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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,256 pages
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विचरनेवाले महर्षि पराशरने उसे देखा। वह अतिशय रूप-सौन्दर्यसे सुशोभित थी। सिद्धोंके हृदयमें भी उसे पानेकी अभिलाषा जाग उठती थी ।। ६८—७० ।। दृष्ट्वैव स च तां धीमांश्चकमे चारुहासिनीम् । दिव्यां तां वासवीं कन्यां रम्भोरुं मुनिपुङ्गवः ॥ ७१ ॥ उसकी हँसी बड़ी मोहक थी, उसकी जाँघें कदलीकी-सी शोभा धारण करती थीं। उस दिव्य वसुकुमारीको देखकर परम बुद्धिमान् मुनिवर पराशरने उसके साथ समागमकी इच्छा प्रकट की ॥ ७१ ॥ संगमं मम कल्याणि कुरुष्वेत्यभ्यभाषत । साब्रवीत् पश्य भगवन् पारावारे स्थितानृषीन् ॥ ७२ ॥ और कहा—‘कल्याणी! मेरे साथ संगम करो।’ वह बोली—‘भगवन्! देखिये, नदीके आर-पार दोनों तटोंपर बहुत-से ऋषि खड़े हैं ॥ ७२ ॥ आवयोर्दृष्टयोरेभिः कथं नु स्यात् समागमः । एवं तयोक्तो भगवान् नीहारमसृजत् प्रभुः ॥ ७३ ॥ ‘और हम दोनोंको देख रहे हैं। ऐसी दशामें हमारा समागम कैसे हो सकता है?’ उसके ऐसा कहनेपर शक्तिशाली भगवान् पराशरने कुहरेकी सृष्टि की ॥ ७३ ॥ येन देशः स सर्वस्तु तमोभूत इवाभवत् । दृष्ट्वा सृष्टं तु नीहारं ततस्तं परमर्षिणा ॥ ७४ ॥ विस्मिता साभवत् कन्या व्रीडिता च तपस्विनी । जिससे वहाँका सारा प्रदेश अन्धकारसे आच्छादित-सा हो गया। महर्षिद्वारा कुहरेकी सृष्टि देखकर वह तपस्विनी कन्या आश्चर्यचकित एवं लज्जित हो गयी ॥ ७४ १/२ ॥

सत्यवत्युवाच

विद्धि मां भगवन् कन्यां सदा पितृवशानुगाम् ॥ ७५ ॥ सत्यवतीने कहा—भगवन्! आपको मालूम होना चाहिये कि मैं सदा अपने पिताके अधीन रहनेवाली कुमारी कन्या हूँ ॥ ७५ ॥ त्वत्संयोगाच्च दुष्येत कन्याभावो ममानघ । कन्यात्वे दूषिते वापि कथं शक्ये द्विजोत्तम ॥ ७६ ॥ गृहं गन्तुमृषे चाहं धीमन् न स्थातुमुत्सहे । एतत् संचिन्त्य भगवन् विधत्स्व यदनन्तरम् ॥ ७७ ॥ निष्पाप महर्षे! आपके संयोगसे मेरा कन्याभाव (कुमारीपन) दूषित हो जायगा। द्विजश्रेष्ठ! कन्याभाव दूषित हो जानेपर मैं कैसे अपने घर जा सकती हूँ। बुद्धिमान् मुनीश्वर! अपने कन्यापनके कलंकित हो जानेपर मैं जीवित रहना नहीं चाहती। भगवन्! इस बातपर भलीभाँति विचार करके जो उचित जान पड़े, वह कीजिये ॥ ७६-७७ ॥

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एवमुक्तवतीं तां तु प्रीतिमानृषिसत्तमः । उवाच मत्प्रियं कृत्वा कन्यैव त्वं भविष्यसि ॥ ७८ ॥ वृणीष्व च वरं भीरु यं त्वमिच्छसि भामिनि । वृथा हि न प्रसादो मे भूतपूर्वः शुचिस्मिते ॥ ७९ ॥ सत्यवतीके ऐसा कहनेपर मुनिश्रेष्ठ पराशर प्रसन्न होकर बोले—'भीरु! मेरा प्रिय कार्य करके भी तुम कन्या ही रहोगी। भामिनि! तुम जो चाहो, वह मुझसे वर माँग लो। शुचिस्मिते! आजसे पहले कभी भी मेरा अनुग्रह व्यर्थ नहीं गया है' ॥ ७८-७९ ॥

एवमुक्ता वरं वव्रे गात्रसौगन्ध्यमुत्तमम् । स चास्यै भगवान् प्रादान्मनसःकाङ्क्षितं भुवि ॥ ८० ॥ महर्षिके ऐसा कहनेपर सत्यवतीने अपने शरीरमें उत्तम सुमन होनेका वरदान माँगा। भगवान् पराशरने इस भूतलपर उसे वह मनोवांछित वर दे दिया ॥ ८० ॥

ततो लब्धवरा प्रीता स्त्रीभावगुणभूषिता । जगाम सह संसर्गमृषिणाद्भुतकर्मणा ॥ ८१ ॥ तेन गन्धवतीत्येवं नामास्याः प्रथितं भुवि । तस्यास्तु योजनाद् गन्धमाजिघ्रन्त नरा भुवि ॥ ८२ ॥ तस्या योजनगन्धेति ततो नामापरं स्मृतम् । तदनन्तर वरदान पाकर प्रसन्न हुई सत्यवती नारीपनके समागमोचित गुण (सद्यः ऋतुस्नान आदि)-से विभूषित हो गयी और उसने अद्भुतकर्मा महर्षि पराशरके साथ समागम किया। उसके शरीरसे उत्तम गन्ध फैलनेके कारण पृथ्वीपर उसका गन्धवती नाम विख्यात हो गया। इस पृथ्वीपर एक योजन दूरके मनुष्य भी उसकी दिव्य सुगन्धका अनुभव करते थे। इस कारण उसका दूसरा नाम योजनगन्धा हो गया ॥ ८१-८२ १/२ ॥

इति सत्यवती हृष्टा लब्ध्वा वरमनुत्तमम् ॥ ८३ ॥ पराशरेण संयुक्ता सद्यो गर्भं सुषाव सा । जज्ञे च यमुनाद्वीपे पाराशर्यः स वीर्यवान् ॥ ८४ ॥ इस प्रकार परम उत्तम वर पाकर हर्षोल्लाससे भरी हुई सत्यवतीने महर्षि पराशरका संयोग प्राप्त किया और तत्काल ही एक शिशुको जन्म दिया। यमुनाके द्वीपमें अत्यन्त शक्तिशाली पराशरनन्दन व्यास प्रकट हुए ॥ ८३-८४ ॥

स मातरमनुज्ञाप्य तपस्येव मनो दधे । स्मृतोऽहं दर्शयिष्यामि कृत्येष्विति च सोऽब्रवीत् ॥ ८५ ॥ उन्होंने मातासे यह कहा—'आवश्यकता पड़नेपर तुम मेरा स्मरण करना। मैं अवश्य दर्शन दूँगा।' इतना कहकर माताकी आज्ञा ले व्यासजीने तपस्यामें ही मन लगाया ॥ ८५ ॥

एवं द्वैपायनो जज्ञे सत्यवत्यां पराशरात् । न्यस्तो द्वीपे स यद् बालस्तस्माद् द्वैपायनः स्मृतः ॥ ८६ ॥

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इस प्रकार महर्षि पराशरद्वारा सत्यवतीके गर्भसे द्वैपायन व्यासजीका जन्म हुआ। वे बाल्यावस्थामें ही यमुनाके द्वीपमें छोड़ दिये गये, इसलिये 'द्वैपायन' नामसे प्रसिद्ध हुए॥ ८६॥ (ततः सत्यवती हृष्टा जगाम स्वं निवेशनम्। तस्यास्त्वायोजनाद् गन्धमाजिघ्रन्ति नरा भुवि॥ दाशराजस्तु तद्गन्धमाजिघ्रन् प्रीतिमावहत्।) तदनन्तर सत्यवती प्रसन्नतापूर्वक अपने घरपर गयी। उस दिनसे भूमण्डलके मनुष्य एक योजन दूरसे ही उसकी दिव्य गन्धका अनुभव करने लगे। उसका पिता दाशराज भी उसकी गन्ध सूँघकर बहुत प्रसन्न हुआ।

दाश उवाच (त्वामाहुर्मत्स्यगन्धेति कथं बाले सुगन्धता। अपास्य मत्स्यगन्धत्वं केन दत्ता सुगन्धता॥) **दाशराजने पूछा—**बेटी! तेरे शरीरसे मछलीकी-सी दुर्गन्ध आनेके कारण लोग तुझे 'मत्स्यगन्धा' कहा करते थे, फिर तुझमें यह सुगन्ध कहाँसे आ गयी? किसने यह मछलीकी दुर्गन्ध दूर कर तेरे शरीरको सुगन्ध प्रदान की है?

