केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 15, कुल 152 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७
पद-भाष्य निर्वेदमायान्नास्त्यकृतः कृतेन । | लोकोंकी परीक्षा कर वैराग्यको प्राप्त | हो जाय, क्योंकि कृत (कर्म) के तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् | द्वारा अकृत (नित्यस्वरूप मोक्ष) | प्राप्त नहीं हो सकता । उसका समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्” | विशेष ज्ञान प्राप्त करनेके लिये तो (मु० उ० १ । २ । १२) | उस (जिज्ञासु) को हाथमें समिधा | लेकर श्रोत्रिय और ब्रह्मनिष्ठ गुरुके ही इत्याद्याथर्वणे च । | पास जाना चाहिये” इत्यादि । एवं हि विरक्तस्य प्रत्यगात्म- | केवल इस प्रकारसे ही विरक्त (निवृत्ताज्ञानस्य) विषयं विज्ञानं श्रोतुं | पुरुषको प्रत्यगात्मविषयक विज्ञानके (कृतकृत्यता-) मन्तुं विज्ञातुं च | श्रवण, मनन और साक्षात्कारकी (प्रदर्शनम्) सामर्थ्यमुपपद्यते, | क्षमता हो सकती है, और किसी नान्यथा । एतस्माच्च प्रत्यगात्म- | तरह नहीं । इस प्रत्यगात्माके वाक्य-भाष्य भवन्ति तन्निर्वर्तकाश्रयप्राण- | संस्कारके ही कारण होते हैं। “देवयाजी विज्ञानसहितानि । “देवयाजी | श्रेष्ठ हैं या आत्मयाजी” इस प्रकार श्रेयानात्मयाजी वा” इत्युपक्र- | आरम्भ करके वाजसनेय श्रुतिमें कहा म्यात्मयाजी तु करोति “इदं | है कि आत्मयाजी अपने संस्कारके मेऽनेनाङ्गं संस्क्रियते इति” संस्का- | लिये ही यह समझकर कर्म करता है रार्थमेव कर्माणीति वाजसनेयके। | कि “इससे मेरे इस अंगका संस्कार “महायज्ञैश्च यज्ञैश्च ब्राह्मीयं | होगा” । “यह शरीर महायज्ञ और क्रियते तनुः” (मनु० २ । २८) | यज्ञोंद्वारा ब्रह्मज्ञानकी प्राप्तिके योग्य “यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि | किया जाता है।” “यज्ञ, दान और तप- मनीषिणाम्” (गीता १८ । ५) | ये विद्वानोंको पवित्र करनेवाले ही हैं” इत्यादि स्मृतेश्च । | इत्यादि स्मृतियोंसे भी यही बात सिद्ध | होती है । प्राणादिविज्ञानं च केवलं कर्म- | अकेला या कर्मके साथ मिला हुआ समुच्चितं वा सकामस्य प्राणात्म- | होनेपर भी प्राणादि विज्ञान सकाम