महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1572, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंराजन्! महात्मा इन्द्रको वहाँसे प्रस्थान करते देख समस्त स्वर्गवासी देवता सेनासहित उनके पीछे-पीछे चले गये ॥ २३ १/२ ॥
देवराजं तदा यान्तं सह देवैरवेक्ष्य तु ।। २४ ।।
वासुदेवार्जुनौ वीरौ सिंहनादं विनेदतुः ।
उस समय देवताओंसहित देवराज इन्द्रको जाते देख वीरवर श्रीकृष्ण और अर्जुनने सिंहनाद किया ॥ २४ १/२ ॥
देवराजे गते राजन् प्रहृष्टौ केशवार्जुनौ ।। २५ ।।
निर्विशङ्कं वनं वीरौ दाहयामासतुस्तदा ।
राजन्! देवराजके चले जानेपर वीरवर केशव तथा अर्जुन अत्यन्त प्रसन्न हो उस समय बेखटके खाण्डववनका दाह कराने लगे ॥ २५ १/२ ॥
स मारुत इवाभ्राणि नाशयित्वार्जुनः सुरान् ।। २६ ।।
व्यधमच्छरसङ्घातैर्देहिनः खाण्डवालयान् ।
जैसे प्रबल वायु बादलोंको छिन्न-भिन्न कर देती है, उसी प्रकार अर्जुनने देवताओंको भगाकर अपने बाणोंके समुदायसे खाण्डववासी प्राणियोंको मारना आरम्भ किया ॥ २६ १/२ ॥
न च स्म किंचिच्छक्नोति भूतं निश्चरितुं ततः ।। २७ ।।
संछिद्यमानमिषुभिरस्यता सव्यसाचिना ।
सव्यसाची अर्जुनके बाण चलाते समय उनके बाणोंसे कट जानेके कारण कोई भी जीव वहाँसे बाहर न निकल सका ॥ २७ १/२ ॥
नाशक्नुवंश्च भूतानि महान्त्यपि रणेऽर्जुनम् ।। २८ ।।
निरीक्षितुममोघास्त्रं योद्धुं चापि कुतो रणे ।
शतं चैकेन विव्याध शतेनैकं पतत्रिणाम् ।। २९ ।।
अमोघ अस्त्रधारी अर्जुनको उस समय बड़े-से-बड़े प्राणी देख भी न सके, फिर रणभूमिमें युद्ध तो कर ही कैसे सकते थे। वे कभी एक ही बाणसे सैकड़ोंको बींध डालते थे और कभी एकहीको सौ बाणोंसे घायल कर देते थे ॥ २८-२९ ॥
व्यसवस्तेऽपतन्नग्नौ साक्षात् कालहता इव ।
न चालभन्त ते शर्म रोधस्सु विषमेषु च ।। ३० ।।
वे सभी प्राणी प्राणशून्य होकर साक्षात् कालसे मारे हुएकी भाँति आगमें गिर पड़ते थे। वे वनके किनारे हों या दुर्गम स्थानोंमें हों, कहीं भी उन्हें शान्ति नहीं मिलती थी ॥ ३० ॥
पितृदेवनिवासेषु संतापश्चाप्यजायत ।
भूतसङ्घाश्च बहवो दीनाश्चक्रुर्महास्वनम् ।। ३१ ।।