कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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(१) मालतीमूर्वार्कशणगवेथुकातस्यादिर्वल्कवर्गः । (२) मुञ्जबल्बजादि रज्जुभाण्डम् । तालीतालभूर्जानां पत्रम् । किंशुककुसुम्भकुङ्कुमानां पुष्पम् । (३) कन्दमूलफलादिरौषधवर्गः । (४) कालकूटवत्सनाभहालाहलमेषशृङ्गमुस्ताकुष्ठमहाविषवेल्लितक-गौराद्र्रबालकमार्कंटहैमवतकालिङ्गकदारदकाङ्कोलगरक्रोष्ट्रकादीनि विषाणि । (५) सर्पाः कीटाश्च । त एव कुम्भगताः । विषवर्गः । (६) गोधासेरकद्वीपिंशिशुमारसिंहव्याघ्रहस्तिमहिषचमरसृमरखड्ग-गोमृगगवयानां चर्मास्थिपित्तस्नावस्थ-( ? )-दन्तशृङ्गखुरपुच्छानि अन्येषां वापि मृगपशुपक्षिव्यालानाम् । (७) कालायसताम्रवृत्तकांस्यसीसत्रपुवैकृन्तकारकूटानि लोहानि ।
( १ ) मालती ( चमेली ), मूर्वा ( मरोरफली ), अर्क ( आक ), शण (सन), गवेथुका ( नागवला ) और अतसी ( अलसी ), आदि वल्कवर्ग के हैं ।
( २ ) मुंज ( मूंज ), बल्वज ( लवा घास ), ये रज्जु, अर्थात् रस्सी बनाने बनाने की घासें हैं । ताली ( ताड़ का एक भेद ), ताल ( ताड़ ),भूर्ज ( भोजपत्र ), इनका पत्ता लिखने के काम में आता है । किंशुक ( पलाश के फूल ), कुसुम्भ ( कुसुम के फूल ), और कंकुम ( केसर ), ये सब वस्त्र आदि रंगने के साधन हैं ।
( ३ ) कंद ( बिदारी, सूरण आदि ), मूल ( अनंतमूल, कामराज, खस आदि ), और फल ( आंवला, हर्रा, बहेडा आदि ), ये सब औषधिवर्ग हैं ।
( ४ ) कालकूट, वत्सनाभ, हलाहल, मेषशृङ्ग, मुस्ता, कुष्ठ, महाविष, वेल्लितक, गोराद्रं, बालक, मार्केट, हैमवत, कलिगक, दारदक, अङ्कोलसारक और कुष्ट्रक इत्यादि सब विष हैं ।
( ५ ) धारीदार साँप, मेंढक तथा छिपकली आदि को सीसे के घड़े में बन्द करके आगे आने वाले 'औपनिषदिक' प्रकरण में लिखी गई विधि के अनुसार जब संस्कार किया जाता है तो वह भी विष बन जाते हैं ।
( ६ ) गोधा ( गोह ), सेरक ( सफद गोह ) द्वीपी ( वघेरा ), शिशुमार (बड़ी जाति की मछली ), सिंह, व्याघ्र, हाथी, भैंसा, चमरगाय, साँभर, गैंडा, गाय, हरिण और नीलगाय इनकी खाल, हड्डी, दाँत पित्ता, नसें, सींग, खुर और पूंछ आदि सभी उपयोग में आने वाली चीजें संग्रह-योग्य हैं; इनके अतिरिक्त अन्य मृग, पशु-पक्षी, साँप आदि जानवरों के चर्म का भी संग्रह करना चाहिए ।
( ७ ) काला लोहा, तांबा, काँसा, सीसा, राँगा, इस्पात और पीतल, ये सब लोहे के भेद हैं ।