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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

२२८ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ दूसरा अधिकरण

२२८ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ दूसरा अधिकरण

(१) तेन गोमण्डलं खरोष्ट्रमहिषमजाविकं च व्याख्यातम् । (२) द्विरह्नः स्नानमश्वानां गन्धमाल्यं च दापयेत् । कृष्णसन्धिषु भूतेज्याः शुक्लेषु स्वस्तिवाचनम् ॥ (३) नीराजनामाश्वयुजे कारयेन्नवमेऽहनि । यात्रादाववसाने वा व्याधौ वा शान्तिके रतः ॥

इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणेऽश्वाध्यक्षो नाम त्रिंशोऽध्यायः, आदितः पञ्चाशः।

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पर करना चाहिए। यदि चिकित्सा और दवाई के दोष के कारण घोड़ा मर जाय तो जितनी कीमत का घोड़ा हो उतना दण्ड अश्वशाला के अध्यक्ष पर किया जाय ।

( १ ) घोड़ों की परिचर्या और चिकित्सा के लिए ऊपर जो नियम बताये गये हैं, गाय, बैल, गधा, ऊँट, भैंस और भेड़-बकरियों को परिचर्या चिकित्सा के सम्बन्ध में भी वही नियम समझने चाहिए; इनके सम्बन्ध में भी वही दण्ड-व्यवस्था है ।

( २ ) शरद और ग्रीष्म, दोनों ऋतुओं में घोड़ों को दो-दो बार नहलाना चाहिये । गन्ध और मालाएँ उन्हें प्रतिदिन दी जानी चाहिए । अमावस्था को घोड़ों के निमित्त भूतों को बलि देनी चाहिए । और पूर्णमासी को उनके कुशल-क्षेम के लिये स्वस्तिवाचन पढ़ा जाना चाहिए ।

( ३ ) आश्विन मास की नवमी को घोड़ों के स्वस्थ-नीरोग रहने के लिये नीराजना संस्कार करना चाहिए । यात्रा के आगे और यात्रा की समाप्ति पर और घोड़ों में कोई संक्रामक रोग फैलने पर भी नीराजना संस्कार करना चाहिए ।

अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में अश्वाध्यक्ष नामक तीसवाँ अध्याय समाप्त ।

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प्रकरण ४७# हस्त्यध्यक्षः
अध्याय ३१

(१) हस्त्यध्यक्षो हस्तिवनरक्षां दम्यकर्मक्षान्तानां हस्तिहस्तिनीकलभानां शालास्थानशय्याकर्मविधायवसप्रमाणं कर्मस्वायोगं बन्धनोपकरणं साङ्ग्रामिकमलङ्कारं चिकित्सकानीकस्थोपस्थायुकवर्गं चानुतिष्ठेत् । (२) हस्त्यायामद्विगुणोत्सेधविष्कम्भायामां हस्तिनीस्थानाधिकां सप्रग्रीवां कुमारीसङ्ग्रहां प्राङ्मुखीमुदङ्मुखीं वा शालां निवेशयेत् । (३) हस्त्यायामचतुरश्रश्लक्ष्णालानस्तम्भफलकान्तरकं मूत्रपुरीषोत्सर्गस्थानं निवेशयेत् । स्थानसमशय्यामर्धापाश्रयां दुर्गे सान्नाह्योपवाह्यानां बहिर्दम्यव्यालानाम् ।


गजशाला का अध्यक्ष

(१) गजशाला के अध्यक्ष को चाहिए कि वह हाथियों के जंगल की रक्षा करे; सिखाये जाने योग्य हाथी-हथिनी और उनके बच्चों के लिए वह गजशाला, बाँधने, उठने-बैठने के यथोचित स्थान बनवाये; वही युद्ध-सम्बन्धी कार्य, पका हुआ भोजन और हरी घास-भूसा आदि के तौल का निर्णय करे; हाथियों को हर तरह की चाल चलना सिखाये; हाथियों के अम्बारी, अंकुश आदि साजों और युद्धसम्बन्धी आभूषणों का प्रबन्ध करे; हाथियों के चिकित्सक और उनकी सेवा-टहल करने वाले कर्मचारियों पर भी अध्यक्ष नजर रखे ।

(२) हाथी के लिए उसकी लम्बाई से दुगुनी ऊँची, दुगुनी चौड़ी और दुगुनी लम्बी गजशाला बनवानी चाहिए, हथिनी के रहने की गजशाला उससे छह हाथ अधिक लम्बी होनी चाहिए, गजशाला के आगे बरामदा, उसमें बाँधने के लिये तराजू के आकार के खूंटे (कुमारी) और उसके दरवाजे पूर्व या उत्तर की ओर होने चाहिए ।

(३) हाथी की लम्बाई जितना, चौकोर, चिकना एक खूंटा वहाँ गाड़ा जाय, खूंटा एक तख्ते के बीच में लगाकर गाड़ा जाय, जिससे ऊपर की जमीन ढकी रहे और खूंटे को उखाड़ा न जा सके; पाखाना और पेशाब के लिए पीछे की ओर ढलवां स्थान बनवाना चाहिए । हाथी के सोने-बैठने के लिए एक चबूतरा-सा बनवाया जाय, जिसकी ऊँचाई साढ़े चार हाथ होनी चाहिए । युद्ध तथा सवारी के उपयोगी हाथियों की शय्या किले के भीतर ही बनवाई जाय, जो हाथी अभी सिखवा या बनैले हों उन्हें किले के बाहर ही रखना चाहिए ।

२३० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण

(१) प्रथमसप्तमावष्टमभागावह्नः स्नानकालौ, तदनन्तरं विधायाः । पूर्वाह्ने व्यायामकालः, पश्चादह्नः प्रतिपानकालः । रात्रिभागौ द्वौ स्वप्नकालौ, त्रिभागः संवेशनोत्थानिकः । (२) ग्रीष्मे ग्रहणकालः । विंशतिवर्षो ग्राह्यः । (३) विक्को मूढो मत्कुणो व्याधितो गर्भिणी धेनुका हस्तिनी चाग्राह्याः । (४) सप्तारत्निरुत्सेधो नवायामो दशपरिणाहः । प्रमाणतश्चत्वारिंशद्वर्षो भवत्युत्तमः । त्रिंशद्वर्षो मध्यमः । पञ्चविंशतिवर्षोऽवरः । (५) तयोः पादावरो विधाविधिः । (६) अरत्नौ तण्डुलद्रोणः । अर्धाढकं तैलस्य । सर्पिषस्त्रयः प्रस्थाः । दशपलं लवणस्य । मांसं पञ्चाशतपलिकम् । रसस्याढकं द्विगुणं वा दध्नः पिण्डक्लेदनार्थम् । क्षारं दशपलिकम् । मद्यस्य आढकं द्विगुणं वा पयसः प्रतिपानम् गात्रावसेकस्तैलप्रस्थः शिरसोऽष्टभागः प्रादीपकश्च । यवस्य द्वौ भारौ सपादौ शष्पस्य शुष्कस्यार्धतृतीयो भारः । कडङ्गारस्यानियमः ।


( १ ) एक दिन के, बराबर आठ भागों में पहिला तथा सातवाँ भाग हाथी के स्नान करने के लिये होना चाहिए। स्नान के बाद ( अर्थात् दूसरे और आठवें भाग में ) उन्हें पका खाना खिलाना चाहिए, दोपहर से पहिले उन्हें कवायद सिखानी चाहिए, दोपहर के बाद पीने के लिये देना चाहिए । रात के बराबर तीन भागों में से दो भाग सोने के लिए और एक भाग उठने-बैठने के लिए होना चाहिए ।

