भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1202, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 1202

वृक्षानुत्पाटयामास तरसा वै बभञ्ज च पृथिव्याश्च प्रदेशान् वै नादयंस्तु वनानि च ॥ १५ ॥ उनमें सैकड़ों मतवाले गजराजोंके समान बल था। वे एक साथ सौ-सौ मनुष्योंका वेग रोक सकते थे। उनका पराक्रम सिंह और शार्दूलके समान था महाबली भीम उस वनमें वृक्षोंको उखाड़ते और उन्हें वेगपूर्वक पुनः तोड़ डालते थे। वे अपनी गर्जनासे उस वन्य भूमिके प्रदेशों तथा समूचे वनको गुँजाते रहते थे ॥ १४-१५ ॥ पर्वताग्राणि वै मृद्नन् नादयानश्च विज्वरः प्रक्षिपन् पादपांश्चापि नादेनापूरयन् महीम् ॥ १६ ॥ वे पर्वतशिखरोंको रौंदते, वृक्षोंको तोड़कर इधर-उधर बिखेरते और निश्चिन्त होकर अपने सिंहनादसे भूमण्डलको प्रतिध्वनित किया करते थे ॥ १६ ॥ वेगेन न्यपतद् भीमो निर्भयश्च पुनः पुनः आस्फोटयन् क्ष्वेडयंश्च तलतालांश्च वादयन् ॥ १७ ॥ वे निर्भय होकर बार-बार वेगपूर्वक कूदते-फाँदते, ताल ठोंकते, सिंहनाद करते और तालियाँ बजाते थे ॥ १७ ॥ चिरसम्बद्धदर्पस्तु भीमसेनो वने तदा गजेन्द्राश्च महासत्त्वा मृगेन्द्राश्च महाबलाः ॥ १८ ॥ भीमसेनस्य नादेन व्यमुज्जन्त गुहा भयात् वनमें घूमते हुए भीमसेनका बलाभिमान दीर्घकालसे बहुत बढ़ा हुआ था। उस समय उनकी सिंह-गर्जनासे महान् बलशाली गजराज और मृगराज भी भयसे अपना स्थान छोड़कर भाग गये ॥ १८ १/२ ॥ क्वचित् प्रधावंस्तिष्ठंश्च क्वचिच्चोपविशंस्तथा ॥ १९ ॥ मृगप्रेप्सुर्महारौद्रे वने चरति निर्भयः स तत्र मनुजव्याघ्रो वने वनचरोपमः ॥ २० ॥ पद्भ्यामभिसमापेदे भीमसेनो महाबलः स प्रविष्टो महारण्ये नादान् नदति चाद्भुतान् ॥ २१ ॥ त्रासयन् सर्वभूतानि महासत्त्वपराक्रमः वे कहीं दौड़ते, कहीं खड़े होते और कहीं बैठते हुए शिकार पानेकी अभिलाषासे उस महाभयंकर वनमें निर्भय विचरते रहते थे। वे नरश्रेष्ठ महाबली भीम उस वनमें वनचर भीलोंकी भाँति पैदल ही चलते थे, उनका साहस और पराक्रम महान् था। वे गहन वनमें प्रवेश करके समस्त प्राणियोंको डराते हुए अद्भुत गर्जना करते थे ॥ १९—२१ १/२ ॥ ततो भीमस्य शब्देन भीताः सर्पा गुहाशयाः ॥ २२ ॥ अतिक्रान्तास्तु वेगेन जगामानुसृतः शनैः ततोऽमरवरप्रख्यो भीमसेनो महाबलः ॥ २३ ॥

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