सत्यवत्युवाच (शक्तेः पुत्रो महाप्राज्ञः पराशर इति स्मृतः॥ नावं वाह्यमानाया मम दृष्ट्वा सुगर्हितम्। अपास्य मत्स्यगन्धत्वं योजनाद् गन्धतां ददौ॥ ऋषेः प्रसादं दृष्ट्वा तु जनाः प्रीतिमुपागमन्।) **सत्यवती बोली—**पिताजी! महर्षि शक्तिके पुत्र महाज्ञानी पराशर हैं, (वे यमुनाजीके तटपर आये थे; उस समय) मैं नाव खे रही थी। उन्होंने मेरी दुर्गन्धताकी ओर लक्ष्य करके मुझपर कृपा की और मेरे शरीरसे मछलीकी गन्ध दूर करके ऐसी सुगन्ध दे दी, जो एक योजन दूरतक अपना प्रभाव रखती है। महर्षिका यह कृपाप्रसाद देखकर सब लोग बड़े प्रसन्न हुए।

पादापसारिणं धर्मं स तु विद्वान् युगे युगे। आयुः शक्तिं च मर्त्यानां युगावस्थामवेक्ष्य च॥ ८७॥ ब्रह्मणो ब्राह्मणानां च तथानुग्रहकाङ्क्षया। विव्यास वेदान् यस्मात् स तस्माद् व्यास इति स्मृतः॥ ८८॥ विद्वान् द्वैपायनजीने देखा कि प्रत्येक युगमें धर्मका एक-एक पाद लुप्त होता जा रहा है। मनुष्योंकी आयु और शक्ति क्षीण हो चली है और युगकी ऐसी दुरवस्था हो गयी है। यह

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सब देख-सुनकर उन्होंने वेद और ब्राह्मणोंपर अनुग्रह करनेकी इच्छासे वेदोंका व्यास (विस्तार) किया। इसलिये वे व्यास नामसे विख्यात हुए ॥ ८७-८८ ॥ वेदानध्यापयामास महाभारतपञ्चमान् । सुमन्तुं जैमिनिं पैलं शुकं चैव स्वमात्मजम् ॥ ८९ ॥ प्रभुर्वरिष्ठो वरदो वैशम्पायनमेव च । संहितास्तैः पृथक्त्वेन भारतस्य प्रकाशिताः ॥ ९० ॥ सर्वश्रेष्ठ वरदायक भगवान् व्यासने चारों वेदों तथा पाँचवें वेद महाभारतका अध्ययन सुमन्तु, जैमिनि, पैल, अपने पुत्र शुकदेव तथा मुझ वैशम्पायनको कराया। फिर उन सबने पृथक्-पृथक् महाभारतकी संहिताएँ प्रकाशित कीं ॥ ८९-९० ॥ तथा भीष्मः शान्तनवो गङ्गायाममितद्युतिः । वसुवीर्यात् सम्भवन्महावीर्यो महायशाः ॥ ९१ ॥ अमिततेजस्वी शान्तनुनन्दन भीष्म आठवें वसुके अंशसे तथा गंगाजीके गर्भसे उत्पन्न हुए। वे महान् पराक्रमी और अत्यन्त यशस्वी थे ॥ ९१ ॥ वेदार्थविच्च भगवानृषिर्विप्रो महायशाः । शूले प्रोतः पुराणर्षिश्चौरश्चौरैरशङ्कया ॥ ९२ ॥ अणीमाण्डव्य इत्येवं विख्यातः स महायशाः । स धर्ममाहूय पुरा महर्षिरिदमुक्तवान् ॥ ९३ ॥ पूर्वकालकी बात है वेदार्थोंके ज्ञाता, महान् यशस्वी, पुरातन मुनि, ब्रह्मर्षि भगवान् अणीमाण्डव्य चोर न होते हुए भी चोरके संदेहसे शूलीपर चढ़ा दिये गये। परलोकमें जानेपर उन महायशस्वी महर्षिने पहले धर्मको बुलाकर इस प्रकार कहा— ॥ ९२-९३ ॥ इषीकया मया बाल्याद् विद्धा ह्येका शकुन्तिका । तत् किल्बिषं स्मरे धर्म नान्यत् पापमहं स्मरे ॥ ९४ ॥ ‘धर्मराज! पहले कभी मैंने बाल्यावस्थाके कारण सींकसे एक चिड़ियेके बच्चेको छेद दिया था। वही एक पाप मुझे याद आ रहा है। अपने दूसरे किसी पापका मुझे स्मरण नहीं है ॥ ९४ ॥ तन्मे सहस्रममितं कस्मान्नेहाजयत् तपः । गरीयान् ब्राह्मणवधः सर्वभूतवधाद् यतः ॥ ९५ ॥ ‘मैंने अगणित सहस्रगुना तप किया है। फिर उस तपने मेरे छोटे-से पापको क्यों नहीं नष्ट कर दिया। ब्राह्मणका वध समस्त प्राणियोंके वधसे बड़ा है ॥ ९५ ॥ तस्मात् त्वं किल्बिषी धर्म शूद्रयोनौ जनिष्यसि । तेन शापेन धर्मोऽपि शूद्रयोनावजायत ॥ ९६ ॥ ‘(तुमने मुझे शूलीपर चढ़वाकर वही पाप किया है) इसलिये तुम पापी हो। अतः पृथ्वीपर शूद्रकी योनिमें तुम्हें जन्म लेना पड़ेगा।' अणीमाण्डव्यके उस शापसे धर्म भी

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शूद्रकी योनिमें उत्पन्न हुए ॥ ९६ ॥ विद्वान् विदुररूपेण धर्मी तनुरकिल्बिषी । संजयो मुनिकल्पस्तु जज्ञे सूतो गवलगणात् ॥ ९७ ॥ पापरहित विद्वान् विदुरके रूपमें धर्मराजका शरीर ही प्रकट हुआ था। उसी समय गवलगणसे संजय नामक सूतका जन्म हुआ, जो मुनियोंके समान ज्ञानी और धर्मात्मा थे ॥ ९७ ॥

सूर्याच्च कुन्तिकन्याया जज्ञे कर्णो महाबलः । सहजं कवचं बिभ्रत् कुण्डलो द्योतिताननः ॥ ९८ ॥ राजा कुन्तिभोजकी कन्या कुन्तीके गर्भसे सूर्यके अंशसे महाबली कर्णकी उत्पत्ति हुई। वह बालक जन्मके साथ ही कवचधारी था। उसका मुख शरीरके साथ ही उत्पन्न हुए कुण्डलकी प्रभासे प्रकाशित होता था ॥ ९८ ॥

अनुग्रहार्थं लोकानां विष्णुर्लोकनमस्कृतः । वसुदेवात् तु देवक्यां प्रादुर्भूतो महायशाः ॥ ९९ ॥ उन्हीं दिनों विश्ववन्दित महायशस्वी भगवान् विष्णु जगत्के जीवोंपर अनुग्रह करनेके लिये वसुदेवजीके द्वारा देवकीके गर्भसे प्रकट हुए ॥ ९९ ॥

अनादिनिधनो देवः स कर्ता जगतः प्रभुः । अव्यक्तमक्षरं ब्रह्म प्रधानं त्रिगुणात्मकम् ॥ १०० ॥ वे भगवान् आदि-अन्तसे रहित, द्युतिमान्, सम्पूर्ण जगत्के कर्ता तथा प्रभु हैं। उन्हींको अव्यक्त अक्षर (अविनाशी) ब्रह्म और त्रिगुणमय प्रधान कहते हैं ॥ १०० ॥

