भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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प्र० ३३ : अ० १७ ] कुप्य का अध्यक्ष १६९

(१) विदलमृत्तिकामयं भाण्डम् । (२) अङ्गारतुषभस्मानि मृगपशुपक्षिव्यालवाटाः काष्ठतृणवाटाश्चेति । (३) बहिरन्तरश्च कर्मान्ता विभक्ताः सर्वभाण्डिकाः । आजीवपुररक्षार्थाः कार्याः कुप्योपजीविना ॥

इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे कुप्याध्यक्षो नाम सप्तदशोऽध्यायः,
आदितोः सप्तत्रिंशः ।

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( १ ) पात्र दो प्रकार के होते हैं एक विदलमय ( पिटारी, टोकरी आदि ) और दूसरे मृत्तिकामय ( घड़े, शकोरे आदि ) ।

( २ ) कोयला, राख, मृग, पशु-पक्षी तथा अन्य जंगली जानवर, लकड़ी और घास-फूस आदि का ढेर भी कुप्य होने के कारण सङ्ग्रह-योग्य हैं ।

( ३ ) कुप्य के अध्यक्ष को और उसके सहयकों को चाहिए कि वे बाहर जंगलों के पास जनपद और दुर्ग आदि में गाड़ा तथा लकड़ी आदि से बनी हुई चीजें या सवारियों; सब तरह के बर्तन आदि को और अपनी आजीविका तथा नगर, जनपद की रक्षा के लिए अन्य आवश्यक वस्तुओं का भी संग्रह करे ।

अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में कुप्याध्यक्ष सत्रहवां अध्याय समाप्त ।

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