कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
आबलीयस नामक बारहवें अधिकरण में योगातिसन्धान-
प्र० १६८-१७० : अ० ५ ] योग-दण्डादि द्वारा विजय ७०१
(१) प्रत्युत्पन्ने वा कारणे यद्यदुपपद्येत तत्तदमित्रेऽन्तःपुरगते गूढसञ्चारः प्रयुञ्जीत, ततो गूढमेवापगच्छेत्, स्वजनसंज्ञां च प्ररूपयेत् । (२) द्वाःस्थान् वर्षवरांश्चान्यान् निगूढोपहितान् परे । तूर्यसंज्ञाभिराहूय द्विषच्छेषाणि घातयेत् ॥
इति आबलीयसे द्वादशेऽधिकरणे योगातिसन्धानं दण्डातिसन्धानम् एकविजयश्चेति पञ्चमोऽध्यायः, आदित एकोनचत्वारि- शदधिकशततमोऽध्यायः । समाप्तमिदमाबलीयसं नाम द्वादशमधिकरणम् ।
—: ० :—
को सुरंगों या तहखानों में छिपे हुए गुप्तचर मार डालें; अथवा छिपकर रहने वाले रसोइया तथा मांस बनाने वाले गुप्तचर विष देकर शत्रु को मार डालें; या किसी निषिद्ध एकान्त में सोते हुए राजा के ऊपर गुप्त वेषधारी स्त्री, सर्प, विष या अग्नि का प्रयोग कर उसको मार डाले ।
( १ ) अथवा समयानुसार जैसे कारण उपस्थित हों उन्हीं के अनुकूल उपायों द्वारा विजिगीषु अन्तःपुर में गये हुए शत्रु राजा को छिपकर मार डाले और छिपकर ही बाहर निकल आवे । अपने छिपे हुए व्यक्तियों को वह इशारों से उक्त अभिप्राय को समझा दे ।
( २ ) द्वारपाल, नपुंसक तथा अन्तःपुर आदि के अन्य गुप्तचर वेषधारी कर्मचारियों को तथा शत्रु के ऊपर छिपे तौर पर नियुक्त दूसरे गुप्तचरों को बाजे आदि के विशेष संकेतों द्वारा बुलाकर शत्रु के बाकी आदमियों को भी मार डाला जाय ।
आबलीयस नामक बारहवें अधिकरण में योगातिसन्धान- दण्डातिसन्धान-एकविजय नामक पांचवां अध्याय समाप्त ।
—: ० :—
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तेरहवाँ अधिकरण
तेरहवाँ अधिकरण
दुर्गलम्भोपाय
| प्रकरण १७१ | उपजापः |
|---|---|
| अध्याय १ |
(१) विजिगीषु परग्राममवाप्तुकामः सर्वज्ञदैवतसंयोगख्यापनाभ्यां स्वपक्षमुद्धर्षयेत्, परपक्षं चोद्वेजयेत् । (२) सर्वज्ञख्यापनं तु-गृहगुह्यप्रवृत्तिज्ञानेन प्रत्यादेशो मुख्यानां, कण्टक-शोधनापसर्पागमेन प्रकाशनं राजद्विष्टकारिणां, विज्ञाप्योपायनख्यापनम-दृष्टसंसर्गविद्यासंज्ञादिभिः, विदेशप्रवृत्तिज्ञानं तदहरेव गृहकपोतेन मुद्रा-संयुक्तेन । (३) दैवतसंयोगख्यापनं तु-सुरुङ्गामुखेनाग्निचैत्यदैवतप्रतिमाच्छिद्रानु-प्रविष्टैरग्निचैत्यदैवतव्यञ्जनैः सम्भाषणं पूजनं च, उदकादुत्थितैर्वा नाग-वरुणव्यञ्जनैः सम्भाषा पूजनं च, रात्रावन्तरुदके समुद्रवालुकाकोशं प्रणि-
उपजाप
(१) यदि विजिगीषु राजा अपने शत्रु के गाँव या शहर पर अधिकार करने का इच्छुक हो तो उसे चाहिए कि वह स्वयं को सर्वज्ञ तथा देवता का साक्षात्कार करने वाला प्रसिद्ध करके अपने पक्ष को उत्साहित करे और शत्रुपक्ष में बेचैनी फैला दे ।
(२) सर्वज्ञता की प्रसिद्धि के तरीके : अपनी सर्वज्ञता का प्रचार-प्रसार करने के लिये विजिगीषु को चाहिए कि वह अपने गुप्तचरों द्वारा, प्रमुख व्यक्तियों के घरों में छिपे तौर पर होने वाले बुरे कार्यों का पता लगाकर, उन प्रमुख व्यक्तियों को ऐसे कार्य करने से वर्जित करे । कण्टक शोधन अधिकरण में निर्दिष्ट अपसर्पोपदेश के द्वारा अपने शत्रुओं के गुप्त-भेदों को जानकर उन्हें उनके सामने प्रकट करे और ऐसा करने से उन लोगों को रोके । दूसरे लोगों से अज्ञात संसर्ग विद्या (नाचना, गाना) के संकेतों द्वारा अथवा गुप्तचरों से पता लगाकर राजा के लिए भेंटस्वरूप आने वाली वस्तुओं को वह पहिले ही बतला दे । विदेश में घटित होने वाली घटना को वह मुद्रायुक्त कपोत के द्वारा अपने घर पर बैठा ही बतला दे ।
(३) दैवसाक्षात्कार की प्रसिद्धि के तरीके : अपने दैव-साक्षात्कार के प्रचार-प्रसार के लिए विजिगीषु को चाहिए कि सुरंग के द्वारा आग के बीच में तथा देवताओं की पोली प्रतिमाओं के बीच में और समाधि (चैत्य) के बीच में गुप्तचरों को भेजकर राजा उनसे बातचीत करे एवं उनका पूजन करे; अथवा पानी से निकले
४५ कौ०
| ७०६ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ तेरहवां अधिकरण |
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धायाग्निमालादर्शनम्, शिलाशिक्यावगृहीते प्लवके स्थानम्, उदकबस्तिना जरायुणा वा शिरोऽवगूढनासः पृषतान्त्रकुलीरनक्रशिशुमारोद्भवसाभिर्वा शतपाकं तैलं नस्तः प्रयोगः तेन रात्रिगणशश्चरति इत्युदकचरणानि, तैर्वरुणनागकन्यावाक्यक्रिया सम्भाषणं च, कोपस्थानेषु मुखादग्निधूमोत्सर्गः । (१) तदस्य स्वविषये कार्तान्तिकनैमित्तिकमौहूर्तिकपौराणिकैक्षणिकगूढपुरुषाः साचिव्यकरास्तद्दर्शिनश्च प्रकाशयेयुः । परस्य विषये दैवतदर्शनं दिव्यकोशदण्डोत्पत्तिं च अस्य ब्रूयुः । दैवतप्रश्ननिमित्तवायसाङ्गविद्यास्वप्नमृगपक्षिव्याहारेषु चास्य विजयं ब्रूयुः, विपरीतममित्रस्य सदुन्दुभिमुल्कां च परस्य नक्षत्रे दर्शयेयुः ।
