भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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त्रिसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः

अर्जुनद्वारा हिरण्यपुरवासी पौलोम तथा कालकेयोंका वध और इन्द्रद्वारा अर्जुनका अभिनन्दन

अर्जुन उवाच

निवर्तमानेन मया महद् दृष्टं ततोऽपरम्।
पुरं कामचरं दिव्यं पावकार्कसमप्रभम् ॥ १ ॥
**अर्जुन बोले—**राजन्! तत्पश्चात् लौटते समय मार्गमें मैंने एक दूसरा दिव्य एवं विशाल नगर देखा, जो अग्नि और सूर्यके समान प्रकाशित हो रहा था। वह अपने निवासियोंकी इच्छाके अनुसार सर्वत्र आ-जा सकता था ॥ १ ॥

रत्नद्रुममयैश्चित्रैः सुस्वरैश्च पतत्त्रिभिः।
पौलोमैः कालकञ्जैश्च नित्यहृष्टै रधिष्ठितम् ॥ २ ॥
विचित्र रत्नमय वृक्ष और मधुर स्वरमें बोलनेवाले पक्षी उस नगरकी शोभा बढ़ाते थे। पौलोम और कालकञ्ज नामक दानव सदा प्रसन्नतापूर्वक वहाँ निवास करते थे ॥ २ ॥

गोपुराट्टालकोपेतं चतुर्द्वारं दुरासदम्।
सर्वरत्नमयं दिव्यमद्भुतोपमदर्शनम् ॥ ३ ॥
उस नगरमें ऊँचे-ऊँचे गोपुरोंसहित सुन्दर अट्टालिकायें सुशोभित थीं। उसमें चारों दिशाओंमें एक-एक करके चार फाटक लगे थे। शत्रुओंके लिये उस नगरमें प्रवेश पाना अत्यन्त कठिन था। सब प्रकारके रत्नोंसे निर्मित वह दिव्य नगर अद्भुत दिखायी देता था ॥ ३ ॥

द्रुमैः पुष्पफलोपेतैः सर्वरत्नमयैर्वृतम्।
तथा पतत्त्रिभिर्दिव्यैरुपेतं सुमनोहरैः ॥ ४ ॥
फल और फूलोंसे भरे हुए सर्वरत्नमय वृक्ष नगरको सब ओरसे घेरे हुए थे तथा वह नगर दिव्य एवं अत्यन्त मनोहर पक्षियोंसे युक्त था ॥ ४ ॥

असुरैर्नित्यमुदितैः शूलर्ष्टिमुसलायुधैः।
चापमुद्गरहस्तैश्च स्रग्विभिः सर्वतो वृतम् ॥ ५ ॥
सदा प्रसन्न रहनेवाले बहुत-से असुर गलेमें सुन्दर माला धारण किये और हाथोंमें शूल, ऋष्टि, मुसल, धनुष तथा मुद्गर आदि अस्त्र-शस्त्र लिये सब ओरसे घेरकर उस नगरकी रक्षा करते थे ॥ ५ ॥

तदहं प्रेक्ष्य दैत्यानां पुरमद्भुतदर्शनम्।
अपृच्छं मातलिं राजन् किमिदं वर्ततेऽद्भुतम् ॥ ६ ॥