( २ ) गर्मी के मौसम में ही हाथियों को पकड़ना चाहिए । बीस वर्ष या उससे अधिक आयु का हाथी पकड़ने योग्य है ।

( ३ ) दूध पीने वाला हाथी ( विक्क ), हथिनी के समान दातों वाला ( मूढ ), जिसके दाँत न निकले हों ( मत्कुण ) बीमार हाथी और गर्भिणी तथा दूध चुराने वाली हथनी को न पकड़ना चाहिये ।

( ४ ) सात हाथ ऊँचा, नौ हाथ लम्बा और दस हाथ मोटा, चालीस वर्ष उम्र वाला हाथी सर्वोत्तम समझा जाता है । तीस वर्ष का मध्यम; और पच्चीस वर्ष का अधम माना गया है ।

( ५ ) उत्तम हाथी को जितना आहार दिया जाय उससे चौथाई हिस्सा कम मध्यम को और उससे भी चौथाई हिस्सा कम अधम को दिया जाना चाहिए ।

( ६ ) सात हाथ ऊँचे उत्तम हाथी को एक द्रोण चावल, आधा आढक तेल, तीन प्रस्थ घी, दस पल नमक, पचास पल मांस, एक आढक शोरवा या दो आढक दही में सना हुआ दाना दस पल गुड़, दोपहर के बाद पीने के लिए एक आढक शराब या उससे दुगुना दूध, शरीर के मलने के लिए एक प्रस्थ तेल, शिर में लगाने के लिए आधा कुडब तेल, इतना ही तेल रात को लगाने के लिए, चालीस तुला तृण, पचास

प्र० ४७ : अ० ३१ ] गजशाला का अध्यक्ष २३१

(१) सप्ता‍रत्निना तुल्यभोजनोऽष्टारत्निरत्यरालः ।
(२) यथाहस्तमवशेषः षडरत्निः पञ्चारत्निश्च ।
(३) क्षीरयावसिको विक्कः क्रीडार्थं ग्राह्यः ।
(४) सञ्जातलोहिता प्रतिच्छन्ना संलिप्तपक्षा समकक्ष्या व्यतिकीर्णमांसा समतलपतला जातद्रोणिकेति शोभाः ।
(५) शोभावशेन व्यायामं भद्रं मन्दं च कारयेत् ।
मृगसङ्कीर्णलिङ्गं च कर्मस्वृतुवशेन वा ॥
इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे हस्त्यध्यक्षो नामैकत्रिंशोऽध्यायः,
आदित एकपञ्चाशः ।

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तुला हरी घास, साठ तुला रूखी घास और भूसा तथा पत्तियाँ जितना खा सके, खिलाना चाहिए ।

( १ ) आठ हाथ ऊँचे अत्यराल नामक हाथी को सात हाथ ऊँचे उत्तम हाथी के ही बराबर खाना दिया जाय ।

( २ ) छह हाथ ऊँचे हाथी मध्यम कोटि के हैं; उनका आहार उत्तम हाथी के आहार से चौथाई हिस्सा कम होना चाहिए; इसी प्रकार पाँच हाथ ऊँचे अधम श्रेणी के हाथियों के आहार मध्यम हाथियों के आहार से चौथाई हिस्सा कम होना चाहिए ।

( ३ ) दूध पीने वाले बच्चों को केवल क्रीडाकौतुक के लिए पकड़ा जाय और दूध, हरी घास या जई आदि के छोटे-छोटे ग्रास देकर उनका पालन-पोषण किया जाय ।

( ४ ) अवस्थानुसार हाथियों की सात प्रकार की शोभा मानी गई है; १. जब हाथियों के शरीर में केवल हड्डी, चमड़ा ही रह जाय; फिर धीरे-धीरे खूब संचरने लगे, इस शोभा को संजातलोहिता कहते हैं; २. जब मांस बढ़ने लगे, उस अवस्था की शोभा को प्रतिच्छन्ना कहते हैं; ३. जब दोनों ओर मांस भरने लगे, उस अवस्था को संलिप्तपक्षा कहते हैं; ४. जब सारे अवयवों में मांस भरने लगे, उस समय की शोभा को समकक्ष्या कहते हैं; ५. जब शरीर पर कहीं ऊँचा कहीं नीचा मांस दिखाई दे, उस शोभा को व्यतिकीर्णमांसा कहते हैं; ६. जब रीढ़ की हड्डी के बराबर मांस चढ़ जाय, उस अवस्था की शोभा को समतलपतला कहते हैं; और ७. जब मांस रीढ़ की हड्डी से ऊपर चढ़ जाय, उस शोभा का नाम जातिद्रोणिका है ।

( ५ ) इस प्रकार अवस्थाओं को ध्यान में रखकर हाथियों को कवायद सिखायी जाय । जिन हाथियों में उत्तम, मध्यम आदि सांकर्य लक्षण प्रकट हों, उनको युद्ध-सम्बन्धी कार्यों में लगाना चाहिए; अथवा ऋतुओं के अनुसार ही उन्हें युद्ध आदि कार्यों में लगाया जाय ।

अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में एकतीसवाँ अध्याय समाप्त ।

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प्रकरण ४८
अध्याय ३२

हस्त्यध्यक्षः हस्तिप्रचारश्च


(१) कर्मस्कन्धाः चत्वारः—दम्यः सान्नाह्य औपवाह्यो व्यालश्च। (२) तत्र दम्यः पञ्चविधः—स्कन्धगतः स्तम्भगतो वारिगतोऽवपातगतो यूथगतश्चेति। तस्योपचारो विक्ककर्म। (३) सान्नाह्यः सप्तक्रियापथः—उपस्थानं संवर्तनं संयानं वधावधो हस्तियुद्धं नागरायणं साङ्ग्रामिकं च। तस्योपविचारः कक्ष्याकर्म ग्रैवेयकर्म यूथकर्म च।


हाथियों की श्रेणियाँ तथा उनके कार्य

( १ ) कार्य-भेद से हाथियों की चार श्रेणियाँ होती हैं : १. दम्य ( शिक्षा देने योग्य ), २. सान्नाह्य ( युद्ध के योग्य ), ३. औपवाह्य ( सवारी के योग्य ) और ४. व्याल ( घातक वृत्तिवाला )।

( २ ) उनमें दम्य हाथी पाँच प्रकार का होता है : १. स्कंधगत ( जो सूंड का सहारा देकर सवार को अपने ऊपर बैठा ले ), २. स्तम्भगत ( जो हाथी खूंटे पर बँधा रह सके ), ३. वारिगत ( हाथियों की फँसाने वाली भूमि पर आ जाने वाला ), ४. अवपातगत ( हाथियों को फँसाने के लिए जंगलों में बनाये गये घास-फूस के गढों में आये हुये ) और ५. यूथगत (जो हथिनियों के साथ विहार करने के व्यसनी हों)। दम्य हाथी की परिचर्या हाथी के बच्चे के समान करनी चाहिए।