नागदेव तथा वरुण के वेष में रहने वाले गुप्तचर से बातचीत करे और उनकी पूजा भी करे । रात में मजबूत एवं जिनके भीतर पानी प्रवेश न कर सके, ऐसी पेटियों में रेता भर कर उनको पानी में छिपा दिया जाय और फिर उसके द्वारा पानी में आग लगाकर दिखाया जाय । रस्सियों में पत्थर बांध कर उनको नाव के नीचे से पानी में लटका दिया जाय, जिससे कि तेज धारा में नाव स्थिर खड़ी रह जाय । उदकबस्ती ( वाटरप्रूफ कपड़ा ) अथवा जरायु ( गर्भाशय के समान बनी हुई चमड़े की थैली ) से शिर और नासिका ढककर, साँभर की आंत ( पृषतान्त्र ), केंकडा ( कुलीर ), मगर ( नक्र ), शिरस नामक मछली ( शिशुमार ) और ऊद ( उद्भ ) नाम की मछली की चर्बी के साथ तेल को सौ बार पका कर उसका जो घोल तैयार हो उसको नाक में डाल दिया जाय । ऐसा करने से रात में झुंड के झुंड पुरुष जल में संतरण कर सकते हैं । जल में तैरते हुए वे पुरुष वरुण या नाग की कन्याओं जैसी आवाज निकालें और राजा उनके साथ बातचीत करे । क्रोधावेश प्रकट करते समय राजा औषधियों के द्वारा अपने मुँह से आग और धुआँ उगले ।
( १ ) राजा की उक्त आश्चर्यमयी बातों को उसके सहायक तथा दैवज्ञ ( कार्तान्तिक ), शुभाशुभ फल को बताने वाले ( नैमित्तिक ), ज्योतिषी ( मौहूर्तिक ), कथा-वाचक ( पौराणिक ), प्रश्नवक्ता ( ईक्षणिक ) और गुप्तपुरुष सर्वत्र प्रचारित करें । शत्रुदेश में भी ये लोग राजा के दैव-साक्षात्कार तथा स्वेच्छया दिव्यकोष एवं दिव्य सेना को पैदा कर देने की सनसनीपूर्ण खबर फैला दें । दैवतप्रश्न ( भाग्यप्रश्न ), शकुन ( निमित्त ), काकविद्या ( वायसविद्या ), अंग को देखकर फलाफल का निर्देश ( अंगविद्या ), स्वप्न, पशु-पक्षी आदि सभी निमित्तों से राजा की विजय को सूचित किया जाय और उल्कापात आदि को दिखाकर यह प्रसिद्धि करें कि शत्रु का कोई बड़ा अनिष्ट होने वाला है ।
प्र० १७१ : अ० १ ] उपजाप ७०७
(१) परस्य मुख्यान्मित्रत्वेनापदिशन्तो दूतव्यञ्जनाः स्वामिसत्कारं ब्रूयुः । स्वपक्षबलाधानं परपक्षप्रतिघातं च तुल्ययोगक्षेमममात्यानामायुधीयानां च कथयेयुः । येषु व्यसनाभ्युदयावेक्षणमपत्यपूजनं प्रयुञ्जीत ।
(२) तेन परपक्षमुत्साहयेद्यथोक्तं पुरस्तात् । भूयश्च वक्ष्यामः—साधारणगर्दभेन दक्षान्, लकुटशाखाहननाभ्यां दण्डचारिणः, कुलैडकेन चोद्विग्नान्, अशनिवर्षेण विमानितान्, विदुलेनावकेशिना वायसपिण्डेन कैतवजमेघेन वा विहताशान्, दुर्भगालङ्कारेण द्वेषिणेति पूजाफलान्, व्याघ्रचर्मणा मृत्युकूटेन चोपहितान्, पीलुविखादनेन करकयोष्ट्र्या गर्दभीक्षीराभिमन्थनेनेति ध्रुवापकारिण इति ।
(१) शत्रुमुख्यों के साथ मित्ररूप में रहने वाले गुप्तचर उनके सामने अपने स्वामी के द्वारा प्राप्त अपने आदर-सत्कार की खूब बड़ाई करें । शत्रु-प्रकृति तथा शत्रु-सेना के सामने वे गुप्तचर अपने पक्ष की सेना की उन्नति और शत्रुपक्ष की सेना के ह्रास अथवा दोनों के समान योगक्षेम की चर्चा करें । अमात्यों और सैनिकों के सामने वे कहें कि उनका राजा विपत्ति के समय अपने अनुचरों की पूरी सहायता करता है तथा अभ्युदय के समय दान, मान, संमान से सबको खुश करता है । किसी भी अधीनस्थ कर्मचारी के मर जाने पर उसके पुत्रों को सत्कृत करता है ।
(२) उक्त सभी कारणों का बखान कर शत्रु के अधीनस्थ कर्मचारियों को उससे भिन्न कर दिया जाय । शत्रुपक्ष में भेद डालने के लिए कुछ उपायों का वर्णन पीछे कर दिया गया है और कुछ विशेष उपाय इस प्रकार हैं : कार्यपटु एवं कर्मठ व्यक्तियों से यह कह दिया जाय कि राजा ने तुमको बिल्कुल गधा बना दिया है । इसी प्रकार सैनिकों से कहा जाय कि राजा ने उन्हें लठैत बना रखा है । शत्रु राजा से भयभीत कर्मचारियों को कहा जाय कि उन्हें झुंड से बिछड़े हुए या जीवन से निराश एक मेढ़े या बकरे की तरह बना दिया है । तिरस्कृत व्यक्तियों को कहा जाय कि किस प्रकार उन्होंने इतने वज्रपात के समान अपमान को चुपचाप पी लिया है । सर्वथा निराश व्यक्तियों को फलहीन बेंत, अखाद्य अन्नपिण्ड या न बरसने वाले बादल की उपमा देकर स्वामी राजा के विरोध में उकसाया जाय । ससंमान आभूषण आदि देकर पुरस्कृत व्यक्तियों से कहा जाय कि व्यभिचारिणी स्त्री को गहना पहनाने से क्या लाभ ? शत्रु द्वारा ठगे गये व्यक्तियों को मृत्यु स्थान; बनावटी व्याघ्र जैसे राजा का उदाहरण दिया जाय । शत्रु के निकटवर्ती सदा ही अपकार करने वाले व्यक्तियों को कहा जाय कि उन्हें तो पीलु वृक्ष का फल खिलाकर, ओले दिखाकर, ऊँटनी तथा गदही का दूध मथने का काम दिया गया है ।
७०८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तेरहवां अधिकरण
(१) प्रतिपन्नान् अर्थमानाभ्यां योजयेत् । द्रव्यभक्तच्छिद्रेषु चैनान् द्रव्यभक्तदानैरनुगृह्णीयात् । अप्रतिगृह्णतां स्त्रीकुमारालङ्कारानभिहरेयुः । (२) दुर्भिक्षस्तेनाटव्युपघातेषु च पौरजानपदानुत्साहयन्तः सत्रिणो ब्रूयुः—'राजानमनुग्रहं याचामहे, निरनुग्रहाः परत्र गच्छामः' इति । (३) तथेति प्रतिपन्नेषु द्रव्यधान्यपरिग्रहैः । साचिव्यं कार्यमित्येतदुपजापादद्भुतं महत् ॥
इति दुर्गलम्भोपाये त्रयोदशेऽधिकरणे उपजापो नाम प्रथमोऽध्यायः; आदितश्चत्वारिंशदुत्तरशततमः ।
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( १ ) जो लोग उकसाने में आकर शत्रु राजा का विरोध करने लगें उन्हें अच्छी तरह सत्कृत किया जाय और उन पर धन-अन्न का संकट आने पर उनकी पूरी सहायता की जाय । यदि वे लोग गौरव नष्ट होने के विचार से इस प्रकार अन्न-धन की सहायता लेना मंजूर न करें तो उनके स्त्री-पुत्रों के लिए आभूषण बना कर भेज दिये जायें ।
