार्थाः कार्याः कुप्योपजीविना ॥
इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे कुप्याध्यक्षो नाम सप्तदशोऽध्यायः,
आदितोः सप्तत्रिंशः ।
—: ० :—
( १ ) पात्र दो प्रकार के होते हैं एक विदलमय ( पिटारी, टोकरी आदि ) और दूसरे मृत्तिकामय ( घड़े, शकोरे आदि ) ।
( २ ) कोयला, राख, मृग, पशु-पक्षी तथा अन्य जंगली जानवर, लकड़ी और घास-फूस आदि का ढेर भी कुप्य होने के कारण सङ्ग्रह-योग्य हैं ।
( ३ ) कुप्य के अध्यक्ष को और उसके सहयकों को चाहिए कि वे बाहर जंगलों के पास जनपद और दुर्ग आदि में गाड़ा तथा लकड़ी आदि से बनी हुई चीजें या सवारियों; सब तरह के बर्तन आदि को और अपनी आजीविका तथा नगर, जनपद की रक्षा के लिए अन्य आवश्यक वस्तुओं का भी संग्रह करे ।
अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में कुप्याध्यक्ष सत्रहवां अध्याय समाप्त ।
—: ० :—
| प्रकरण ३४ | ## आयुधागाराध्यक्षः |
|---|---|
| अध्याय १८ |
(१) आयुधागाराध्यक्षः साङ्ग्रामिकं दौर्गकर्मिकं परपुराभिघातिकं यन्त्रमायुधमावरणमुपकरणं च तज्जातकारुशिल्पिभिः कृतकर्मप्रमाणकालवेतनफलनिष्पत्तिभिः कारयेत् । स्वभूमौ च स्थापयेत् । स्थानपरिवर्तनमातपप्रवातप्रदानं च बहुशः कुर्यात् । ऊष्मोपस्नेहकृमिभिरुपहन्यमानमन्यथा स्थापयेत् । जातिरूपलक्षणप्रमाणागममूल्यानिक्षेपैश्चोपलभेत ।
(२) सर्वतोभद्रजामदग्न्यबहुमुखविश्वासघातिसङ्घाटीयानकपर्जन्यकबाहूर्ध्वबाह्वर्धबाहूनि स्थितयन्त्राणि ।
आयुधागार का अध्यक्ष
( १ ) आयुधागार के अध्यक्ष को चाहिए कि वह, युद्धोपयोगी सामग्री तैयार करने वाले कारीगरों एवं कुशल शिल्पियों के द्वारा युद्ध में काम देने वाले, दुर्ग की रक्षा के योग्य शत्रु के नगर को विध्वंस कर देने वाले सर्वतोभद्र ( मशीनगन ), जामदग्न्य आदि यन्त्र, शक्ति, धनुष आदि हथियार कवच और सवारी आदि जितने भी साधन हैं, उनका निर्माण करवाये; उन कारीगरों से कितने समय में कितनी मजदूरी देकर कितना काम कराया जाय इत्यादि बातों को वह पहिले ही से निश्चित कर ले । तैयार हुए सामान को उसके उपयुक्त स्थान में रखवा दिया जाय अथवा अपने ही कब्जे में रखा जाय । अध्यक्ष को चाहिए कि जिससे समान पर जंक आदि न लगे, उसको धूप-हवा भी दिलाता रहे, गर्मी, सील और घुन आदि के कारण जो हथियार खराब हो रहे हों उन्हें वहां से उठवा कर किसी ऐसे स्थान में रखवा दे, कि वे अधिक खराब न होने पावें, उन हथियारों के जाति स्वरूप, लक्षण, लम्बाई, चौड़ाई, मोटाई प्राप्तिस्थान मूल्य और उपयुक्त स्थान आदि के सम्बन्ध में प्रत्येक बात को अच्छी तरह से समझ-बूझ ले ।
( २ ) दश प्रकार के स्थितयंत्र होते हैं, जिनका विवरण इस प्रकार है : १. सर्वतोभद्र ( मशीनगन ), २. जामदग्न्य ( जिसमें बीच के छेद से बड़े-बड़े गोले निकलें ), ३. बहुमुख ( किले की दीवारों में ऊँचाई पर बनाये गये वे स्थान, जहां से सैनिक गोलीवर्षा कर सकें ), ४. विश्वासघाती ( नगर के बाहर तिरछी बनावट का एक ऐसा यन्त्र, जिसको छू लेने से ही प्राणान्त हो जाय ), ५. संघाटि ( लंबे-ऊँचे बांसों से बना हुआ वह यंत्र, जो महलों के ऊपर रोशनी फेंके ), ६. यानक
प्र० ३४ : अ० १८ ] आयुधागार का अध्यक्ष १७१
(१) पञ्चालिकदेवदण्डसूकरिकामुसलयष्टिहस्तिवारकतालवृन्तमुद्गर-द्रुघणगदास्पृक्तलाकुद्दालास्फोटिमोद्घाटिमोत्पाटिमशतघ्नीत्रिशूलचक्राणि चलयन्त्राणि। (२) शक्तिप्रासकुन्तहाटकभिण्डिपालशूलतोमरवराहकर्णकणपकर्पण-त्रासिकादीनि च हलमुखानि।
( पहियों पर रखा जाने वाला लम्बा यन्त्र ), ७. पर्जन्यक ( वरुणास्त्र, फायर ब्रिगेड ), ८. बाहुयन्त्र ( पर्जन्यक की भाँति; किन्तु उसका आधा ), ६. ऊर्ध्वबाहु ( ऊपर स्तंभ की आकृति का नजदीक की मार करने वाला यन्त्र ) और १०. अर्धबाहु ( ऊर्ध्वबाहु का आधा )।
( १ ) चलयंत्र भी अनेक हैं, जिनका व्योरा इस प्रकार है : १. पाञ्चलिक ( बढ़िया लकड़ी पर तेज धार का बना यन्त्र, जो परकोटे के बाहर जल के बीच में शत्रु को रोकने के काम में आता है ), २. देवदण्ड ( कील रहित बड़ा भारी स्तम्भ, जो परकोटे के ऊपर रखा रहता है ), ३. सूकरिका ( सूत और चमड़े की या बाँस और चमड़े की बनी मशकरी, जो परकोटे तथा अट्टालक के ऊपर ढक कर रखी जाती है ), ४. मुसलयष्टि ( खैर की मूसल का बना हुआ डंडा, जिसके आगे शूल लगा हो ), ५. हस्तिवारक ( त्रिशूल या त्रिशूल डण्डा ), ६. तालवृन्त ( चारों ओर घूमने वाला यन्त्र ), ७. मुद्गर, ८. द्रुघण ( मुद्गर के ही समान यन्त्र ), ६. गदा, १०. स्पृक्तला ( काँटेदार गदा ), ११. कुद्दाल, १२. आस्फोटिम ( चमड़े से बना हुआ चार कोना वाला, मिट्टी के ढेले या पत्थर फेंकने वाला यन्त्र ), १३. उद्घाटिम ( मुद्गर की आकृति का यन्त्र ), १४. उत्पाटिम ( खंभे आदि को उड़ा देने वाला यन्त्र ), शतघ्नी ( कीले की दीवार के ऊपर रखा जाने वाला बड़े स्तम्भ की आकृति का यन्त्र ), १५. त्रिशूल और १६. चक्र, ये सोलह प्रकार के चलयन्त्र है।
( २ ) हलमुख ( भाले की तरह ) हथियारों के नाम इस प्रकार हैं : १. शक्ति ( कनेर के पत्ते की आकृति का लोहे का बना हथियार ), १. प्रास ( चौबीस अंगुल लम्बा, दुधारा हथियार, जिसकी मूठ बीच में लकड़ी की बनी हो ), ३. कुंत ( सात हाथ का उत्तम, छह हाथ का मध्यम और पाँच हाथ का निकृष्ट ), ४. हाटक ( कुंत के समान तीन कांटों वाला हथियार ), ५. भिण्डिपाल ( मोटे फल वाला, कुन्त के समान ), ६. शूल ( तेज मुख वाला हथियार ), ७. तोमर ( बाण के समान तेज मुख वाला, जो चार हाथ का अधम, साढ़े चार हाथ का मध्यम और पांच हाथ का उत्तम समझा जाता है ), ८. वराहकर्ण ( एक प्रकार का प्रास, जिसका मुख सुअर के कान के समान होता है ), ६. कणप ( लोहे का बना हुआ, दोनों ओर तीन-तीन कांटों से युक्त, चौबीस, बाईस और बीस अंगुल का क्रमशः उत्तम, मध्यम एवं अधम ), १०. कर्पण ( तोमर के समान, हाथ से फेंका जाने वाला बाण ), ११.