( ३ ) सान्नाह्य हाथी कार्य-भेद से सात प्रकार के होते हैं : १. उपस्थान ( आगे-पीछे के अङ्गों को ऊँचा-नीचा, छोटा-बड़ा करने वाला तथा रस्सी, बाँस, ध्वजा आदि को लांघने वाला ), २. संवर्त्तन ( सो जाने, बैठ जाने तथा कूदने-फाँदने वाला ), ३. संयान ( सीधी-बिरछी, गोलाकार चालों को समझने वाला ), ४. वधावध ( सूंड, दांत आदि से प्रहार करने या पकड़ देने वाला ), ५. हस्तियुद्ध ( हर प्रकार के हाथियों से लड़ने वाला ), ६. नगरायण ( नगर आदि को नष्ट करने वाला ) और ७. सांग्रामिक ( खुले आम युद्ध करने वाला )। सान्नाह्य हाथी को ऐसी शिक्षा दी जानी चाहिये कि वह रस्सी बांधने, गले में फन्दा डालने और झुण्ड के अनुकूल कार्य करने में चतुर हो जाय।

प्र० ४८ : अ० ३२ ] हाथियों के कार्य २३३

( १ ) औपवाह्योऽष्टविधः—आचरणः, कुञ्जरोपवाह्यः, धोरणः, आधानगतिकः, यष्टचुपवाह्यः, तोत्रोपवाह्यः, शुद्धोपवाह्यः, मार्गायु-कश्चेति । तस्योपविचारः—शारदकर्म हीनकर्म नारोष्ट्रकर्म च । ( २ ) व्याल एकक्रियापथः । तस्योपविचार आयम्यैकरक्षः कर्मशङ्कि-तोऽवरुद्धो विषमः प्रभिन्नः प्रभिन्नविनिश्चयः मदहेतुविनिश्चयश्च । ( ३ ) क्रियाविपन्नो व्यालः । शुद्धः सुव्रतो विषमः सर्वदोषप्रदुष्टश्च । ( ४ ) तेषां बन्धनोपकरणमनीकस्थप्रमाणम् । आलानग्रैवेयककक्ष्यापा-रायणपरिक्षेपोत्तरादिकं बन्धनम् । अंकुशवेणुयन्त्रादिकमुपकरणम् । वैज-


( १ ) औपवाह्य हाथी आठ प्रकार के होते हैं : १. आचरण ( उठने, बैठने, झुकने, मुड़ने आदि अनेक प्रकार की गतियों को जानने वाला ), २. कुंजरोपवाह्य ( दूसरे हाथियों के साथ चाल चलने वाला ), ३. धोरण ( एक ही ओर से अनेक प्रकार को चाल दिखाने वाला ), ४. आधानगतिक ( अनेक प्रकार की चाल चलने वाला ), ५. यष्टचुपवाह्य ( ताड़ने पर भी कार्य न करने वाला ), ६. तोत्रोपवाह्य ( बरछी मारने पर भी कार्य न करने वाला ), ७. शुद्धोपवाह्य ( बिना तोड़े, पैर के इशारे से ही कार्य करने वाला ) और ८. मार्गायुक्त ( शिकार सम्बन्धी कार्यों में निपुण ) । उनको शिक्षा देते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि जो हाथी अधिक मोटे हों उन्हें दुबला बनाया जाय, जो स्वस्थ हों उनकी रक्षा की जाय, जो मेहनत न करता हो उससे मेहनत करवाई जाय, इसी प्रकार प्रत्येक हाथी को हर प्रकार के इशारों की शिक्षा दी जानी चाहिए ।

( २ ) घातक ( व्याल ) हाथी से कार्य लेने का एक ही मार्ग है कि उसको बाँध कर रखा जाय या डण्डे के जोर पर उसे काबू में रखा जाय । उसके उपद्रवों से सावधान रहा जाय । उसके उपद्रव हैं : कवायद के समय बिगड़ जाना, कार्य की लापरवाही कर देना, मनमानी करना, उन्मत्त हो जाना, मद तथा आहार के लिए बेचैन हो जाना, और जिसके बिगड़ने का कारण पता ही न लगे ।

( ३ ) कार्य बिगाड़ देने वाले दुष्ट हाथी को व्याल कहते हैं । उसके चार भेद हैं : १. शुद्ध ( जो केवल मारने वाला हो ), २. सुव्रत ( जो ठीक से न चलता हो ), ३. विषम ( जो मारता भी हो और ठीक तरह से चलता भी न हो ) और ४. सर्वदोषप्रदुष्ट ( जिसमें सभी बुराइयाँ हों ) ।

( ४ ) हाथियों पर कसी जाने वाली सारी सामग्री की व्यवस्था, चतुर हस्ति-शिक्षकों की राय से करनी चाहिए । हाथियों पर कसने के लिए खूँटा ( आलान ), गले की जंजीर ( ग्रैवेयक ), काँख में बांधने को रस्सी ( कक्ष्या ), चढ़ते समय सहारा देने वाली रस्सी ( परायण ), हाथीं के पैर में बाँधने की जंजीर ( परिक्षेप ) और

२३४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण

यन्तीक्षुरप्रमालास्तरणकुथादिकं भूषणम् । वर्मतोमरशरावापयन्त्रादिकः सांग्रामिकालङ्कारः । (१) चिकित्सकानीकस्थारोहकाधोरणहस्तिपकौचारिक विधापाचक-यावसिकपादपाशिककुटीरक्षकौपशायिकादिरौपस्थायिकवर्गः । (२) चिकित्सकुटीरक्षकविधापाचकाः प्रस्थौदनं स्नेहप्रसृतिं क्षार-लवणयोश्च द्विपलिकं हरेयुः । दशपलं मांसस्यान्यत्र चिकित्सकेभ्यः । (३) पथिव्याधिकर्ममदजराभितप्तानां चिकित्सकाः प्रतिकुर्य्युः । (४) स्थानस्याशुद्धिर्यवसस्याग्रहणं स्थले शयनमभागे घातः परा-रोहणमकाले यानमभूमावतीर्थेऽवतारणं तरुषण्ड इत्यत्ययस्थानानि । तमेषां भक्तवेतनादाददीत ।


उसके गले में बाँधने की रस्सी ( उत्तर ) । अंकुश, बाँस का डंडा और अम्बारी ( यन्त्र ) आदि उसके लिए अन्य उपकरण हैं । इसके अतिरिक्त वैजयन्ती ( हाथी के ऊपर लगाये जाने वाली पताका ), क्षुरप्रमाला ( उसको पहनाने की माला ), आस्त-रण ( अंबारी के नीचे का गद्दा ) और कुथ ( झूला ), यह सामग्री हाथियों को सजाने के लिए है । हाथियों के संग्राम-संबन्धी अलङ्करण हैं : कवच, तोमर, तूणीर और भिन्न-भिन्न प्रकार के हथियार ।

( १ ) गजवैद्य, गजशिक्षक, गजारोही, गजसंबन्धी शास्त्रोक्त विधियों का ज्ञाता, गजरक्षक, नहलाने-धुलाने वाला, खाना बनाने वाला, चारा देने वाला, बाँधने वाला, गजशाला का रक्षक और हाथी के सोने की जगह का प्रबन्ध करने वाला; ये सब हाथी की परिचर्या करने वाले कर्मचारी हैं ।

( २ ) गजवैद्य, गजशाला का रक्षक और हाथियों का रसोइया, ये तीनों हाथी के आहार में से एक प्रस्थ अन्न, आधी अञ्जली तेल या घी तथा दो पल गुड़ एवं नमक ले लिया करें । गजवैद्य को छोड़ कर बाकी दोनों सेवक दस-दस पल मांस भी ले लें ।

