महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकचत्वारिंशोऽध्यायः
शृंगी ऋषिका राजा परीक्षित्को शाप देना और शमीकका अपने पुत्रको शान्त करते हुए शापको अनुचित बताना
सौतिरुवाच
एवमुक्तः स तेजस्वी शृङ्गी कोपसमन्वितः ।
मृतधारं गुरुं श्रुत्वा पर्यतप्यत मन्युना ॥ १ ॥
**उग्रश्रवाजी कहते हैं—**शौनकजी! कृशके ऐसा कहनेपर तेजस्वी शृंगी ऋषिको बड़ा क्रोध हुआ। अपने पिताके कंधेपर मृतक (सर्प) रखे जानेकी बात सुनकर वह रोष और शोकसे संतप्त हो उठा ॥ १ ॥
स तं कृशमभिप्रेक्ष्य सूनृतां वाचमुत्सृजन् ।
अपृच्छत् तं कथं तातः स मेऽद्य मृतधारकः ॥ २ ॥
उसने कृशकी ओर देखकर मधुर वाणीमें पूछा—'भैया! बताओ तो, आज मेरे पिता अपने कंधेपर मृतक कैसे धारण कर रहे हैं?' ॥ २ ॥
कृश उवाच
राज्ञा परिक्षिता तात मृगयां परिधावता ।
अवसक्तः पितुस्तेऽद्य मृतः स्कन्धे भुजङ्गमः ॥ ३ ॥
**कृशने कहा—**तात! आज राजा परीक्षित् अपने शिकारके पीछे दौड़ते हुए आये थे। उन्होंने तुम्हारे पिताके कंधेपर मृतक साँप रख दिया है ॥ ३ ॥
शृंग्युवाच
किं मे पित्रा कृतं तस्य राज्ञोऽनिष्टं दुरात्मनः ।
ब्रूहि तत् कृश तत्त्वेन पश्य मे तपसो बलम् ॥ ४ ॥
**शृंगी बोला—**कृश! ठीक-ठीक बताओ, मेरे पिताने उस दुरात्मा राजाका क्या अपराध किया था? फिर मेरी तपस्याका बल देखना ॥ ४ ॥
कृश उवाच
स राजा मृगयां यातः परिक्षिदभिमन्युजः ।
ससार मृगमेकाकी विद्ध्वा बाणेन शीघ्रगम् ॥ ५ ॥
न चापश्यन्मृगं राजा चरंस्तस्मिन् महावने ।
पितरं ते स दृष्ट्वैव पप्रच्छानभिभाषिणम् ॥ ६ ॥