भारतकोश
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेत । ( १०३ ) आसीनो लभते सौख्यमुष्णं चैवाभिनन्दति ॥ १८ ॥ उच्छ्रि- ताक्षो ललाटेन स्विद्यता भृशमार्त्तिमान् । विशुष्कास्यो मुहुः श्वासो मुहुश्चैवावधम्यते ॥ १९ ॥ मेघाम्बुशीतप्राग्वातैः श्लेष्मलैश्च विवर्द्धते । स याप्यस्तमकश्वासः साध्यो वा स्या- न्नवोत्थितः ॥ २० ॥ जिस कालमें शरीरकी पवन उलटी गतिसे नाडियोंके छिद्रमें प्राप्त होकर मस्तक तथा कण्ठका आश्रय कर कफसंयुक्त होय, तब कफसे रुककर अतिवेगपूर्वक कण्ठमें घुरघुर शब्द करे और मस्तकमें पीनस्रोग करे और अत्यन्त तीव्र वेगसे हृदयको पीडाका करनेवाला ऐसे श्वासको उत्पन्न करे उस श्वासके वेगसे मूर्च्छित होय, त्रासको प्राप्त होय, चेष्टारहित होय और खांसीके उठनेसे बडे मोहको बारंबार प्राप्त होय और जब कफ छूटे तब दुःख होय और कफ छूटनेके बाद दो घटी पर्यन्त सुख पावे, कण्ठमें खुजली चले, बडे कष्टसे बोले, श्वासकी पीडासे नींद न आवे, सोवे तो वायुसे पसवाडोंमें पीडा होय, बैठे ही चैन पडे और गरमीके पदार्थोंसे खुश होय, नेत्रोंमें सूजन होय, ललाटमें पसीना आवे, अत्यन्त पीडा होय, मुख सूखे, बारंबार श्वास और बारंबार हाथीपर बैठनेके सदृश सर्व देह चलायमान होवे । यह श्वास मेघके वर्षनेसे, शीतसे, पूर्वकी पवनसे और कफकारक पदार्थोंके सेवन करनेसे बढे है. यह तमकश्वास याप्य है, यदि नया प्रगट भया होय तो साध्य होय है ॥ पित्तका अनुबन्ध होकर ज्वरादिकोंका योग होनेसे प्रतमक होय है, उसको कहते हैं- ज्वरमूर्च्छापरीतस्य विद्यात्प्रतमकं तु तम् । इस तमकश्वासमें ज्वर और मूर्च्छा ये दोनों लक्षण होनेसे इसको प्रतमकश्वास कहते हैं ॥ प्रतमकके दूसरे लक्षण और कारण कहते हैं- उदावर्त्तरजोजीर्णक्लिन्नकायनिरोधजः ॥ २१ ॥ तमसा वर्धतेऽत्यर्थं शीतैश्चाशु प्रशाम्यति । मज्जतस्तमसीवास्य विद्यात्प्रतमकं तु तम् ॥ २२ ॥ उदावर्त, धूल, आमादि अजीर्ण, विदग्धान्न, मलमूत्रादि वेगके रोकनेसे अथवा क्लिन्नकाय कहिये वृद्ध मनुष्य और निरोध कहिये वेगरोध इन कारणोंसे प्रगट भई जो श्वास सो अन्धकारसे अथवा तमोगुणसे अत्यन्त बढे और शीतल उपचारसे शीघ्र शांति हो जाय, इस श्वासके योगसे रोगीको अन्धकारमें डूबा सदृश मालूम होय, इसको प्रतमकश्वास ऐसे कहते हैं ॥

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