( ३ ) रास्ता चलने से, बीमारी के कारण, अधिक कार्य करने से, मद के कारण तथा बुढ़ापे की वजह से हाथियों को कोई भी कष्ट हो जाय तो गजवैद्य सावधानी से उनकी चिकित्सा करें ।

( ४ ) हाथी के स्थान की सफाई न करना, उसे खाना न देना, उसको खाली जगह सुला देना, उसके नाजुक स्थानों पर चोट मारना, किसी अनधिकारी व्यक्ति को उस पर चढ़ाना, बेसमय हाथी को चलाना, बिना घाट के ही उतार देना, घने पेड़ों के बीच हाथी को ले जाना; हाथियों के साथ इस प्रकार का व्यवहार करने वाले प्रत्येक कर्मचारी को दण्डित किया जाना चाहिए । यह दण्ड उनके भत्ते और वेतन में से काट लिया जाय ।

प्र० ४८ अ० ३२ ] हाथियों के कार्य २३५

(१) तिस्रो नीराजनाः कार्याश्चातुर्मास्यृतुसन्धिषु ।
भूतानां कृष्णसन्धीज्याः सेनान्यः शुक्लसन्धिषु ॥
(२) दन्तमूलपरीणाहद्विगुणं प्रोज्झ्य कल्पयेत् ।
अब्दे द्वयर्धे नदीजानां पञ्चाब्दे पर्वतौकसाम् ॥

इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे हस्तिप्रचारो नाम द्वात्रिंशोऽध्यायः,
आदितः द्विपञ्चाशः ।

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( १ ) हाथियों की बल-वृद्धि और उनके कुशल क्षेम के लिए चार मास बाद ऋतु-संधि की तिथि पर वर्ष में तीन बार नीराजन कर्म कराया जाय; प्रत्येक अमावस्या पर भूतवलि और प्रत्येक पूर्णमासी पर स्कन्दपूजा भी करवाई जाय ।

( २ ) हाथी का दाँत जड़ में जितना मोटा हो, उससे दुगुना हिस्सा छोड़कर, आगे का बाकी हिस्सा कटा देना चाहिए । जो हाथी नदीचर हों, उनके दाँत ढाई वर्ष के बाद और जो हाथी पर्वतों के रैवासी हों उनके दाँत पाँच वर्ष के बाद और कटवाने चाहिए ।

अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में हस्तिप्रचार नामक बत्तीसवाँ अध्याय समाप्त ।

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प्रकरण ४९-५०# रथाध्यक्षः पत्त्यध्यक्ष सेनापतिप्रचारः
अध्याय ३३

(१) अश्वाध्यक्षेण रथाध्यक्षो व्याख्यातः । (२) स रथकर्मान्तान् कारयेत् । (३) दशपुरुषो द्वादशान्तरो रथः। तस्मादेकान्तरावरा आ षडन्त- रादिति सप्त रथाः । (४) देवरथपुष्परथसाङ्ग्रामिकपारियाणिकपरपुराभियानिकवैनयि- कांश्च रथान् कारयेत् । (५) इष्वस्त्रप्रहरणावर णोपकरणकल्पनाः सारथिरथिकरथ्यानां च


रथसेना तथा पैदलसेना के अध्यक्षों और सेनापति के कार्यों का निरूपण

( १ ) रथसेना के अध्यक्ष के कार्य : पिछले प्रकरण में अश्वशाला के अध्यक्ष के जो-जो कार्य बताये गये हैं, उन्हीं के अनुसार रथ का अध्यक्ष भी अपनी जुम्मेदारी के कार्यों की व्यवस्था करे ।

( २ ) उसको चाहिए कि वह नये-नये रथ बनवाये और जीर्ण हो जाने पर उनकी मरम्मत करवाये ।

( ३ ) एक सौ बीस अंगुल ऊँचा और उतना ही लम्बा रथ उत्तम कोटि का माना जाता है । सबसे बड़ा रथ बारह बित्ता लम्बा होता है, उसमें एक-एक बित्ता कम करके अन्त में सबसे छोटा रथ छह बित्ते का होता है । रथ सात प्रकार के होते हैं ।

( ४ ) रथाध्यक्ष को चाहिए कि वह विभिन्न कार्यों के उपयोगी देवरथ ( यात्रा, उत्सव आदि के लिए ), पुष्परथ ( विवाह आदि कार्यों के लिए ), साङ्ग्रामिक ( युद्ध आदि कार्यों के लिए ), पारियाणिक ( सामान्य यात्रा के लिए ), परपुराभियानिक ( शत्रु के दुर्ग को ढाहने के लिए ) और वैनयिक ( घोड़े आदि को सिखाने के लिए ) आदि अलग-अलग रथों का निर्माण करवाये ।

( ५ ) रथाध्यक्ष को चाहिए कि वह बाण, तूणीर, धनुष, अस्त्र, तोमर, गदा, रथ के झूलों, और लगाम आदि सामग्री के सम्बन्ध में तथा सारथि, रथ बनाने

प्र० ४९-५० : अ० ३३ ] सेनाध्यक्षों के कार्य २३७

कर्मस्वायोगं विद्यात् । आ कर्मभ्यश्च भक्तवेतनं भृतानामभृतानां च योग्या- रक्षानुष्ठानमर्थमानकर्म च ।

(१) एतेन पत्त्यध्यक्षो व्याख्यातः । स मौलभृतश्रेणिमित्रामित्राटवीब- लानां सारफल्गुतां विद्यात् । निम्नस्थलप्रकाशकूटखनकाकाशदिवारात्रियुद्ध- व्यायामं च विद्यात् । आयोगमयागं च कर्मसु ।

(२) तदेव सेनापतिः सर्वयुद्धप्रहरणविद्याविनीतो हस्त्यश्वरथचर्या- संघुष्टश्चतुरङ्गस्य बलस्यानुष्ठानाधिष्ठानं विद्यात् ।

(३) स्वभूमिं युद्धकालं प्रत्यनीकमभिन्नभेदनं भिन्नसन्धानं संहतभेदनं भिन्नवधं दुर्गवधं यात्राकालं च पश्येत् ।


वाला, रथ के घोड़े आदि के कार्यों की पूरी जानकारी रखे । रथाध्यक्ष का यह भी कर्तव्य है कि वह नियमित रूप से कार्य करने वाले तथा अस्थायी रूप से कार्य करने वाले कारीगरों एवं कर्मचारियों के उचित वेतन-भत्ता तथा निर्वाहयोग्य धन की व्यवस्था करे एवं उनका आदर-सत्कार करे ।

( १ ) पैदल सेना के अध्यक्ष के कार्य : रथ्याध्यक्ष के ही समान पत्त्यध्यक्ष की आरम्भिक कार्य-व्यवस्था को भी समझना चाहिए । इसके अतिरिक्त वह राजधानी की रक्षा करने वाली सेना ( मौलबल ), वेतनभोगी सेना ( भृतबल ), विभिन्न प्रदेशों में रखी गई सेना ( श्रेणिबल ), मित्रराजा की सेना ( मित्रबल ), शत्रुराजा की सेना ( अमित्रबल ) और जङ्गल की सुरक्षा के लिये नियुक्त सेना ( अटवीबल ) के सामर्थ्य-असामर्थ्य की पूरी जानकारी रखे । इसके अतिरिक्त वह, जङ्गल, तराई, मोर्चबंदी, छल-कपट, खाई, हवाई, दिन और रात आदि सभी प्रकार के युद्धों की जानकारी प्राप्त करे । देश-काल की दृष्टि से सेनाओं की उपयोगिता और अनुपयोगिता का भी वह ज्ञान रखे ।

