महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
क्रियास्वपि च सर्वासु विशेषानभ्यशिक्षयत् ॥ ७३ ॥ अस्त्रोंके विज्ञान, सौष्ठव (प्रयोगपटुता) तथा सम्पूर्ण क्रियाओंमें भी महाबली अर्जुनने उसे विशेष शिक्षा दी थी ॥ ७३ ॥ आगमे च प्रयोगे च चक्रे तुल्यमिवात्मना । तुतोष पुत्रं सौभद्रं प्रेक्षमाणो धनंजयः ॥ ७४ ॥ धनंजयने अभिमन्युको (अस्त्र-शस्त्रोंके) आगम और प्रयोगमें अपने समान बना दिया था। वे सुभद्राकुमारको देखकर बहुत संतुष्ट रहते थे ॥ ७४ ॥ सर्वसंहननोपेतं सर्वलक्षणलक्षितम् । दुर्धर्षमृषभस्कन्धं व्यात्ताननमिवोरगम् ॥ ७५ ॥ वह दूसरोंको तिरस्कृत करनेवाले समस्त सद्गुणोंसे सम्पन्न, सभी उत्तम लक्षणोंसे सुशोभित एवं दुर्धर्ष था। उसके कंधे वृषभके समान हृष्ट-पुष्ट थे तथा मुँह बाये हुए सर्पकी भाँति वह शत्रुओंको भयानक प्रतीत होता था ॥ ७५ ॥ सिंहदर्पं महेष्वासं मत्तमातङ्गविक्रमम् । मेघदुन्दुभिनिर्घोषं पूर्णचन्द्रनिभाननम् ॥ ७६ ॥ उसमें सिंहके समान गर्व तथा मतवाले गजराजकी भाँति पराक्रम था। वह महाधनुर्धर वीर अपने गम्भीर स्वरसे मेघ और दुन्दुभिकी ध्वनिको लजा देता था। उसका मुख पूर्ण चन्द्रमाके समान मनमें आह्लाद उत्पन्न करता था ॥ ७६ ॥ कृष्णस्य सदृशं शौर्ये वीर्ये रूपे तथाऽऽकृतौ । ददर्श पुत्रं बीभत्सुर्मघवानिव तं यथा ॥ ७७ ॥ वह शूरता, पराक्रम, रूप तथा आकृति—सभी बातोंमें श्रीकृष्णके समान ही जान पड़ता था। अर्जुन अपने उस पुत्रको वैसी ही प्रसन्नतासे देखते थे, जैसे इन्द्र उन्हें देखा करते थे ॥ ७७ ॥ पाञ्चाल्यपि तु पञ्चभ्यः पतिभ्यः शुभलक्षणा । लेभे पञ्च सुतान् वीराञ्श्रेष्ठान् पञ्चाचलानिव ॥ ७८ ॥ शुभलक्षणा पांचालीने भी अपने पाँचों पतियोंसे पाँच श्रेष्ठ पुत्रोंको प्राप्त किया। वे सब-के-सब वीर और पर्वतके समान अविचल थे ॥ ७८ ॥ युधिष्ठिरात् प्रतिविन्ध्यं सुतसोमं वृकोदरात् । अर्जुनाच्छुतकम्माणं शतानीकं च नाकुलिम् ॥ ७९ ॥ सहदेवाच्छुतसेनमेतान् पञ्च महारथान् । पाञ्चाली सुषुवे वीरानादित्यानदितिर्यथा ॥ ८० ॥ युधिष्ठिरसे प्रतिविन्ध्य, भीमसेनसे सुतसोम, अर्जुनसे श्रुतकर्मा, नकुलसे शतानीक और सहदेवसे श्रुतसेन उत्पन्न हुए थे। इन पाँच वीर महारथी पुत्रोंको पांचाली (द्रौपदी)-ने उसी प्रकार जन्म दिया, जैसे अदितिने बारह आदित्योंको ॥ ७९-८० ॥
शास्त्रतः प्रतिविन्ध्यं तमूचुर्विप्रा युधिष्ठिरम्। परप्रहरणज्ञाने प्रतिविन्ध्यो भवत्वयम्॥ ८१॥ ब्राह्मणोंने युधिष्ठिरसे उनके पुत्रका नाम शास्त्रके अनुसार प्रतिविन्ध्य बताया। उनका उद्देश्य यह था कि यह प्रहारजनित वेदनाके ज्ञानमें विन्ध्यपर्वतके समान हो। (इसे शत्रुओंके प्रहारसे तनिक भी पीड़ा न हो)॥ ८१॥ सुते सोमसहस्रे तु सोमार्कसमतेजसम्। सुतसोमं महेष्वासं सुषुवे भीमसेनतः॥ ८२॥ भीमसेनके सहस्र सोमयाग करनेके पश्चात् द्रौपदीने उनसे सोम और सूर्यके समान तेजस्वी महान् धनुर्धर पुत्रको उत्पन्न किया था, इसलिये उसका नाम सुतसोम रखा गया॥ ८२॥ श्रुतं कर्म महत् कृत्वा निवृत्तेन किरीटिना। जातः पुत्रस्तथेत्येवं श्रुतकर्मा ततोऽभवत्॥ ८३॥ किरीटधारी अर्जुनने महान् एवं विख्यात कर्म करनेके पश्चात् लौटकर द्रौपदीसे पुत्र उत्पन्न किया था, इसलिये उनके पुत्रका नाम श्रुतकर्मा हुआ॥ ८३॥ शतानीकस्य राजर्षेः कौरव्यस्य महात्मनः। चक्रे पुत्रं सनामानं नकुलः कीर्तिवर्धनम्॥ ८४॥ कौरवकुलके महामना राजर्षि शतानीकके नामपर नकुलने अपने कीर्तिवर्धक पुत्रका नाम शतानीक रख दिया॥ ८४॥ ततस्त्वजीजनत् कृष्णा नक्षत्रे वह्निदैवते। सहदेवात् सुतं तस्माच्छ्रुतसेनेति यं विदुः॥ ८५॥ तदनन्तर कृष्णाने सहदेवसे अग्निदेवतासम्बन्धी कृत्तिका नक्षत्रमें एक पुत्र उत्पन्न किया, इसलिये उसका नाम श्रुतसेन रखा गया (श्रुतसेन अग्निका ही नामान्तर है)॥ ८५॥ एकवर्षान्तरास्त्वेते द्रौपदेया यशस्विनः। अन्वजायन्त राजेन्द्र परस्परहितैषिणः॥ ८६॥ राजेन्द्र! ये यशस्वी द्रौपदीकुमार एक-एक वर्षके अन्तरसे उत्पन्न हुए थे और एक-दूसरेका हित चाहनेवाले थे॥ ८६॥ जातकर्मण्यानुपूर्व्याच्चूड़ोपनयनानि च। चकार विधिवद् धौम्यस्तेषां भरतसत्तम॥ ८७॥ भरतश्रेष्ठ! पुरोहित धौम्यने क्रमशः उन सभी बालकोंके जातकर्म, चूड़ाकरण और उपनयन आदि संस्कार विधिपूर्वक सम्पन्न किये॥ ८७॥ कृत्वा च वेदाध्ययनं ततः सुचरितव्रताः। जगृहुः सर्वमिष्वस्त्रमर्जुनाद् दिव्यमानुषम्॥ ८८॥
पूर्णरूपसे ब्रह्मचर्य व्रतका पालन करनेवाले उन बालकोंने धौम्य मुनिसे वेदाध्ययन करनेके पश्चात् अर्जुनसे सम्पूर्ण दिव्य एवं मानुष धनुर्वेदका ज्ञान प्राप्त किया ॥ ८८ ॥
दिव्यगर्भोपमैः पुत्रैर्व्यूढोरस्कैर्महारथैः ।
अन्वितो राजशार्दूल पाण्डवा मुदमाप्नुवन् ॥ ८९ ॥
राजेश्वर! देवपुत्रोंके समान चौड़ी छातीवाले महारथी पुत्रोंसे संयुक्त हो पाण्डव बड़े प्रसन्न हुए ॥ ८९ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि हरणाहरणपर्वणि विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत हरणाहरणपर्वमें दो सौ बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२० ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १ १/२ श्लोक मिलाकर कुल ९० १/२ श्लोक हैं)