( २ ) दुर्भिक्ष के समय चोर और आटविकों की लूट-मार की दशा में गुप्तचर शत्रु राजा के ग्रामवासियों; नगरवासियों तथा जनपदवासियों को उत्साहित करते हुए कहें कि 'हम लोग राजा से सहायता की याचना करें । यदि राजा हमारी सहायता नहीं करता है तो हम लोगों को दूसरे राजा के आश्रय में चला जाना चाहिए ।' इस प्रकार शत्रु देश की प्रजा को राजा से भिन्न किया जाय ।
( ३ ) जब शत्रु देश की प्रजा गुप्तचरों की बात से राजी हो जाय तो विजिगीषु राजा को चाहिये कि धन, धान्य और निवास की सुविधा देकर उनकी सहायता करें । शत्रुपक्ष को शत्रु से भिन्न करने का यह अद्भुत उपाय है ।
दुर्गलम्भोपाय नामक तेरहवें अधिकरण में उपजाप नामक प्रथम अध्याय समाप्त ।
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| प्रकरण १७२ | ## योगवामनम् |
|---|---|
| अध्याय २ |
(१) मुण्डो जटिलो वा पर्वतगुहावासी चतुर्वर्षशतायुर्ब्रुवाणः प्रभूतजटिलान्तेवासी नगराभ्याशे तिष्ठेत् । शिष्याश्चास्य मूलफलोपगमनैरमात्यान् राजानं च भगवद्दर्शनाय योजयेयुः । समागतश्च राज्ञा पूर्वराजदेशाभिज्ञानानि कथयेत्—‘शते शते च वर्षाणां पूर्णेऽहमग्निं प्रविश्य पुनर्बालो भवामि, तदिह भवत्समीपे चतुर्थमग्निं प्रवेक्ष्यामि । अवश्यं मे भवान्मानयितव्यः, त्रीन् वरान् वृणीष्व’ इति । प्रतिपन्नं ब्रूयात्—‘सप्तरात्रमिह सपुत्रदारेण प्रेक्षाप्रहवणपूर्वं वस्तव्यम्’ इति । वसन्तमवस्कन्देत ।
(२) मुण्डो वा जटिलो वा स्थानिकव्यञ्जनः प्रभूतजटिलान्तेवासी बस्तशोणितदिग्धां वेणुशलाकां सुवर्णचूर्णेनावलिप्य वल्मीके निदध्यादुपजिह्विकानुसरणार्थं, स्वर्णनालिकां वा । ततः सत्री राज्ञः कथयेत्—‘असौ सिद्धः
कपट उपायों द्वारा राजा को लुभाना
( १ ) मुण्डित या जटाधारी साधु के वेश में पहाड़ की गुफा में अपने अनेक शिष्यों सहित रहने वाले गुप्तचर अपनी आयु को चार सौ वर्ष की बताकर नगर के समीप डेरा डालें । वे शिष्य लोग राजा तथा उसके अमात्यों को कन्द, मूल, फल लेकर उस भगवत्स्वरूप सिद्ध पुरुष के दर्शन करने के लिए उत्साहित करें । जब राजा उसके दर्शनार्थ जाये तब वह साधुवेशधारी गुप्तचर प्राचीन राजाओं और देशों के संबंध में अनेक बातें बताये तथा कहे ‘मैं सौ वर्ष बीत जाने पर अग्नि में प्रवेश करके फिर बालक बन जाता हूँ । अब यहाँ पर आपके सामने चौथी बार अग्नि में प्रवेश करूँगा । कुछ वरदान देकर मैं आपको संमानित करना चाहता हूँ । अपने इच्छानुसार आप मुझसे तीन वर माँग सकते हैं ।’ यदि राजा इन बातों को मान ले तो आगे कहें ‘आप अपने स्त्री-पुत्रों सहित सात रात्रि तक खेल-तमाशा कराते हुए तथा उत्सव मनाते हुए यहाँ मेरे आश्रम पर निवास करें ।’ जब वह राजा सपरिवार वहाँ रहने लगे तो सोते समय चुपके से उसको मार दिया जाय ।
( २ ) अथवा मुंडित या जटाधारी के वेश में अनेक शिष्यों सहित किसी स्थान में रहने वाला मठाधीश गुप्तचर बकरे के खून से सनी तथा स्वर्ण चूर्ण से लिपटी, या सुवर्ण युक्त एक बाँस की नली को जंगल में जाकर पहिचान के लिए किसी बाँबी में रख दे । वह बाँस की नली ऐसे स्थान पर रख दी जाय जिससे सांप आसानी से
| ७१० | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ तेरहवां अधिकरण |
|---|
पुष्पितं निधिं जानाति' इति । स राज्ञा पृष्टः 'तथा' इति ब्रूयात् । तच्चाभिज्ञानं दर्शयेत् । भूयो वा हिरण्यमन्तराधाय ब्रूयाच्चैनम्-'नागरक्षितोऽयं निधिः प्रणिपातसाध्यः इति । प्रतिपन्नं ब्रूयात्-'सप्तरात्रम्' इति समानम् । (१) स्थानिकव्यञ्जनं वा रात्रौ तेजनानिग्नयुक्तमेकान्ते तिष्ठन्तं सत्रिणः क्रमाभिनीतं राज्ञः कथयेयुः-'असौ सिद्धः सामैधिकः' इति । तं राजा यमर्थं याचेत, तमस्य करिष्यमाणः 'सप्तरात्रम्' इति समानम् । (२) सिद्धव्यञ्जनो वा राजानं जम्भकविद्याभिः प्रलोभयेत् । 'तं राजा' इति समानम् । (३) सिद्धव्यञ्जनो वा देशदेवतामभ्यर्हितामाश्रित्य प्रहवणैरभीक्ष्णं प्रकृतिमुख्यानभिसंवास्य क्रमेण राजानमतिसन्दध्यात् । (४) जटिलव्यञ्जनमन्तरुदकवासिनं वा सर्वश्वेतं तटसुरुङ्गाभूमिगृहापसरणं वरुणं नागराजं वा सत्रिणः क्रमाभिनीतं राज्ञः कथयेयुः । 'तं राजा' इति समानम् ।
भीतर-बाहर आ-जा सके। तदनंतर सत्री गुप्तचर राजा से जाकर कहे 'अमुक सिद्ध पुरुष जमीन में गड़े हुए खजाने को बता सकता है।' राजा के पूछने पर अपनी अभिज्ञता को स्वीकार कर ले और तत्संबंधी कुछ चिह्न भी बताये। अथवा वहाँ और भी धन गाड़कर राजा से कहे कि 'यह खजाना साँपों से सुरक्षित है। इसलिए इसको बड़ी तजवीज से ही प्राप्त किया जा सकता है।' जब राजा, सिद्ध को बातों को मान ले तब उससे कहे 'आपको सात रात तक सपरिवार मेरे समीप रहना होगा।' तदनन्तर सोते समय रात में उसको मार डाला जाय।
(१) अथवा रात्रि के एकांत में अपने शरीर को अग्नि के समान प्रज्वलित कर बैठे हुए उस सिद्ध महात्मा को सत्री गुप्तचर राजा को दिखायें तथा राजा से कहें कि 'यह सिद्ध पुरुष भावी समृद्धि को बता सकता है।' तदनंतर राजा उस सिद्ध पुरुष से जिस समृद्धि की याचना करे उसको भविष्य में पूरा कर देने का वायदा कर राजा को सात रात्रि तक सपरिवार आश्रम में रहने के लिए कहा जाय और फिर पूर्ववत् उसको मार डाला जाय।