| १७२ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ दूसरा अधिकरण |
|---|
(१) तालचापदारवशाङ्गीणि कार्मुककोदण्डद्रूणा धनूंषि । (२) मूर्वार्कशणगवेधुवेणुस्नायूनि ज्याः । (३) वेणुशरशलाकादण्डासननाराचाश्च इषवः । तेषां मुखानि छेदन-भेदनताडनान्यायसास्थिदारवाणि । (४) निस्त्रिंशमण्डलाग्रासियष्टयः खड्गाः । खड्गमहिषवारणविषाणदारुवेणूमूलानि त्सरवः । (५) परशुकुठारपट्टसखनित्रकुद्दालक्रकचकाण्डच्छेदनाः क्षुरकल्पाः । (६) यन्त्रगोष्पणमुष्टिपाषाणरोचनीदृषदश्चायुधानि । (७) लोहजालजालिकापट्टकवचसूत्रकङ्कटशिशुमारखड्गधेनुकहस्तिगोचर्मखुरभृङ्गसंघातं वर्मणि । शिरस्त्राणकण्ठत्राणकूर्पासकञ्चुकवारवाण-
त्रासिका ( प्रास जितनी, सम्पूर्ण लोहे की बनी ); ये सब हथियार हलमुख कहलाते हैं, क्योंकि इन सभी का अग्रभाग हल के अग्रभाग की तरह तेज होता है ।
( १ ) धनुष चार प्रकार से बनाये जाते हैं : १. ताल ( ताड़ का बना हुआ ), २. चाप ( अच्छे बाँस का बना हुआ ), ३. दारव ( मजबूत लकड़ी का बना हुआ ) और ४. शाङ्ग ( सींगों का बना हुआ ); आकृति और क्रिया-भेद से इनके कार्मुक, कोदण्ड और द्रूण, आदि नाम हैं ।
( २ ) मूर्वा, आख सन, गवेधुकावेणु ( रामबाँस ) और ताँत; इनसे मजबूत धनुष की डोरी बनती है ।
( ३ ) बाण के भी अनेक भेद हैं, जिनके प्रकार हैं : १. वेणु ( बाँस ), २. शर ( नरसल ), ३. शालाका ( मजबूत लकड़ी ), ४. दण्डासन ( आधा लोहा और आधा बाँस ) और ५. नाराच ( सम्पूर्ण लोहे का ) । इन बाणों के अग्रभाग में लोहे, हड्डी तथा मजबूत लकड़ी की बनी नोक छेदने, काटने, आघात पहुँचाने वाला रक्त-सहित एवं रक्तरहित घाव करने के लिए लगी रहती है ।
( ४ ) खड्ग ( तलवार ) तीन प्रकार के होते हैं : १. निस्त्रिंश ( जिसका अगला भाग काफी टेढ़ा हो ), २. मण्डलाग्र ( जिसका अगला हिस्सा कुछ गोलाकार हो ) और ३. असियष्टि ( जिसका आकार पतला एवं लम्बा हो ) । खड्ग के लिए गैंडा, भैंस की सींग, हाथीदाँत, मजबूत लकड़ी और बाँस की जड़ की मूठ बनवानी चाहिए ।
( ५ ) फरसा, कुल्हाड़ा, द्विमुखी त्रिशूल, फावड़ा, कुदाल, आरा और गँड़ासा; ये सब छुरे की धार की भाँति तेज होने के कारण क्षुरकल्प या क्षुरवर्ग के हथियार कहलाते हैं ।
( ६ ) यन्त्रपाषाण, गोष्पणपाषाण, मुष्टिपाषाण, रोचनी और दृषद; ये सब आयुध कहलाते हैं ।
( ७ ) कवच छह प्रकार से बनाये जाते हैं, जिनके तरीके इस प्रकार हैं : १. लोहजाल ( सिर से पैर तक ढकने वाला ), २. लोहजालिका सिर के अलावा सारे
प्र० ३४ : अ० १८ ] आयुधागार का अध्यक्ष १७३
पट्टनागोदरिकाः । पेटीचर्महस्तिकर्णतालमूलधमनिकाकवाटकटिकाप्रति- हतवलाहकान्ताश्चावरणानि ।
(१) हस्तिरथवाजिनां योग्याभाण्डमालङ्कारिकं सन्नाहकल्पनाश्रोप- करणानि । ऐन्द्रजालिकमौपनिषदिकं च कर्म ।
(२) कर्मान्तानां च,
इच्छामारम्भनिष्पत्तिं प्रयोगं व्याजमुद्दयम् ।
क्षयव्ययौ च जानीयात् कुप्यानामायुधेश्वरः ॥
इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे आयुधागाराध्यक्षो नाम अष्टादशोऽध्यायः; आदितोऽष्टचत्वारिंशः ।
—: ० :—
शरीर को ढकने वाला ), ३. लोहपट्ट ( बाहों को छोड़ सारे शरीर को ढक देने वाला ), ४. लोहकवच ( केवल पीठ तथा छाती को ढक देने वाला ), ५. सूत्रकंकण ( सूत का बना कवच ) और ६. मछली, गैंडा, नीलगाय, हाथी तथा बैल, इन पाँचों के चमड़े, खुर एवं सींगों को मिलाकर बनाया हुआ कवच । इनके अतिरिक्त शिरस्त्राण ( सिर को ढक देने वाला ), कंठत्राण ( गले को ढक देने वाला ) कूर्पास ( आधी बाँहों को ढक देने वाला ), कंचुक ( घुटनों तक शरीर को ढक देने वाला ), वारवाण (सारी देह को ढक देने वाला ), पट्ट ( बिना बाहों एवं बिना लोहे का कवच ), नागोदरिका ( केवल हाथ की उङ्गलियों की रक्षा करने वाला ); ये सात प्रकार के आवरण ( कवच ) देह पर धारण किए जाने योग्य हैं । चमड़े की पेटी, मुँह ढकने का आवरण, लकड़ी की पेटी, सूत की पेटी, लकड़ी का पट्टा, चमड़ा एवं बाँस को कूट कर बनाई गई पेटी, पूरे हाथों को ढकने वाला आवरण और किनारों पर लोहे के पत्तों से बँधा आवरण; आदि अनेक प्रकार के होते हैं ।
( १ ) हाथी, घोड़ा, रथ आदि की शिक्षा एवं सजावट के साधन; अंकुश, कोड़े, पताका, कवच और शरीर की रक्षा करने वाले अन्य आवरण; ये सब उपकरण कहलाते हैं । ऐन्द्रजालिक और औपनिषदिक आदि जादू एवं प्रयोग-क्रियायें भी उपकरण कहलाती हैं ।
( २ ) कुप्य के अध्यक्ष को चाहिए कि वह पिछले दो अध्यायों में निर्दिष्ट द्रव्य-व्यापारों से सम्बद्ध कार्यों का आरम्भ एवं उनकी समाप्ति राजा की इच्छा तथा रुचि के अनुसार ही करे; उन विषयों और कार्यों की उपयोगिता, तथा हानि-लाभ को भी वह भलीभाँति समझे; आयुधागार के अध्यक्ष के लिए भी इन बातों का जानना आवश्यक है ।
अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में आयुधागाराध्यक्ष नामक अठारहवाँ अध्याय समाप्त ।
—: ० :—
| प्रकरण ३५ | # तुलामानपौतवम् |
|---|---|
| अध्याय १९ |
(१) पौतवाध्यक्षः पौतवकर्मान्तान् कारयेत् ।
(२) धान्यमाषा दश सुवर्णमाषकः । पञ्च वा गुञ्जाः । ते षोडश सुवर्णः कर्षो वा । चतुष्कर्षं पलम् ।