१. धनुर्वेदमें निम्नांकित चार पाद बताये गये हैं—मन्त्रमुक्त, पाणिमुक्त, मुक्तामुक्त और अमुक्त। जैसा कि वचन है—
मन्त्रमुक्तं पाणिमुक्तं मुक्तामुक्तं तथैव च । अमुक्तं च धनुर्वेदे चतुष्पाच्छस्त्रमीरितम् ।।
जिसका मन्त्रद्वारा केवल प्रयोग होता है, उपसंहार नहीं, उसे मन्त्रमुक्त कहते हैं। जिसे हाथमें लेकर धनुषद्वारा छोड़ा जाय, वह बाण आदि पाणिमुक्त कहा गया है। जिसके प्रयोग और उपसंहार दोनों हों, वह मुक्तामुक्त है। जो वस्तुतः छोड़ा नहीं जाता, जैसे मन्त्रद्वारा साधित (ध्वजा आदि) है, जिसको देखनेमात्रसे शत्रु भाग जाते हैं, वह अमुक्त कहलाता है। ये अथवा सूत्र, शिक्षा, प्रयोग तथा रहस्य—ये ही धनुर्वेदके चार पाद हैं।
२. आदान, संधान, मोक्षण, निवर्तन, स्थान, मुष्टि, प्रयोग, प्रायश्चित्त, मण्डल तथा रहस्य—धनुर्वेदके ये दस अंग हैं। यथा—
आदानमथ संधानं मोक्षणं विनिवर्तनम् । स्थानं मुष्टिः प्रयोगश्च प्रायश्चित्तानि मण्डलम् ।।
रहस्यं चेति दशधा धनुर्वेदाङ्गमिश्यते ।
‘तरकससे बाणको निकालना आदान है। उसे धनुषकी प्रत्यंचापर रखना संधान है, लक्ष्यपर छोड़ना मोक्षण कहा गया है। यदि बाण छोड़ देनेके बाद यह मालूम हो जाय कि हमारा विपक्षी निर्बल या शस्त्रहीन है, तो वीर पुरुष मन्त्रशक्तिसे उस बाणको लौटा लेते हैं। इस प्रकार छोड़े हुए अस्त्रको लौटा लेना विनिवर्तन कहलाता है। धनुष या उसकी प्रत्यंचाके धारण अथवा शरसंधानकालमें धनुष और प्रत्यंचाके मध्यदेशको स्थान कहा गया है। तीन या चार अंगुलियोंका सहयोग ही मुष्टि है। तर्जनी और मध्यमा अंगुलिके अथवा मध्यमा और अंगुष्ठके मध्यसे बाणका संधान करना प्रयोग कहलाता है। स्वतः या दूसरेसे प्राप्त होनेवाले ज्याघात (प्रत्यंचाके आघात) और बाणके आघातको रोकनेके लिये जो दस्तानों आदिका प्रयोग किया जाता है, उसका नाम प्रायश्चित्त है। चक्राकार घूमते हुए रथके साथ-साथ घूमनेवाले लक्ष्यका वेध मण्डल कहलाता है। शब्दके आधारपर लक्ष्य बींधना अथवा एक ही समय अनेक लक्ष्योंको बींध डालना, ये सब रहस्यके अन्तर्गत हैं।’
३. ब्रह्मास्त्र आदिको दिव्य और खड्ग आदिको मानुष कहा गया है।
(खाण्डवदाहपर्व)
(खाण्डवदाहपर्व)
एकविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
युधिष्ठिरके राज्यकी विशेषता, कृष्ण और अर्जुनका खाण्डववनमें जाना तथा उन दोनोंके पास ब्राह्मणवेशधारी अग्निदेवका आगमन
वैशम्पायन उवाच
इन्द्रप्रस्थे वसन्तस्ते जघ्नुरन्यान् नराधिपान्।
शासनाद् धृतराष्ट्रस्य राज्ञः शान्तनवस्य च॥ १॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! राजा धृतराष्ट्र तथा शान्तनुनन्दन भीष्मकी आज्ञासे इन्द्रप्रस्थमें रहते हुए पाण्डवोंने अन्य बहुत-से राजाओंको, जो उनके शत्रु थे, मार दिया॥ १॥
आश्रित्य धर्मराजानं सर्वलोकोऽवसत् सुखम्।
पुण्यलक्षणकर्माणं स्वदेहमिव देहिनः॥ २॥
धर्मराज युधिष्ठिरका आसरा लेकर सब लोग सुखसे रहने लगे, जैसे जीवात्मा पुण्यकर्मोंके फलस्वरूप अपने उत्तम शरीरको पाकर सुखसे रहता है॥ २॥
स समं धर्मकामार्थान् सिषेवे भरतर्षभ।
त्रीनिवात्मसमान् बन्धून् नीतिमानिव मानयन्॥ ३॥
भरतश्रेष्ठ! महाराज युधिष्ठिर नीतिज्ञ पुरुषकी भाँति धर्म, अर्थ और काम इन तीनोंको आत्माके समान प्रिय बन्धु मानते हुए न्याय और समतापूर्वक इनका सेवन करते थे॥ ३॥
तेषां समविभक्तानां क्षितौ देहवतामिव।
बभौ धर्मार्थकामानां चतुर्थ इव पार्थिवः॥ ४॥
इस प्रकार तुल्यरूपसे बँटे हुए धर्म, अर्थ और काम तीनों पुरुषार्थ भूतलपर मानो मूर्तिमान् होकर प्रकट हो रहे थे और राजा युधिष्ठिर चौथे पुरुषार्थ मोक्षकी भाँति सुशोभित होते थे॥ ४॥
अध्येतारं परं वेदान् प्रयोक्तारं महाध्वरे।
रक्षितारं शुभाँल्लोकान् लेभिरे तं जनाधिपम्॥ ५॥
प्रजाने महाराज युधिष्ठिरके रूपमें ऐसा राजा पाया था, जो परम ब्रह्म परमात्माका चिन्तन करनेवाला, बड़े-बड़े यज्ञोंमें वेदोंका उपयोग करनेवाला और शुभ लोकोंके संरक्षणमें तत्पर रहनेवाला था ॥ ५ ॥ अधिष्ठानवती लक्ष्मीः परायणवती मतिः । वर्धमानोऽखिलो धर्मस्तेनासीत् पृथिवीक्षिताम् ॥ ६ ॥ राजा युधिष्ठिरके द्वारा दूसरे राजाओंकी चंचल लक्ष्मी भी स्थिर हो गयी, बुद्धि उत्तम निष्ठावाली हो गयी और सम्पूर्ण धर्मकी दिनोंदिन वृद्धि होने लगी ॥ ६ ॥ भ्रातृभिः सहितो राजा चतुर्भिरधिकं बभौ । प्रयुज्यमानैर्विततो वेदैरेव महाध्वरः ॥ ७ ॥ जैसे यथावसर उपयोगमें लाये जानेवाले चारों वेदोंके द्वारा विस्तारपूर्वक आरम्भ किया हुआ महायज्ञ शोभा पाता है, उसी प्रकार अपनी आज्ञाके अधीन रहनेवाले चारों भाइयोंके साथ राजा युधिष्ठिर अत्यन्त सुशोभित होते थे ॥ ७ ॥ तं तु धौम्यादयो विप्राः परिवार्योपतस्थिरे । बृहस्पतिसमा मुख्याः प्रजापतिमिवामराः ॥ ८ ॥ जैसे बृहस्पति-सदृश मुख्य-मुख्य देवता प्रजापतिकी सेवामें उपस्थित होते हैं, उसी प्रकार धौम्य आदि ब्राह्मण राजा युधिष्ठिरको सब ओरसे घेरकर बैठते थे ॥ ८ ॥ धर्मराजे ह्यतिप्रीत्या पूर्णचन्द्र इवामले । प्रजानां रेमिरे तुल्यं नेत्राणि हृदयानि च ॥ ९ ॥ निर्मल एवं पूर्ण चन्द्रमाके समान आनन्दप्रद राजा युधिष्ठिरके प्रति अत्यन्त प्रीति होनेके कारण उन्हें देखकर प्रजाके नेत्र और मन एक साथ प्रफुल्लित हो उठते थे ॥ ९ ॥ न तु केवलदैवेन प्रजा भावेन रेमिरे । यद् बभूव मनःकान्तं कर्मणा स चकार तत् ॥ १० ॥ प्रजा केवल उनके पालनरूप राजोचित कर्मसे ही संतुष्ट नहीं थी, वह उनके प्रति श्रद्धा और भक्तिभाव रखनेके कारण भी सदा आनन्दित रहती थी। राजाके प्रति प्रजाकी भक्ति इसलिये थी कि प्रजाके मनको जो प्रिय लगता था, राजा युधिष्ठिर उसीको क्रियाद्वारा पूर्ण करते थे ॥ १० ॥ न ह्ययुक्तं न चासत्यं नासह्यं न च वाप्रियम् । भाषितं चारुभाषस्य जज्ञे पार्थस्य धीमतः ॥ ११ ॥ सदा मीठी बातें करनेवाले बुद्धिमान् कुन्तीनन्दन राजा युधिष्ठिरके मुखसे कभी कोई अनुचित, असत्य, असह्य और अप्रिय बात नहीं निकलती थी ॥ ११ ॥ स हि सर्वस्य लोकस्य हितमात्मन एव च । चिकीर्षन् सुमहातेजा रेमे भरतसत्तम ॥ १२ ॥
भरतश्रेष्ठ! महातेजस्वी राजा युधिष्ठिर सब लोगोंका और अपना भी हित करनेकी चेष्टामें लगे रहकर सदा प्रसन्नतापूर्वक समय बिताते थे ॥ १२ ॥
तथा तु मुदिताः सर्वे पाण्डवा विगतज्वराः । अवसन् पृथिवीपालांस्तापयन्तः स्वतेजसा ॥ १३ ॥
इस प्रकार सभी पाण्डव अपने तेजसे दूसरे नरेशोंको संतप्त करते हुए निश्चिन्त तथा आनन्दमग्न होकर वहाँ निवास करते थे ॥ १३ ॥
ततः कतिपयाहस्य बीभत्सुः कृष्णमब्रवीत् । उष्णानि कृष्ण वर्तन्ते गच्छावो यमुनां प्रति ॥ १४ ॥
तदनन्तर कुछ दिनोंके बाद अर्जुनने श्रीकृष्णसे कहा—'कृष्ण! बड़ी गरमी पड़ रही है। चलिये, यमुनाजीमें स्नानके लिये चलें ॥ १४ ॥
सुहृज्जनवृतौ तत्र विहृत्य मधुसूदन । सायाह्ने पुनरेष्यावो रोचतां ते जनार्दन ॥ १५ ॥
'मधुसूदन! मित्रोंके साथ वहाँ जलविहार करके हमलोग शामतक फिर लौट आयेंगे। जनार्दन! यदि आपकी रुचि हो, तो चलें' ॥ १५ ॥
वासुदेव उवाच
कुन्तीमातर्ममाप्येतद् रोचते यद् वयं जले । सुहृज्जनवृताः पार्थ विहरेम यथासुखम् ॥ १६ ॥
वासुदेव बोले—कुन्तीनन्दन! मेरी भी ऐसी ही इच्छा हो रही है कि हमलोग सुहृदोंके साथ वहाँ चलकर सुखपूर्वक जलविहार करें ॥ १६ ॥
वैशम्पायन उवाच
आमन्त्र्य तौ धर्मराजमनुज्ञाप्य च भारत । जग्मतुः पार्थगोविन्दौ सुहृज्जनवृतौ ततः ॥ १७ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—भारत! यह सलाह करके युधिष्ठिरकी आज्ञा ले अर्जुन और श्रीकृष्ण सुहृदोंके साथ वहाँ गये ॥ १७ ॥
विहारदेशं सम्प्राप्य नानाद्रुममनुत्तमम् । गृहैरुच्चावचैर्युक्तं पुरन्दरपुरोपमम् ॥ १८ ॥ भक्ष्यैर्भोज्यैश्च पेयैश्च रसवद्भिर्महाधनैः । माल्यैश्च विविधैर्गन्धैर्युक्तं वार्ष्णेयपार्थयोः ॥ १९ ॥ विवेशान्तःपुरं तूर्णं रत्नैरुच्चावचैः शुभैः । यथोपजोषं सर्वश्च जनश्चिक्रीड भारत ॥ २० ॥
यमुनाके तटपर जहाँ विहारस्थान था, वहाँ पहुँचकर श्रीकृष्ण और अर्जुनके रनिवासकी स्त्रियाँ नाना प्रकारके सुन्दर रत्नोंके साथ क्रीड़ाभवनके भीतर चली गयीं। वह
उत्तम विहारभूमि नाना प्रकारके वृक्षोंसे सुशोभित थी। वहाँ बने हुए अनेक छोटे-बड़े भवनोंके कारण वह स्थान इन्द्रपुरीके समान सुशोभित होता था। अन्तःपुरकी स्त्रियोंके साथ अनेक प्रकारके भक्ष्य, भोज्य, बहुमूल्य सरस पेय, भाँति-भाँतिके पुष्पहार और सुगन्धित द्रव्य भी थे। भारत! वहाँ जाकर सब लोग अपनी-अपनी रुचिके अनुसार जलक्रीड़ा करने लगे ॥ १८-२० ॥
स्त्रियश्च विपुलश्रोण्यश्चारूपीनपयोधराः ।
मदस्खलितगामिन्यश्चिक्रीडुर्वामलोचनाः ॥ २१ ॥
विशाल नितम्बों और मनोहर पीन उरोजोंवाली वामलोचना वनिताएँ भी यौवनके मदके कारण डगमगाती चालसे चलकर इच्छानुसार क्रीड़ाएँ करने लगीं ॥ २१ ॥
वने काश्चिज्जले काश्चित् काश्चिद् वेश्मसु चाङ्गनाः ।
यथायोग्यं यथाप्रीति चिक्रीडुः पार्थकृष्णयोः ॥ २२ ॥
वे स्त्रियाँ श्रीकृष्ण और अर्जुनकी रुचिके अनुसार कुछ वनमें, कुछ जलमें और कुछ घरोंमें यथोचितरूपसे क्रीड़ा करने लगीं ॥ २२ ॥
द्रौपदी च सुभद्रा च वासांस्याभरणानि च ।
प्रायच्छतां महाराज ते तु तस्मिन् मदोत्कटे ॥ २३ ॥
महाराज! उस समय यौवनमदसे युक्त द्रौपदी और सुभद्राने बहुत-से वस्त्र और आभूषण बाँटे ॥ २३ ॥
काश्चित् प्रहृष्टा ननृतुश्चक्रुशुश्च तथापराः ।
जहसुश्च परा नार्यो जगुश्चान्या वरस्त्रियः ॥ २४ ॥
वहाँ कुछ श्रेष्ठ स्त्रियाँ हर्षोल्लासमें भरकर नृत्य करने लगीं। कुछ जोर-जोरसे कोलाहल करने लगीं। अन्य बहुत-सी स्त्रियाँ ठठाकर हँसने लगीं तथा कुछ सुन्दरी स्त्रियाँ गीत गाने लगीं ॥ २४ ॥
रुरुधुश्चापरास्तत्र प्रजघ्नुश्च परस्परम् ।
मन्त्रयामासुरन्याश्च रहस्यानि परस्परम् ॥ २५ ॥
कुछ एक-दूसरीको पकड़कर रोकने और मृदु प्रहार करने लगीं तथा कुछ दूसरी स्त्रियाँ एकान्तमें बैठकर आपसमें कुछ गुप्त बातें करने लगीं ॥ २५ ॥
वेणुवीणामृदङ्गानां मनोज्ञानां च सर्वशः ।
शब्देन पूर्यते हर्म्यं तद् वनं सुमहर्द्धिमत् ॥ २६ ॥
वहाँका राजभवन और महान् समृद्धिशाली वन वीणा, वेणु और मृदंग आदि मनोहर वाद्योंकी सुमधुर ध्वनिसे सब ओर गूँजने लगा ॥ २६ ॥