(२) अथवा सिद्ध के वेष में रहने वाला गुप्तचर राजा को कपट विद्याओं से प्रलोभन में फँसाकर पूर्ववत् मार डाले।
(३) अथवा सिद्ध के वेष में रहने वाला गुप्तचर किसी प्रसिद्ध देवता के मंदिर में रहकर निरंतर सहभोज और उत्सव के द्वारा राजा की अमात्यप्रकृति को अपने वश में करके उस प्रकृतिवर्ग के ही द्वारा राजा को मरवा डाले।
(४) इसी प्रकार मुण्डित या जटाधारी गुप्तचर उदकचरी विद्याओं के
प्र० १७२ : अ० २ ] योगवामन ७११
(१) जनपदान्तेवासी सिद्धव्यञ्जनो वा राजानं शत्रुदर्शनाय योजयेत् । प्रतिपन्नं बिम्बं कृत्वा शत्रुमावाहयित्वा निरुद्धे देशे घातयेत् । (२) अश्वपण्योपयाता वैदेहकव्यञ्जनाः पण्योपायननिमित्तमाहूय राजानं पण्यपरीक्षायामासक्तमश्वव्यतिकीर्णं वा हन्युः, अश्वैश्च प्रहरेयुः । (३) नगराभ्याशे वा चैत्यमारुह्य रात्रौ तीक्ष्णाः कुम्भेषु नालीन् वा विदलानि धमन्तः-‘स्वामिनो मुख्यानां वा मांसानि भक्षयिष्यामः, पूजा नो वर्तताम्’ इत्यव्यक्तं ब्रूयुः । तदेषां नैमित्तिकमौहूर्तिकव्यञ्जनाः ख्यापयेयुः । (४) मङ्गल्ये वा ह्रदे तटाकमध्ये वा रात्रौ तेजनतैलाभ्यक्ता नागरूपिणः शक्तिमुसलान्ययोमयानि निष्पेषयन्तस्तथैव ब्रूयुः । ऋक्षचर्मकञ्चुकिनो वा अग्निधूमोत्सर्गयुक्ता रक्षोरूपं वहन्तस्त्रिरपसव्यं नगरं कुर्वाणाः श्वशृगाल-
द्वारा अपने आप को जल के भीतर छिपा कर अपने स्वरूप को स्वच्छ, श्वेत एवं दिव्य, देवता के रूप की तरह बना लें । फिर सत्री गुप्तचर उसको वरुण देवता या नागराज कहकर उसका प्रचार करे । जब राजा उस पर विश्वास कर अपनी मनो-कामना पूर्ण करने की याचना करे तो उसे पूर्ववत् मार डाला जाय ।
( १ ) अथवा जनपद की सीमा में रहने वाला सिद्धवेष गुप्तचर वहाँ के राजा को शत्रु राजा से मिला देने का प्रपंच रचे । जब राजा इस पर राजी हो जाय तो पूर्व निर्धारित सांकेतिक चिह्नों के द्वारा शत्रु राजा को वहाँ बुलाकर फिर उस फँसाये गये राजा को एकांत में मार दिया जाय ।
( २ ) घोड़ों के व्यापारी गुप्तचर अच्छे-अच्छे घोड़ों को लेकर शत्रु राज्य में जायें और सौदे के बहाने शत्रु को अपने पास बुलायें । जब राजा घोड़ों की परीक्षा कर ले या घोड़ों से घिर जाय तब उसको मार दिया जाय और उन्हीं घोड़ों पर सवार होकर उसकी राजधानी पर हमला बोल दिया जाय ।
( ३ ) अथवा नगर के समीपस्थ किसी समाधि या श्मशान में खड़े वृक्ष पर चढ़ कर सत्री गुप्तचर रात में अव्यक्त रूप से इस प्रकार बोलें 'हम इस राजा के या इसकी मुख्य प्रकृतियों के मांस को अवश्य खायेंगे, हमारी पूजा होनी चाहिए ।' इस इस बात को शकुनवक्ता ( नैमित्तिक ) तथा ज्योतिषी ( मौहूर्तिक ) के वेष में रहने वाले गुप्तचर सर्वत्र प्रकाशित कर दें ।
( ४ ) अथवा किसी मांगलिक गहरे जलाशय में रात के समय वे गुप्तचर नाग का रूप बनाकर तथा शरीर में जलने वाले तेल की मालिश कर हाथ में लोहे की बनी हुई शक्ति और मूसल लेकर उन्हें परस्पर रगड़ते हुए चिल्लायें कि हम राजा और उसके मंत्रियों का मांस खायेंगे; हमारी पूजा होनी चाहिए' । अथवा रीछ की खाल को ओढ़ कर राक्षसों का वेष बनाये मुँह से आग-धुआं उगलते हुए, नगर के
७१२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तेरहवां अधिकरण
वाशितान्तरेषु तथैव ब्रूयुः । चैत्यदैवप्रतिमां वा तेजनतैलेनाभ्रपटलच्छन्नेना- ग्निना वा रात्रौ प्रज्वाल्य तथैव ब्रूयुः । तदन्ये ख्यापयेयुः ।
(१) दैवतप्रतिमानाभ्यर्हितानां वा शोणितेन प्रस्रावमतिमात्रं कुर्युः । तदन्ये देवरुधिरसंस्रावे संग्रामे पराजयं ब्रूयुः ।
(२) सन्धिरात्रिषु श्मशानप्रमुखे वा चैत्यमूर्ध्वभक्षितैर्मनुष्यैः प्ररूप- येयुः । ततो रक्षोरूपी मनुष्यकं याचेत । यश्चात्र शूरवादिकोऽन्यतमो वा द्रष्टुमागच्छेत् तमन्त्ये लोहमुसलैर्हन्युः, यथा रक्षोभिर्हत इति ज्ञायेत । तद- द्भुतं राज्ञस्तद्दर्शिनः सत्रणश्च कथयेयुः । ततो नैमित्तिकमौहूर्तिकव्यञ्जनाः शान्ति प्रायश्चित्तं ब्रूयुः—'अन्यथा महदकुशलं राज्ञो देशस्य च' इति । प्रति- पन्नम्—'एतेषु सप्तरात्रमेकैक मन्त्रबलिहोम स्वयं राज्ञा कर्तव्यम्' इति ब्रूयुः । ततः समानम् ।
चारों ओर बाँई ओर से तीन परिक्रमा करते हुए वे गुप्तचर कुत्तों तथा सियारों की भाषा में ऊपर की तरह आवाज लगायें । अथवा जलने वाले तेल ( तेजनतैल ) में अभ्रक मिलाकर उसके बीच में श्मशान के देवता की ढकी हुई मूर्ति को रात में जलाकर वे गुप्त पुरुष राजा तथा उसके मंत्रियों को खा जाने की बात कहें । दूसरे सभी गुप्तचर इन बातों को नगर भर में फैला दें ।
( १ ) अथवा गुप्तचर देवप्रतिमाओं के भीतर से बकरे आदि के खून को इस प्रकार बहाये कि देखने वालों को ऐसा प्रतीत हो कि देवप्रतिमाएँ स्वयं ही खून उगल रही हैं । तदनन्तर गुप्तचर इस अपशकुन को नगर भर में यह कह कर प्रचारित करे कि संग्राम में अवश्य ही राजा की पराजय होगी ।