(३) अष्टाशीतिगौरसर्षपा रूप्यमाषकः । ते षोडश धरणम् । शैम्ब्यानि वा विंशतिः ।
(४) विंशतितण्डुलं वज्रधरणम् ।
तोल और माप का अध्यक्ष
( १ ) पौतवाध्यक्ष (तोल-माप की जांच करने वाला सरकारी अफसर) को चाहिये कि वह शास्त्रोक्त विधि से तोलने-मापने के साधन तराजू, बाट आदि बनवाये ।
( २ ) दस उड़द के दाने अथवा पाँच रत्ती परिमाण का एक सुवर्णमाषक होता है । सोलह माष का एक सुवर्ण या एक कर्ष होता है । चार कर्ष का एक पल होता है; अर्थात् :
सोने का तोल
$$\left.\begin{array}{l} \text{१० उर्द के दाने} \ \text{५ रत्ती} \end{array}\right} = \text{१ सुवर्णमाषक}$$
१६ माष = १ सुवर्ण या १ कर्ष
४ कर्ष = १ पल
( ३ ) अठ्ठासी सफेद सरसों परिमाण का एक रूप्यमापक होता है । सोलह रूप्यमापक या बीस मूली के बीज परिमाण का एक धरण होता है; जैसे :
चाँदी का तोल
८८ सफेद सरसों = १ रूप्यमाषक
$$\left.\begin{array}{l} \text{१६ रूप्यमाषक} \ \text{२० मूली के बीज} \end{array}\right} = \text{१ धरण}$$
( ४ ) बीस चावल परिमाण का एक वज्रधरण होता है :
हीरे का तोल
२० चावल = १ वज्रधरण
प्र० ३५ : अ० १६ ] तौल और माप का अध्यक्ष १७५
(१) अर्धमाषकः, माषकः, द्वौ, चत्वारः, अष्टौ माषकाः, सुवर्णो, द्वौ, चत्वारः, अष्टौ सुवर्णाः, दश, विंशतिः, चत्वारिंशत्, शतमिति । (२) तेन धरणानि व्याख्यातानि । (३) प्रतिमानान्वयोमयानि मागधमेकलशैलमयानि, यानि वा नोदक-प्रदेहाभ्यां वृद्धिं गच्छेयुरुष्णेन वा ह्रासम् । (४) षडङ्गुलादूर्ध्वमष्टाङ्गुलोत्तराः दश तुलाः कारयेल्लोहपलादूर्ध्व-कपलोत्तराः । यन्त्रमुभयतः शिक्यं वा । (५) पञ्चविंशत्पललोहां द्विसप्तत्यङ्गुलायामां समवृत्तां कारयेत् । तस्याः पञ्चपलिकं मण्डलं बद्ध्वा समकरणं कारयेत् । ततः कर्षोत्तरं पलं, पलोत्तरं दशपलं, द्वादश पञ्चदश विंशतिरिति पदानि कारयेत् । तत आ शताद् दशोत्तरं कारयेत् । अक्षेषु नद्ध्त्रीपिनद्धं कारयेत् ।
( १ ) तोलने के बाटों ( प्रतिमानों ) का निर्माण इस क्रम से होना चाहिए : आधा माषक, माषक, दो माषक, चार माषक, आठ माषक, सुवर्ण, दो सुवर्ण, चार सुवर्ण, आठ सुवर्ण, दस सुवर्ण, बीस सुवर्ण, तीस सुवर्ण, चालीस सुवर्ण, सौ सुवर्ण, सोना तोलने के लिए ये १४ बाट होने चाहिए ।
( २ ) इसी क्रम से चांदी तोलने के लिए धरण एवं रूप्यमाषक बाटों का भी निर्माण करवाना चाहिए; अर्थात् धरण, दो धरण, चार धरण, आठ धरण, दस धरण, बीस धरण, तीस धरण, चालीस धरण और सौ धरण; एवं अर्ध माषक, माषक, दो माषक, चार माषक, आठ माषक; आदि १४ बाटों का क्रम है ।
( ३ ) तौलने के बाट लोहे के बनने चाहिए या मगध तथा मेकल देश के पत्थर के होने चाहिए; या ऐसी-वस्तुओं के बनने चाहिए, जो पानी पड़ने तथा लेप लगने से वजनी न हो जांय और गर्मी के प्रभाव से हलके न पड़ जांय ।
( ४ ) सोना-चांदी तोलने के लिये छोटी-बड़ी दस तुलाऐं बनवानी चाहिए, जिनका क्रम इस प्रकार है १. छह अंगुल की, २. चौदह अंगुल की, ३. बाईस अंगुल की, ४. तीस अंगुल की ५. अड़तीस अंगुल की, ६. छियालीस अंगुल की, ७. चौवन अंगुल की, ८. बासठ अंगुल की, ६. सत्तर अंगुल की और १०. अठहत्तर अंगुल की; उनका वजन क्रमशः एक पल से १० पल तक होना चाहिए; उनके दोनों ओर पलड़े ( शिक्य ) लगे होने चाहिए ।
( ५ ) सोना-चांदी के अतिरिक्त दूसरे पदार्थों को तोलने के लिए जो तुलायें बनवायी जाँय, उनका आकार-प्रकार इस तरह होना चाहिए; पैतीस पल लोहे से बनी हुई, तीन हाथ लंबी समवृत्ता ( गोलाकार ) नामक तुला अन्य पदार्थों को तोलने के लिए बनवानी चाहिए । उसके बीच में पाँच पल का काँटा लगवाकर ठीक मध्य में एक चिह्न भी करवा देना चाहिए । उसके बाद काँटे की गोलाकार परिधि में उस चिह्न से क्रमशः एक कर्ष, दो कर्ष, तीन कर्ष, चार कर्ष, एक पल, दो पल,
१७६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
(१) द्विगुणलोहां तुलामतः षण्णवत्यङ्गुलायामां परिमाणीं कारयेत् । तस्याः शतपदादूर्ध्वं विंशतिः, पञ्चाशत्, शतमिति पदानि कारयेत् । (२) विंशतितौलिको भारः । (३) दशधरणिकं पलम् । तत्पलशतमायमानी । (४) पञ्चपलावरा व्यावहारिकी भाजन्यन्तःपुरभाजनी च । (५) तासामर्धधरणावरं पलम् । द्विपलावरमुत्तरलोहम् । षडङ्गुलावराश्चायामाः ।
इस प्रकार दस पल तक; दस पल के बाद बारह पल, पन्द्रह पल और बीस पल के चिह्न लगवाये जाँय । फिर बीस पल के आगे दस-दस पल का अन्तर देकर सौ पल तक के चिह्न होने चाहिए । प्रत्येक पाँच पल के बाद, मोटी जानकारी के लिये, लम्बी रेखा बनवा देनी चाहिए ।
( १ ) उक्त समवृत्ता तुला से दुगुने लोहे ( सत्तर पल परिमाण ) से बनी छियानवे अंगुल लम्बी तुला का नाम परिमाणी है । उस पर भी समवृत्ता नामक तुला के ही अनुसार सौ पल तक चिह्न लगाने के बाद एक सौ बीस, एक सौ पचास और दो सौ पल तक के चिह्न और लगने चाहिए ।
( २ ) सौ पल परिमाण की एक तुला और बीस तुला परिमाण का एक भार होता है, यथा :
१०० पल = १ तुला
२० तुला = १ भार
( ३ ) दस धरण का एक पल और सौ पल परिमाण की आयमानी नामक तुला होती है, आयमानी अर्थात् आमदनी की वस्तुओं को तोलनेवाली तुला । जैसे :
१० धरण = १ पल
