भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1822

रही थीं। स दृष्ट्वा रामसेतुं च चिन्तयन् रामविक्रमम् । प्रणम्य तमतिक्रम्य याम्यां वेलामलोकयत् ॥ भगवान् श्रीरामके द्वारा बनवाये हुए पुलको देखकर घटोत्कचको भगवान्‌के पराक्रमका चिन्तन हो आया और उस सेतुतीर्थको प्रणाम करके उसने समुद्रके दक्षिणतटकी ओर दृष्टिपात किया। गत्वा पारं समुद्रस्य दक्षिणं स घटोत्कचः । ददर्श लङ्कां राजेन्द्र नाकपृष्ठोपमां शुभाम् ॥ राजेन्द्र! तत्पश्चात् दक्षिणतटपर पहुँचकर घटोत्कचने लंकापुरी देखी, जो स्वर्गके समान सुन्दर थी। प्राकारेणावृतां रम्यां शुभद्वारैश्च शोभिताम् । प्रासादैर्बहुसाहस्रैः श्वेतरक्तैश्च संकुलाम् ॥ उसके चारों ओर चहारदीवारी बनी थी। सुन्दर फाटक उस रमणीयपुरीकी शोभा बढ़ाते थे। सफेद और लाल रंगके हजारों महलोंसे वह लंकापुरी भरी हुई थी। तापनीयगवाक्षेण मुक्ताजालान्तरेण च । हैमराजतजालेन दान्तजालैश्च शोभिताम् ॥ वहाँके गवाक्ष (जँगले) सोनेके बने हुए थे और उनके भीतर मोतियोंकी जाली लगी हुई थी। कितने ही गवाक्ष सोने, चाँदी तथा हाथीदाँतकी जालियोंसे सुशोभित थे। हर्म्यगोपुरसम्बाधां रुक्मतोरणसंकुलाम् । दिव्यदुन्दुभिनिह्र्रादामुद्यानवनशोभिताम् ॥ कितनी ही अट्टालिकाएँ तथा गोपुर उस नगरीकी शोभा बढ़ाते थे। स्थान-स्थानपर सोनेके फाटक लगे हुए थे। वहाँ दिव्य दुन्दुभियोंकी गम्भीर ध्वनि गूँजती रहती थी। बहुत-से उद्यान और वन उस नगरीकी श्रीवृद्धि कर रहे थे। पुष्पगन्धैश्च संकीर्णां रमणीयमहापथाम् । नानारत्नैश्च सम्पूर्णाामिन्द्रस्येवामरावतीम् ॥ उसमें चारों ओर फूलोंकी सुगन्ध छा रही थी। वहाँकी लंबी-चौड़ी सड़कें बहुत सुन्दर थीं। भाँति-भाँतिके रत्नोंसे भरी-पुरी लंका इन्द्रकी अमरावतीपुरीको भी लज्जित कर रही थी। विवेश स पुरीं लङ्कां राक्षसैश्च निषेविताम् । ददर्श राक्षसत्राताञ्छूलप्राशधरान् बहून् ॥ घटोत्कचने राक्षसोंसे सेवित उस लंकापुरीमें प्रवेश किया और देखा, झुंड-के-झुंड राक्षस त्रिशूल और भाले लिये विचर रहे हैं। नानावेषधरान् दक्षान् नारीश्च प्रियदर्शनाः ।