आत्मानमव्ययं चैव प्रकृतिं प्रभवं प्रभुम् । पुरुषं विश्वकर्माणं सत्त्वयोगं ध्रुवाक्षरम् ॥ १०१ ॥ अनन्तमचलं देवं हंसं नारायणं प्रभुम् । धातारमजमव्यक्तं यमाहुः परमव्ययम् ॥ १०२ ॥ कैवल्यं निर्गुणं विश्वमनादिमजमव्ययम् । पुरुषः स विभुः कर्ता सर्वभूतपितामहः ॥ १०३ ॥ आत्मा, अव्यय, प्रकृति (उपादान), प्रभव (उत्पत्ति-कारण), प्रभु (अधिष्ठाता), पुरुष (अन्तर्यामी), विश्वकर्मा, सत्त्वगुणसे प्राप्त होने योग्य तथा प्रणवाक्षर भी वे ही हैं; उन्हींको अनन्त, अचल, देव, हंस, नारायण, प्रभु, धाता, अजन्मा, अव्यक्त, पर, अव्यय, कैवल्य, निर्गुण, विश्वरूप, अनादि, जन्मरहित और अविकारी कहा गया है। वे सर्वव्यापी, परम पुरुष परमात्मा, सबके कर्ता और सम्पूर्ण भूतोंके पितामह हैं ॥ १०१—१०३ ॥

धर्मसंवर्धनार्थाय प्रजज्ञेऽन्धकवृष्णिषु । अस्त्रज्ञौ तु महावीर्यौ सर्वशास्त्रविशारदौ ॥ १०४ ॥

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उन्होंने ही धर्मकी वृद्धिके लिये अन्धक और वृष्णिकुलमें बलराम और श्रीकृष्णरूपमें अवतार लिया था। वे दोनों भाई सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंके ज्ञाता, महापराक्रमी और समस्त शास्त्रोंके ज्ञानमें परम प्रवीण थे ॥ १०४ ॥

सात्यकिः कृतवर्मा च नारायणमनुव्रतौ ।
सत्यकाद् हृदिकाच्चैव जज्ञातेऽस्त्रविशारदौ ॥ १०५ ॥
सत्यकसे सात्यकि और हृदिकसे कृतवर्माका जन्म हुआ था। वे दोनों अस्त्रविद्यामें अत्यन्त निपुण और भगवान् श्रीकृष्णके अनुगामी थे ॥ १०५ ॥

भरद्वाजस्य च स्कन्नं द्रोण्यां शुक्रमवर्धत ।
महर्षेरूग्रतपसस्तस्माद् द्रोणो व्यजायत ॥ १०६ ॥
एक समय उग्रतपस्वी महर्षि भरद्वाजका वीर्य किसी द्रोणी (पर्वतकी गुफा)-में स्खलित होकर धीरे-धीरे पुष्ट होने लगा। उसीसे द्रोणका जन्म हुआ ॥ १०६ ॥

गौतमान्मिथुनं जज्ञे शरस्तम्बाच्छरद्वतः ।
अश्वत्थाम्नश्च जननी कृपश्चैव महाबलः ॥ १०७ ॥
किसी समय गौतमगोत्रीय शरद्वान्‌का वीर्य सरकंडेके समूहपर गिरा और दो भागोंमें बँट गया। उसीसे एक कन्या और एक पुत्रका जन्म हुआ। कन्याका नाम कृपी था, जो अश्वत्थामाकी जननी हुई। पुत्र महाबली कृपके नामसे विख्यात हुआ ॥ १०७ ॥

अश्वत्थामा ततो जज्ञे द्रोणादेव महाबलः ।
तथैव धृष्टद्युम्नोऽपि साक्षादग्निसमद्युतिः ॥ १०८ ॥
वैताने कर्मणि ततः पावकात् समजायत ।
वीरो द्रोणविनाशाय धनुरादाय वीर्यवान् ॥ १०९ ॥
तदनन्तर द्रोणाचार्यसे महाबली अश्वत्थामाका जन्म हुआ। इसी प्रकार यज्ञकर्मका अनुष्ठान होते समय प्रज्वलित अग्निसे धृष्टद्युम्नका प्रादुर्भाव हुआ, जो साक्षात् अग्निदेवके समान तेजस्वी था। पराक्रमी वीर धृष्टद्युम्न द्रोणाचार्यका विनाश करनेके लिये धनुष लेकर प्रकट हुआ था ॥ १०८-१०९ ॥

तत्रैव वेद्यां कृष्णापि जज्ञे तेजस्विनी शुभा ।
विभ्राजमाना वपुषा बिभ्रती रूपमुत्तमम् ॥ ११० ॥
उसी यज्ञकी वेदीसे शुभस्वरूपा तेजस्विनी द्रौपदी उत्पन्न हुई, जो परम उत्तम रूप धारण करके अपने सुन्दर शरीरसे अत्यन्त शोभा पा रही थी ॥ ११० ॥

प्रह्लादशिष्यो नग्नजित् सुबलश्चाभवत् ततः ।
तस्य प्रजा धर्महन्त्री जज्ञे देवप्रकोपनात् ॥ १११ ॥
गान्धारराजपुत्रोऽभूच्छकुनिः सौबलस्तथा ।
दुर्योधनस्य जननी जज्ञातेऽर्थविशारदौ ॥ ११२ ॥

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प्रह्लादका शिष्य नग्नजित् राजा सुबलके रूपमें प्रकट हुआ। देवताओंके कोपसे उसकी संतति (शकुनि) धर्मका नाश करनेवाली हुई। गान्धारराज सुबलका पुत्र शकुनि एवं सौबल नामसे विख्यात हुआ तथा उनकी पुत्री गान्धारी दुर्योधनकी माता थी। ये दोनों भाई-बहिन अर्थशास्त्रके ज्ञानमें निपुण थे ॥ १११-११२ ॥

कृष्णद्वैपायनाज्जज्ञे धृतराष्ट्रो जनेश्वरः । क्षेत्रे विचित्रवीर्यस्य पाण्डुश्चैव महाबलः ॥ ११३ ॥ धर्मार्थकुशलो धीमान् मेधावी धूतकल्मषः । विदुरः शूद्रयोनौ तु जज्ञे द्वैपायनादपि ॥ ११४ ॥ पाण्डोस्तु जज्ञिरे पञ्च पुत्रा देवसमाः पृथक् । द्वयोः स्त्रियोर्गुणज्येष्ठस्तेषामासीद् युधिष्ठिरः ॥ ११५ ॥

राजा विचित्रवीर्यकी क्षेत्रभूता अम्बिका और अम्बालिकाके गर्भसे कृष्णद्वैपायन व्यासद्वारा राजा धृतराष्ट्र और महाबली पाण्डुका जन्म हुआ। द्वैपायन व्याससे ही शूद्रजातीय स्त्रीके गर्भसे विदुरजीका भी जन्म हुआ था। वे धर्म और अर्थके ज्ञानमें निपुण, बुद्धिमान्, मेधावी और निष्पाप थे। पाण्डुसे दो स्त्रियोंके द्वारा पृथक्-पृथक् पाँच पुत्र उत्पन्न हुए, जो सब-के-सब देवताओंके समान थे। उन सबमें बड़े युधिष्ठिर थे। वे उत्तम गुणोंमें भी सबसे बढ़-चढ़कर थे ॥ ११३—११५ ॥

धर्माद् युधिष्ठिरो जज्ञे मारुताच्च वृकोदरः । इन्द्राद् धनंजयः श्रीमान् सर्वशस्त्रभृतां वरः ॥ ११६ ॥ जज्ञाते रूपसम्पन्नावश्विभ्यां च यमावपि । नकुलः सहदेवश्च गुरुशुश्रूषणे रतौ ॥ ११७ ॥

युधिष्ठिर धर्मसे, भीमसेन वायुदेवतासे, सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ श्रीमान् अर्जुन इन्द्रदेवसे तथा सुन्दर रूपवाले नकुल और सहदेव अश्विनीकुमारोंसे उत्पन्न हुए थे। वे जुड़वें पैदा हुए थे। नकुल और सहदेव सदा गुरुजनोंकी सेवामें तत्पर रहते थे ॥ ११६-११७ ॥

