भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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षष्टितमोऽध्यायः

जनमेजयके यज्ञमें व्यासजीका आगमन, सत्कार तथा राजाकी प्रार्थनासे व्यासजीका वैशम्पायनजीसे महाभारत-कथा सुनानेके लिये कहना

सौतिरुवाच

श्रुत्वा तु सर्पसत्राय दीक्षितं जनमेजयम् ।
अभ्यगच्छदृषिर्विद्वान् कृष्णद्वैपायनस्तदा ॥ १ ॥
उग्रश्रवाजी कहते हैं—शौनक! जब विद्वान् महर्षि श्रीकृष्णद्वैपायनने यह सुना कि राजा जनमेजय सर्पयज्ञकी दीक्षा ले चुके हैं, तब वे वहाँ आये ॥ १ ॥

जनयामास यं काली शक्तेः पुत्रात् पराशरात् ।
कन्यैव यमुनाद्वीपे पाण्डवानां पितामहम् ॥ २ ॥
वेदव्यासजीको सत्यवतीने कन्यावस्थामें ही शक्तिनन्दन पराशरजीसे यमुनाजीके द्वीपमें उत्पन्न किया था। वे पाण्डवोंके पितामह हैं ॥ २ ॥

जातमात्रश्च यः सद्य इष्ट्या देहमवीवृधत् ।
वेदांश्चाधिजगे साङ्गान् सेतिहासान् महायशाः ॥ ३ ॥
यन्नैति तपसा कश्चिन्न वेदाध्ययनेन च ।
न व्रतैर्नोपवासैश्च न प्रशान्त्या न मन्युना ॥ ४ ॥
जन्म लेते ही उन्होंने अपनी इच्छासे शरीरको बढ़ा लिया तथा उन महायशस्वी व्यासजीको (स्वतः ही) अंगों और इतिहासोंसहित सम्पूर्ण वेदों और उस परमात्मतत्त्वका ज्ञान प्राप्त हो गया, जिसे कोई तपस्या, वेदाध्ययन, व्रत, उपवास, शम और यज्ञ आदिके द्वारा भी नहीं प्राप्त कर सकता ॥ ३-४ ॥

विव्यासैकं चतुर्धा यो वेदं वेदविदां वरः ।
परावरज्ञो ब्रह्मर्षिः कविः सत्यव्रत शुचिः ॥ ५ ॥
वे वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ थे और उन्होंने एक ही वेदको चार भागोंमें विभक्त किया था। ब्रह्मर्षि व्यासजी परब्रह्म और अपरब्रह्मके ज्ञाता, कवि (त्रिकालदर्शी), सत्यव्रतपरायण तथा परम पवित्र हैं ॥ ५ ॥

यः पाण्डुं धृतराष्ट्रं च विदुरं चाप्यजीजनत् ।
शान्तनोः संततिं तन्वन् पुण्यकीर्तिर्महायशाः ॥ ६ ॥
उनकी कीर्ति पुण्यमयी है और वे महान् यशस्वी हैं। उन्होंने ही शान्तनुकी संतान-परम्पराका विस्तार करनेके लिये पाण्डु, धृतराष्ट्र तथा विदुरको जन्म दिया था ॥ ६ ॥