१०० पल = १ आयमानी
( ४ ) आयमानी से पाँच पल कम ( ९५ पल ) परिमाण की तुला का नाम व्यावहारिकी ( क्रय-विक्रय में व्यवहार योग्य ) है, उससे पाँच पल कम (९० पल) की तुला का नाम भाजनी ( भृत्यों को द्रव्य देने योग्य ), और उससे भी पाँच पल कम ( ८५ पल ) परिमाण की तुला का नाम अन्तःपुरभाजनी ( रानी एवं राजकुमारों को द्रव्य देने योग्य ) है, अर्थात्
९५ पल = १ व्यावहारिकी
९० पल = १ भाजनी
८५ पल = १ अन्तःपुरभाजनी
( ५ ) व्यावहारिकी, भाजनी और अन्तःपुरभाजनी, इन तीनों तुलाओं में उत्तरोत्तर आधा-आधा धरण कम हो जाता है । अर्थात् आयमानी तुला में दस धरण का एक पल होता है तो व्यावहारिकी का ९½ धरण का एक पल भाजनी का ९ धरण का एक पल और अन्तःपुरभाजनी का ८½ धरण का एक पल होना चाहिए । इसी प्रकार इन तुलाओं के बनाने में लोहा भी उत्तरोत्तर दो-दो पल कम लगना
प्र० ३५ अ० १९ ] तौल और माप का अध्यक्ष १७७
(१) पूर्वयोः पञ्चपलिकः प्रयामो मांसलोहलवणमणिवर्जम् । (२) काष्ठतुला अष्टहस्ता पदवती प्रतिमानवती मयूरपदाधिष्ठाना । (३) काष्ठपञ्चविंशतिपलं तण्डुलप्रस्थसाधनम् । एष प्रदेशो बह्वल्पयोः । (४) इति तुलाप्रतिमानं व्याख्यातम् । (५) अथ धान्यमाषद्विपलशतं द्रोणमायमानम् । सप्ताशीतिपलशतमर्धपलं च व्यावहारिकम् । पञ्चसप्ततिपलशतं भाजनीयम् । द्विषष्टिपलशतमर्धपलं चान्तःपुरभाजनीयम् ।
चाहिए, अर्थात् आयमानी तुला यदि पैंतीस पल लोहे की बनाई जाय तो व्यावहारिकी तुला तैंतीस पल की, भाजनी इकत्तीस पल की, और अन्तःपुरभाजनी उन्नीस पल की बनायी जाय । इनकी लम्बाई भी पूर्वापेक्षया उत्तरोत्तर छः-छः अङ्गुल कम होनी चाहिए, यदि आयमानी तुला बहत्तर अङ्गुल लम्बी बनाई जाय तो व्यावहारिकी छियासठ अङ्गुल की, भाजनी साठ अङ्गुल की और अन्तःपुरभाजनी चौवन अङ्गुल की ही हो ।
( १ ) परिमाणी और आयमानी तुलाओं में मांस, लोहा, नमक और मणियों को छोड़ कर अन्य वस्तुओं को तोलने पर पाँच पल अधिक तोला जाता है, इसी को प्रयाम कहते हैं ।
( २ ) लकड़ी की तुला आठ हाथ की होनी चाहिए, जिसमें एक, दो, तीन आदि गिनती के चिह्न बने होने चाहिए, इसके बाट पत्थर के और इसका आकार मोर के पैरों जैसा होना चाहिए ।
( ३ ) एक प्रस्थ चावलों को पकाने के लिए पच्चीस पल लकड़ी पर्याप्त है । इसी हिसाब से कम ज्यादा लकड़ी का उपयोग करना चाहिए ।
( ४ ) यहाँ तक सोलह प्रकार की तुलाऐं और चौदह प्रकार के बाटों का निरूपण किया गया है ।
( ५ ) इसके आगे द्रोण, आढक आदि मापने के साधनों का निरूपण किया जाता है :—दो-सौ पल धान्यमाष-परिमाण का एक आयमान द्रोण ( राजकीय आय को मापने योग्य ) होता है । एक-सौ साढ़े-सत्तासी पल का एक व्यावहारिक ( सर्वसामान्य के उपयोगी ) द्रोण होता है । एक-सौ पचहत्तर पल का एक भाजनीय द्रोण ( भृत्योपयोगी ) होता है, और एक-सौ साढ़े-बासठ पल का अन्तःपुरभाजनीय द्रोण ( अन्तःपुर के उपयोगी ) कहा जाता है, अर्थात् ;
२०० पल धान्यमाषक = १ आयमानद्रोण
१८७ ½ पल " = १ व्यावहारिकद्रोण
१७५ पल " = १ भाजनीयद्रोण
१६२ ½ पल " = १ अन्तःपुरभाजनीय द्रोण
१२ कौ०
| १७८ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ दूसरा अधिकरण |
|---|
(१) तेषामाढकप्रस्थकुडवाश्चतुर्भागावराः । (२) षोडशद्रोणा खारी, विंशतिद्रोणिकः कुम्भः, कुम्भैर्दशभिर्वहः । (३) शुष्कसारदारुमयं समं चतुर्भागशिखं मानं कारयेत् । अन्तःशिखं वा । रसस्य तु । (४) सुरायाः पुष्पफलयोः तुषाङ्गाराणां सुधायाश्च शिखामानं द्विगुणोत्तरा वृद्धिः । (५) सपादपणो द्रोणमूल्यम् । आढकस्य पादोनः । षण्माषकाः प्रस्थस्य । माषकः कुडवस्य । (६) द्विगुणं रसादीनां मानमूल्यम् । (७) विंशतिपणाः प्रतिमानस्य । तुलामूल्यं त्रिभागः ।
(१) द्रोण का चौथाई आढक, आढक का चौथाई प्रस्थ और प्रस्थ का चौथाई कुडव होता है ।
(२) सोलह द्रोण की एक खारी, बीस द्रोण का एक कुम्भ और दस कुम्भ परिमाण का एक वह होता है, यथा :
१६ द्रोण = १ खारी
२० द्रोण / १ १/४ खारी = १ कुम्भ
१० कुम्भ = १ वह
(३) अनाज मापने के लिए बढ़िया सूखी लकड़ी का ऐसा मान बनवाया जाय, कि जितना अनाज उसमें समा सके, उसका चतुर्थांश उसकी गर्दन में आ जाय, अथवा गर्दन बनाकर ऊपर से नीचे तक उसकी एक जैसी बनावट रहे, उसका मुँह खुला रहना चाहिए । घी-तेल मापने के लिए भी ऐसा ही मान बनवाया जाय ।
(४) शराब, फल, फूल, भूसी, कोयला, और चूना-कलई, इन छह पदार्थों को मापने के लिए जो बर्तन बनवाया जाय उसके ऊपर का हिस्सा, नीचे के हिस्से से दुगुना चौड़ा होना चाहिए और उस पर गर्दन भी बनी होनी चाहिए ।
(५) लकड़ी के बने एक द्रोण परिमाण बर्तन का मूल्य सवा पण होना चाहिए । इसी प्रकार एक आढक परिमाण के बर्तन की कीमत पौन पण, एक प्रस्थ के वर्तन की छह माषक और एक कुडव परिमाण वाले वर्तन की कीमत एक माषक होनी चाहिए ।
(६) घी-तेल आदि द्रव पदार्थों को मापने वाले बर्तनों की कीमत अनाज मापने वाले बर्तनों से दुगुनी होनी चाहिए ।
(७) चौदह प्रकार के सम्पूर्ण बाटों की कीमत बीस पण और सम्पूर्ण तुलाओं की कीमत उसके तिहाई अर्थात् ६ २/३ पण होती है ।
प्र० ३५ : अ० १९ ] तौल और माप का अध्यक्ष १७९