तथा पुत्रशतं जज्ञे धृतराष्ट्रस्य धीमतः । दुर्योधनप्रभृतयो युयुत्सुः करणस्तथा ॥ ११८ ॥

परम बुद्धिमान् राजा धृतराष्ट्रके दुर्योधन आदि सौ पुत्र हुए। इनके अतिरिक्त युयुत्सु भी उन्हींका पुत्र था। वह वैश्यजातीय मातासे उत्पन्न होनेके कारण 'करण*' कहलाता था ॥ ११८ ॥

ततो दुःशासनश्चैव दुःसहश्चापि भारत । दुर्मर्षणो विकर्णश्च चित्रसेनो विविंशतिः ॥ ११९ ॥ जयः सत्यव्रतश्चैव पुरुमित्रश्च भारत । वैश्यापुत्रो युयुत्सुश्च एकादश महारथाः ॥ १२० ॥

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भरतवंशी जनमेजय! धृतराष्ट्रके पुत्रोंमें दुर्योधन, दुःशासन, दुःसह, दुर्मर्षण, विकर्ण, चित्रसेन, विविंशति, जय, सत्यव्रत, पुरुमित्र तथा वैश्यापुत्र युयुत्सु—ये ग्यारह महारथी थे ॥ ११९-१२० ॥

अभिमन्युः सुभद्रायामर्जुनादभ्यजायत ।
स्वस्रीयो वासुदेवस्य पौत्रः पाण्डोर्महात्मनः ॥ १२१ ॥
अर्जुनद्वारा सुभद्राके गर्भसे अभिमन्युका जन्म हुआ। वह महात्मा पाण्डुका पौत्र और भगवान् श्रीकृष्णका भानजा था ॥ १२१ ॥

पाण्डवेभ्यो हि पाञ्चाल्यां द्रौपद्यां पञ्च जज्ञिरे ।
कुमारा रूपसम्पन्नाः सर्वशास्त्रविशारदाः ॥ १२२ ॥
पाण्डवोंद्वारा द्रौपदीके गर्भसे पाँच पुत्र उत्पन्न हुए थे, जो बड़े ही सुन्दर और सब शास्त्रोंमें निपुण थे ॥ १२२ ॥

प्रतिविन्ध्यो युधिष्ठिरात् सुतसोमो वृकोदरात् ।
अर्जुनाच्छ्रुतकीर्तिस्तु शतानीकस्तु नाकुलिः ॥ १२३ ॥
तथैव सहदेवाच्च श्रुतसेनः प्रतापवान् ।
हिडिम्बायां च भीमेन वने जज्ञे घटोत्कचः ॥ १२४ ॥
युधिष्ठिरसे प्रतिविन्ध्य, भीमसेनसे सुतसोम, अर्जुनसे श्रुतकीर्ति, नकुलसे शतानीक तथा सहदेवसे प्रतापी श्रुतसेनका जन्म हुआ था। भीमसेनके द्वारा हिडिम्बासे वनमें घटोत्कच नामक पुत्र उत्पन्न हुआ ॥ १२३-१२४ ॥

शिखण्डी द्रुपदाज्जज्ञे कन्या पुत्रत्वमागता ।
यां यक्षः पुरुषं चक्रे स्थूणः प्रियचिकीर्षया ॥ १२५ ॥
राजा द्रुपदसे शिखण्डी नामकी एक कन्या हुई, जो आगे चलकर पुत्ररूपमें परिणत हो गयी। स्थूणाकर्ण नामक यक्षने उसका प्रिय करनेकी इच्छासे उसे पुरुष बना दिया था ॥ १२५ ॥

कुरुणां विग्रहे तस्मिन् समागच्छन् बहून् यथा ।
राज्ञां शतसहस्राणि योत्स्यमानानि संयुगे ॥ १२६ ॥
तेषामपरिमेयानां नामधेयानि सर्वशः ।
न शक्यानि समाख्यातुं वर्षाणामयुतैरपि ।
एते तु कीर्तिता मुख्या यैराख्यानमिदं ततम् ॥ १२७ ॥
कौरवोंके उस महासमरमें युद्ध करनेके लिये राजाओंके कई लाख योद्धा आये थे। दस हजार वर्षोंतक गिनती की जाय तो भी उन असंख्य योद्धाओंके नाम पूर्णतः नहीं बताये जा सकते। यहाँ कुछ मुख्य-मुख्य राजाओंके नाम बताये गये हैं, जिनके चरित्रोंसे इस महाभारत-कथाका विस्तार हुआ है ॥ १२६-१२७ ॥

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इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि अंशावतरणपर्वणि व्यासाद्युत्पत्तौ त्रिषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६३ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत अंशावतरणपर्वमें व्यास आदिकी उत्पत्तिसे सम्बन्ध रखनेवाला तिरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६३ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ १/३ श्लोक मिलाकर कुल १३१ १/३ श्लोक हैं)

ब्राह्मणोंद्वारा क्षत्रियवंशकी उत्पत्ति और वृद्धि तथा उस समयके धार्मिक राज्यका वर्णन; असुरोंका जन्म और उनके भारसे पीड़ित पृथ्वीका ब्रह्माजीकी शरणमें ज

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चतुःषष्टितमोऽध्यायः

ब्राह्मणोंद्वारा क्षत्रियवंशकी उत्पत्ति और वृद्धि तथा उस समयके धार्मिक राज्यका वर्णन; असुरोंका जन्म और उनके भारसे पीड़ित पृथ्वीका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना तथा ब्रह्माजीका देवताओंको अपने अंशसे पृथ्वीपर जन्म लेनेका आदेश

जनमेजय उवाच

य एते कीर्तिता ब्रह्मन् ये चान्ये नानुकीर्तिताः ।
सम्यक् ताञ्छ्रोतुमिच्छामि राजंश्चान्यान् सहस्रशः ॥ १ ॥
जनमेजय बोले— ब्रह्मन्! आपने यहाँ जिन राजाओंके नाम बताये हैं और जिन दूसरे नरेशोंके नाम यहाँ नहीं लिये हैं, उन सब सहस्रों राजाओंका मैं भलीभाँति परिचय सुनना चाहता हूँ ॥ १ ॥

यदर्थमिह सम्भूता देवकल्पा महारथाः ।
भुवि तन्मे महाभाग सम्यगाख्यातुमर्हसि ॥ २ ॥
महाभाग! वे देवतुल्य महारथी इस पृथ्वीपर जिस उद्देश्यकी सिद्धिके लिये उत्पन्न हुए थे, उसका यथावत् वर्णन कीजिये ॥ २ ॥

वैशम्पायन उवाच

रहस्यं खल्विदं राजन् देवानामिति नः श्रुतम् ।
तत्तु ते कथयिष्यामि नमस्कृत्य स्वयम्भुवे ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजीने कहा— राजन्! यह देवताओंका रहस्य है, ऐसा मैंने सुन रखा है। स्वयम्भू ब्रह्माजीको नमस्कार करके आज उसी रहस्यका तुमसे वर्णन करूँगा ॥ ३ ॥

त्रिःसप्तकृत्वः पृथिवीं कृत्वा निःक्षत्रियां पुरा ।
जामदग्न्यस्तपस्तेपे महेन्द्रे पर्वतोत्तमे ॥ ४ ॥
तदा निःक्षत्रिये लोके भार्गवेण कृते सति ।
ब्राह्मणान् क्षत्रिया राजन् सुतार्थिन्योऽभिचक्रमुः ॥ ५ ॥
पूर्वकालमें जमदग्निनन्दन परशुरामने इक्कीस बार पृथ्वीको क्षत्रियरहित करके उत्तम पर्वत महेन्द्रपर तपस्या की थी। उस समय जब भृगुनन्दनने इस लोकको क्षत्रियशून्य कर दिया था, क्षत्रिय-नारियोंने पुत्रकी अभिलाषासे ब्राह्मणोंकी शरण ग्रहण की थी ॥ ४-५ ॥