( २ ) अथवा पूर्णिमा या अमावस की रातों में ऊपर के भाग जिनके खाये गये हैं ऐसे मनुष्यों द्वारा चिता के चिह्नों को दिखाया जाय । तदनन्तर राक्षस बना हुआ कोई गुप्तचर वहीं प्रकट होकर अपने भोजन के लिए एक पुरुष को माँगे । अपने आप को बहादुर कहने वाला जो-कोई भी व्यक्ति वहाँ देखने के लिए आया हो उसको दूसरे सभी गुप्तचर लोहे के मूसलों से मार डालें, जिससे सब लोगों को यही मालूम हो कि अमुक व्यक्ति को राक्षसों ने मार डाला है । इस अद्भुत घटना को देखने वाले लोग तथा गुप्तचर इस बात को राजा तक पहुँचायें । तदनन्तर गुप्तचरों के वेष में रहने वाले नैमित्तिक तथा मौहूर्तिक लोग राजा से शान्ति और प्रायश्चित्त के लिए कहें कि यदि ऐसा न किया गया तो राजा-प्रजा का बड़ा अनिष्ट होगा । जब राजा इस बात को स्वीकार कर ले तो उस दुर्निमित्त शान्ति के लिए राजा को सात रात्रि तक बलि, मंत्र तथा होम करने को राजी कर पूर्ववत् उसका वध किया जाय ।
प्र० १७२ : अ० २] योगवामन ७१३
(१) एतान् वा योगानात्मनि दर्शयित्वा प्रतिकुर्वीत, परेषामुपदेशार्थम् । ततः प्रयोजयेद्योगान् । योगदर्शनप्रतीकारेण वा कोशाभिसंहरणं कुर्यात् । (२) हस्तिकामं वा नागवनपाला हस्तिना लक्षण्येन प्रलोभयेयुः, प्रतिपन्नं गहनमेकायनं वाऽतिनीय घातयेयुः, बद्ध्वा वापहरेयुः । (३) तेन मृगयाकामो व्याख्यातः । (४) द्रव्यस्त्रीलोलुपमाढ्यविधवाभिर्वा परमरूपयौवनाभिः स्त्रीभिर्दायादनिक्षेपार्थमुपनीताभिः सत्रिणः प्रलोभयेयुः । प्रतिपन्नं रात्रौ सत्रिच्छन्नाः समागमे शस्त्ररसाभ्यां घातयेयुः । (५) सिद्धप्रव्रजितचैत्यस्तूपदैवतप्रतिमानाम्भीक्ष्णाभिगमनेषु वा भूमिगृहसुरुङ्गागूढभित्तिप्रविष्टास्तीक्ष्णाः परमभिहन्युः । (६) येषु देशेषु याः प्रेक्षाः प्रेक्षते पार्थिवः स्वयम् । यात्राविहारे रमते यत्र क्रीडति वाम्भसि ॥
( १ ) विजिगीषु राजा को चाहिए कि उक्त सभी योगों को वह स्वयं तथा अपने गुप्तचरों, अपने सहायकों को सिखलाये और तब अपने ऊपर किये जाने वाले इस प्रकार के योगों का प्रतीकार कराये । यथावसर उन प्रयोगों द्वारा शत्रु को अपने वश में करे । अथवा इन्हीं प्रयोगों के द्वारा अपना कोष बढ़ाये ।
( २ ) अथवा विजिगीषु के हस्तिवनों के रक्षक पुरुष अच्छे हाथियों को दिखाकर, हाथी की इच्छा रखने वाले शत्रु राजा को, प्रलोभन दें । जब वह इस बात पर राजी हो जाय तो घने जंगल में ले जाकर उसको मार दिया जाय; अथवा गिरफ्तार कर अपने राजा के पास ले आवें ।
( ३ ) इसी प्रकार शिकार की इच्छा रखने वाले शत्रुराजा के संबंध में भी समझना चाहिए ।
( ४ ) अथवा जो राजा धन तथा स्त्रियों की कामना करता हो उसको सत्री गुप्तचर धनसंपन्न विधवा स्त्रियों के द्वारा या दायभाग तथा अमानत के मुकदमों के बहाने वहाँ लायी गयी अत्यंत रूपवती जवान स्त्रियों के जाल में फँसा दिया जाय । जब राजा उनके काबू में हो जाय तब संयोग के लिए किसी एकांत स्थान को नियुक्त कर, वहाँ रात के समय शस्त्र या विष के द्वारा उस राजा को मार दिया जाय ।
( ५ ) अथवा ऐसे अवसरों पर जबकि राजा किसी सिद्ध पुरुष, किसी उच्च भिक्षु या श्मशान के स्तूप, या देवताओं के दर्शनार्थ बार-बार आये-जाये उस समय सुरंग, भूमिगृह तथा गूढभित्तियों में छिपे हुए गुप्तचर उसको मार डालें ।
( ६ ) शत्रुराजा जिन देशों में नाच, गाना, या तमाशा आदि को देखने जाता हो तथा उत्सवों में शामिल होता हो अथवा जहाँ जलक्रीडा करता हो; अथवा जहाँ
७१४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तेरहवां अधिकरण
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चाटूक्तचांदिषु कृत्येषु यज्ञप्रहवणेषु वा ।
सूतिकाप्रेतरोगेषु प्रीतिशोकभयेषु वा ॥
प्रमादं याति यस्मिन्वा विश्वासात्स्वजनोत्सवे ।
यत्रास्यारक्षिसञ्चारो दुर्दिने सङ्कुलेषु वा ॥
विप्रस्थाने प्रदीप्ते वा प्रविष्टे निर्जनेऽपि वा ।
वस्त्राभरणमाल्यानां फेलाभिः शयनासनैः ॥
मद्यभोजनफेलाभिस्तूर्यैर्वाभिहतैः सह ।
प्रहरेयुररींस्तीक्ष्णाः पूर्वप्रणिहितैः सह ॥
(१) यथैव प्रविशेयुश्च द्विषतः सत्रहेतुभिः ।
तथैव चापगच्छेयुरित्युक्तं योगवामनम् ॥
इति दुर्गलम्भोपाये त्रयोदशेऽधिकरणे योगवामनं नाम द्वितीयोऽध्यायः;
आदित एकचत्वारिंशदुत्तरशततमः ।
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पर धिक्कार के योग्य कार्य करता हो, या यज्ञ, उत्सव, सूतिका, मृत्यु, रोग, प्रीति, शोक, भय आदि में प्रसन्न, दुःखी और भयभीत होता हो; अथवा जब किसी सगे-संबंधी के यहाँ उत्सव में सम्मिलित होकर प्रमत्त हो जाता हो, अथवा जहाँ रक्षित पुरुषों के बिना ही जाता-आता हो, अथवा किसी दुर्दिन या भीड़-भिड़ाके के अवसरों पर, अथवा निर्जन स्थान में, अथवा नगर में आग लग जाने पर, या नीरव घने जंगल में शत्रु के प्रविष्ट हो जाने पर—ऐसी स्थितियों में पहिले ही से छिपे हुए गुप्तचर, ज्यों ही इशारे के लिए वस्त्र, आभरण, माला, शयन, आसन, मद्य, भोजन आदि अवसरों पर तूर्यघोष हो, वैसे ही वे धावा बोल दें ।
( १ ) जिस प्रकार सत्री आदि गुप्तचर शत्रुओं के बीच में प्रविष्ट हुए हों, उसी छल से वे बाहर निकल आवें, अन्यथा उनके पकड़े जाने की संभावना हो सकती है । यहाँ तक योगवामन ( कपट उपायों द्वारा राजा को लुभाना ) का निरूपण किया गया ।
दुर्गलम्भोपाय नामक तेरहवें अधिकरण में योगवामन नामक दूसरा अध्याय समाप्त
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प्रकरण १७३ अध्याय ३
अपसर्पप्रणिधिः
