भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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अष्टषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः

अर्जुनद्वारा स्वर्गलोकमें अपनी अस्त्रशिक्षा और निवातकवच दानवोंके साथ युद्धकी तैयारीका कथन

अर्जुन उवाच

ततस्तामवसं प्रीतो रजनीं तत्र भारत ।
प्रसादाद् देवदेवस्य त्र्यम्बकस्य महात्मनः ॥ १ ॥
**अर्जुन कहते हैं—**भारत! देवाधिदेव परमात्मा भगवान् त्रिलोचनके कृपाप्रसादसे मैंने प्रसन्नतापूर्वक वह रात वहीं व्यतीत की ॥ १ ॥

व्युषितो रजनीं चाहं कृत्वा पौर्वाह्णिकीः क्रियाः ।
अपश्यं तं द्विजश्रेष्ठं दृष्टवानस्मि यं पुरा ॥ २ ॥
सबेरा होनेपर पूर्वाह्नकालकी क्रिया पूरी करके मैंने पुनः उन्हीं श्रेष्ठ ब्राह्मणको अपने समक्ष पाया, जिनका दर्शन मुझे पहले भी हो चुका था ॥ २ ॥

तस्मै चाहं यथावृत्तं सर्वमेव न्यवेदयम् ।
भगवन्तं महादेवं समेतोऽस्मीति भारत ॥ ३ ॥
भरतकुलभूषण! उनसे मैंने अपना सारा वृत्तान्त यथावत् कह सुनाया और बताया कि 'मैं भगवान् महादेवजीसे मिल चुका हूँ' ॥ ३ ॥

स मामुवाच राजेन्द्र प्रीयमाणो द्विजोत्तमः ।
दृष्टस्त्वया महादेवो यथा नान्येन केनचित् ॥ ४ ॥
राजेन्द्र! तब वे विप्रवर बड़े प्रसन्न होकर मुझसे बोले—‘कुन्तीकुमार! जिस प्रकार तुमने महादेवजीका दर्शन किया है, वैसा दर्शन और किसीने नहीं किया है ॥ ४ ॥

समेत्य लोकपालैस्तु सर्वैर्वैवस्वतादिभिः ।
द्रष्टास्यनघ देवेन्द्रं स च तेऽस्त्राणि दास्यति ॥ ५ ॥
‘अनघ! अब तुम यम आदि लोकपालोंके साथ देवराज इन्द्रका दर्शन करोगे और वे भी तुम्हें अस्त्र प्रदान करेंगे' ॥ ५ ॥

एवमुक्त्वा स मां राजन्नाश्लिष्य च पुनः पुनः ।
अगच्छत् स यथाकामं ब्राह्मणः सूर्यसंनिभः ॥ ६ ॥
राजन्! ऐसा कहकर सूर्यके समान तेजस्वी ब्राह्मण देवताने मुझे बार-बार हृदयसे लगाया और फिर वे इच्छानुसार अपने अभीष्ट स्थानको चले गये ॥ ६ ॥

अथापराह्ले तस्याह्नः प्रावात् पुण्यः समीरणः ।
पुनर्नवमिमं लोकं कुर्वन्निव सपत्नहन् ॥ ७ ॥