ताभिः सह समापेतुर्ब्राह्मणाः संशितव्रताः ।

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ऋतावृत्तौ नरव्याघ्र न कामान्नानृतौ तथा ॥ ६ ॥ नररत्न! वे कठोर व्रतधारी ब्राह्मण केवल ऋतुकालमें ही उनके साथ मिलते थे; न तो कामवश और न बिना ऋतुकालके ही ॥ ६ ॥ तेभ्यश्च लेभिरे गर्भं क्षत्रियास्ताः सहस्रशः । ततः सुषुविरे राजन् क्षत्रियान् वीर्यवत्तरान् ॥ ७ ॥ कुमारांश्च कुमारीश्च पुनः क्षत्राभिवृद्धये । एवं तद् ब्राह्मणैः क्षत्रं क्षत्रियासु तपस्विभिः ॥ ८ ॥ जातं वृद्धं च धर्मेण सुदीर्घेणायुषान्वितम् । चत्वारोऽपि ततो वर्णा बभूवुर्ब्राह्मणोत्तराः ॥ ९ ॥ राजन्! उन सहस्रों क्षत्राणियोंने ब्राह्मणोंसे गर्भ धारण किया और पुनः क्षत्रियकुलकी वृद्धिके लिये अत्यन्त बलशाली क्षत्रियकुमारों तथा कुमारियोंको जन्म दिया। इस प्रकार तपस्वी ब्राह्मणोंद्वारा क्षत्राणियोंके गर्भसे धर्मपूर्वक क्षत्रिय-संतानकी उत्पत्ति और वृद्धि हुई। वे सब संतानें दीर्घायु होती थीं। तदनन्तर जगत्में पुनः ब्राह्मणप्रधान चारों वर्ण प्रतिष्ठित हुए ॥ ७—९ ॥ अभ्यगच्छन्नृतौ नारीं न कामान्नानृतौ तथा । तथैवान्यानि भूतानि तिर्यग्योनिगतान्यपि ॥ १० ॥ ऋतौ दारांश्च गच्छन्ति तत् तथा भरतर्षभ । ततोऽवर्धन्त धर्मेण सहस्रशतजीविनः ॥ ११ ॥ उस समय सब लोग ऋतुकालमें ही पत्नीसमागम करते थे; केवल कामनावश या ऋतुकालके बिना नहीं करते थे। इसी प्रकार पशु-पक्षी आदिकी योनिमें पड़े हुए जीव भी ऋतुकालमें ही अपनी स्त्रियोंसे संयोग करते थे। भरतश्रेष्ठ! उस समय धर्मका आश्रय लेनेसे सब लोग सहस्र एवं शत वर्षोंतक जीवित रहते थे और उत्तरोत्तर उन्नति करते थे ॥ १०-११ ॥ ताः प्रजाः पृथिवीपाल धर्मव्रतपरायणाः । आधिभिर्व्याधिभिश्चैव विमुक्ताः सर्वशो नराः ॥ १२ ॥ भूपाल! उस समयकी प्रजा धर्म एवं व्रतके पालनमें तत्पर रहती थी; अतः सभी लोग रोगों तथा मानसिक चिन्ताओंसे मुक्त रहते थे ॥ १२ ॥ अथेमां सागरापाङ्गीं गां गजेन्द्रगताखिलाम् । अध्यतिष्ठत् पुनः क्षत्रं सशैलवनपत्तनाम् ॥ १३ ॥ गजराजके समान गमन करनेवाले राजा जनमेजय! तदनन्तर धीरे-धीरे समुद्रसे घिरी हुई पर्वत, वन और नगरोंसहित इस सम्पूर्ण पृथ्वीपर पुनः क्षत्रियजातिका ही अधिकार हो गया ॥ १३ ॥ प्रशासति पुनः क्षत्रे धर्मेणेमां वसुन्धराम् ।

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ब्राह्मणाद्यास्ततो वर्णा लेभिरे मुदमुत्तमाम् ॥ १४ ॥
जब पुनः क्षत्रिय शासक धर्मपूर्वक इस पृथ्वीका पालन करने लगे, तब ब्राह्मण आदि वर्णोंको बड़ी प्रसन्नता प्राप्त हुई ॥ १४ ॥

कामक्रोधोद्भवान् दोषान् निरस्य च नराधिपाः ।
धर्मेण दण्डं दण्ड्येषु प्रणयन्तोऽन्वपालयन् ॥ १५ ॥
उन दिनों राजालोग काम और क्रोधजनित दोषोंको दूर करके दण्डनीय अपराधियोंको धर्मानुसार दण्ड देते हुए पृथ्वीका पालन करते थे ॥ १५ ॥

तथा धर्मपरे क्षत्रे सहस्राक्षः शतक्रतुः ।
स्वादु देशे च काले च वर्षेणापालयत् प्रजाः ॥ १६ ॥
इस तरह धर्मपरायण क्षत्रियोंके शासनमें सारा देश-काल अत्यन्त रुचिकर प्रतीत होने लगा। उस समय सहस्र नेत्रोंवाले देवराज इन्द्र समयपर वर्षा करके प्रजाओंका पालन करते थे ॥ १६ ॥

न बाल एव म्रियते तदा कश्चिज्जनाधिप ।
न च स्त्रियं प्रजानाति कश्चिदप्राप्तयौवनः ॥ १७ ॥
राजन्! उन दिनों कोई भी बाल्यावस्थामें नहीं मरता था। कोई भी पुरुष युवावस्था प्राप्त हुए बिना स्त्री-सुखका अनुभव नहीं करता था ॥ १७ ॥

एवमायुष्मतीभिस्तु प्रजाभिर्भरतर्षभ ।
इयं सागरपर्यन्ता समापूर्यत मेदिनी ॥ १८ ॥
भरतश्रेष्ठ! ऐसी व्यवस्था हो जानेसे समुद्रपर्यन्त यह सारी पृथ्वी दीर्घकालतक जीवित रहनेवाली प्रजाओंसे भर गयी ॥ १८ ॥

ईजिरे च महायज्ञैः क्षत्रिया बहुदक्षिणैः ।
साङ्गोपनिषदन् वेदान् विप्राश्चाधीयते तदा ॥ १९ ॥
क्षत्रियलोग बहुत-सी दक्षिणावाले बड़े-बड़े यज्ञोंद्वारा यजन करते थे। ब्राह्मण अंगों और उपनिषदोंसहित सम्पूर्ण वेदोंका अध्ययन करते थे ॥ १९ ॥

न च विक्रीणते ब्रह्म ब्राह्मणाश्च तदा नृप ।
न च शूद्रसमभ्याशे वेदानुच्चारयन्त्युत ॥ २० ॥
राजन्! उस समय ब्राह्मण न तो वेदका विक्रय करते और न शूद्रोंके निकट वेदमन्त्रोंका उच्चारण ही करते थे ॥ २० ॥

कारयन्तः कृषिं गोभिस्तथा वैश्याः क्षिताविह ।
युञ्जते धुरि नो गाश्च कृशाङ्गांश्चाप्यजीवयन् ॥ २१ ॥
वैश्यगण बैलोंद्वारा इस पृथ्वीपर दूसरोंसे खेती कराते हुए भी स्वयं उनके कंधेपर जुआ नहीं रखते थे—उन्हें बोझ ढोनेमें नहीं लगाते थे और दुर्बल अंगोंवाले निकम्मे पशुओंको भी दाना-घास देकर उनके जीवनकी रक्षा करते थे ॥ २१ ॥

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फेनपांश्च तथा वत्सान् न दुहन्ति स्म मानवाः । न कूटमानैर्वणिजः पण्यं विक्रीणते तदा ॥ २२ ॥ जबतक बछड़े केवल दूधपर रहते, घास नहीं चरते, तबतक मनुष्य गौओंका दूध नहीं दुहते थे। व्यापारीलोग बेचने योग्य वस्तुओंका झूठे माप-तौलद्वारा विक्रय नहीं करते थे ॥ २२ ॥

कर्माणि च नरव्याघ्र धर्मोपेतानि मानवाः । धर्ममेवानुपश्यन्तश्चक्रुर्धर्मपरायणाः ॥ २३ ॥ नरश्रेष्ठ! सब मनुष्य धर्मकी ही ओर दृष्टि रखकर धर्ममें ही तत्पर हो धर्मयुक्त कर्मोंका ही अनुष्ठान करते थे ॥ २३ ॥