( २ ) सेनापति के कार्य : सेनापति को चाहिये कि वह अश्वाध्यक्ष से लेकर पत्त्यध्यक्ष तक के सम्पूर्ण कार्य-व्यापार को भली भांति समझे, सेनापति को हर प्रकार के युद्ध करने, हथियार चलाने और आन्वीक्षिकी आदि शास्त्रों में पारंगत होना चाहिए, हाथी, घोड़े और रथ चलाने की भी पूरी योग्यता उसमें होनी चाहिए, चतुरङ्गिणी सेना के कार्य और स्थान की भी उसे पूरी जानकारी होनी चाहिए ।

( ३ ) इसके अतिरिक्त उसमें, अपनी भूमि, युद्धकाल, शत्रुसेना, शत्रुव्यूह का तोड़ना, बिखरी हुई सेना को समेटना, बिखरी हुई शत्रुसेना का मर्दन करना, दुर्ग तोड़ना और उचित समय पर युद्ध के लिये प्रस्थान करना, इन सभी बातों को समझने-करने की पूरी क्षमता होनी चाहिए ।

२३८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण

(१) तूर्यध्वजपताकाभिर्व्यूहसंज्ञाः प्रकल्पयेत् ।
स्थाने याने प्रहरणे सैन्यानां विनये रतः ॥

इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयाऽधिकरणे रथाध्यक्षपत्त्यध्यक्ष-सेनापतिप्रचारो नाम त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः, आदितस्त्रिपञ्चाशः ।

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( १ ) सेनापति को चाहिये कि युद्धकाल में अपनी सेना को संचालित करने के लिये वह चढ़ाई करने, कूच करने एवं धावा बोलने के लिये बाजे, ध्वजा तथा झण्डियों के द्वारा ऐसे इशारों का प्रयोग करे, जिन्हें शत्रुसेना न समझ सके ।

अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में रथाध्यक्ष पत्त्यध्यक्ष सेनापति-प्रचार नामक तैंतीसवाँ अध्याय समाप्त ।

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प्रकरण ५१-५२# मुद्राध्यक्षः विवीताध्यक्षः
अध्याय ३४

(१) मुद्राध्यक्षो मुद्रां माषकेण दद्यात् ।
(२) समुद्रो जनपदं प्रवेष्टुं निष्क्रमितुं वा लभेत ।
(३) द्वादशपणममुद्रो जानपदो दद्यात् । कूटमुद्रायां पूर्वः साहसदण्डः । तिरोजनपदस्योत्तमः ।
(४) विवीताध्यक्षो मुद्रां पश्येत् ।
(५) भयान्तरेषु च विवीतं स्थापयेत् । चोरव्यालभयान्निम्नारणयानि शोधयेत् ।


मुद्राविभाग और चारागाहविभाग के अध्यक्ष

( १ ) मुद्रा-विभाग का अध्यक्ष : मुद्रा-विभाग के अध्यक्ष को चाहिए कि वह जनपद में आनेवाले और नगर से जानेवाले प्रत्येक व्यक्ति को राजकीय मुहर लगा हुआ पासपोर्ट दे तथा बदले में एक माषक टैक्स वसूल करे ।

( २ ) जिस व्यक्ति के पास पासपोर्ट हो वही जनपद में प्रवेश कर सकता है और वही जनपद से बाहर जा सकता है ।

( ३ ) अपने जनपद में रहनेवाला कोई पुरुष बिना पासपोर्ट के यदि प्रवेश करे या बाहर जाये तो उस पर बारह पण दण्ड किया जाना चाहिए । अपने ही राज्य का कोई व्यक्ति यदि जाली पासपोर्ट लेकर आना-जाना चाहे तो उसे प्रथम साहस दण्ड दिया जाना चाहिए, यदि दूसरे देश का व्यक्ति ऐसा करे तो उसे उत्तम साहस दण्ड देना चाहिए ।

( ४ ) चारागाह-विभाग का अध्यक्ष : विवीताध्यक्ष का कार्य है कि जो व्यक्ति बिना पासपोर्ट या जाली पासपोर्ट लेकर छिपे तौर से जङ्गलों के रास्ते होकर सफर करते हुए पकड़ा जाय उसको गिरफ्तार कर लें ।

( ५ ) जिन स्थानों से चोर, शत्रु या शत्रु के गुप्तचर आदि के आने-जाने की संभावना हो, ऐसे स्थानों पर चारागाह ( विवीत ) स्थापित किये जाँय । चोर और हिंसक जानवरों के संभावित घने जंगलों में भी खाइयाँ और गुफाएँ बनाकर निगरानी रखनी चाहिए ।

२४० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण

२४० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण

(१) अनुदके कूपसेतुबन्धोत्सान् स्थापयेत्, पुष्पफलवाटांश्च। (२) लुब्धकश्वगणिनः परिव्रजेयुररण्यानि। तस्करामित्राभ्यागमे शंखदुन्दुभिशब्दमग्राह्याः कुर्युः शैलवृक्षाधिरूढा वा शीघ्रवाहना वा। (३) अमित्राटवीसंचारं च राज्ञो गृहकपोतैर्मुद्रायुक्तैर्हारयेयुः धूमाग्निपरम्परया वा। (४) द्रव्यहस्तिवनाजीवं वर्तनीं चोररक्षणम्।
सार्थातिवाह्यं गोरक्ष्यं व्यवहारं च कारयेत्॥

इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे मुद्राध्यक्ष-विवीताध्यक्षो नाम चतुस्त्रिंशोऽध्यायः, आदितश्चतुष्पञ्चाशः।

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(१) जिस जगह पानी का अभाव हो वहाँ पक्के कुयें, पक्के तालाव, फूल तथा फलों के बगीचे और प्याऊ आदि की व्यवस्था की जाय।

(२) शिकारी और बहेलिये निरन्तर जंगलों में घूमते रहें। उन्हें चाहिए कि वे चोर या शत्रुओं के आने की सूचना पहाड़ पर या वृक्ष पर चढ़कर अथवा शंख-दुन्दुभी बजाकर अन्तपाल को पहुँचायें, अथवा शीघ्रगामी घोड़ों पर चढ़कर वे इस सूचना को अन्तपाल तक पहुँचावें।

(३) यदि जंगल में शत्रु आ जांय तो मुहर लगे पालतू कबूतरों के द्वारा उसका समाचार राजा तक पहुँचाया जाय, यदि रात को शत्रु जंगल में प्रवेश करें तो आग जलाकर और दिन में धुआँ लुङ्ग करके सूचित करें।

(४) विवीताध्यक्ष का कार्य है कि वह द्रव्यवनों और हस्तिवनों के घास, लकड़ी तथा कोयले आदि का भी प्रबन्ध करें, दुर्ग के रास्ते जाने का टैक्स, चोरों से की हुई रक्षा का टैक्स, गोरक्षा का टैक्स तथा इन सभी वस्तुओं के खरीद-फरोख्त का प्रबन्ध भी विवीताध्यक्ष ही करवाये।

अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में मुद्राध्यक्ष-विवीताध्यक्ष नामक चौतीसवाँ अध्याय समाप्त।

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प्रकरण ५३-५४## समाहर्तृप्रचारः
अध्याय ३५### गृहपतिवैदेहकतापसव्‍यञ्‍जनाः प्रणिधयः