तस्मिंस्तदा वर्तमाने कुरुदाशार्हनन्दनौ ।
समीपं जग्मतुः कंचिद्देशं सुमनोहरम् ॥ २७ ॥
इस प्रकार जब वहाँ क्रीड़ा-विहारका आनन्दमय उत्सव चल रहा था, उसी समय श्रीकृष्ण और अर्जुन पासके ही किसी अत्यन्त मनोहर प्रदेशमें गये ।। २७ ।। तत्र गत्वा महात्मानौ कृष्णौ परपुरंजयौ । महार्हासनयो राजंस्ततस्तौ संनिषीदतुः ।। २८ ।। तत्र पूर्वव्यतीतानि विक्रान्तानीतराणि च । बहूनि कथयित्वा तौ रेमाते पार्थमाधवौ ।। २९ ।। राजन्! वहाँ जाकर शत्रुओंकी राजधानीको जीतनेवाले वे दोनों महात्मा श्रीकृष्ण और अर्जुन दो बहुमूल्य सिंहासनोंपर बैठे और पहले किये हुए पराक्रमों तथा अन्य बहुत-सी बातोंकी चर्चा करके आमोद-प्रमोद करने लगे ।। २८-२९ ।। तत्रोपविष्टौ मुदितौ नाकपृष्ठेऽश्विनाविव । अभ्यागच्छत् तदा विप्रो वासुदेवधनंजयौ ।। ३० ।। वहाँ प्रसन्नतापूर्वक बैठे हुए धनंजय और वासुदेव स्वर्गलोकमें स्थित अश्विनीकुमारोंकी भाँति सुशोभित हो रहे थे। उसी समय उन दोनोंके पास एक ब्राह्मणदेवता आये ।। ३० ।। बृहच्छालप्रतीकाशः प्रतप्तकनकप्रभः । हरिपिङ्गोऽज्ज्वलश्मश्रुः प्रमाणायामतः समः ।। ३१ ।। वे विशाल शालवृक्षके समान ऊँचे थे। उनकी कान्ति तपाये हुए सुवर्णके समान थी। उनके सारे अंग नीले और पीले रंगके थे, दाढ़ी-मूँछें अग्निज्वालाके समान पीतवर्णकी थीं तथा ऊँचाईके अनुसार ही उनकी मोटाई थी ।। ३१ ।। तरुणादित्यसंकाशश्चीरवासा जटाधरः । पद्मपत्राननः पिङ्गस्तेजसा प्रज्वलन्निव ।। ३२ ।। वे प्रातःकालिक सूर्यके समान तेजस्वी जान पड़ते थे। वे चीरवस्त्र पहने और मस्तकपर जटा धारण किये हुए थे। उनका मुख कमलदलके समान शोभा पा रहा था। उनकी प्रभा पिंगलवर्णकी थी और वे अपने तेजसे मानो प्रज्वलित हो रहे थे ।। ३२ ।। उपसृष्टं तु तं कृष्णौ भ्राजमानं द्विजोत्तमम् । अर्जुनो वासुदेवश्च तूर्णमुत्पत्य तस्थतुः ।। ३३ ।। वे तेजस्वी द्विजश्रेष्ठ जब निकट आ गये, तब अर्जुन और भगवान् श्रीकृष्ण तुरंत ही आसनसे उठकर खड़े हो गये ।। ३३ ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि खाण्डवदाहपर्वणि ब्राह्मणरूप्यनलागमने एकविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत खाण्डवदाहपर्वमें ब्राह्मणरूपी अग्निदेवके आगमनसे सम्बन्ध रखनेवाला दो सौ इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२१ ॥
अग्निदेवका खाण्डववनको जलानेके लिये श्रीकृष्ण और अर्जुनसे सहायताकी याचना करना, अग्निदेव उस वनको क्यों जलाना चाहते थे, इसे बतानेके प्रसंगमें राजा श्वेतक
द्वाविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
अग्निदेवका खाण्डववनको जलानेके लिये श्रीकृष्ण और अर्जुनसे सहायताकी याचना करना, अग्निदेव उस वनको क्यों जलाना चाहते थे, इसे बतानेके प्रसंगमें राजा श्वेतकिकी कथा
वैशम्पायन उवाच
सोऽब्रवीदर्जुनं चैव वासुदेवं च सात्वतम् ।
लोकप्रवीरौ तिष्ठन्तौ खाण्डवस्य समीपतः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! उन ब्राह्मण-देवताने अर्जुन और सात्वतवंशी भगवान् वासुदेवसे, जो विश्वविख्यात वीर थे और खाण्डववनके समीप खड़े हुए थे, कहा— ॥ १ ॥
ब्राह्मणो बहुभोक्तास्मि भुञ्जेऽपरिमितं सदा ।
भिक्षे वार्ष्णेयपार्थौ वामेकां तृप्तिं प्रयच्छतम् ॥ २ ॥
‘मैं अधिक भोजन करनेवाला एक ब्राह्मण हूँ और सदा अपरिमित अन्न भोजन करता हूँ। वीर श्रीकृष्ण और अर्जुन! आज मैं आप दोनोंसे भिक्षा माँगता हूँ। आपलोग एक बार पूर्ण भोजन कराकर मुझे तृप्ति प्रदान कीजिये’ ॥ २ ॥
एवमुक्तौ तमब्रूतां ततस्तौ कृष्णपाण्डवौ ।
केनान्नेन भवांस्तृप्येत् तस्यान्नस्य यतावहे ॥ ३ ॥
उनके ऐसा कहनेपर श्रीकृष्ण और अर्जुन बोले—‘ब्रह्मन्! बताइये, आप किस अन्नसे तृप्त होंगे? हम दोनों उसीके लिये प्रयत्न करेंगे’ ॥ ३ ॥
एवमुक्तः स भगवानब्रवीत् तायुभौ ततः ।
भाषमाणौ तदा वीरौ किमन्नं क्रियतामिति ॥ ४ ॥
जब वे दोनों वीर ‘आपके लिये किस अन्नकी व्यवस्था की जाय?’ इसी बातको बार-बार दुहराने लगे, तब उनके ऐसा कहनेपर भगवान् अग्निदेव उन दोनोंसे इस प्रकार बोले ॥ ४ ॥
ब्राह्मण उवाच
नाहमन्नं बुभुक्षे वै पावकं मां निबोधतम् ।
यदन्नमनुरूपं मे तद् युवां सम्प्रयच्छतम् ॥ ५ ॥
**ब्राह्मणदेवताने कहा—**वीरो! मुझे अन्नकी भूख नहीं है, आपलोग मुझे अग्नि समझें। जो अन्न मेरे अनुरूप हो, वही आप दोनों मुझे दें ।। ५ ।।
इदमिन्द्रः सदा दावं खाण्डवं परिरक्षति ।
न च शक्नोम्यहं दग्धुं रक्ष्यमाणं महात्मना ।। ६ ।।
इन्द्र सदा इस खाण्डववनकी रक्षा करते हैं। उन महामनासे सुरक्षित होनेके कारण मैं इसे जला नहीं पाता ।। ६ ।।
वसत्यत्र सखा तस्य तक्षकः पन्नगः सदा ।
सगणस्तत्कृते दावं परिरक्षति वज्रभृत् ।। ७ ।।
इस वनमें इन्द्रका सखा तक्षक नाग अपने परिवारसहित सदा निवास करता है। उसीके लिये वज्रधारी इन्द्र सदा इसकी रक्षा करते हैं ।। ७ ।।
तत्र भूतान्यनेकानि रक्षतेऽस्य प्रसङ्गतः ।
तं दिधक्षुर्न शक्नोमि दग्धुं शक्रस्य तेजसा ।। ८ ।।
उस तक्षक नागके प्रसंगसे ही यहाँ रहनेवाले और भी अनेक जीवोंकी वे रक्षा करते हैं, इसलिये इन्द्रके प्रभावसे मैं इस वनको जला नहीं पाता। परंतु मैं सदा ही इसे जलानेकी इच्छा रखता हूँ ।। ८ ।।