स्वकर्मनिरताश्चासन् सर्वे वर्णा नराधिप । एवं तदा नरव्याघ्र धर्मो न ह्रसते क्वचित् ॥ २४ ॥ राजन्! उस समय सब वर्णोंके लोग अपने-अपने कर्मके पालनमें लगे रहते थे। नरश्रेष्ठ! इस प्रकार उस समय कहीं भी धर्मका ह्रास नहीं होता था ॥ २४ ॥

काले गावः प्रसूयन्ते नार्यश्च भरतर्षभ । भवन्त्यृतुषु वृक्षाणां पुष्पाणि च फलानि च ॥ २५ ॥ भरतश्रेष्ठ! गौएँ तथा स्त्रियाँ भी ठीक समयपर ही संतान उत्पन्न करती थीं। ऋतु आनेपर ही वृक्षोंमें फूल और फल लगते थे ॥ २५ ॥

एवं कृतयुगे सम्यग् वर्तमाने तदा नृप । आपूर्यत मही कृत्स्ना प्राणिभिर्बहुभिर्भृशम् ॥ २६ ॥ नरेश्वर! इस तरह उस समय सब ओर सत्ययुग छा रहा था। सारी पृथ्वी नाना प्रकारके प्राणियोंसे खूब भरी-पूरी रहती थी ॥ २६ ॥

एवं समुदिते लोके मानुषे भरतर्षभ । असुरा जज्ञिरे क्षेत्रे राज्ञां तु मनुजेश्वर ॥ २७ ॥ भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार सम्पूर्ण मानव-जगत् बहुत प्रसन्न था। मनुजेश्वर! इसी समय असुरलोग राजपत्नियोंके गर्भसे जन्म लेने लगे ॥ २७ ॥

आदित्यैर्हि तदा दैत्या बहुशो निर्जिता युधि । ऐश्वर्याद् भ्रंशिताः स्वर्गात् सम्बभूवुः क्षिताविह ॥ २८ ॥ उन दिनों अदितिके पुत्रों (देवताओं)-द्वारा दैत्यगण अनेक बार युद्धमें पराजित हो चुके थे। स्वर्गके ऐश्वर्यसे भ्रष्ट होनेपर वे इस पृथ्वीपर ही जन्म लेने लगे ॥ २८ ॥

इह देवत्वमिच्छन्तो मानुषेषु मनस्विनः । जज्ञिरे भुवि भूतेषु तेषु तेष्वसुरा विभो ॥ २९ ॥ प्रभो! यहीं रहकर देवत्व प्राप्त करनेकी इच्छासे वे मनस्वी असुर भूतलपर मनुष्यों तथा भिन्न-भिन्न प्राणियोंमें जन्म लेने लगे ॥ २९ ॥

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गोष्वश्वेषु च राजेन्द्र खरोष्ट्रमहिषेषु च । क्रव्यात्सु चैव भूतेषु गजेषु च मृगेषु च ॥ ३० ॥ जातैरिह महीपाल जायमानैश्च तैर्मही । न शशाकात्मनाऽऽत्मानमियं धारयितुं धरा ॥ ३१ ॥ राजेन्द्र! गौओं, घोड़ों, गदहों, ऊँटों, भैंसों, कच्चे मांस खानेवाले पशुओं, हाथियों और मृगोंकी योनिमें भी यहाँ असुरोंने जन्म लिया और अभीतक वे जन्म धारण करते जा रहे थे। उन सबसे यह पृथ्वी इस प्रकार भर गयी कि अपने-आपको भी धारण करनेमें समर्थ न हो सकी ॥ ३०-३१ ॥

अथ जाता महीपालाः केचिद् बहुमदान्विताः । दितेः पुत्रा दनोश्चैव तदा लोक इह च्युताः ॥ ३२ ॥ वीर्यवन्तोऽवलिप्तास्ते नानारूपधरा महीम् । इमां सागरपर्यन्तां परीयुररिमर्दनाः ॥ ३३ ॥ स्वर्गसे इस लोकमें गिरे हुए तथा राजाओंके रूपमें उत्पन्न हुए कितने ही दैत्य और दानव अत्यन्त मदसे उन्मत्त रहते थे। वे पराक्रमी होनेके साथ ही अहंकारी भी थे। अनेक प्रकारके रूप धारण कर अपने शत्रुओंका मान-मर्दन करते हुए समुद्रपर्यन्त सारी पृथ्वीपर विचरते रहते थे ॥ ३२-३३ ॥

ब्राह्मणान् क्षत्रियान् वैश्याञ्छूद्रांश्चैवाप्यपीडयन् । अन्यानि चैव सत्त्वानि पीडयामासुरोजसा ॥ ३४ ॥ वे ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों तथा शूद्रोंको भी सताया करते थे। अन्यान्य जीवोंको भी अपने बल और पराक्रमसे पीड़ा देते थे ॥ ३४ ॥

त्रासयन्तोऽभिनिघ्नन्तः सर्वभूतगणांश्च ते । विचेरुः सर्वशो राजन् महीं शतसहस्रशः ॥ ३५ ॥ राजन्! वे असुर लाखोंकी संख्यामें उत्पन्न हुए थे और समस्त प्राणियोंको डराते-धमकाते तथा उनकी हिंसा करते हुए भूमण्डलमें सब ओर घूमते रहते थे ॥ ३५ ॥

आश्रमस्थान् महर्षींश्च धर्षयन्तस्ततस्ततः । अब्रह्मण्या वीर्यमदा मत्ता मदबलेन च ॥ ३६ ॥ वे वेद और ब्राह्मणके विरोधी, पराक्रमके नशेमें चूर तथा अहंकार और बलसे मतवाले होकर इधर-उधर आश्रमवासी महर्षियोंका भी तिरस्कार करने लगे ॥ ३६ ॥

एवं वीर्यबलोत्सिक्तैर्भूरियन्तैर्महासुरैः । पीड्यमाना मही राजन् ब्रह्माणमुपचक्रमे ॥ ३७ ॥ राजन्! जब इस प्रकार बल और पराक्रमके मदसे उन्मत्त महादैत्य विशेष यत्नपूर्वक इस पृथ्वीको पीड़ा देने लगे, तब यह ब्रह्माजीकी शरणमें जानेको उद्यत हुई ॥ ३७ ॥

न ह्यमी भूतसत्त्वौघाः पन्नगाः सनगां महीम् ।

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तदा धारयितुं शेकुः संक्रान्तां दानवैर्बलात् ॥ ३८ ॥ ततो मही महीपाल भारार्ता भयपीडिता । जगाम शरणं देवं सर्वभूतपितामहम् ॥ ३९ ॥ सा संवृतं महाभागैर्देवद्विजमहर्षिभिः । ददर्श देवं ब्रह्माणं लोककर्तारमव्ययम् ॥ ४० ॥ दानवोंने बलपूर्वक जिसपर अधिकार कर लिया था, पर्वतों और वृक्षोंसहित उस पृथ्वीको उस समय कच्छप और दिग्गज आदिकी संगठित शक्तियाँ तथा शेषनाग भी धारण करनेमें समर्थ न हो सके। महीपाल! तब असुरोंके भारसे आतुर तथा भयसे पीड़ित हुई पृथ्वी सम्पूर्ण भूतोंके पितामह भगवान् ब्रह्माजीकी शरणमें उपस्थित हुई। ब्रह्मलोकमें जाकर पृथ्वीने उन लोकस्रष्टा अविनाशी देव भगवान् ब्रह्माजीका दर्शन किया, जिन्हें महाभाग देवता, द्विज और महर्षि घेरे हुए थे ॥ ३८—४० ॥

गन्धर्वैरप्सतेभिश्च देवकर्मसु निष्ठितैः । वन्द्यमानं मुदोपेतैर्ववन्दे चैनमेत्य सा ॥ ४१ ॥ देवकर्ममें संलग्न रहनेवाले अप्सराएँ और गन्धर्व उन्हें प्रसन्नतापूर्वक प्रणाम करते थे। पृथ्वीने उनके निकट जाकर प्रणाम किया ॥ ४१ ॥