(१) समाहर्ता चतुर्धा जनपदं विभज्य ज्येष्ठमध्यमकनिष्ठविभागेन ग्रामाग्रं परिहारकमायुधीयं धान्यपशुहिरण्यकुप्यविष्टप्रतिकरमिदमेतावदिति निबन्धयेत्।

(२) तत्प्रदिष्टः पञ्चग्रामीं दशग्रामीं वा गोपश्चिन्तयेत्।

(३) सीमावरोधेन ग्रामाग्रं कृष्टाकृष्टस्थलकेदारारामषण्डवाटवनवास्तुचैत्यदेवगृहसेतुबन्धश्मशानसत्रप्रपापुण्यस्थानविवीतपथिसंख्यानेनक्षेत्राग्रं, तेन सीम्नां क्षेत्राणां च मर्यादारण्यपथिप्रमाणसम्प्रदानविक्रयानुग्रहपरिहारनिबन्धान् कारयेत्। गृहाणां च करदाकरदसंख्यानेन।


समाहर्त्ता और गुप्तचरों के कार्यों का निरूपण

(१) समाहर्त्ता (रेवेन्यू कलक्टर) को चाहिए कि वह सारे जनपद को चार हिस्सों में बाँटकर उन्हें श्रेष्ठ, मध्यम और कनिष्ठ के क्रम से उनकी गणना, उपज, भौगोलिक परिस्थिति उनका नकशा, खसरा एवं रकवा आदि को अपने रजिस्टर में दर्ज कर ले; जो गाँव नियमित रूप से सैनिक जवानों को दें तथा जो गाँव अन्न, पशु, सोना, चाँदी, नौकर-चाकर आदि को नियमित रूप से दें, उनका व्योरा भी रजिस्टर में दर्ज कर लें।

(२) समाहर्त्ता के आदेशानुसार पाँच-पाँच या दस-दस गावों का एक-एक केन्द्र बनाकर उसका प्रबन्ध गोप नामक अधिकारी करे।

(३) नदी, पहाड़, जंगल, दीवाल आदि के द्वारा गाँवों की सरहदबन्दी करके उसको रजिस्टर में चढ़ाया जाय, खेतों का व्योरा चढ़ाने वाले रजिस्टर में इतनी बातें दर्ज रहनी चाहिये; खेती योग्य जमीन, खेती के अयोग्य या पथरीली जमीन, ऊँची-नीची जमीन, साठी-गेहूँ योग्य जमीन, बाग-बगीचे योग्य जमीन, केले के योग्य जमीन, ईख के योग्य जमीन, जंगल के योग्य जमीन, आबादी के योग्य जमीन, चैत्य, देवालय, तालाब, श्मशान, अन्नक्षेत्र, प्याऊ, तीर्थस्थान, चरागाह, और रथ-गाड़ी तथा पैदल मार्ग के योग्य जमीन। इसी प्रकार नदी, पर्वत आदि सरहद और खेतों की लम्बाई-चौड़ाई का भी उल्लेख होना चाहिए। इन बातों के अलावा ऐसे जंगल,

१६ कौ०

२४२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण

(१) तेषु चैतावच्चातुर्वर्ण्यमेतावन्तः कर्षकगोरक्षकवैदेहककारुकर्मकर-दासाश्चैतावच्च द्विपदचतुष्पदमिदं च हिरण्यविष्टिशुल्कदण्डं समुत्तिष्ठतीति । (२) कुलानां च स्त्रीपुरुषाणां बालवृद्धकर्मचरित्राजीवव्ययपरिमाणं विद्यात् । (३) एवञ्च जनपदचतुर्भागं स्थानिकः चिन्तयेत् । (४) गोपस्थानिकस्थानेषु प्रदेष्टारः कार्यकरणं बलिप्रग्रहं च कुर्युः । (५) समाहर्तृप्रदिष्टाश्च गृहपतिकव्यञ्जना येषु ग्रामेषु प्रणिहितास्तेषां ग्रामाणां क्षेत्रगृहकुलाग्रं विद्युः । मानसञ्जाताभ्यां क्षेत्राणि भोगपरिहा-

जो ग्रामवासियों के काम न आते हों, खेतों में जाने-आने के रास्ते, उनकी नाप, किस व्यक्ति ने किस व्यक्ति को कौन खेत जोतने लिए दिया है, बिक्री का ब्योरा, तकाबी, मुल्तबी और छूट आदि का भी उल्लेख होना चाहिए । साथ ही रजिस्टर में यह भी दर्ज होना चाहिए कि वहाँ कितने घर, जमीन की किस्त तथा मकानों का किराया देने वाले हैं और कितने नहीं हैं ।

( १ ) रजिस्टर में इस बात का उल्लेख किया जाय कि उन घरों में इतने ब्राह्मण, इतने क्षत्रिय, इतने वैश्य और इतने शूद्र रहते हैं, इसी प्रकार वहाँ के किसान, ग्वाले, व्यापारी, कारीगर, मजदूर, और दासों की संख्या भी रजिस्टर में दर्ज होनी चाहिये, फिर सारे मनुष्यों और सारे पशुओं का जोड़ अलग-अलग लिया जाय, अन्त में इनसे इतना सोना, इतने नौकर, इतना टैक्स और इतना दण्ड राजा को प्राप्त हुआ, यह भी जोड़ देना चाहिए ।

( २ ) गोप नामक अधिकारी को चाहिए कि वह प्रत्येक परिवार के स्त्री पुरुष, बालक तथा वृद्ध की गणना और उनके कार्य, चरित्र, आजीविका एवं व्यय आदि के सम्बन्ध में पूरी जानकारी रखे ।

( ३ ) इसी प्रकार जनपद के चौथे हिस्से का प्रबन्ध स्थानिक नामक अधिकारी करे ।

( ४ ) गोप और स्थानिक के कार्यक्षेत्र में प्रदेष्टा ( कण्टक शोधनाधिकारी ) नामक अधिकारी राज्य के शत्रुओं का दमन करें । गोप और स्थानिक टैक्स न देने वालों से टैक्स वसूल करें । राज्य के बलवान् व्यक्ति यदि शासन में विघ्न-बाधा उपस्थित करें तो उनका भी वे दमन करें ।

( ५ ) गृहस्थ ( गृहपति ) के वेश में रहने वाले गुप्तचर, समाहर्त्ता की आज्ञानुसार अपने क्षेत्र के गाँवों का रकवा, घर और परिवारों की तादात को अच्छी तरह से जानें । वे गुप्तचर यह नोट रखें कि कौन खेत कितने बड़े हैं और उनकी उपज क्या है, किस घर से कर वसूल किया जाता है और कौन घर छोड़ा जाता है, यह

प्र० ५३-५४ : अ० ३५ ] समाहर्ता और गुप्तचरों के कार्य २४३

राभ्यां गृहाणि वर्णकर्मभ्यां कुलानि च । तेषां जङ्घाग्रमायव्ययौ च विद्युः । प्रस्थितागतानां च प्रवासावासकारणमनर्थ्यानां च स्त्रीपुरुषाणां चारप्रचारं च विद्युः ।

(१) एवं वैदेहकव्यञ्जनाः स्वभूमिजानां राजपण्यानां खनिसेतुवनकर्मान्तक्षेत्रजानां परिमाणमर्घं च विद्युः । परभूमिजातानां वारिस्थलपथोपयातानां सारफल्गुपण्यानां कर्मसु च, शुल्कवर्त्तन्यातिवाहिकगुल्मतरदेयभागभक्तपण्यागारप्रमाणं विद्युः ।