स मां प्रज्वलितं दृष्ट्वा मेघाम्भोभिः प्रवर्षति ।
ततो दग्धुं न शक्नोमि दिधक्षुर्दावमीप्सितम् ।। ९ ।।
मुझे प्रज्वलित देखकर वे मेघोंद्वारा जलकी वर्षा करने लगते हैं, यही कारण है कि जलानेकी इच्छा रखते हुए भी मैं इस खाण्डववनको दग्ध करनेमें सफल नहीं हो पाता ।। ९ ।।
स युवाभ्यां सहायाभ्यामस्त्रविद्भ्यां समागतः ।
दहेयं खाण्डवं दावमेतदन्नं वृतं मया ।। १० ।।
आप दोनों अस्त्रविद्याके पूरे जानकार हैं, अतः मैं इसी उद्देश्यसे आपके पास आया हूँ कि आप दोनोंकी सहायतासे इस खाण्डववनको जला सकूँ। मैं इसी अन्नकी भिक्षा माँगता हूँ ।। १० ।।
युवां ह्युदकधारास्ता भूतानि च समन्ततः ।
उत्तमास्त्रविदौ सम्यक् सर्वतो वारयिष्यथः ।। ११ ।।
आप दोनों उत्तम अस्त्रोंके ज्ञाता हैं, अतः जब मैं इस वनको जलाने लगूँ, उस समय आपलोग ऊपरसे बरसती हुई जलकी धाराओं तथा इस वनसे निकलकर चारों ओर भागनेवाले प्राणियोंको रोकियेगा ।। ११ ।।
जनमेजय उवाच
किमर्थं भगवानग्निः खाण्डवं दग्धुमिच्छति ।
रक्ष्यमाणं महेन्द्रेण नानासत्त्वसमायुतम् ॥ १२ ॥
जनमेजयने पूछा— ब्रह्मन्! भगवान् अग्निदेव देवराज इन्द्रके द्वारा सुरक्षित और अनेक प्रकारके जीव-जन्तुओंसे भरे हुए खाण्डववनको किसलिये जलाना चाहते थे? ॥ १२ ॥
न ह्येतत् कारणं ब्रह्मन्नल्पं सम्प्रतिभाति मे ।
यद् ददाह सुसंक्रुद्धः खाण्डवं हव्यवाहनः ॥ १३ ॥
विप्रवर! मुझे इसका कोई साधारण कारण नहीं जान पड़ता, जिसके लिये कुपित होकर हव्यवाहन अग्निने समूचे खाण्डववनको भस्म कर दिया ॥ १३ ॥
एतद् विस्तरशो ब्रह्मञ्छ्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ।
खाण्डवस्य पुरा दाहो यथा समभवन्मुने ॥ १४ ॥
ब्रह्मन्! मुने! पूर्वकालमें खाण्डववनका दाह जिस प्रकार हुआ, वह सब विस्तारके साथ मैं ठीक-ठीक सुनना चाहता हूँ ॥ १४ ॥
वैशम्पायन उवाच
शृणु मे ब्रुवतो राजन् सर्वमेतद् यथातथम् ।
यन्निमित्तं ददाहाग्निः खाण्डवं पृथिवीपते ॥ १५ ॥
वैशम्पायनजीने कहा— महाराज जनमेजय! अग्निदेवने जिस कारण खाण्डववनको जलाया, वह सब वृत्तान्त मैं यथावत् बतलाता हूँ, सुनो ॥ १५ ॥
हन्त ते कथयिष्यामि पौराणीमृषिसंस्तुताम् ।
कथामिमां नरश्रेष्ठ खाण्डवस्य विनाशिनीम् ॥ १६ ॥
नरश्रेष्ठ! खाण्डववनके विनाशसे सम्बन्ध रखनेवाली यह प्राचीन कथा महर्षियोंद्वारा प्रस्तुत की गयी है। उसीको मैं तुमसे कहूँगा ॥ १६ ॥
पौराणः श्रूयते राजन् राजा हरिहयोपमः ।
श्वेतकिर्नाम विख्यातों बलविक्रमसंयुतः ॥ १७ ॥
राजन्! सुना जाता है, प्राचीनकालमें इन्द्रके समान बल और पराक्रमसे सम्पन्न श्वेतकि नामके एक राजा थे ॥ १७ ॥
यज्वा दानपतिर्धीमान् यथा नान्योऽस्ति कश्चन ।
ईजे च स महायज्ञैः ऋतुभिश्चाप्तदक्षिणैः ॥ १८ ॥
उस समय उनके-जैसा यज्ञ करनेवाला, दाता और बुद्धिमान् दूसरा कोई नहीं था। उन्होंने पर्याप्त दक्षिणावाले अनेक बड़े-बड़े यज्ञोंका अनुष्ठान किया था ॥ १८ ॥
तस्य नान्याभवद् बुद्धिर्दिवसे दिवसे नृप ।
सत्रे क्रियासमारम्भे दानेषु विविधेषु च ॥ १९ ॥
राजन्! प्रतिदिन उनके मनमें यज्ञ और दानके सिवा दूसरा कोई विचार ही नहीं उठता था। वे यज्ञकर्मोंके आरम्भ और नाना प्रकारके दानोंमें ही लगे रहते थे ॥ १९ ॥ ऋत्विग्भिः सहितो धीमानेवमीजे स भूमिपः । ततस्तु ऋत्विजश्चास्य धूमव्याकुललोचनाः ॥ २० ॥ इस प्रकार वे बुद्धिमान् नरेश ऋत्विजोंके साथ यज्ञ किया करते थे। यज्ञ करते-करते उनके ऋत्विजोंकी आँखें धुएँसे व्याकुल हो उठीं ॥ २० ॥ कालेन महता खिन्नास्तत्यजुस्ते नराधिपम् । ततः प्रचोदयामास ऋत्विजस्तान् महीपतिः ॥ २१ ॥ चक्षुर्विकलतां प्राप्ता न प्रपेदुश्च ते क्रतुम् । ततस्तेषामनुमते तद् विप्रैस्तु नराधिपः ॥ २२ ॥ सत्रं समापयामास ऋत्विग्भिरपरैः सह । दीर्घकालतक आहुति देते-देते वे सभी खिन्न हो गये थे। इसलिये राजाको छोड़कर चले गये। तब राजाने उन ऋत्विजोंको पुनः यज्ञके लिये प्रेरित किया। परंतु जिनके नेत्र दुखने लगे थे, वे ऋत्विज उनके यज्ञमें नहीं आये। तब राजाने उनकी अनुमति लेकर दूसरे ब्राह्मणोंको ऋत्विज बनाया और उन्हींके साथ अपने चालू किये हुए यज्ञको पूरा किया ॥ २१-२२ १/२ ॥ तस्यैवं वर्तमानस्य कदाचित् कालपर्यये ॥ २३ ॥ सत्रमाहर्तुकामस्य संवत्सरशतं किल । ऋत्विजो नाभ्यपद्यन्त समाहर्तुं महात्मनः ॥ २४ ॥ इस प्रकार यज्ञपरायण राजाके मनमें किसी समय यह संकल्प उठा कि मैं सौ वर्षोंतक चालू रहनेवाला एक सत्र प्रारम्भ करूँ; परंतु उन महामनाको वह यज्ञ आरम्भ करनेके लिये ऋत्विज ही नहीं मिले ॥ २३-२४ ॥ स च राजाकरोद् यत्नं महान्तं ससुहृज्जनः । प्रणिपातेन सान्त्वेन दानेन च महायशाः ॥ २५ ॥ ऋत्विजोऽनुनयामास भूयो भूयस्त्वतन्द्रितः । ते चास्य तमभिप्रायं न चक्रुरमितौजसः ॥ २६ ॥ उन महायशस्वी नरेशने अपने सुहृदोंको साथ लेकर इस कार्यके लिये बहुत बड़ा प्रयत्न किया। पैरोंपर पड़कर, सान्त्वनापूर्ण वचन कहकर और इच्छानुसार दान देकर बार-बार निरालस्यभावसे ऋत्विजोंको मनाया, उनसे यज्ञ करानेके लिये अनुनय-विनय की; परंतु उन्होंने अमिततेजस्वी नरेशके मनोरथको सफल नहीं किया ॥ २५-२६ ॥ स चाश्रमस्थान् राजर्षिस्तानुवाच रुषान्वितः । यद्यहं पतितो विप्राः शुश्रूषायां न च स्थितः ॥ २७ ॥ आशु त्याज्योऽस्मि युष्माभिर्ब्राह्मणैश्च जुगुप्सितः ।