अथ विज्ञापयामास भूमिस्तं शरणार्थिनी । संनिधौ लोकपालानां सर्वेषामेव भारत ॥ ४२ ॥ तत् प्रधानात्मनस्तस्य भूमेः कृत्यं स्वयम्भुवः । पूर्वमेवाभवद् राजन् विदितं परमेष्ठिनः ॥ ४३ ॥ भारत! तदनन्तर शरण चाहनेवाली भूमीने समस्त लोकपालोंके समीप अपना सारा दुःख ब्रह्माजीसे निवेदन किया। राजन्! स्वयम्भू ब्रह्मा सबके कारणरूप हैं, अतः पृथ्वीका जो आवश्यक कार्य था वह उन्हें पहलेसे ही ज्ञात हो गया था ॥ ४२-४३ ॥

स्रष्टा हि जगतः कस्मान्न सम्बुध्येत भारत । ससुरासुरलोकानामशेषेण मनोगतम् ॥ ४४ ॥ भारत! भला जो जगत्के स्रष्टा हैं, वे देवताओं और असुरोंसहित समस्त जगत्का सम्पूर्ण मनोगत भाव क्यों न समझ लें ॥ ४४ ॥

तामुवाच महाराज भूमिं भूमिपतिः प्रभुः । प्रभवः सर्वभूतानामीशः शम्भुः प्रजापतिः ॥ ४५ ॥ महाराज! जो इस भूमिके पालक और प्रभु हैं, सबकी उत्पत्तिके कारण तथा समस्त प्राणियोंके अधीश्वर हैं, वे कल्याणमय प्रजापति ब्रह्माजी उस समय भूमिसे इस प्रकार बोले ॥ ४५ ॥

ब्रह्मोवाच

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यदर्थमभिसम्प्राप्ता मत्सकाशं वसुन्धरे ।
तदर्थं संनियोक्ष्यामि सर्वानैव दिवौकसः ॥ ४६ ॥
ब्रह्माजीने कहा— वसुन्धरे! तुम जिस उद्देश्यसे मेरे पास आयी हो, उसकी सिद्धिके लिये मैं सम्पूर्ण देवताओंको नियुक्त कर रहा हूँ ॥ ४६ ॥

वैशम्पायन उवाच

इत्युक्त्वा स महीं देवो ब्रह्मा राजन् विसृज्य च ।
आदिदेश तदा सर्वान् विबुधान् भूतकृत् स्वयम् ॥ ४७ ॥
अस्या भूमेर्निरसितुं भारं भागैः पृथक् पृथक् ।
अस्यामेव प्रसूयध्वं विरोधायेति चाब्रवीत् ॥ ४८ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन्! सम्पूर्ण भूतोंकी सृष्टि करनेवाले भगवान् ब्रह्माजीने ऐसा कहकर उस समय पृथ्वीको तो विदा कर दिया और समस्त देवताओंको यह आदेश दिया—'देवताओ! तुम इस पृथ्वीका भार उतारनेके लिये अपने-अपने अंशसे पृथ्वीके विभिन्न भागोंमें पृथक्-पृथक् जन्म ग्रहण करो। वहाँ असुरोंसे विरोध करके अभीष्ट उद्देश्यकी सिद्धि करनी होगी' ॥ ४७-४८ ॥

तथैव स समानीय गन्धर्वाप्सरसां गणान् ।
उवाच भगवान् सर्वानिदं वचनमर्थवत् ॥ ४९ ॥
इसी प्रकार भगवान् ब्रह्माने सम्पूर्ण गन्धर्वों और अप्सराओंको भी बुलाकर यह अर्थसाधक वचन कहा ॥ ४९ ॥

ब्रह्मोवाच

स्वैः स्वैरंशैः प्रसूयध्वं यथेष्टं मानुषेषु च ।
अथ शक्रादयः सर्वे श्रुत्वा सुरगुरोर्वचः ।
तथ्यमर्थ्यं च पथ्यं च तस्य ते जगृहुस्तदा ॥ ५० ॥
ब्रह्माजी बोले— तुम सब लोग अपने-अपने अंशसे मनुष्योंमें इच्छानुसार जन्म ग्रहण करो। तदनन्तर इन्द्र आदि सब देवताओंने देवगुरु ब्रह्माजीकी सत्य, अर्थसाधक और हितकर बात सुनकर उस समय उसे शिरोधार्य कर लिया ॥ ५० ॥

अथ ते सर्वशोंऽशैः स्वैर्गन्तुं भूमिं कृतक्षणाः ।
नारायणममित्रघ्नं वैकुण्ठमुपचक्रमुः ॥ ५१ ॥
अब वे अपने-अपने अंशोंसे भूलोकमें सब ओर जानेका निश्चय करके शत्रुओंका नाश करनेवाले भगवान् नारायणके समीप वैकुण्ठधाममें जानेको उद्यत हुए ॥ ५१ ॥

यः स चक्रगदापाणिः पीतवासाः शितिप्रभः ।
पद्मनाभः सुरारिघ्नः पृथुचार्वञ्चितेक्षणः ॥ ५२ ॥

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जो अपने हाथोंमें चक्र और गदा धारण करते हैं, पीताम्बर पहनते हैं, जिनके अंगोंकी कान्ति श्याम रंगकी है, जिनकी नाभिसे कमलका प्रादुर्भाव हुआ है, जो देव-शत्रुओंके नाशक तथा विशाल और मनोहर नेत्रोंसे युक्त हैं ॥ ५२ ॥

प्रजापतिपतिर्देवः सुरनाथो महाबलः ।
श्रीवत्साङ्को हृषीकेशः सर्वदैवतपूजितः ॥ ५३ ॥
जो प्रजापतियोंके भी पति, दिव्यस्वरूप, देवताओंके रक्षक, महाबली, श्रीवत्सचिह्नसे सुशोभित, इन्द्रियोंके अधिष्ठाता तथा सम्पूर्ण देवताओंद्वारा पूजित हैं ॥ ५३ ॥

तं भुवः शोधनायेन्द्र उवाच पुरुषोत्तमम् ।
अंशेनावतरेत्येवं तथेत्याह च तं हरिः ॥ ५४ ॥
उन भगवान् पुरुषोत्तमके पास जाकर इन्द्रने उनसे कहा—‘प्रभो! आप पृथ्वीका शोधन (भार-हरण) करनेके लिये अपने अंशसे अवतार ग्रहण करें।’ तब श्रीहरिने ‘तथास्तु’ कहकर उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली ॥ ५४ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि अंशावतरणपर्वणि चतुःषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत अंशावतरणपर्वमें चौंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६४ ॥


* ‘वैश्यायां क्षत्रियाज्जातः करणः परिकीर्तितः ।’ (वैश्य माता और क्षत्रिय पितासे उत्पन्न पुत्र ‘करण’ कहलाता है) इस धर्मशास्त्रीय वचनके अनुसार युयुत्सुकी ‘करण’ संज्ञा बतायी गयी है।

(सम्भवपर्व)

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⬅ विषय-सूची (TOC)

(सम्भवपर्व)

पञ्चषष्टितमोऽध्यायः

मरीचि आदि महर्षियों तथा अदिति आदि दक्षकन्याओंके वंशका विवरण

वैशम्पायन उवाच

अथ नारायणेनेन्द्रश्चकार सह संविदम् ।
अवतर्तुं महीं स्वर्गादंशतः सहितः सुरैः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! देवताओंसहित इन्द्रने भगवान् विष्णुके साथ स्वर्ग एवं वैकुण्ठसे पृथ्वीपर अंशतः अवतार ग्रहण करनेके सम्बन्धमें कुछ सलाह की ॥ १ ॥

आदिश्य च स्वयं शक्रः सर्वानैव दिवौकसः ।
निर्जगाम पुनस्तस्मात् क्षयान्नारायणस्य ह ॥ २ ॥
तत्पश्चात् सभी देवताओंको तदनुसार कार्य करनेके लिये आदेश देकर वे भगवान् नारायणके निवासस्थान वैकुण्ठधामसे पुनः चले आये ॥ २ ॥