(१) चातुर्मासिकं प्रातिवेधनिकं कारयेत्। अप्रतिविद्धस्यात्ययः सपादः सप्तविंशतिपणः। प्रातिवेधनिकं काकणिकमहरहः पौतवाध्यक्षाय दद्युः। (२) द्वात्रिंशद्भागस्तप्तव्याजी सर्पिषश्चतुःषष्टिभागस्तैलस्य। पञ्चाशद्भागो मानस्त्रावो द्रवाणाम्। (३) कुडवार्धचतुरष्टभागानि मानानि कारयेत्। (४) कुडबाश्चतुराशीतिर्वारकः सर्पिषो मतः। चतुःषष्टिस्तु तैलस्य पादश्च घटिकानयोः ॥
इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे तुलामानपौतवं नामैकोनविंशोऽध्यायः, आदित एकोनचत्वारिंशः।
—: ० :—
(१) पौतवाध्यक्ष को चाहिए कि हर चौथे मास वह तुला, बाट, द्रोण आदि का निरीक्षण करे। जो व्यापारी निर्धारित समय पर जाँच न करवावे उसे सवा सत्ताईस पण जुर्माना देना चाहिए। व्यापारियों को चाहिए कि वे एक काकणी प्रतिदिन के हिसाब से चार मास की एक-सौ-बीस काकणी निरीक्षण-कर के रूप में पौतवाध्यक्ष को दें।
(२) यदि गरम घी खरीदा जाय तो उसका बत्तीसवाँ हिस्सा और तेल खरीदा जाय तो उसका चौंसठवाँ हिस्सा छीजन के रूप में अधिक (व्याजी) लेना चाहिए। द्रव पदार्थों में पाँचवाँ हिस्सा छीजन होती है।
(३) छोटी तोल के लिए एक कुडव, आधा कुडव, चौथाई कुडव तथा आठवाँ हिस्सा कुडव, ये चार प्रकार के बाट और माप बनवाने चाहिए।
(४) घी तोलने के लिए चौरासी कुडव परिमाण का एक वारक और तेल तोलने के लिए चौसठ कुडव का एक वारक माना गया है। इक्कीस कुडव की एक घृतघटिका और सोलह कुडव की एक तैलघटिका होती है।
अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में तुलामानपौतव नामक उन्नीसवाँ अध्याय समाप्त।
—: ० :—
| प्रकरण ३६ | देशकालमानम् |
|---|---|
| अध्याय २० |
(१) मानाध्यक्षो देशकालमानं विद्यात् । (२) अष्टौ परमाणवो रथचक्रविप्रुट् । ता अष्टौ लिक्षा । ता अष्टौ यूकामध्यः । ते अष्टौ यवमध्यः । अष्टौ यवमध्याः अङ्गुलम् । (३) मध्यमस्य पुरुषस्य मध्यमाया अङ्गुल्या मध्यप्रकर्षो वाऽङ्गुलम् । (४) चतुरङ्गुलो धनुर्ग्रहः । अष्टाङ्गुला धनुर्मुष्टिः । (५) द्वादशाङ्गुला वितस्तिः, छायापौरुषं च । चतुर्दशाङ्गुलं शमः शलः परिरयः पदं च । द्विवितस्तिररत्निः प्राजापत्यो हस्तः । (६) सधनुर्ग्रहः पौतवविवीतमानम् । सधनुर्मुष्टिः किष्कुः कंसो वा ।
देश और काल का मान
( १ ) पौतवाध्यक्ष को चाहिए कि वह देश और काल का मान भी अच्छी तरह से जान ले । उसकी जानकारी के सूत्र इस प्रकार हैं :
( २ ) ८ परमाणु = १ धूलकण
८ धूलकण = १ लिक्षा
८ लिक्षा = १ यूकामध्य
८ यूकामध्य = १ यवमध्य
८ यवमध्य = १ अंगुल
( ३ ) अथवा मध्यम कोटि के पुरुष की मध्यमा की मोटाई का माप एक अंगुल बराबर होता है ।
( ४ ) ४ अंगुल = १ धनुर्ग्रह
$$\left.\begin{aligned} &\text{८ अंगुल} \ &\text{२ धनुर्ग्रह} \end{aligned}\right}$$ = १ धनुर्मुष्टि
(पाठ संरचना: ८ अंगुल / २ धनुर्ग्रह = १ धनुर्मुष्टि)
( ५ )
$$\left.\begin{aligned} &\text{१२ अंगुल} \ &\text{३ धनुर्ग्रह} \ &\text{१ ½ धनुर्मुष्टि} \end{aligned}\right}$$ = १ वितस्ति या १ छायापुरुष
(पाठ संरचना: १२ अंगुल / ३ धनुर्ग्रह / १ ½ धनुर्मुष्टि = १ वितस्ति या १ छायापुरुष)
१४ अंगुल = १ शम, शल परिरय या पद ( पैर )
२ वितस्ति = १ अरत्नि, प्राजापत्य हाथ
( ६ ) २८ अङ्गुल = १ हाथ ( विवीत और पौतव नापने के लिये )
३२ अङ्गुल = १ किष्कु या कंस
प्र० ३६ : अ० २० ] देश और काल का मान १४१
(१) द्विचत्वारिंशदङ्गुलस्तक्षणः क्राकचिककिष्कुः स्कन्धावारदुर्ग-राजपरिग्रहमानम् । चतुःपञ्चाशदङ्गुलः कुप्यवनहस्तः । (२) चतुरशीत्यङ्गुलो व्यामो रज्जुमानं खातपौरुषं च । (३) चतुररत्निर्दण्डो धनुर्नालिका पौरुषं च । (४) गार्हपत्यमष्टशताङ्गुलं धनुः पथिप्राकारमानम् । पौरुषं च अग्निचित्यानाम् । (५) षट्कंसो दण्डो ब्रह्मदेयातिथ्यमानम् । दशदण्डा रज्जुः । द्विरज्जुकः परिदेशः । त्रिरज्जुकं निवर्त्तनम् । (६) एकतो द्विदण्डाधिको बाहुः द्विधनुःसहस्रं गोरुतम् । चतुर्गोरुतं योजनम् । इति देशमानम् । (७) कालमानमत ऊर्ध्वम् । तुटो लवो निमेषः काष्ठा कला नालिका
( १ ) ४२ अङ्गुल = १ हाथ ( छावनी आदि में बढ़ई के उपयोगार्थ )
३२ अङ्गुल = १ किष्कु या कंस ( छावनी आदि में लकड़ी चीरने के लिये )
५४ अङ्गुल = १ हाथ (जंगली लकड़ी और पदार्थ नापने के लिये)
( २ ) ८४ अङ्गुल = १ हाथ ( रस्सी, खाई और कुआँ नापने के लिए )
( ३ ) ४ अरत्नि = १ दण्ड, धनु, नालिका, पौरुष
( ४ ) १०८ अङ्गुल = १ गार्हपत्यधनु ( विश्वकर्मा द्वारा निश्चित, सड़क, किला एवं परकोटा नापने के लिए )
१०८ अङ्गुल = १ पौरुष ( यज्ञसम्बन्धी कार्यों के लिए )
( ५ ) ६ कंस } = १ दण्ड ( ब्राह्मण आदि को भूमिदान देने के लिए )
८ हाथ }
१० दण्ड } = १ रज्जु
४ अरत्नि }
२ रज्जु = १ परिदेश
३ रज्जु } = १ निवर्त्तन
१३ परिदेश }
( ६ ) ३० + ३२ दण्ड = १ बाहु ( पूरा हाथ )
६६६ २/३ निवर्त्तन } = १ गोरुत ( १ कोश )
२००० धनु }
४ गोरुत = १ योजन
यहाँ तक देश-मान का निरूपण किया गया है ।
( ७ ) इसके बाद काल-मान का निरूपण किया जाता है । तुट, लव, निमेष,
१८४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