(१) श्रेणीमुख्यमाप्तं निष्पातयेत् । स परमाश्रित्य पक्षापदेशेन स्वविषयात् साचिव्यकरणसहायोपादानं कुर्वीत । कृतापसर्पोपचयो वा परमनुमान्य स्वामिनो दूष्यग्रामं वीतहस्त्यश्वं दूष्यामात्यं दण्डमाक्रन्दं वा हत्वा परस्य प्रेषयेत् । जनपदैकदेशं श्रेणीमटवीं वा सहायोपादानार्थं संश्रयेत । विश्वासमुपगतः स्वामिनः प्रेषयेत् । ततः स्वामी हस्तिबन्धनमटवीघातं वापदिश्य गूढमेव प्रहरेत् ।
(२) एतेनामात्याटविका व्याख्याताः ।
(३) शत्रुणा मैत्रीं कृत्वा अमात्यानवक्षिपेत् । ते तच्छत्रोः प्रेषयेयुः—‘भर्तारं नः प्रसादय’ इति । स यं दूतं प्रेषयेत् । तमुपालभेत—‘भर्ता ते माम-
गुप्तचरों का शत्रु देश में निवास
( १ ) विजिगीषु राजा को चाहिए कि वह अपने किसी अत्यन्त विश्वस्त श्रेणी-मुख्य को बनावटी शत्रुतावश अपने राज्य से निकाल दे । वह शत्रु-राजा की शरण में जाकर उसका विश्वास प्राप्त करे और उसके कार्य का बहाना बनाकर छिपे तौर से अपने देश की युद्धोपयोगी सहायक वस्तुओं का संग्रह करे । सहायतार्थ जब उसके पास पर्याप्त गुप्तचर एकत्र हो जायँ तब वह शत्रु-राजा की अनुमति से अपने राजा के किसी दूष्यवर्ग या मित्र पर आक्रमण कर वहाँ से विजित हाथी, घोड़े, राजद्रोही अमात्य, सैनिक और मित्र आदि को गिरफ्तार कर शत्रु-राजा के पास भेज दे । विजिगीषु के उस विश्वस्त व्यक्ति को चाहिए कि वह जनपद के किसी एक देश, संघ या आटविक पुरुषों को अपने उस बनावटी स्वामी की सहायता के लिए तैयार करके फिर उनके साथ गुप्त-मंत्रणा करे । जब गुप्त-मंत्रणा द्वारा वे लोग वस्तुस्थिति को जानकर पूरी तरह सहमत हो जाँय तो उन्हें अपने असली स्वामी के सहायतार्थ उसके पास भेज दे । तदनन्तर हाथियों को पकड़ने या जंगल को नष्ट करने का बहाना बनाकर विजिगीषु राजा अपने असावधान शत्रु पर आक्रमण कर दे ।
( २ ) इसी प्रकार अमात्य तथा आटविक को गुप्तचर बनाकर शत्रु-देश में भेज देने की रीति को भी समझ लेना चाहिए ।
( ३ ) विजिगीषु राजा को चाहिए कि वह अपने शत्रु राजा के साथ बनावटी मित्रता करके अपने अमात्यों का तिरस्कार कर दे, वे अमात्य उस शत्रु-राजा के
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मात्यैर्भेदयति, न च पुनरिहागन्तव्यम्' इति । अथैकममात्यं निष्पातयेत् । स परमाश्रित्य योगापसर्परक्तदूष्यानशक्तिमतः स्तेनाटविकानुभयोपघातकान् वा परस्योपहरेत् । आप्तभावोपगतः प्रवीरपुरुषोपघातमस्योपहरेत् । अन्तपालमाटविकं दण्डचारिणं वा—'दृढमसौ चासौ च ते शत्रुगा सन्धत्ते' इति । अथ पश्चादभित्यक्तशासनै रेनान्धातयेत् । (१) दण्डबलव्यवहारेण वा शत्रुमुद्योज्य घातयेत् । (२) कृत्यपक्षोपग्रहेण वा परस्यामित्रं राजानमात्मन्यपकारयित्वाभियुञ्जीत । ततः परस्य प्रेषयेत् । 'असौ ते वैरी ममापकरोति, तमेहि सम्भूय हनिष्यावः । भूमौ हिरण्ये वा ते परिग्रहः' इति । प्रतिपन्नमभिसत्कृत्यागत-
पास अपने दूत को इस प्रकार का संदेश लेकर भेजें कि 'आप हमारे स्वामी को प्रसन्न करा दीजिए ।' उसके बाद जब शत्रु-राजा अपने जिस दूत को विजिगीषु राजा के पास भेजे, उसको विजिगीषु राजा यह कह कर धमका दे कि 'तुम्हारा राजा, हमारे अमात्यों को हमसे अलग करना चाहता है । खबरदार ! ऐसा संदेश लेकर मेरे पास फिर कभी न आना' । इसके बाद विजिगीषु राजा उन अमात्यों में से एक अमात्य को अपने यहाँ से निकाल दे । वह अमात्य शत्रु-राजा की शरण में जाकर अपने राजा के गुप्तचर, गूढ़-पुरुष, दूष्य-पुरुष, चोर तथा 'आटविक आदि को साथ ले जाकर शत्रु-राजा के पास जाये और उससे कहे कि, 'मैंने आपके लिए इतने सहायक तैयार कर दिये हैं' जब शत्रु-राजा उस अमात्य पर पूरा विश्वास करने लगे तो वह अमात्य शत्रु-राजा के शक्तिशाली पुरुषों को मरवा डाले । वह अमात्य शत्रु-राजा से कहे कि 'आपके ये आटविक और सैनिक लोग बड़े दुष्ट हो गए हैं । मैं निश्चयपूर्वक कह सकता हूँ कि अमुक आटविक या अमुक सैनिक आपके शत्रु-राजा के साथ संधि कर रहे हैं ।' तदनन्तर वह अमात्य वध्य पुरुषों के पास आटविक और विजिगीषु की पारस्परिक मित्रता को प्रकट करने वाले कपट लेखों को उस शत्रु-राजा को दिखाकर उन अन्तःपाल आदि को मरवा डाले ।
( १ ) अथवा वह अमात्य शत्रु को सैनिक सहायता देने का वायदा कर उसको उसके शत्रु से भिड़ा दे और बाद में उसकी सहायता न कर उसके शत्रु द्वारा ही उसको मरवा डाले ।
( २ ) अथवा विजिगीषु को चाहिए कि वह शत्रु के क्रुद्ध, लुब्ध तथा भीत आदि प्रतिपक्ष को अपने अनुकूल बनाकर शत्रु के शत्रु राजा द्वारा अपना कुछ अपकार कराये और फिर उस पर चढ़ाई कर दे । उसके बाद विजिगीषु शत्रु-राजा के पास अपने दूत द्वारा यह संदेश भेजे कि 'यह तुम्हारा शत्रु-राजा बराबर मेरा अपकार कर रहा है, आओ, हम दोनों मिलकर उस पर चढ़ाई कर दें । इस विजय में जो
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मवस्कन्देन प्रकाशयुद्धेन वा शत्रुना घातयेत् । अभिविश्वासनार्थं भूमिदान-पुत्राभिषेकरक्षापदेशेन वा ग्राहयेत् । अविषह्यमुपांशुदण्डेन वा घातयेत् । स चेद्दण्डं दद्यात् न स्वयमागच्छेत्' तमस्य वैरिणा घातयेत् । दण्डेन वा प्रयातमिच्छेत् न विजिगीषुणा' तथाप्येनमुभयतः संपीडनेन घातयेत् । (१) अविश्वस्तो वा प्रत्येकशो यातुमिच्छेत्, राज्यैकदेशं वा यातव्यस्य आदातुकामः, तथाप्येनं वैरिणा सर्वसन्दोहेन वा घातयेत् । वैरिणा वा सक्तस्य दण्डोपनयेन मूलमन्यतो हारयेत् । (२) शत्रुभूम्या वा मित्रं पणेत मित्रभूम्या वा शत्रुम् । ततः शत्रुभूमि-लिप्सायां मित्रेणात्मन्यपकारयित्वाभियुञ्जीत । इति समानाः पूर्वेण सर्व एव योगाः ।
