भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1350, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 1350

जो श्रेष्ठ द्विज सदा अतिथियों, भूत-प्राणियों तथा पितरोंको अर्पण करके अर्थात् बलिवैश्वदेव करके शेष अन्न स्वयं भोजन करता है, उससे बढ़कर महान् सुख और क्या हो सकता है? देवेन्द्र! इस यज्ञशेष अन्नसे बढ़कर अत्यन्त मधुर और पवित्र दूसरा कोई भोजन नहीं है॥

दत्त्वा यस्त्वतिथिभ्यो वै भुङ्क्ते तेनैव नित्यशः ।
यावतो ह्यन्धसः पिण्डानश्नाति सततं द्विजः ॥ ३४ ॥
तावतां गोसहस्राणां फलं प्राप्नोति दायकः ।
यदेनो यौवनकृतं तत् सर्वं नश्यते ध्रुवम् ॥ ३५ ॥

जो प्रतिदिन अतिथियोंको देकर शेष अन्नसे ही भोजनका काम चलाता है, उसके अन्नके जितने ग्रास अतिथि ब्राह्मण नित्य भोजन करता है, उतने ही हजार गौओंके दानका पुण्य उस दाताको प्राप्त होता है, तथा उसके द्वारा युवावस्थामें जो पाप हुए होते हैं, वे सब निश्चय ही नष्ट हो जाते हैं ॥ ३४-३५ ॥

सदक्षिणस्य भुक्तस्य द्विजस्य तु करे गतम् ।
यद् वारि वारिणा सिञ्चेत् तद्ध्येनस्तरते क्षणात् ॥ ३६ ॥

ब्राह्मणके भोजन कर लेनेपर जो उसे दक्षिणा दी जाती है, उस समय उसके हाथमें जो प्रतिग्रहका जल रहता है, उसे दाता पुनः उत्सर्गके जलसे सींचे। ऐसा करनेसे वह तत्काल सब पापोंसे छूट जाता है ॥ ३६ ॥

एताश्चान्याश्च वै बह्वीः कथयित्वा कथाः शुभाः ।
बकेन सह देवेन्द्र आपृच्छ्य त्रिदिवं गतः ॥ ३७ ॥

इस प्रकार देवराज इन्द्र बकके साथ ये तथा और बहुत-सी उत्तम कथा-वार्ताएँ करके उनसे आज्ञा लेकर स्वर्गलोकको चले गये ॥ ३७ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि ब्राह्मणमहाभाग्ये बकशक्रसंवादे त्रिनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १९३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेय समास्यापर्वमें ब्राह्मणोंके माहात्म्यके सम्बन्धमें बक-इन्द्रसंवादविषयक एक सौ तिरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १९३ ॥

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