माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेत । ( ९३ ) क्रूरैर्भृशमभ्याहतस्य च ॥ २४ ॥ ताडिते वक्षसि व्याधि- र्बलवान् समुदीर्यते । स्त्रीषु चातिप्रसक्तस्य रूक्षाल्पप्रमिता- शिनः ॥ २५ ॥ उरो विरुज्यतेऽत्यर्थं भिद्यतेऽथ विभज्यते । प्रपीड्यते तथा पार्श्वे शुष्यत्यङ्गं प्रवेपते ॥ २६॥ क्रमाद्वीर्यं बलं वर्णो रुचिरग्निश्च हीयते । ज्वरो व्यथा मनोदैन्यं विड्भेदोऽग्निवधावपि ॥ २७॥ दुष्टः श्यावोऽथ दुर्गन्धः पीतो विग्रथितो बहुः । कासमानस्य चाभीक्ष्णं कफः सास्रः प्रवर्त्तते ॥ २८ ॥ सक्षतः क्षीयतेऽत्यर्थं तथा शुक्रौजसोः क्षयात् । बहुत तीरंदाजी करनेसे, बहुत भारी वस्तु उठानेसे, बलवान् पुरुषके साथ युद्ध करनेसे, ऊंचे स्थानसे गिरनेसे, बैल, घोडा, हाथी, ऊंट इत्यादिक दौडते हुएको थामनेसे, भारी शिला लकडी पत्थर निर्घात ( अस्त्रविशेष ) इनके फेंकनेसे शत्रुको मारनेवाला, जोरसे वेदादिक शास्त्रको पढनेसे अथवा दूर दिशावर शीघ्र चलकर जानेसे, गंगा यमुनादि महानदीको तरनेवाला, अथवा घोडेके साथ दौडनेवाला, अकस्मात् कला खानेवाला, जल्दी जल्दी बहुत नाचनेसे, इसी प्रकार दूसरे मल्ल- युद्धादि क्रूरकर्म करनेसे, उर ( छाती ) फट जाती है ऐसे पुरुषकी छाती दुखनेसे बलवान् उरःक्षतरूप व्याधि उत्पन्न होय है और बहुत मैथुन करनेसे वा खानेसे तथा छातीमें चोट लगनेसे अत्यंत स्त्रीरमण करनेसे और रूखा थोडा कुसमय और बिना अनुमानका भोजन करनेवालेके-पूर्वोक्त लक्षणयुक्त ऐसे पुरुषका हृदय फटेके सदृश मालूम हो अथवा हृदयके दो टूक कर डाले ऐसा मालूम हो और हृदयमें अत्यन्त पीडा हो और उसके पसवाडोंमें अत्यन्त पीडा हो, अंग सब सूखने लगें तथा थरथर कांपने लगें और शक्ति, मांस, वर्ण, रुचि और अग्नि ये सब क्रमसे घटने लगे, ज्वर रहे, व्यथा हो, मनमें सन्ताप, दीन होजाय, अग्नि मन्द होनेसे दस्त होने लगें और बारंबार खाँसते २ दुष्ट काला अत्यन्त दुर्गन्धयुक्त पीला गांठके समान बहुत और रुधिर मिला ऐसा कफ गिरे इस प्रकार क्षतरोगी अत्यन्त क्षीण होय सो केवल क्षतसे ही क्षीण हो जाय ऐसा नहीं किन्तु स्त्रीसेवन करनेसे शुक्र और ओज ( सब धातुओंका तेज ) इनका क्षय होनेसे यह मनुष्य क्षीण हो जाता है ॥ उरःक्षतका पूर्वरूप । अव्यक्तं लक्षणं तस्य पूर्वरूपमिति स्मृतम् ॥ २९ ॥ उस उरःक्षतके अप्रगट लक्षणोंको पूर्वरूप कहते हैं ॥