(२) एवं समाहर्तृप्रदिष्टास्तापसव्यञ्जनाः कर्षकगोरक्षकवैदेहकानामध्यक्षाणां च शौचाशौचं विद्युः । पुराणचोरव्यञ्जनाश्चान्तेवासिनश्चैत्यचतुष्पथशून्यपदोदपाननदीपानतीर्थायतनाश्रमारण्यशैलवनगहनेषु स्तेनामित्रप्रवीरपुरुषाणां च प्रवेशनस्थानगमनप्रयोजनान्युपलभेरन् ।


परिवार ब्राह्मणों का है या क्षत्रियों का और वे क्या-क्या कार्य करते हैं। वे गुप्तचर यह भी जाने कि उन परिवारों के प्राणियों ( मनुष्यों तथा पशुओं ) का संख्या कितनी है और उनकी आमदनी खर्च के जरिये क्या हैं। एक स्थान से दूसरे स्थान में जाने-आने वाले लोगों और अपने स्थान को छोड़कर दूसरी जगह बस जाने वाले लोगों के सम्बन्ध में, राजा से सम्बन्ध न रखने वाली नर्तकियों, जुआरियों, भाँडों आदि के आवास-प्रवास पर भी वे गुप्तचर निगरानी रखें और यह भी जानें कि शत्रुओं के गुप्तचर कहाँ-कहाँ पर रहकर क्या-क्या कार्य कर रहे हैं।

( १ ) इसी प्रकार व्यापारी के वेष में रहने वाले गुप्तचर ( वैदेहक ) समाहर्त्ता के आदेशानुसार अपने अधिकार-क्षेत्र में उत्पन्न और बेची जाने वाली सरकारी वस्तुओं, खनिज पदार्थों, तालाबों, जंगलों तथा कारखानों से उत्पन्न होने वाली वस्तुओं की तौल एवं कीमत को अच्छी तरह से समझें। विदेशी व्यापारियों ने चुङ्गी, सीमाकर, मार्गरक्षा का कर, नाव कर, अन्तपाल का टैक्स, साझेदारी का हिस्सा, भत्ता, भोजन-व्यय और बाजार आदि का टैक्स कितना दिया है, यह भी वे जानें।

( २ ) इसी प्रकार तपस्वी के वेष में रहने वाले गुप्तचर ( तापस ), समाहर्त्ता की आज्ञानुसार, अपने क्षेत्र में रहने वाले किसान, ग्वाले, व्यापारी और अध्यक्षों की ईमानदारी तथा बेईमानी के रहस्यों को जानें। पुराने चोरों के वेष में रहने वाले उन तापस गुप्तचरों के शिष्य ( पुराणचोर ) देवालय, चौराहा, निर्जन स्थान, तालाब, नदी, कुओं के समीपस्थ जलाशय, तीर्थस्थान, आश्रम, जंगल, पहाड़ और घना जंगल आदि स्थानों में ठहर कर चोरों, शत्रुओं, शत्रुओं के भेजे हुए तीक्ष्ण तथा रसद आदि गुप्तचरों का ठीक-ठीक पता लगायें।

अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में गृहपतितापसव्यञ्जन प्रणिधि

२४४कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ दूसरा अधिकरण

(१) समाहर्ता जनपदं चिन्तयेदेवमुत्थितः । चिन्तयेयुश्च संस्थास्ताः संस्थाश्चान्याः स्वयोनयः ॥

इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे गृहपतितापसव्यञ्जनप्रणिधिर्नाम पंचविंशोऽ- ध्यायः, आदितः पञ्चपञ्चाशः ।

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(१) इस प्रकार अपने कार्यों में तत्पर समाहर्त्ता जनपद की रक्षा का प्रबन्ध करें और उसकी आज्ञा से कार्य करने वाले गुप्तचर एवं उनके विभिन्न संघ, संस्था आदि जनपद के प्रबन्ध में तत्पर रहें।

अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में गृहपतितापसव्यञ्जन प्रणिधि पैंतीसवाँ अध्याय समाप्त ।

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प्रकरण ५५ | नागरिकप्रणिधिः अध्याय ३६ |


(१) समाहर्तृवन्नागरिको नगरं चिन्तयेत्, दशकुलीं गोपो, विंशतिकुलीं चत्वारिंशत्कुलीं वा । स तस्यां स्त्रीपुरुषाणां जातिगोत्रनामकर्मभिः जङ्घाग्रमायव्ययौ च विद्यात् । (२) एवं दुर्गचतुर्भागं स्थानिकश्चिन्तयेत् । (३) धर्मवसथिनः पाषण्डिपथिकानावेद्य वासयेयुः । स्वप्रत्ययाश्च तपस्विनः श्रोत्रियांश्च । (४) कारुशिल्पिनः स्वकर्मस्थानेषु स्वजनं वासयेयुः । वैदेहकाश्चान्योन्यं स्वकर्मस्थानेषु । पण्यानामदेशकालविक्रेतारमस्वकरणं च निवेदयेयुः । (५) शौण्डिकपाक्वमांसिकौदनिकरूपाजीवाः परिज्ञातमावासयेयुः । अतिव्ययकर्तारमत्याहितकर्माणं च निवेदयेयुः ।


नागरिक के कार्य

( १ ) समाहर्त्ता की तरह नागरिक अधिकारी भी नगर के प्रबन्ध की चिन्ता करे । उत्तम दस कुलों, मध्यम बीस कुलों और अधम चालीस कुलों का प्रबन्ध गोप नामक अधिकारी करे । उन कुलों के स्त्री-पुरुषों के वर्ण, गोत्र, नाम, कार्य, उनकी संख्या और उनके आय-व्यय के सम्बन्ध के वह भली भाँति जाने ।

( २ ) इसी प्रकार दुर्ग के चौथे हिस्से का प्रबन्ध, अर्थात् दुर्ग में रहने वाले स्त्री-पुरुषों के सम्बन्ध में उक्त जानकारी स्थानिक नामक अधिकारी प्राप्त करे ।

( ३ ) धर्मशाला के प्रबन्धक को चाहिए कि वह, धूर्त-पाखण्डी मुसाफिरों को गोप की अनुमति से ही टिकाये, किन्तु जिन तपस्वियों या श्रोत्रियों को वह स्वयं जानता है, उन्हें अपनी जिम्मेदारी पर भी टिका सकता है ।

( ४ ) मोटे तथा महीन कार्य को करने वाले सुपरिचित एवं विश्वस्त कारीगर को अपने कार्य करने के स्थानों में ठहराया जा सकता है । व्यापारी लोग अपने जान-पहचान वाले व्यापारियों को अपनी-अपनी दूकानों में ठहरा सकते हैं, किन्तु देश-काल के विपरीत व्यापार करने वाले या दूसरे के सामान को अपने व्यवहार में लाने वाले व्यक्ति की सूचना नागरिक को कर देनी चाहिए ।

( १ ) मद्य-मांस बेचने वाले, होटल वाले और वेश्यायें अपने-अपने परिचितों

२४६कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ दूसरा अधिकरण

(१) चिकित्सकः प्रच्छन्नव्रणप्रतीकारयितारमपथ्यकारिणं च गृहस्वामी च निवेद्य गोपस्थानिकयोर्मुच्यते । अन्यथा तुल्यदोषः स्यात् ।

(२) प्रस्थितागतौ च निवेदयेत् । अन्यथा रात्रिदोषं भजेत । क्षेमरात्रुषु त्रिपणं दद्यात् ।