मुहूर्तः पूर्वापरभागौ दिवसो रात्रिः पक्षो मास ऋतुरयनं संवत्सरो युगमिति कालः ।
(१) निमेषचतुर्भागस्तुटः ।
(२) द्वौ त्रुटौ लवः ।
(३) द्वौ लवौ निमेषः ।
(४) पञ्च निमेषाः काष्ठाः ।
(५) त्रिंशत् काष्ठाः कला ।
(६) चत्वारिंशत् कला नाडिका ।
(७) सुवर्णमाषकाश्चत्वारश्चतुरंगुलायामाः कुम्भच्छिद्रकाढकमम्भसो वा नालिका ।
(८) द्विनालिको मुहूर्तः । पञ्चदशमुहूर्तो दिवसो रात्रिश्च चैत्रे मास्याश्वयुजे च मासि भवतः । ततः परं त्रिभिर्मुहूर्तैरन्यतरः षण्मासं वर्धते ह्सते चेति ।
(९) छायायामष्टपौरुष्यामष्टादशभागच्छेदः, षट्पौरुष्यां चतुर्दश-
काष्ठा, कला, नालिका, मुहूर्त, पूर्वाह्ण, अपराह्न, दिन, रात, पक्ष, मास, ऋतु, अयन, संवत्सर और युग, काल के ये सत्रह विभाग हैं ।
( १ ) निमेष = पलक मारने तक का समय, त्रुटि = निमेष का चौथा हिस्सा
( २ ) २ त्रुटि = १ लव
( ३ ) २ लव = १ निमेष
( ४ ) ५ निमेष = १ काष्ठा
( ५ ) ३० काष्ठा = १ कला
( ६ ) ४० कला = १ नालिका
( ७ ) अथवा एक घड़े में चार सुवर्णमाषक के बराबर चौड़ा और चार अंगुल लम्बा छेद बनाकर इतने ही परिमाण की एक नली घड़े में लगा दी जाय, उस घड़े में एक आढ़क जल भर दिया जाय । वह जल उस नली के द्वारा जितने समय में बाहर निकले, उतने समय को नलिका कहते हैं ।
२ नालिका = १ मुहूर्त
१५ मुहूर्त = १ दिन या १ रात
( ८ ) इस मान के दिन और रात केवल चैत तथा आश्विन मास में होते हैं । इसके बाद छह-मास तक दिन बढ़ता और रात्रि घटती है, दूसरे छह महीने तक रात्रि बढ़ती है और दिन घटता रहता है ।
( ९ ) जब धूपघड़ी की छाया ९६ अङ्गुल लम्बी हो तो दिन का अठारहवां भाग समाप्त हुआ समझना चाहिए, ७२ अङ्गुल छाया रहने पर दिन का चौदहवां भाग,
प्र० ३६ : अ० २० ] देश और काल का मान १८३
भागः, चतुष्पौरुष्यामष्टभागः, द्विपौरुष्यां षड्भागः, पौरुष्यां चतुर्भागः, अष्टाङ्गुलायां त्रयोदशभागाः, चतुरङ्गुलायामष्टभागाः, अच्छाया मध्याह्न इति । (१) परावृत्ते दिवसे शेषमेव विद्यात् । (२) आषाढे मासि नष्टच्छायो मध्याह्नो भवति । अतः परं श्रावणादीनां षण्मासानां द्वयङ्गुलोत्तरा माघादीनां द्वयङ्गुलावरा छाया इति । (३) पञ्चदशाहोरात्राः पक्षः । सोमाप्यायनः शुक्लः सोमावच्छेदनो बहुलः । (४) द्विपक्षो मासः । त्रिंशदहोरात्रः प्रकर्ममासः । सार्धः सौरः । अर्धन्यूनश्चान्द्रमासः । सप्तविंशतिर्नक्षत्रमासः । द्वात्रिंशद् मलमासः । पञ्चत्रिंशदश्ववाहायाः । चत्वारिंशद्धस्तिवाहायाः । (५) द्वौ मासावृतुः । श्रावणः प्रोष्ठपदश्च वर्षाः । आश्वयुजः कार्तिकश्च
४८ अङ्गुल लम्बी रहने पर आठवां हिस्सा, २४ अङ्गुल लम्बी रहने पर छठा हिस्सा, १२ अङ्गुल लम्बी रहने पर चौथा हिस्सा, ८ अङ्गुल लम्बी रहने पर दिन के दस भागों में तीसरा हिस्सा, चार अङ्गुल लम्बी रह जाने पर आठ भागों में तीसरा हिस्सा और जब छाया बिल्कुल न रहे तो मध्याह्न समझना चाहिए ।
(१) मध्याह्न अर्थात् बारह बजे के बाद उक्त छाया-मान के अनुसार दिन का शेष भाग समझना चाहिए ।
(२) आषाढ़ के महीने की दोपहरी ( मध्याह्न ) छायारहित होती है । श्रावण से पौष तक मध्यान्ह में दो अङ्गुल छाया अधिक रहती है, और फिर माघ से ज्येष्ठ तक दो अङ्गुल कम हो जाती है ।
(३) पन्द्रह दिन-रात का एक पक्ष होता है । जिस पक्ष में चन्द्रमा बढ़ता रहता है उसे शुक्लपक्ष और जिस पक्ष में चन्द्रमा घटता है उसे कृष्ण ( बहुल ) पक्ष कहते हैं ।
(४) दो पक्ष का एक महीना होता है । वेतन देने के लिए तीस दिन-रात का एक महीना माना जाता है । साढ़े तीस दिन-रात का एक सौर मास होता है । साढ़े उनतीस दिन-रात का एक चान्द्रमास होता है । सत्ताईस दिन-रात का एक नक्षत्र-मास होता है । बत्तीस दिन-रात का एक मलीमास होता है । पैंतीस दिन रात का महीना घोड़ों के सईसों को वेतन देने के उपयोग में लाया जाता है । हाथियों की सेवा में नियुक्ति कर्मचारियों का एक महीना, चालीस दिन-रात का होता है ।
(५) दो मास की एक ऋतु होती है । श्रावण-भादों में वर्षा ऋतु होती है । आश्विन-कार्तिक में शरद ऋतु होती है । मार्गशीर्ष-पौष में हेमन्त ऋतु होती है ।
१८४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
१८४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
शरत् । मार्गशीर्षः पौषश्च हेमन्तः । माघः फाल्गुनश्च शिशिरः । चैत्रो वैशाखश्च वसन्तः । ज्येष्ठामूलीय आषाढश्च ग्रीष्मः ।
(१) शिशिराद्युत्तरायणम् । वर्षादि दक्षिणायनम् ।
(२) द्वचयनः संवत्सरः । पञ्चसंवत्सरो युगमिति ।
(३) दिवसस्य हरत्यर्कः षष्टिभागमृत्तौ ततः ।
करोत्येकमहश्छेदं तथैवैंकं च चन्द्रमाः ॥
एवमर्धतृतीयानामब्दानामधिमासकम् ।
ग्रीष्मे जनयतः पूर्वं पञ्चाब्दान्ते च पश्चिमम् ॥
इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे देशकालमानं नाम विंशोऽध्यायः, आदितश्चत्वारिंशः ।
—: ० :—
माघ—फाल्गुल में शिशिर ऋतु होती है । चैत्र—वैशाख में वसन्त ऋतु होती है । ज्येष्ठ-आषाढ में ग्रीष्म ऋतु होती है ।
(१) शिशिर, वसन्त तथा ग्रीष्म उत्तरायण और वर्षा, शरद् तथा हेमन्त दक्षिणायन कहलाते हैं ।