तन्नार्हथ क्रतुश्रद्धां व्याघातयितुमद्य ताम् ॥ २८ ॥ तब उन राजर्षिने कुछ कुपित होकर आश्रमवासी महर्षियोंसे कहा—'ब्राह्मणो! यदि मैं पतित होऊँ और आपलोगोंकी शुश्रूषासे मुँह मोड़ता होऊँ तो निन्दित होनेके कारण आप सभी ब्राह्मणोंके द्वारा शीघ्र ही त्याग देनेयोग्य हूँ, अन्यथा नहीं; अतः यज्ञ करानेके लिये मेरी इस बढ़ी हुई श्रद्धामें आपलोगोंको बाधा नहीं डालनी चाहिये ॥ २७-२८ ॥ अस्थाने वा परित्यागं कर्तुं मे द्विजसत्तमाः । प्रपन्न एव वो विप्राः प्रसादं कर्तुमर्हथ ॥ २९ ॥ 'विप्रवरो! इस प्रकार बिना किसी अपराधके मेरा परित्याग करना आपलोगोंके लिये कदापि उचित नहीं है। मैं आपकी शरणमें हूँ। आपलोग कृपापूर्वक मुझपर प्रसन्न होइये ॥ २९ ॥ सान्त्वदानादिभिर्वाक्यैस्तत्त्वतः कार्यवत्तया । प्रसादयित्वा वक्ष्यामि यन्नः कार्यं द्विजोत्तमाः ॥ ३० ॥ 'श्रेष्ठ द्विजगण! मैं कार्यार्थी होनेके कारण सान्त्वना देकर दान आदि देनेकी बात कहकर यथार्थ वचनोंद्वारा आपलोगोंको प्रसन्न करके आपकी सेवामें अपना कार्य निवेदन कर रहा हूँ ॥ ३० ॥ अथवाहं परित्यक्तो भवद्भिर्द्वेषकारणात् । ऋत्विजोऽन्यान् गमिष्यामि याजनार्थं द्विजोत्तमाः ॥ ३१ ॥ 'द्विजोत्तमो! यदि आपलोगोंने द्वेषवश मुझे त्याग दिया तो मैं यह यज्ञ करानेके लिये दूसरे ऋत्विजोंके पास जाऊँगा' ॥ ३१ ॥ एतावदुक्त्वा वचनं विरराम स पार्थिवः । यदा न शेकू राजानं याजनार्थं परंतप ॥ ३२ ॥ ततस्ते याजकाः क्रुद्धास्तमूचुर्नृपसत्तमम् । तव कर्माण्यजस्रं वै वर्तन्ते पार्थिवोत्तम ॥ ३३ ॥ इतना कहकर राजा चुप हो गये। परंतप जनमेजय! जब वे ऋत्विज राजाका यज्ञ करानेके लिये उद्यत न हो सके, तब वे रुष्ट होकर उन नृपश्रेष्ठसे बोले—'भूपालशिरोमणे! आपके यज्ञकर्म तो निरन्तर चलते रहते हैं ॥ ३२-३३ ॥ ततो वयं परिश्रान्ताः सततं कर्मवाहिनः । श्रमादस्मात् परिश्रान्तान् स त्वं नस्त्यक्तुमर्हसि ॥ ३४ ॥ बुद्धिमोहं समास्थाय त्वरासम्भावितोऽनघ । गच्छ रुद्र सकाशं त्वं स हि त्वां याजयिष्यति ॥ ३५ ॥ 'अतः सदा कर्ममें लगे रहनेके कारण हमलोग थक गये हैं, पहलेके परिश्रमसे हमारा कष्ट बढ़ गया है। ऐसी दशामें बुद्धिमोहित होनेके कारण उतावले होकर आप चाहें तो
हमारा त्याग कर सकते हैं। निष्पाप नरेश! आप तो भगवान् रुद्रके ही समीप जाइये। अब वे ही आपका यज्ञ करायेंगे' ।। ३४-३५ ।।
साधिक्षेपं वचः श्रुत्वा संक्रुद्धः श्वेतकिर्नृपः ।
कैलासं पर्वतं गत्वा तप उग्रं समास्थितः ।। ३६ ।।
ब्राह्मणोंका यह आक्षेपयुक्त वचन सुनकर राजा श्वेतकिको बड़ा क्रोध हुआ। वे कैलास पर्वतपर जाकर उग्र तपस्यामें लग गये ।। ३६ ।।
आराधयन् महादेवं नियतः संशितव्रतः ।
उपवासपरो राजन् दीर्घकालमतिष्ठत ।। ३७ ।।
राजन्! तीक्ष्ण व्रतका पालन करनेवाले राजा श्वेतकि मन-इन्द्रियोंके संयमपूर्वक महादेवजीकी आराधना करते हुए बहुत दिनोंतक निराहार खड़े रहे ।। ३७ ।।
कदाचिद् द्वादशे काले कदाचिदपि षोडशे ।
आहारमकरोद् राजा मूलानि च फलानि च ।। ३८ ।।
वे कभी बारहवें दिन और कभी सोलहवें दिन फल-मूलका आहार कर लेते थे ।। ३८ ।।
ऊर्ध्वबाहुस्त्वनिमिषस्तिष्ठन् स्थाणुरिवाचलः ।
षण्मासानभवद् राजा श्वेतकिः सुसमाहितः ।। ३९ ।।
दोनों बाहें ऊपर उठाकर एकटक देखते हुए राजा श्वेतकि एकाग्रचित हो छः महीनोंतक ठूँठकी तरह अविचल भावसे खड़े रहे ।। ३९ ।।
तं तथा नृपशार्दूलं तप्यमानं महत् तपः ।
शंकरः परमप्रीत्या दर्शयामास भारत ।। ४० ।।
भारत! उन नृपश्रेष्ठको इस प्रकार भारी तपस्या करते देख भगवान् शंकरने अत्यन्त प्रसन्न होकर उन्हें दर्शन दिया ।। ४० ।।
उवाच चैनं भगवान् स्निग्धगम्भीरया गिरा ।
प्रीतोऽस्मि नरशार्दूल तपसा ते परंतप ।। ४१ ।।
और स्नेहपूर्वक गम्भीर वाणीमें भगवान्ने उनसे कहा—'परंतप! नरश्रेष्ठ! मैं तुम्हारी तपस्यासे बहुत प्रसन्न हूँ ।। ४१ ।।
वरं वृणीष्व भद्रं ते यं त्वमिच्छसि पार्थिव ।
एतच्छ्रुत्वा तु वचनं रुद्रस्यामिततेजसः ।। ४२ ।।
प्रणिपत्य महात्मानं राजर्षिः प्रत्यभाषत ।
'भूपाल! तुम्हारा कल्याण हो। तुम जैसा चाहते हो, वैसा वर माँग लो।' अमिततेजस्वी रुद्रका यह वचन सुनकर राजर्षि श्वेतकिने परमात्मा शिवके चरणोंमें प्रणाम किया और इस प्रकार कहा— ।। ४२ १/२ ।।
यदि मे भगवान् प्रीतः सर्वलोकनमस्कृतः ।। ४३ ।।
स्वयं मां देवदेवेश याजयस्व सुरेश्वर ।
एतच्छ्रुत्वा तु वचनं राज्ञा तेन प्रभाषितम् ॥ ४४ ॥
उवाच भगवान् प्रीतः स्मितपूर्वमिदं वचः ।
‘देवदेवेश! सुरेश्वर! यदि मेरे ऊपर आप सर्वलोक-वन्दित भगवान् प्रसन्न हुए हैं तो स्वयं चलकर मेरा यज्ञ करायें।' राजाकी कही हुई यह बात सुनकर भगवान् शिव प्रसन्न होकर मुसकराते हुए बोले— ॥ ४३-४४ १/२ ॥
नास्माकमेष विषयो वर्तते याजनं प्रति ॥ ४५ ॥
त्वया च सुमहत् तप्तं तपो राजन् वरार्थिना ।
याजयिष्यामि राजंस्त्वां समयेन परंतप ॥ ४६ ॥
