भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1527

क्रियास्वपि च सर्वासु विशेषानभ्यशिक्षयत् ॥ ७३ ॥ अस्त्रोंके विज्ञान, सौष्ठव (प्रयोगपटुता) तथा सम्पूर्ण क्रियाओंमें भी महाबली अर्जुनने उसे विशेष शिक्षा दी थी ॥ ७३ ॥ आगमे च प्रयोगे च चक्रे तुल्यमिवात्मना । तुतोष पुत्रं सौभद्रं प्रेक्षमाणो धनंजयः ॥ ७४ ॥ धनंजयने अभिमन्युको (अस्त्र-शस्त्रोंके) आगम और प्रयोगमें अपने समान बना दिया था। वे सुभद्राकुमारको देखकर बहुत संतुष्ट रहते थे ॥ ७४ ॥ सर्वसंहननोपेतं सर्वलक्षणलक्षितम् । दुर्धर्षमृषभस्कन्धं व्यात्ताननमिवोरगम् ॥ ७५ ॥ वह दूसरोंको तिरस्कृत करनेवाले समस्त सद्गुणोंसे सम्पन्न, सभी उत्तम लक्षणोंसे सुशोभित एवं दुर्धर्ष था। उसके कंधे वृषभके समान हृष्ट-पुष्ट थे तथा मुँह बाये हुए सर्पकी भाँति वह शत्रुओंको भयानक प्रतीत होता था ॥ ७५ ॥ सिंहदर्पं महेष्वासं मत्तमातङ्गविक्रमम् । मेघदुन्दुभिनिर्घोषं पूर्णचन्द्रनिभाननम् ॥ ७६ ॥ उसमें सिंहके समान गर्व तथा मतवाले गजराजकी भाँति पराक्रम था। वह महाधनुर्धर वीर अपने गम्भीर स्वरसे मेघ और दुन्दुभिकी ध्वनिको लजा देता था। उसका मुख पूर्ण चन्द्रमाके समान मनमें आह्लाद उत्पन्न करता था ॥ ७६ ॥ कृष्णस्य सदृशं शौर्ये वीर्ये रूपे तथाऽऽकृतौ । ददर्श पुत्रं बीभत्सुर्मघवानिव तं यथा ॥ ७७ ॥ वह शूरता, पराक्रम, रूप तथा आकृति—सभी बातोंमें श्रीकृष्णके समान ही जान पड़ता था। अर्जुन अपने उस पुत्रको वैसी ही प्रसन्नतासे देखते थे, जैसे इन्द्र उन्हें देखा करते थे ॥ ७७ ॥ पाञ्चाल्यपि तु पञ्चभ्यः पतिभ्यः शुभलक्षणा । लेभे पञ्च सुतान् वीराञ्श्रेष्ठान् पञ्चाचलानिव ॥ ७८ ॥ शुभलक्षणा पांचालीने भी अपने पाँचों पतियोंसे पाँच श्रेष्ठ पुत्रोंको प्राप्त किया। वे सब-के-सब वीर और पर्वतके समान अविचल थे ॥ ७८ ॥ युधिष्ठिरात् प्रतिविन्ध्यं सुतसोमं वृकोदरात् । अर्जुनाच्छुतकम्माणं शतानीकं च नाकुलिम् ॥ ७९ ॥ सहदेवाच्छुतसेनमेतान् पञ्च महारथान् । पाञ्चाली सुषुवे वीरानादित्यानदितिर्यथा ॥ ८० ॥ युधिष्ठिरसे प्रतिविन्ध्य, भीमसेनसे सुतसोम, अर्जुनसे श्रुतकर्मा, नकुलसे शतानीक और सहदेवसे श्रुतसेन उत्पन्न हुए थे। इन पाँच वीर महारथी पुत्रोंको पांचाली (द्रौपदी)-ने उसी प्रकार जन्म दिया, जैसे अदितिने बारह आदित्योंको ॥ ७९-८० ॥