भूमि और हिरण्य प्राप्त होगा उसमें तुम्हें भी हिस्सा दिया जायेगा । जब शत्रु-राजा इस बात को स्वीकार कर विजिगीषु राजा के पास आ जाय तो पहले उसका अच्छा स्वागत-सत्कार किया जाय और बाद में सोते समय छिपकर उसका वध कर दिया जाय, अथवा प्रकाशयुद्ध के समय शत्रु के द्वारा ही उसको मरवा दिया जाय । यदि विजिगीषु की विजय हो जाय तो अपनी पूर्व प्रतिज्ञा के अनुसार जीते हुए हिरण्य तथा भूमि देने या पुत्र के राज्याभिषेक करने अथवा अपनी रक्षा करने के बहाने उस सहयोगी शत्रु-राजा को बुलाकर उसे कैद कर ले । यदि शत्रु इस प्रकार भी काबू में न आये तो उपांशु दंड द्वारा उसका वध करा दिया जाय । यदि विजिगीषु की सहायता के लिए शत्रु-राजा स्वयं न आकर अपनी सेना को ही भेज दे तो उस सेना को मुकाबले में लड़ाकर मरवा दिया जाय । यदि विजिगीषु के सहायतार्थ आया हुआ शत्रु-राजा अपनी सेना के साथ ही युद्ध-भूमि में आना चाहे, तब भी दोनों ओर से घेरा डालकर उसको मरवा दिया जाय ।
( १ ) यदि विजिगीषु के अविश्वास के कारण सहायतार्थ आया हुआ वह शत्रु-राजा इस नीयत से युद्ध में जाये कि अमुक हिस्से को जीत कर मैं अपने वश में कर लूंगा तब भी विजिगीषु उस शत्रु-राजा को उसके शत्रु-राजा द्वारा अपनी सम्पूर्ण सैनिक शक्ति के द्वारा अवश्यमेव मरवा डाले; अथवा लड़ाई में व्यस्त उस शत्रु-राजा की राजधानी में भेजकर विजिगीषु उसका अपहरण करवा डाले ।
( २ ) अथवा विजिगीषु राजा को चाहिए कि वह अपने मित्र के साथ छिपे तौर पर यह कह कर संधि कर ले कि 'यदि हम दोनों ने मिलकर शत्रु पर विजय प्राप्त कर ली तो उसकी भूमि को हम आपस में आधा-आधा बाँट लेंगे ।' इसी प्रकार विजिगीषु शत्रु-राजा के साथ भी छिपे तौर पर यह संधि कर ले कि 'हम दोनों मिल कर तुम्हारे अमुक शत्रु पर विजय प्राप्त करके उसकी भूमि को आपस में बराबर बाँट
७१८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तेरहवाँ अधिकरण
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(१) शत्रुं वा मित्रभूमिंलिप्सायां प्रतिपन्नं दण्डेनानुगृह्णीयात्, ततो मित्रगतमतिसन्दध्यात् । कृतप्रतिविधानो वा व्यसनमात्मनो दर्शयित्वा मित्रेणामित्रमुत्साहयित्वा आत्मानमभियोजयेत् । ततः संपीडनेन घातयेत्, जीवग्राहेण वा राज्यविनिमयं कारयेत् । मित्रेणाहूतश्चेच्छत्रुरगाह्यो स्थातु-मिच्छेत्, सामन्तादिभिर्मूलमस्य हारयेत्, दण्डेन वा त्रातुमिच्छेत्, तमस्य घातयेत् । (२) तौ चेन्न भिद्येयातां प्रकाशमेवान्योन्यस्य भूम्या पणेत, ततः परस्परं मित्रव्यञ्जनोभयवेतना वा दूतान् प्रेषयेयुः—‘अयं ते राजा भूमिं लिप्सते शत्रुसंहितः' इति । तयोरन्यतरो जाताशङ्कारोषः पूर्ववच्चेष्टेत । (३) दुर्गराष्ट्रदण्डमुख्यान् वा कृत्यपक्षहेतुभिरभिविख्याप्य प्रव्राजयेत्,
लेंगे' इसी प्रकार विजिगीषु राजा जब शत्रु को जीतने की इच्छा करे तो मित्र के द्वारा अपना कुछ अपकार कराके इसी बहाने से उसके ऊपर आक्रमण कर दे । इसके बाद आगे का कार्य पूर्ववत् किया जाय ।
(१) अथवा जब शत्रु-राजा विजिगीषु के मित्र राजा पर आक्रमण करने की इच्छा करे तो विजिगीषु अपनी ओर से सैनिक सहायता देने की प्रतिज्ञा कर उसको युद्ध में भिड़ा दे । जब सेनाएँ मित्र देश में युद्ध के लिए चली जायें तो वहाँ मित्र से मिलकर उस आक्रमणकारी शत्रु को ही मरवा दिया जाय । अथवा उसके ऊपर कोई बनावटी विपत्ति दिखाकर अपने मित्र के द्वारा शत्रु को उत्साहित करके विजिगीषु अपने ऊपर चढ़ाई करा दे । जब शत्रु-राजा विजिगीषु राजा पर चढ़ाई कर दे तो विजिगीषु और उसका मित्र दोनों ही उस आक्रमणकारी शत्रु को बीच में घेरकर मार डालें । अथवा उसको कैद में डालकर उसकी जगह अपने आज्ञाकारी उसके पुत्र या अन्य किसी सम्बन्धी का राज्याभिषेक कर दें । यदि विजिगीषु के मित्र द्वारा बुलाया हुआ वह शत्रु अलग रहकर ही विजिगीषु पर आक्रमण करना चाहे तो जिस समय वह शत्रु-राजा विजिगीषु के साथ युद्ध में फंसा हो, उस समय सामन्त राजा के द्वारा उसकी राजधानी को लुटवा दिया जाय । यदि सेना के द्वारा वह अपनी रक्षा करना चाहे तो उस सेना को ही मरवा दिया जाय ।
(२) यदि शत्रु और उसका मित्र आपस में मिले रहें तो उन्हें प्रकट रूप में भूमि तथा राज्य देने का प्रलोभन दिया जाय । तदनन्तर विजिगीषु और मित्र के उभय-वेतनभोगी मध्यस्थ दूतों के द्वारा यह सन्देश भेजा जाय कि 'यह राजा शत्रु से मिलकर तुम्हारे राज्य को लेना चाहता है ।' इस तरह दोनों में फूट और संदेह पैदा कर विजिगीषु राजा आक्रमणकारी शत्रु को मार डाले ।
(३) अथवा विजिगीषु अपने दुर्ग, राष्ट्र और सेना के मुख्य पुरुषों को यह
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ते युद्धावस्कन्दावरोधव्यसनेषु शत्रुमतिसन्दध्युः, भेदं वास्य स्ववर्गेभ्यः कुर्युः, अभित्यक्तशासनैः प्रतिसमानयेयुः ।