(३) पथिकोत्पथिकांश्च बहिरन्तश्च नगरस्य देवगृहपुण्यस्थानवनश्मशानेषु सत्रणमनिष्टोपकरणमुद्भाण्डीकृतमाविग्नमतिस्वप्नमध्वक्लान्तमपूर्वं वा गृह्णीयुः ।

(४) एवमभ्यन्तरे शून्यनिवेशायवेशनशौण्डिकौदनिकपाक्वमांसिकद्यूतपाषण्डावासेषु विचयं कुर्युः ।

(५) अग्निप्रतीकारं च ग्रीष्मे मध्यमयोरह्णश्चतुर्भागयोः । अष्टभागोऽग्निदण्डः । बहिरधिश्रयणं वा कुर्युः ।


को अपने घर ठहरा सकते हैं । जो व्यक्ति अधिक खर्चीला दीखे या अधिक शराब पीता हो, उसकी सूचना गोप अथवा स्थानिक के पास भेज देनी चाहिए ।

( १ ) जो व्यक्ति हथियार लगे अपने घावों का इलाज छिपा कर कराता है और रोग या महामारी आदि फैलाने वाले द्रव्यों का छिपे तौर से उपयोग करता है, उसका इलाज करने वाला वैद्य यदि उसके इन कार्यों की सूचना गोप या स्थानिक को दे देता है तो वह अदण्ड्य है, किन्तु यदि वह सूचना न दे तो अपराधी के समान ही उसको भी दण्ड दिया जाना चाहिए, जिस घर में ऐसे कार्य किए जाते हों उस घर का मालिक यदि गोप या स्थानिक को सूचित कर देता है तो वह क्षम्य है, अन्यथा उसको भी अपराधी के समान दण्ड दिया जाना चाहिए ।

( २ ) घर के मालिक को चाहिए कि वह घर से जाने वाले या घर में आने वाले प्रत्येक व्यक्ति की सूचना गोप को दे । अन्यथा वे लोग रात्रि में यदि किसी की चोरी आदि करें तो गृहस्वामी उसके लिए उत्तरदायी समझा जायगा । वे लोग भले ही कुछ भी अपराध न करें, किन्तु सूचना न देने के अपराध में गृहस्वामी प्रतिरात्रि तीन पण दण्ड का भागी है ।

( ३ ) व्यापारियों के वेश में बड़े-बड़े मार्गों पर घूमने वाले, ग्वाले तथा लकड़हारे के वेश में रास्ता छोड़कर जंगलों में घूमने वाले, नगर के भीतर या बाहर बने हुए मन्दिरों, तीर्थों, जंगलों या श्मशानों, कहीं भी, हथियार से घायल, हथियार तथा विष को लिये हुए, सामर्थ्य से अधिक भार उठाये हुए, डरे हुए, घबड़ाये हुए, घोर निद्रा में सोये हुए, थके हुए या इसी प्रकार का कोई अजनबी पन किये हुये, इस प्रकार के सन्दिग्ध व्यक्ति को पकड़कर नागरिक के सुपुर्द कर देना चाहिए ।

( ४ ) इसी प्रकार नगर के खंडहरों में, कल-कारखानों में, शराब की दूकानों में, होटलों में, मांस बेचने वाली दूकानों में, जुआघरों में, पाखंडियों के अड्डों में कोई सन्दिग्ध व्यक्ति दिखाई दे तो, गुप्तचर उसको पकड़ कर नागरिक को सौंप दें ।

( ५ ) गर्मी की ऋतु में मध्याह्न के चार भागों में आग जलाने की मनाही कर

प्र० ५५ : अ० ३६ ] नागरिक के कार्य २४७

(१) पादः पञ्चघटीनाम् । कुम्भद्रोणीनिःश्रेणीपरशुशूर्पाङ्कुशकचग्रहणीदृतीनां चाकरणे । (२) तृणकटच्छन्नान्यपनयेत् । अग्निजीविन एकस्थान् वासयेत् । स्वगृहद्वारेषु गृहस्वामिनो वसेयुरसम्पातिनो रात्रौ । रथ्यासु कुटव्रजाः सहस्रं तिष्ठेयुः, चतुष्पथद्वारराजपरिग्रहेषु च । (३) प्रदीप्तमनभिधावतो गृहस्वामिनो द्वादशपणो दण्डः । षट्पणोऽवक्रयिणः । प्रमादाद्दीप्तेषु चतुष्पञ्चाशतपणो दण्डः । (४) प्रादीपिकोऽग्निना वध्यः । (५) पांसुन्न्यासे रथ्यायामष्टभागो दण्डः । पङ्कोदकसन्निरोधे पादः । राजमार्गे द्विगुणः ।


देनी चाहिए। जो भी इस आज्ञा का उल्लंघन करे उसे एक पण का आठवां हिस्सा दण्ड दिया जाय । अथवा ( यदि आवश्यक ही हो तो ) घास-फूस के मकानों के बाहर खुली जगह में आग जलाई जाय ।

( १ ) यदि कोई व्यक्ति निषिद्ध समय में पांच घड़ी तक आग जलावे तो उसे चौथाई पण दण्ड दिया जाय और उस व्यक्ति को भी यही दण्ड दिया जाय, जो गर्मी के मौसम में अपने घर के सामने पानी से भरे घड़े, पानी से भरी नांद, सीढ़ी, कुल्हाड़ा, सूप, छाज, कोंचा, फूस आदि को निकालने के लिए लम्बा लट्ठ, और चमड़े की मशक आदि वस्तुओं का इन्तजाम करके न रखें ।

( २ ) गर्मी की मौसम में फूस और चटाई के बने मकानों को एकदम उठा देना चाहिए। बढ़ई और लुहार आदि को किसी एक जगह में ही बसाया जाना चाहिए । घरों के स्वामियों को रात को अपने ही दरवाजों पर सोना चाहिए । गलियों तथा बाजारों में पानी से भरे हुए एक हजार घड़ों का हर समय प्रबन्ध रहना चाहिए । इसी प्रकार चौराहों, नगर के प्रधान द्वारों, खजानों कोष्ठागारों, गजशालाओं और अश्वशालाओं में भी पानी के भरे हजार-हजार घड़ों का हर समय इंतजाम रहना चाहिए ।

( ३ ) यदि गृहस्वामी घर में लगी हुई आग को बुझाने का प्रबंध न करे तो उस पर बारह पण दण्ड कर देना चाहिए । उस घर में रहने वाला किरायेदार भी यदि ऐसा ही करे तो उसे छह पण दण्ड दिया जाना चाहिए । यदि धोखे से अपने घर में ही आग लग जाय तो गृहस्वामी को चौवन पण दण्ड देना चाहिए ।

( ४ ) मकान में आग लगाने वाला व्यक्ति यदि पकड़ लिया जाय तो उसे प्राण दण्ड की सजा देनी चाहिए ।

( ५ ) सड़क पर मिट्टी या कूड़ा-करकट डालने वाले व्यक्ति को पण का आठवाँ हिस्सा ( १/८ पण ) दण्ड दिया जाना चाहिए । जो व्यक्ति गाड़ी, कीचड़ या पानी से सड़क को रोके उसे १/४ पण दण्ड दिया जाना चाहिए । जो व्यक्ति राजमार्ग को इस प्रकार गन्दा करे या रोके उसे दुगुना दण्ड दिया जाना चाहिए ।