(२) उत्तरायण और दक्षिणायन दोनों का एक संवत्सर होता है । पाँच संवत्सरों का एक युग होता है ।
(३) प्रतिदिन सूर्य एक घटिका छेद करता है, इस क्रम से वह एक वर्ष में छह दिन, दो वर्ष में बारह दिन और ढाई वर्ष में पन्द्रह दिन अधिक बना लेता है । इसी प्रकार चन्द्र भी प्रत्येक ऋतु में एक-एक दिन कम करता जाता है, जिससे ढाई वर्ष में पन्द्रह दिन कम हो जाते हैं । इस दृष्टि से सूर्य और चन्द्रमा की गति के अनुसार एक महीने की कमी-बेशी हो जाती है । इस गणना के अनुपात से प्रति ढाई वर्ष बाद ग्रीष्म ऋतु में प्रथम मलिमास और प्रति पाँच वर्ष के बाद हेमन्त ऋतु में दूसरा मलिमास, सूर्य तथा चन्द्रमा बनाते हैं। यही मलिमास अधिकमास कहलाता है, जो ढाई वर्ष में एक महीने के अन्तर को पूरा कर देता है ।
अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में देशकालमान नामक बीसवाँ अध्याय समाप्त ।
—: ० :—
| प्रकरण ३७ |
|---|
| अध्याय २१ |
शुल्काध्यक्षः
(१) शुल्काध्यक्षः शुल्कशालां ध्वजं च प्राङ्मुखम् उदङ्मुखं वा महाद्वाराभ्याशे निवेशयेत् । (२) शुल्कादायिनश्चत्वारः पञ्च वा सार्थोपयातान् वणिजो लिखेयुः—के कुतस्त्याः कियत्पण्याः क्व चाभिज्ञानमुद्रा वा कृतेति । (३) अमुद्राणामत्ययो देयद्विगुणः । (४) कूटमुद्राणां शुल्काष्टगुणो दण्डः । (५) भिन्नमुद्राणामत्ययो घटिकाः स्थाने स्थानम् । (६) राजमुद्रापरिवर्तने नामकृते सपादपणिकं वहनं दापयेत् । (७) ध्वजमलोपस्थितस्य प्रमाणमर्घं च वैदेहकाः पण्यस्य ब्रूयुः—एतत्प्रमाणेनार्घेण पण्यमिदं कः क्रेतेति । त्रिरुद्घोषितमर्थिभ्यो दद्यात् । क्रेतृसंघर्षे मूल्यवृद्धिः । सशुल्का कोशं गच्छेत् ।
शुल्क का अध्यक्ष
( १ ) शुल्क का अध्यक्ष शुल्कशाला ( चुंगीघर ) का निर्माण करवावे, उसके पूर्व तथा उत्तर की ओर, प्रधान द्वार के पास, शुल्कशाला की पहिचान के लिए एक पताका लगवा दे ।
( २ ) शुल्कशाला में चार-पाँच कर्मचारियों की नियुक्ति की जानी चाहिए, जो माल को लाने-ले जाने वाले व्यापारियों का नाम, उनकी जाति, उनका निवास स्थान, माल का विवरण और उस पर कहाँ-कहाँ की मुहर लगी है, इसका विवरण लिखें ।
( ३ ) जिन व्यापारियों के माल पर मुहर न लगी हो, उनको जितनी चुंगी ( शुल्क ) देनी चाहिए, उन पर उसका दुगुना जुर्माना किया जाय ।
( ४ ) जिन व्यापारियों ने अपने माल पर नकली मुहर लगाई है उन पर चुंगी का आठ गुना जुर्माना ठोकना चाहिए ।
( ५ ) जो व्यापारी मुहर लगाकर उसको मिटा दे, उन्हें तीन घड़ी तक ( ढाई घड़ी का एक घंटा ) ऐसे स्थान पर बैठाया जाय, जहाँ पर कि आने-जाने वाले सभी व्यापारी उनके अपराध को जान सकें ।
( ६ ) माल का नाम बदलने वाले व्यापारी पर सवापण दण्ड करना चाहिए ।
( ७ ) शुल्कशाला की ध्वजा के नीचे एकत्र होकर व्यापारी लोग अपने माल का नाम, उसकी कीमत और उसका वजन आदि की बोली बोलें । तीन बार आवाज
१४६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
(१) शुल्कभयात्पण्यप्रमाणं मूल्यं वा हीनं ब्रुवतस्तदतिरिक्तं राजा हरेत् । शुल्कमष्टगुणं वा दद्यात् । (२) तदेव निविष्टपण्यस्य भाण्डस्य हीनप्रतिवर्णकेनाघार्यापकर्षणे सारभाण्डस्य फल्गुभाण्डेन प्रतिच्छादने च कुर्यात् । (३) प्रतिक्रेतृभयाद्वा पण्यमूल्यादुपरि मूल्यं वर्धयतो मूल्यवृद्धिं राजा हरेत् । द्विगुणं वा शुल्कं कुर्यात् । (४) तदेवाष्टगुणमध्यक्षस्य छादयतः । (५) तस्माद्विक्रयः पण्यानां धृतो मितो गणितो वा कार्यः । तर्कः फल्गुभाण्डानामानुग्राहिकाणां च । (६) ध्वजमूलमतिक्रान्तानां चाकृतशुल्कानां शुल्कादष्टगुणो दण्डः । पथिकोत्पथिकास्तद्विद्युः ।
लगाने पर जो भी खरीद दे, उसे माल दे देना चाहिए, यदि खरीदने वालों में होड़ लग जाय तो माल का मूल्य बढ़ा कर बोली बोली जाय और निर्धारित आमदनी से अधिक मूल्य एवं उसकी चुङ्गी राजकीय कोष में जमा कर दी जाय ।
( १ ) अधिक चुंगी देने के डर से जो व्यापारी अपने माल और उसके मूल्य को कम करके बताये, उस अतिरिक्त माल को राजा ले ले, अथवा व्यापारी से आठ गुना शुल्क वसूल किया जाय ।
( २ ) यही दण्ड उस व्यापारी को भी देना चाहिए जो कि बढ़िया माल की जगह, उसी प्रकार की दूसरी पेटी आदि में घटिया माल रख कर उसका मूल्य कम कर दे अथवा जो व्यापारी नीचे के हिस्से में अच्छा माल भर कर ऊपर से सस्ता माल भर दे और उसी के अनुसार चुंगी दे ।
( ३ ) प्रतिद्वन्द्विता के कारण जो ग्राहक किसी चीज का मूल्य बढ़ा दे, उस बढ़े हुए मूल्य को राजा ले ले अथवा उस मूल्य बढ़ाने वाले खरीद्दार से दुगुनी चुंगी वसूल कर ली जाय ।
( ४ ) मित्रता या रिश्वत के कारण यदि अध्यक्ष किसी अपराधी व्यापारी को माफ कर दे तो अपराध के अनुपात से आठगुना दण्ड अध्यक्ष को दिया जाय ।
( ५ ) इसलिए माल की बिक्री तौल कर अथवा गिन कर भली भांति करनी चाहिए, जिससे छल-कपट न हो सके । कोयला, नमक आदि कम चुंगी वाली वस्तुओं पर अन्दाज से ही कर लेना चाहिए, उन्हें तौलने की आवश्यकता नहीं है ।