‘राजन्! यज्ञ कराना हमारा काम नहीं है; परंतु तुमने यही वर माँगनेके लिये भारी तपस्या की है, अतः परंतप नरेश! मैं एक शर्तपर तुम्हारा यज्ञ कराऊँगा' ॥ ४५-४६ ॥
रुद्र उवाच
समा द्वादश राजेन्द्र ब्रह्मचारी समाहितः ।
सततं त्वाज्यधाराभिर्यदि तर्पयसेऽनलम् ॥ ४७ ॥
कामं प्रार्थयसे यं त्वं मत्तः प्राप्स्यसि तं नृप ।
**रुद्र बोले—**राजेन्द्र! यदि तुम एकाग्रचित्त हो ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए बारह वर्षोंतक घृतकी निरन्तर अविच्छिन्न धाराद्वारा अग्निदेवको तृप्त करो तो मुझसे जिस कामनाके लिये प्रार्थना कर रहे हो, उसे पाओगे ॥ ४७ १/२ ॥
एवमुक्तश्च रुद्रेण श्वेतकिर्मनुजाधिपः ॥ ४८ ॥
तथा चकार तत् सर्वं यथोक्तं शूलपाणिना ।
पूर्णे तु द्वादशे वर्षे पुनरायान्महेश्वरः ॥ ४९ ॥
भगवान् रुद्रके ऐसा कहनेपर राजा श्वेतकिने शूलपाणि शिवकी आज्ञाके अनुसार सारा कार्य सम्पन्न किया। बारहवाँ वर्ष पूर्ण होनेपर भगवान् महेश्वर पुनः आये ॥ ४८-४९ ॥
दृष्ट्वैव च स राजानं शंकरो लोकभावनः ।
उवाच परमप्रीतः श्वेतकिं नृपसत्तमम् ॥ ५० ॥
सम्पूर्ण लोकोंकी उत्पत्ति करनेवाले भगवान् शंकर नृपश्रेष्ठ श्वेतकिको देखते ही अत्यन्त प्रसन्न होकर बोले— ॥ ५० ॥
तोषितोऽहं नृपश्रेष्ठ त्वयेहाद्येन कर्मणा ।
याजनं ब्राह्मणानां तु विधिदृष्टं परंतप ॥ ५१ ॥
‘भूपालशिरोमणे! तुमने इस वेदविहित कर्मके द्वारा मुझे पूर्ण संतुष्ट किया है, परंतु परंतप! शास्त्रीय विधिके अनुसार यज्ञ करानेका अधिकार ब्राह्मणोंको ही है ॥ ५१ ॥
अतोऽहं त्वां स्वयं नाद्य याजयामि परंतप ।
ममांशस्तु क्षितितले महाभागो द्विजोत्तमः ॥ ५२ ॥ 'अतः परंतप! मैं स्वयं तुम्हारा यज्ञ नहीं कराऊँगा। पृथ्वीपर मेरे ही अंशभूत एक महाभाग श्रेष्ठ द्विज हैं ॥ ५२ ॥
दुर्वासा इति विख्यातः स हि त्वां याजयिष्यति । मन्नियोगान्महातेजाः सम्भाराः सम्भ्रियन्तु ते ॥ ५३ ॥ 'वे दुर्वासा नामसे विख्यात हैं। महातेजस्वी दुर्वासा मेरी आज्ञासे तुम्हारा यज्ञ करायेंगे; तुम सामग्री जुटाओ' ॥ ५३ ॥
एतच्छ्रुत्वा तु वचनं रुद्रेण समुदाहृतम् । स्वपुरं पुनरागम्य सम्भारान् पुनरार्जयत् ॥ ५४ ॥ भगवान् रुद्रका कहा हुआ यह वचन सुनकर राजा पुनः अपने नगरमें आये और यज्ञसामग्री जुटाने लगे ॥ ५४ ॥
ततः सम्भृतसम्भारो भूयो रुद्रमुपागमत् । सम्भृता मम सम्भाराः सर्वोपकरणानि च ॥ ५५ ॥ त्वत्प्रसादान्महादेव श्वो मे दीक्षा भवेदिति । एतच्छ्रुत्वा तु वचनं तस्य राज्ञो महात्मनः ॥ ५६ ॥ दुर्वाससं समाहूय रुद्रो वचनमब्रवीत् । एष राजा महाभागः श्वेतकिर्द्विजसत्तम ॥ ५७ ॥ एनं याजय विप्रेन्द्र मन्नियोगेन भूमिपम् । बाढमित्येव वचनं रुद्रं तृषिरुवाच ह ॥ ५८ ॥ तदनन्तर सामग्री जुटाकर वे पुनः भगवान् रुद्रके पास गये और बोले—'महादेव! आपकी कृपासे मेरी यज्ञसामग्री तथा अन्य सभी आवश्यक उपकरण जुट गये। अब कल मुझे यज्ञकी दीक्षा मिल जानी चाहिये।' महामना राजाका यह कथन सुनकर भगवान् रुद्रने दुर्वासाको बुलाया और कहा—'द्विजश्रेष्ठ! ये महाभाग राजा श्वेतकि हैं। विप्रेन्द्र! मेरी आज्ञासे तुम इन भूमिपालका यज्ञ कराओ।' यह सुनकर महर्षिने 'बहुत अच्छा' कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार कर ली ॥ ५५—५८ ॥
ततः सत्रं समभवत् तस्य राज्ञो महात्मनः । यथाविधि यथाकालं यथोक्तं बहुदक्षिणम् ॥ ५९ ॥ तदनन्तर यथासमय विधिपूर्वक उन महामना नरेशका यज्ञ आरम्भ हुआ। शास्त्रमें जैसा बताया गया है, उसी ढंगसे सब कार्य हुआ। उस यज्ञमें बहुत-सी दक्षिणा दी गयी ॥ ५९ ॥
तस्मिन् परिसमाप्ते तु राज्ञः सत्रे महात्मनः । दुर्वाससाभ्यनुज्ञाता विप्रतस्थुः स्म याजकाः ॥ ६० ॥ ये तत्र दीक्षिताः सर्वे सदस्याश्च महौजसः । सोऽपि राजन् महाभागः स्वपुरं प्राविशत् तदा ॥ ६१ ॥
पूज्यमानो महाभागैर्ब्राह्मणैर्वेदपारगैः । वन्दिभिः स्तूयमानश्च नागरैश्चाभिनन्दितः ॥ ६२ ॥ उन महामना नरेशका वह यज्ञ पूरा होनेपर उसमें जो महातेजस्वी सदस्य और ऋत्विज् दीक्षित हुए थे, वे सब दुर्वासाजीकी आज्ञा ले अपने-अपने स्थानको चले गये। राजन्! वे महान् सौभाग्यशाली नरेश भी वेदोंके पारंगत महाभाग ब्राह्मणोंद्वारा सम्मानित हो उस समय अपनी राजधानीमें गये। उस समय वन्दीजनोंने उनका यश गाया और पुरवासियोंने अभिनन्दन किया ॥ ६०—६२ ॥
एवंवृत्तः स राजर्षिः श्वेतकिर्नृपसत्तमः । कालेन महता चापि ययौ स्वर्गमभिष्टुतः ॥ ६३ ॥ ऋत्विग्भिः सहितः सर्वैः सदस्यैश्च समन्वितः । तस्य सत्रे पपौ वह्निर्द्विर्दश वत्सरान् ॥ ६४ ॥ नृपश्रेष्ठ राजर्षि श्वेतकिका आचार-व्यवहार ऐसा ही था। वे दीर्घकालके पश्चात् अपने यज्ञके सम्पूर्ण सदस्यों तथा ऋत्विजोंसहित देवताओंसे प्रशंसित हो स्वर्गलोकमें गये। उनके यज्ञमें अग्निने लगातार बारह वर्षोंतक घृतपान किया था ॥ ६३-६४ ॥
सततं चाज्यधाराभिरैकात्म्ये तत्र कर्मणि । हविषा च ततो वह्निः परां तृप्तिमगच्छत ॥ ६५ ॥ उस अद्वितीय यज्ञमें निरन्तर घीकी अविच्छिन्न धाराओंसे अग्निदेवको बड़ी तृप्ति प्राप्त हुई ॥ ६५ ॥
