भारतकोश
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेत । ( १८३ ) मूत्रजठरके लक्षण । मूत्रस्य वेगेऽभिहते तदुदावर्त्तहेतुकः । अपानः कुपितो वायु- रुदरं पूरयेद् भृशम् ॥ ८ ॥ नाभेरधस्तादाध्मानं जनयेत्तीव्र- वेदनम् । तन्मूत्रजठरं विद्यादधोबस्तिनिरोधजम् ॥ ९ ॥ मूत्रके वेग रोकनेसे मूत्रवेगधारणजनित, उदावर्त्तका कारणभूत ऐसी अपान वायु कुपित होकर पेट बहुत फूलजाय और नाभिके नीचे तीव्र वेदनासंयुक्त अफरा करे, अधोबस्तिका रोध करनेवाला ऐसे इस रोगको मूत्रजठर कहते हैं ॥ मूत्रोत्संगके लक्षण । बस्तौ वाप्यथवा नाले मणौ वा यस्य देहिनः । मूत्रं प्रवृत्तं सज्जेत सरक्तं वा प्रवाहतः ॥ १० ॥ स्रवेच्छनैरल्पमल्पं सरुजं वाथ नीरुजम् । विगुणानिलजो व्याधिः स मूत्रोत्सङ्गसंज्ञितः ॥ ११ ॥ प्रवृत्त भया मूत्र बस्तिमें अथवा शिश्न ( लिंग ) में अथवा शिश्नके अग्रभागमें अटक जाय और बलसे मूत्रको करे भी तो वादीसे बस्तिको फाडकर जो मूत्र निकले वह मंद मंद थोडा थोडा पीडाके साथ अथवा पीडारहित रुधिरसहित निकले ऐसे विगुणवायुसे उत्पन्नहुई इस व्याधिको मूत्रोत्संग कहते हैं ॥ मूत्रक्षयके लक्षण । रूक्षस्य क्लान्तदेहस्य बस्तिस्थौ पित्तमारुतौ । मूत्रक्षयं सरुग्दाहं जनयेतां तदाह्वयम् ॥ १२ ॥ रूखा भया अथवा श्रांत ( थकगया ) देह जिसका ऐसे पुरुषके बस्ति ( मूत्रा- शय ) में स्थित जो पित्त और वायु सो मूत्रको क्षय करे और पीडा तथा दाह होता है उसको मूत्रक्षय ऐसे कहते हैं ॥ मूत्रग्रन्थिके लक्षण । अन्तर्बस्तिमुखे वृत्तं स्थिरोऽल्पः सहसा भवेत् । अश्मरीतुल्यरुग्ग्रन्थिर्मूत्रग्रन्थिः स उच्यते ॥ १३ ॥ बस्तिके मुखमें गोल स्थिर छोटीसी गांठ अकस्मात् होय उसमें पथरीके समान पीडा होय इस रोगको मूत्रग्रन्थि कहते हैं ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA