किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)

किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)
Kiratarjuniyam of Bharavi Hindi
महाकवि भारवि द्वारा
स्रोत: Kiratarjuniyam with Ghantapath & Sudha Hindi Commentary by Sheshraj Sharma (उद्गम)
DevanagariHindipublished707 पृष्ठ
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श्लोकानुक्रमणिका
४३७
| स० | श्लो० | स० | श्लो० | ||
|---|---|---|---|---|---|
| त्वमन्तकः स्याश्च | १८ | ३५ | द्युति वहन्ती वनिता | ८ | ९३ |
| त्वया माभू समारम्भि | ११ | १० | द्युवियद्गामिनो तार | १५ | ४३ |
| त्विषां ततिः पाटलिता | १६ | ३३ | द्योरुन्नतामेव दिशः | १६ | ३५ |
| द | द्रुतपदमभियातु | १० | २ | ||
| दक्षिणां प्रणतदक्षिणां | १८ | २७ | द्वारि चक्षुरधिपाणि | ९ | ४३ |
| ददृशेऽथ सबिस्मयं | १३ | १७ | द्विरदानिव द्विरिख | २ | २३ |
| दधत इव विलासशालि | ५ | ३२ | द्विषतः परासिसिपु | १२ | ३४ |
| दधतमाकरिभिः करिभिः | ५ | ७ | द्विषतामुदयः | २ | ८ |
| दधति क्षतोः परिणतः | ६ | ७ | द्विषतां विहितं | २ | १० |
| दनुजः स्विदयं क्षपाः | १३ | ८ | द्विषन्निमित्ता यदियं | १ | ४१ |
| दरीमुखैरासवराग | १६ | ४६ | द्विषां विघाताय | १ | ३ |
| दिङ्नागहस्ताकृति | १६ | ३८ | द्विषां क्षतोर्याः प्रथमे | १४ | ५५ |
| दिवः पृथिव्याः ककुभां | १४ | ५३ | ध | ||
| दिव्यस्त्रीणा सचरण | ५ | २३ | धनुः प्ररन्ध्रध्वनितं | १६ | २० |
| दिशः समूहन्निव | १४ | ५० | धर्मात्मजो धर्मनिवन्धि | ३ | ३४ |
| दीपयन्नथ नभः | ९ | २३ | धार्तराष्ट्रैः सह प्रीति | ११ | ५५ |
| दीपितस्त्वमनुभाव | १३ | ३८ | धाष्टर्यलङ्घितयथोचित | ९ | ७२ |
| दुरक्षाम्बोध्यता राज्ञा | ११ | ४७ | धूतानामभिमुखपातिभिः | ७ | ३ |
| दुरापदवनजयाया | ११ | ६३ | धृतिविसवलयावलि | १० | २४ |
| दुरासदानरीनूप्रान् | ११ | २३ | धृतिविसवलंय निधाय | १० | ४६ |
| दुर्वचं तदद्य मा स्म | १३ | ४९ | धूतहेतिरप्यधूतजिह्म | ६ | २४ |
| दुःशासनामर्षरजो | ३ | ४७ | धृतोत्पलापोड इव | १६ | १५ |
| दूनास्तेऽरिवलादूना | १५ | ३१ | धैर्याविसादेन हृतप्रसादा | ३ | ३८ |
| दृश्यतामयमनीकहा | १३ | ७० | धैर्येण विश्वास्यतया | ३ | १४ |
| दृष्टावदानाद्वयतेऽरि | १७ | १६ | ध्रुवं प्रणाशः प्रहितस्य | १४ | ९ |
| दृष्ट्वा दृश्यान्त्याचरणी | १८ | २८ | ध्वनिरगविवरेषु | १० | ४ |
| देवाकानिनि कावादे | १४ | २५ | ध्वंसेत हृदयं सद्यः | ११ | ५७ |
| द्यों निरून्धदतिनील | ९ | २० |