न चैच्छत् पुनरादातुं हविरन्यस्य कस्यचित् । पाण्डुवर्णो विवर्णश्च न यथावत् प्रकाशते ॥ ६६ ॥ अब उन्हें फिर दूसरे किसीका हविष्य ग्रहण करनेकी इच्छा नहीं रही। उनका रंग सफेद हो गया, कान्ति फीकी पड़ गयी तथा वे पहलेकी भाँति प्रकाशित नहीं होते थे ॥ ६६ ॥
ततो भगवतो वह्नेर्विकारः समजायत । तेजसा विप्रहीणश्च ग्लानिश्चैनं समाविशत् ॥ ६७ ॥ तब भगवान् अग्निदेवके उदरमें विकार हो गया। वे तेजसे हीन हो ग्लानिको प्राप्त होने लगे ॥ ६७ ॥
स लक्षयित्वा चात्मानं तेजोहीनं हुताशनः । जगाम सदनं पुण्यं ब्रह्मणो लोकपूजितम् ॥ ६८ ॥ अपनेको तेजसे हीन देख अग्निदेव ब्रह्माजीके लोकपूजित पुण्यधाममें गये ॥ ६८ ॥
तत्र ब्रह्माणमासीनमिदं वचनमब्रवीत् । भगवन् परमा प्रीतिः कृत्वा मे श्वेतकेतुना ॥ ६९ ॥ वहाँ बैठे हुए ब्रह्माजीसे वे यह वचन बोले—'भगवन्! राजा श्वेतकिने अपने यज्ञमें मुझे परम संतुष्ट कर दिया ॥ ६९ ॥
अरुचिश्चाभवत् तीव्रा तां न शक्नोम्यपोहितुम् । तेजसा विप्रहीणोऽस्मि बलेन च जगत्पते ॥ ७० ॥ इच्छेयं त्वत्प्रसादेन स्वात्मनः प्रकृतिं स्थिराम् । ‘परंतु मुझे अत्यन्त अरुचि हो गयी है, जिसे मैं किसी प्रकार दूर नहीं कर पाता। जगत्पते! उस अरुचिके कारण मैं तेज और बलसे हीन होता जा रहा हूँ। अतः मैं चाहता हूँ कि आपकी कृपासे मैं स्वस्थ हो जाऊँ; मेरी स्वाभाविक स्थिति सुदृढ़ बनी रहे’ ॥ ७० १/२ ॥ एतच्छ्रुत्वा हुतवहाद् भगवान् सर्वलोककृत् ॥ ७१ ॥ हव्यवाहमिदं वाक्यमुवाच प्रहसन्निव । त्वया द्वादश वर्षाणि वसोर्धाराहुतं हविः ॥ ७२ ॥ उपयुक्तं महाभाग तेन त्वां ग्लानिराविशत् । तेजसा विप्रहीणत्वात् सहसा हव्यवाहन ॥ ७३ ॥ मा गमस्त्वं यथा वह्ने प्रकृतिस्थो भविष्यसि । अरुचिं नाशयिष्येऽहं समयं प्रतिपद्य ते ॥ ७४ ॥ अग्निदेवकी यह बात सुनकर सम्पूर्ण जगत्के स्रष्टा भगवान् ब्रह्माजी हव्यवाहन अग्निसे हँसते हुए-से इस प्रकार बोले—‘महाभाग! तुमने बारह वर्षोंतक वसुधाराकी आहुतिके रूपमें प्राप्त हुई घृतधाराका उपभोग किया है। इसीलिये तुम्हें ग्लानि प्राप्त हुई है। हव्यवाहन! तेजसे हीन होनेके कारण तुम्हें सहसा अपने मनमें ग्लानि नहीं आने देनी चाहिये। वह्ने! तुम फिर पूर्ववत् स्वस्थ हो जाओगे। मैं समय पाकर तुम्हारी अरुचि नष्ट कर दूँगा ॥ ७१—७४ ॥ पुरा देवनियोगेन यत् त्वया भस्मसात् कृतम् । आलयं देवशत्रूणां सुघोरं खाण्डवं वनम् ॥ ७५ ॥ तत्र सर्वाणि सत्त्वानि निवसन्ति विभावसो । तेषां त्वं मेदसा तृप्तः प्रकृतिस्थो भविष्यसि ॥ ७६ ॥ ‘पूर्वकालमें देवताओंके आदेशसे तुमने दैत्योंके जिस अत्यन्त घोर निवासस्थान खाण्डववनको जलाया था, वहाँ इस समय सब प्रकारके जीव-जन्तु आकर निवास करते हैं। विभावसो! उन्हींके मेदसे तृप्त होकर तुम स्वस्थ हो सकोगे ॥ ७५-७६ ॥ गच्छ शीघ्रं प्रदग्धुं त्वं ततो मोक्ष्यसि किल्बिषात् । एतच्छ्रुत्वा तु वचनं परमेष्ठिमुखाच्च्युतम् ॥ ७७ ॥ उत्तमं जवमास्थाय प्रदुद्राव हुताशनः । आगम्य खाण्डवं दावमुत्तमं वीर्यमास्थितः । सहसा प्राज्वलच्चाग्निः क्रुद्धो वायुसमीरितः ॥ ७८ ॥ ‘उस वनको जलानेके लिये तुम शीघ्र ही जाओ। तभी इस ग्लानिसे छुटकारा पा सकोगे।’ परमेष्ठी ब्रह्माजीके मुखसे निकली हुई यह बात सुनकर अग्निदेव बड़े वेगसे वहाँ
दौड़े गये। खाण्डववनमें पहुँचकर उत्तम बलका आश्रय ले वायुका सहारा पाकर कुपित अग्निदेव सहसा प्रज्वलित हो उठे ।। ७७-७८ ।। प्रदीप्तं खाण्डवं दृष्ट्वा ये स्युस्तत्र निवासिनः । परमं यत्नमातिष्ठन् पावकस्य प्रशान्तये ।। ७९ ।। खाण्डववनको जलते देख वहाँ रहनेवाले प्राणियोंने उस आगको बुझानेके लिये बड़ा यत्न किया ।। ७९ ।। करैस्तु करिणः शीघ्रं जलमादाय सत्वराः । सिषिचुः पावकं क्रुद्धाः शतशोऽथ सहस्रशः ।। ८० ।। सैकड़ों और हजारोंकी संख्यामें हाथी अपनी सूँडोंमें जल लेकर शीघ्रतापूर्वक दौड़े आते और क्रोधपूर्वक उतावलीके साथ आगपर उस जलको उड़ेल दिया करते थे ।। ८० ।। बहुशीर्षास्ततो नागाः शिरोभिर्जलसंततिम् । मुमुचुः पावकाभ्याशे सत्वराः क्रोधमूर्च्छिताः ।। ८१ ।। अनेक सिरवाले नाग भी क्रोधसे मूर्च्छित हो अपने मस्तकोंद्वारा अग्निके समीप शीघ्रतापूर्वक जलकी धारा बरसाने लगे ।। ८१ ।। तथैवान्यानि सत्त्वानि नानाप्रहरणोद्यमैः । विलयं पावकं शीघ्रम नयन् भरतर्षभ ।। ८२ ।। भरतश्रेष्ठ! इसी प्रकार दूसरे-दूसरे जीवोंने भी अनेक प्रकारके प्रहारों (धूल झोंकने आदि) तथा उद्यमों (जल छिड़कने आदि)-के द्वारा शीघ्रतापूर्वक उस आगको बुझा दिया ।। ८२ ।। अनेन तु प्रकारेण भूयो भूयश्च प्रज्वलन् । सप्तकृत्वः प्रशमितः खाण्डवे हव्यवाहनः ।। ८३ ।। इस तरह खाण्डववनमें अग्निने बार-बार प्रज्वलित होकर सात बार उसे जलानेका प्रयास किया; परंतु प्रतिबार वहाँके निवासियोंने उन्हें बुझा दिया ।। ८३ ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि खाण्डवदाहपर्वणि अग्निपराभवे द्वाविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ।। २२२ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत खाण्डवदाहपर्वमें अग्निपराभवविषयक दो सौ बाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २२२ ।।