भारतकोश
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 203, कुल 404 में से

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पृष्ठ 203

भाषाटीकासमेत । ( १८५ ) रूक्ष और दुर्बल पुरुषके शकृत् ( मल ) जब वायुकरके प्रेरित उदावर्तको प्राप्त हो तब वह मल मूत्रके मार्गमें आवै उस समय मनुष्य मूतने लगे तौ बड़े कष्टसे मूत्र उतरे और उसके मूत्रमें विष्ठाकीसी दुर्गंध आवै, उसको विड्विघात कहते हैं ॥ बस्तिकुण्डलरोगके लक्षण । द्रुताध्वलङ्घनायासैरभिघातात्प्रपीडनात् । स्वस्थानाद्वस्ति- रुद्वृत्तः स्थूलस्तिष्ठति गर्भवत् ॥ २१ ॥ शूलस्पन्दनदाहार्तो बिन्दुं बिन्दुं स्रवत्यपि । पीडितस्तु सृजेद्धारां संरम्भोद्वेष्ट- नार्तिमान् ॥ २२ ॥ बस्तिकुण्डलमाहुस्तं घोरं शस्त्रविषोप- मम् । पवनप्रबलं प्रायो दुर्निवारमबुद्धिभिः ॥ २३ ॥ जल्दी चलनेसे, लंघन करनेसे, परिश्रमसे, लकड़ी आदिकी चोट लगनेसे पीडासे वस्ति अपने स्थानको छोड़ ऊपर जाय मोटी होकर गर्भके समान कठिन रहे उससे शूल, कम्प और दाह ये होयँ । मूतकी एक एक बून्द गिरे, यदि वास्त जोरसे पीडित होय तो बड़ी धार पड़े, वेगसे हटनेके समान पीडा होय । इस रोगको बस्तिकुण्डल ऐसे कहते हैं । यह शस्त्रके समान जल्दी प्राणनाशक और विषके समान कालांतरमें प्राणका नाशकर्त्ता भयंकर है । इसमें प्रायः वायु प्रबल है, मन्द बुद्धिवाले वैद्योंसे इसका निवारण ( चिकित्सा ) करना कठिन है ॥ इसको अन्य दोषोंके सम्बन्ध होनेसे जो लक्षण होते हैं उनको कहता हूँ- तस्मिन्पित्तान्विते दाहः शूलं मूत्रविवर्णता । श्लेष्मणा गौरवं शोथः स्निग्धं मूत्रं घनं सितम् ॥ २४ ॥ वही बस्तिकुण्डल पित्तयुक्त होनेसे दाह और मूत्रका बुरा रंग होय और कफयुक्त होनेसे जडत्व, सूजन, मूत्र चिकना, गाढा, सफेद ऐसा होय ॥ साध्यासाध्यके लक्षण । श्लेष्मरुद्धबिलो बस्तिः पित्तोदीर्णो न सिध्यति । अविभ्रान्तबिलः साध्यो न च यः कुण्डलीकृतः ॥ २५ ॥ कफ करके जिसका मुख बन्द होय ऐसी और पित्तकरके व्याप्तभई ऐसी वस्ति साध्य नहीं होय और जिस बस्तिका मुख खुला होय तथा कुण्डलीकृत होय सो साध्य नहीं है ॥ कुण्डलीभूतके लक्षण । स्याद्बस्तौ कुण्डलीभूते तृण्मोहः श्वास एव च ॥ २६ ॥ बस्ति कुण्डलीभूत होनेसे प्यास मूर्च्छा और श्वास ये लक्षण होयँ ॥ इति श्रीपण्डितदत्ताराममाथुरप्रणीतमाधवार्यदीपिकायां माथुरीभाषा- टीकायां मूत्राघातनिदानं समाप्तम् ॥

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