(१) लुब्धकव्यञ्जना वा मांसविक्रयेण द्वाःस्था दौवारिकापाश्रयाश्चोराभ्यागमं परस्य द्विस्त्रिरिति निवेद्य लब्धप्रत्यया भर्तुरनीकं द्विधा निवेश्य ग्रामवधेऽवस्कन्दे च द्विषतो ब्रूयुः—'आसन्नश्चोरगणः, महांश्चाक्रन्दः, प्रभूतं सैन्यमागच्छतु' इति । तदर्पयित्वा ग्रामघातदण्डस्य सैन्यमितरदादाय रात्रौ दुर्गद्वारेषु ब्रूयुः—'हतश्चोरगणः, सिद्धयात्रमिदं सैन्यमागतं, द्वारमपान्वियताम्' इति पूर्वप्रणिहिता वा द्वाराणि दद्युः, तैः सह प्रहरेयुः ।
(२) कारुशिल्पिपाषण्डकुशीलववैदेहकव्यञ्जनानायुधीयान् वा परदुर्गे प्रणिदध्यात् । तेषां गृहपतिकव्यञ्जनाः काष्ठतृणधान्यपण्यशकटैः प्रहरणा-
बहाना कर अपने यहाँ से निकाल दे कि वे लोग विजिगीषु के कृत्य पक्ष की सहायता करते हैं । निकाले हुए वे लोग शत्रु की शरण में जाकर युद्ध के समय, सोते समय, अन्तःपुर में रहते समय या किसी आपत्ति के समय मौका पाकर शत्रु को मार डालें । अथवा शत्रु-राजा और उसके अमात्यों के बीच फूट पैदा कर दें और वध्य पुरुषों के द्वारा लाये गये कपट लेखों के प्रमाण से शत्रु-राजा तथा उसके अमात्यों की फूट को अधिक बढ़ा दें ।
( १ ) अथवा शिकारी के वेश में रहने वाले गुप्तचर मांस बेचने के बहाने दरवाजे पर ठहर कर पहरेदारों से मित्रता करके दो तीन बार चिल्लाकर कहें कि 'शत्रु के गाँव में चोर आते हैं' । जब शत्रु राजा को उनकी बातों पर विश्वास हो जाय तो वे गुप्तचर अपने राजा की सेना को ग्रामवध और लूटमार करने ( अवस्कंद ) के लिए दो भागों में बाँट कर शत्रु-राजा से कहें कि 'चोरों का समूह बिलकुल नजदीक आ गया है, उनकी संख्या बहुत है, अतः मुकाबले के लिए आपकी बहुत-सी सेना हमारे साथ जानी चाहिए।' जब शत्रु-राजा चोरों को दण्ड देने के लिए अपनी सेना भेज दे तो वे ही गुप्तचर अपने राजा की सेना के दूसरे हिस्से को लेकर रात के समय दुर्ग के दरवाजों पर आकर चिल्ला-चिल्ला कर कहें कि 'हमने चोरों के समूह को मार डाला है, यह सेना अपने कार्य को सफल करके यहाँ पहुँच गयी है, इसलिए दुर्ग के दरवाजों को खोल दिया जाय' । अथवा पहिले नियुक्त हुए गुप्तचर ही इशारा पाकर दरवाजे खोल दें और उस सेना के सहित वे गुप्तचर दुर्ग पर हमला बोल दें ।
( २ ) अथवा कारु, शिल्पी, पाखण्डी, कुशीलव और वैदेहक आदि के वेष में रहने वाले या आयुधजीवियों के वेष में रहने वाले गुप्तचरों को भेदिया बनाकर दुर्ग में बसा देना चाहिए । उनमें से गृहस्थ के वेष में रहने वाले गुप्तचर दूसरे गुप्तचरों को लकड़ी, घास, अनाज आदि की गाड़ियों में हथियार तथा कवच आदि पहुँचाते रहें ।
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वरणान्यभिहरेयुः, देवध्वजप्रतिमाभिर्वा । ततस्तद्व्यञ्जनाः प्रमत्तवधमव- स्कन्दप्रतिग्रहमभिप्रहरणं पृष्ठतः शङ्खदुन्दुभिशब्देन वा प्रविष्टमित्यावेद- येयुः । प्राकारद्वाराट्टालकदानमनीकभेदं घातं वा कुर्युः । (१) सार्थगणवासिभिरातिवाहिकैः कन्यावाहिकैरश्वपण्यव्यवहारिभि- रुपकरणहारकैर्धान्यक्रेतृविक्रेतृभिर्वा प्रव्रजितलिङ्गिभिर्दूतैश्चदण्डातिनयनं सन्धिकर्म विश्वासनाथम् । (२) इति राजापसर्पाः । (३) एत एवाटवीनामपसर्पाः कण्टकशोधनोक्ताश्च । व्रजमटव्यासन्न- मपसर्पाः सार्थं वा चोरैर्घातयेयुः । कृतसङ्केतमन्नपानं चात्र मदनरसविद्धं वा कृत्वाऽपगच्छेयुः । गोपालकवैदेहकाश्च ततश्चोरान् गृहीतलोप्त्रभाराः मदन- रसविकारकालेऽवस्कन्दयेयुः । सङ्कर्षणदैवतीया वा मुण्डजटिलव्यञ्जनाः
अथवा देवताओं की ध्वजाओं तथा प्रतिमाओं के साथ वे हथियार वहाँ पहुँचाये जायें । उसके बाद कारु आदि के वेष में रहने वाले गुप्तचर प्रमादी पुरुषों के वध, बलात्कार, लूट-मार और चारों ओर के आक्रमण के सम्बन्ध में शंख तथा नगाड़े आदि बजाकर पीछे की ओर से हमला हो जाने की सूचना दें । जब शत्रु उनका प्रतीकार करने के लिए सेना लेकर पीछे की ओर से जाय तो इधर से वे गुप्तचर परकोटा प्रधान दरवाजा तथा उसके ऊपर की अटारी तोड़ने के साथ ही शत्रु ही सेना को पूर्ववत् विभक्त कर यथावसर उसको नष्ट कर दें ।
( १ ) उन्हीं गुप्तचरों को चाहिए कि दुर्गम मार्गों से पार करने वाले व्यापारियों के झुंड में रहते हुए, कन्याओं को ले जाते हुए, घोड़ों का व्यापार करते हुए, तत्सम्बन्धी दूसरे सौदों को बेचते हुए, सामान को इधर-उधर ढोते हुए, अनाज आदि की खरीद-फरोख्त करते हुए और संन्यासियों के वेष में रहते हुए अपनी सेनाओं को दुर्गम रास्तों से निकालकर बाहर ले आवें तथा शत्रु के विश्वास के लिए सन्धि की शर्तों का पूरा-पूरा ध्यान रखें ।
( २ ) इस प्रकार यहाँ तक राजाओं के गुप्त-पुरुषों का निरूपण किया गया ।
( ३ ) कण्टकशोधन अधिकरण में और इस अध्याय में कहे गए गुप्तचर ही आटविकों के भी समझने चाहिए । अर्थात् आवश्यकता होने पर आटविकों में भी वही गुप्तचर कार्य करें । आटविकों के बीच में रहने वाले गुप्तचरों को चाहिए कि वे जंगल के पास की गोशालाओं तथा राहगीरों को आटविकों के साथ मिलकर लूट डालें या नष्ट कर डालें, उसके बाद संकेत पाते ही उनके खाने-पीने की वस्तुओं में विष मिलाकर वहाँ से भाग निकलें । फिर ग्वालों और व्यापारियों के वेश में रहने वाले गुप्तचर चोरों द्वारा चुराये गये उस माल को स्वयं लेकर विष खाने से बेहोश