तेऽमरारिविनाशाय सर्वलोकहिताय च ।
अवतेरुः क्रमेणैव महीं स्वर्गाद् दिवौकसः ॥ ३ ॥
तब देवतालोग सम्पूर्ण लोकोंके हित तथा राक्षसोंके विनाशके लिये स्वर्गसे पृथ्वीपर आकर क्रमशः अवतीर्ण होने लगे ॥ ३ ॥

ततो ब्रह्मर्षिवंशेषु पार्थिवर्षिकुलेषु च ।
जज्ञिरे राजशार्दूल यथाकामं दिवौकसः ॥ ४ ॥
नृपश्रेष्ठ! वे देवगण अपनी इच्छाके अनुसार ब्रह्मर्षियों अथवा राजर्षियोंके वंशमें उत्पन्न हुए ॥ ४ ॥

दानवान् राक्षसांश्चैव गन्धर्वान् पन्नगांस्तथा ।
पुरुषादानि चान्यानि जघ्नुः सत्त्वान्यनेकशः ॥ ५ ॥
दानवा राक्षसाश्चैव गन्धर्वाः पन्नगास्तथा ।
न तान् बलस्थान् बाल्येऽपि जघ्नुर्भरतसत्तम ॥ ६ ॥
वे दानव, राक्षस, दुष्ट गन्धर्व, सर्प तथा अन्यान्य मनुष्यभक्षी जीवोंका बारम्बार संहार करने लगे। भरतश्रेष्ठ! वे बचपनमें भी इतने बलवान् थे कि दानव, राक्षस, गन्धर्व तथा सर्प उनका बाल बाँका तक नहीं कर पाते थे ॥ ५-६ ॥

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जनमेजय उवाच

देवदानवसङ्घानां गन्धर्वाप्सरसां तथा ।
मानवानां च सर्वेषां तथा वै यक्षरक्षसाम् ॥ ७ ॥
श्रोतुमिच्छामि तत्त्वेन सम्भवं कृत्स्नमादितः ।
प्राणिनां चैव सर्वेषां सम्भवं वक्तुमर्हसि ॥ ८ ॥
जनमेजय बोले—भगवन्! मैं देवता, दानवसमुदाय, गन्धर्व, अप्सरा, मनुष्य, यक्ष, राक्षस तथा सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ। आप कृपा करके आरम्भसे ही इन सबकी उत्पत्तिका यथावत् वर्णन कीजिये ॥ ७-८ ॥

वैशम्पायन उवाच

हन्त ते कथयिष्यामि नमस्कृत्य स्वयम्भुवे ।
सुरादीनामहं सम्यग् लोकानां प्रभवाप्ययम् ॥ ९ ॥
वैशम्पायनजीने कहा—अच्छा, मैं स्वयम्भू भगवान् ब्रह्मा एवं नारायणको नमस्कार करके तुमसे देवता आदि सम्पूर्ण लोगोंकी उत्पत्ति और नाशका यथावत् वर्णन करता हूँ ॥ ९ ॥

ब्रह्मणो मानसाः पुत्रा विदिताः षण्महर्षयः ।
मरीचिरत्र्यङ्गिरसौ पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः ॥ १० ॥
ब्रह्माजीके मानस पुत्र छः महर्षि विख्यात हैं—मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह और क्रतु ॥ १० ॥

मरीचेः कश्यपः पुत्रः कश्यपात् तु इमाः प्रजाः ।
प्रजज्ञिरे महाभागा दक्षकन्यास्त्रयोदश ॥ ११ ॥
मरीचिके पुत्र कश्यप थे और कश्यपसे ही ये समस्त प्रजाएँ उत्पन्न हुई हैं। (ब्रह्माजीके एक पुत्र दक्ष भी हैं) प्रजापति दक्षके परम सौभाग्यशालिनी तेरह कन्याएँ थीं ॥ ११ ॥

अदितिर्दितिर्दनुः काला दनायुः सिंहिका तथा ।
क्रोधा प्राधा च विश्वा च विनता कपिला मुनिः ॥ १२ ॥
कद्रूश्च मनुजव्याघ्र दक्षकन्यैव भारत ।
एतासां वीर्यसम्पन्नं पुत्रपौत्रमनन्तकम् ॥ १३ ॥
नरश्रेष्ठ! उनके नाम इस प्रकार हैं—अदिति, दिति, दनु, काला, दनायु, सिंहिका, क्रोधा (क्रूरा), प्राधा, विश्वा, विनता, कपिला, मुनि और कद्रू। भारत! ये सभी दक्षकी कन्याएँ हैं। इनके बल-पराक्रमसम्पन्न पुत्र-पौत्रोंकी संख्या अनन्त है ॥ १२-१३ ॥

अदित्यां द्वादशादित्याः सम्भूता भुवनेश्वराः ।
ये राजन् नामतस्तांस्ते कीर्तयिष्यामि भारत ॥ १४ ॥

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अदितिके पुत्र बारह आदित्य हुए, जो लोकेश्वर हैं। भरतवंशी नरेश! उन सबके नाम तुम्हें बता रहा हूँ— ।। १४ ।। धाता मित्रोऽर्यमा शक्रो वरुणस्त्वंश एव च । भगो विवस्वान् पूषा च सविता दशमस्तथा ॥ १५ ॥ एकादशस्तथा त्वष्टा द्वादशो विष्णुरुच्यते । जघन्यजस्तु सर्वेषामादित्यानां गुणाधिकः ॥ १६ ॥ धाता, मित्र, अर्यमा, इन्द्र, वरुण, अंश, भग, विवस्वान्, पूषा, दसवें सविता, ग्यारहवें त्वष्टा और बारहवें विष्णु कहे जाते हैं। इन सब आदित्योंमें विष्णु छोटे हैं; किंतु गुणोंमें वे सबसे बढ़कर हैं ।। १५-१६ ।। एक एव दितेः पुत्रो हिरण्यकशिपुः स्मृतः । नाम्ना ख्यातास्तु तस्येमे पञ्च पुत्रा महात्मनः ॥ १७ ॥ दितिका एक ही पुत्र हिरण्यकशिपु अपने नामसे विख्यात हुआ। उस महामना दैत्यके पाँच पुत्र थे ।। १७ ।। प्रह्लादः पूर्वजस्तेषां संह्रादस्तदनन्तरम् । अनुह्रादस्तृतीयोऽभूत् तस्माच्च शिबिबाष्कलौ ॥ १८ ॥ उन पाँचोंमें प्रथमका नाम प्रह्लाद है। उससे छोटेको संह्राद कहते हैं। तीसरेका नाम अनुह्राद है। उसके बाद चौथे शिबि और पाँचवें बाष्कल हैं ।। १८ ।। प्रह्लादस्य त्रयः पुत्राः ख्याताः सर्वत्र भारत । विरोचनश्च कुम्भश्च निकुम्भश्चेति भारत ॥ १९ ॥ भारत! प्रह्लादके तीन पुत्र हुए, जो सर्वत्र विख्यात हैं। उनके नाम ये हैं—विरोचन, कुम्भ और निकुम्भ ।। १९ ।। विरोचनस्य पुत्रोऽभूद् बलिरेकः प्रतापवान् । बलेश्च प्रथितः पुत्रो बाणो नाम महासुरः ॥ २० ॥ विरोचनके एक ही पुत्र हुआ, जो महाप्रतापी बलिके नामसे प्रसिद्ध है। बलिका विश्वविख्यात पुत्र बाण नामक महान् असुर है ।। २० ।। रुद्रस्यानुचरः श्रीमान् महाकालेति यं विदुः । चतुस्त्रिंशद् दनोः पुत्राः ख्याताः सर्वत्र भारत ॥ २१ ॥ जिसे सब लोग भगवान् शंकरके पार्षद श्रीमान् महाकालके नामसे जानते हैं। भारत! दनुके चौंतीस पुत्र हुए, जो सर्वत्र विख्यात हैं ।। २१ ।। तेषां प्रथमजो राजा विप्रचित्तिर्महायशाः । शम्बरो नमुचिश्चैव पुलोमा चेति विश्रुतः ॥ २२ ॥ असिलोमा च केशी च दुर्जयश्चैव दानवः । अयःशिरा अश्वशिरा अश्वशंकुश्च वीर्यवान् ॥ २३ ॥