( ६ ) जो व्यापारी छिपकर या किसी छल से चुंगी दिए बिना ही चुंगीघर को लांघ कर चले जांय उन्हें नियत शुल्क से आठ गुना अधिक शुल्क देना चाहिए । असली रास्ता छोड़ कर इधर-उधर से निकल जाने वाले लकड़हारे और ग्वाले आदि पर भी निगरानी रखनी चाहिए ।
प्र० ३७ : अ० २१ ] शुल्क का अध्यक्ष १८७
(१) वैवाहिकमन्वायनमौपायनिकं यज्ञकृत्यप्रसवनैमित्तिकं देवेज्या-चौलोपनयनगोदानव्रतदक्षिणादिषु क्रियाविशेषेषु भाण्डमुच्छुल्कं गच्छेत् । (२) अन्यथावादिनः स्तेयदण्डः । (३) कृतशुल्केनाकृतशुल्कं निर्वाहयतो द्वितीयमेकमुद्रया भित्त्वा पण्यपुटमपहरतो वैदेहकस्य तच्च तावच्च दण्डः । (४) शुल्कस्थानाद्गोमयपलालं प्रमाणं कृत्वा अपहरत उत्तमः साहसदण्डः । (५) शस्त्रवर्मकवचलोहरथरत्नधान्यपशूनामन्यतमानिर्वाह्यं निर्वाहयतो यथावघुषितो दण्डः पण्यनाशश्च । (६) तेषामन्यतमस्यानयने बहिरेवोच्छुल्को विक्रयः । (७) अन्तपालः सपादपणिकां वर्तनीं गृह्णीयात् पण्यवहनस्य, पणिकामेकमुखरस्य, पशूनामर्धपणिकां, क्षुद्रपशूनां पादिकाम्, असभारस्य माषिकाम् । नष्टापहृतं च प्रतिविदध्यात् ।
( १ ) विवाहसंबंधी, विवाह में प्राप्त, सदावर्त्त या क्षेत्रों के लिये दिया गया दान, यज्ञकर्म एवं जन्मोत्सव के लिए भेजा हुआ देवपूजा, मुंडन, जनेऊ, गोदान और व्रत आदि धार्मिक कार्यों से संबद्ध माल पर चुंगी न ली जानी चाहिए ।
( २ ) किन्तु चुंगी के भय से जो व्यक्ति अपने माल का संबंध उक्त कार्यों से बताये तो उसे चोरी का दण्ड दिया जाय ।
( ३ ) यदि कोई व्यापारी चुंगी दिए माल के साथ बिना चुंगी दिए माल को निकाल ले जाय या इसी प्रकार बिना मुहर लगे माल को निकाल ले जाय, अथवा चुंगी दिए माल में बिना चुंगी का माल मिला दे, उस व्यापारी का वह बिना चुङ्गी का माल जब्त कर लिया जाय और उस पर उतना ही दण्ड निर्धारित किया जाय ।
( ४ ) जो व्यापारी चुङ्गी देने के भय से अपने अच्छे माल को घटिया बताकर धोखे से निकाल ले जाने की चेष्टा करे, उसे उत्तम साहस दण्ड दिया जाना चाहिए ।
( ५ ) शस्त्र, कवच, लोहा, रथ, रत्न, अन्न और पशु आदि किसी भी प्रतिबन्ध लगी वस्तु को लाने-ले जाने वाले व्यापारी को पूर्व निर्धारित दण्ड दिया जाय और उसकी उस वस्तु को जब्त कर लिया जाय ।
( ६ ) इनमें से कोई वस्तु यदि बाहर लायी जाये तो वह बिना चुङ्गी दिये भी नगर-सीमाओं के बाहर बेची जा सकती है ।
( ७ ) सीमा रक्षक अन्तपाल को चाहिए कि वह माल ढोने वाली प्रति गाड़ी से मार्गरक्षा-कर ( वर्त्तनी ) के रूप में १¼ पण कर वसूल करे । घोड़े, खच्चर, गधे आदि एक खुर वाले पशुओं की गाड़ी पर एक पण, बैल आदि पशुओं पर आधा पण, बकरी, भेड़ आदि छोटे पशुओं पर चौथाई पण और कंधे पर भार ढोने वाले व्यक्तियों पर एक माष ( तांबे का सिक्का ) कर लेना चाहिए । यदि किसी व्यापारी की कोई
१८८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
(१) वैदेश्यं सार्थं कृतसारफल्गुभाण्डविचयनमभिज्ञानं मुद्रां च दत्त्वा प्रेषयेदध्यक्षस्य । (२) वैदेहकव्यञ्जनो वा सार्थप्रमाणं राज्ञः प्रेषयेत् । तेन प्रदेशेन राजा शुल्काध्यक्षस्य सार्थप्रमाणमुपदिशेत्सर्वज्ञत्वख्यापनार्थम् । ततः सार्थ-मध्यक्षोऽभिगम्य ब्रूयात्—'इदममुष्यामुष्य च सारभाण्डं च निगूहंतव्यम्, एष राज्ञः प्रभावः' इति । (३) निगूहतः फल्गुभाण्डं शुल्काष्टगुणो दण्ड, सारभाण्डं सर्वापहारः । (४) राष्ट्रपीडाकरं भाण्डमुच्छिन्द्यादफलं च यत् । महोपकारमुच्छुल्कं कुर्याद्बीजं तु दुर्लभम् ॥ इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे शुल्काध्यक्षो नाम एकविंशोऽध्यायः, आदित एकचत्वारिंशः । —: ० :—
वस्तु गुम हो गई हो या चोरी गई हो तो अन्तपाल उसका पता लगावे । नष्ट हुई वस्तु मिल जाय तो दे दे, अन्यथा अपने ही पास रख दे ।
(१) अन्तपाल को चाहिए कि वह विदेशी व्यापारियों के माल की भली-भाँति जाँच कर उस पर मुहर लगाये और रमन्ना काटकर उन्हें चुङ्गी के अध्यक्ष ( शुल्का-ध्यक्ष ) के पास भेज दे ।
(२) उन विदेशी व्यापारियों के साथ गुप्त व्यापारी का भेष धारण किये राजा का खुफिया व्यापारियों के सम्बन्ध की सारी सूचनाऐं पहिले ही राजा तक पहुँचा दे । इस सूचना को तथा व्यापारियों के सम्बन्ध में पूरी जानकारी राजा, शुल्काध्यक्ष के पास भेज दे, जिससे कि राजा की जानकारी पर विश्वास किया जा सके और राजा की बात को विश्वासपूर्वक कहा जा सके । तदनुसार शुल्काध्यक्ष व्यापारियों से कहे 'आप लोगों में से अमुक-अमुक व्यापारी के पास इतना घटिया और इतना बढ़िया माल है, आप लोगों को कुछ भी छिपाना नहीं चाहिए । देखिये, राजा का इतना प्रभाव है कि उससे कोई बात छिपी नहीं रह सकती है ।'
(३) जो व्यापारी घटिया माल को छिपाने का यत्न करे, उस पर चुङ्गी से आठ गुना जुर्माना और जो बढ़िया माल को छिपाये उसका सारा माल जब्त कर लेना चाहिए ।
(४) राष्ट्र को हानि पहुँचाने वाले विष या फल आदि माल को राजा नष्ट कर दे और यदि प्रजा का उपकार करने वाला तथा कठिनाई से प्राप्त होने वाला धान्य आदि माल हो तो उस पर चुङ्गी न लगाई जाय, जिससे उस माल का अपने देश में अधिक आयात हो ।
अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में इक्कीसवाँ अध्याय समाप्त । —: ० :—