महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआपके माँगने योग्य न हो। जो वस्तु प्राप्त हो सकती है, उसे देनेकी प्रतिज्ञा कर लेनेपर मैं उसे देकर ही अधिक सुखी होता हूँ॥ ४॥
ददामि ते रोहिणीनां सहस्रं
प्रियो हि मे ब्राह्मणो याचमानः।
न मे मनः कुप्यति याचमाने
दत्तं न शोचामि कदाचिदर्थम्॥ ५॥
मैं आपको लाल रंगकी एक हजार गौएँ देता हूँ; क्योंकि न्याययुक्त याचना करनेवाला ब्राह्मण मुझे बहुत प्रिय है। मेरे मनमें याचकपर कभी क्रोध नहीं आता है और न मैं कभी दिये हुए धनके लिये पश्चात्ताप ही करता हूँ॥ ५॥
इत्युक्त्वा ब्राह्मणाय राजा गोसहस्रं ददौ।
प्राप्तवांश्च गवां सहस्रं ब्राह्मण इति॥ ६॥
ऐसा कहकर राजाने ब्राह्मणको एक हजार गौएँ दे दीं और ब्राह्मणने उन सहस्रों गौओंको ग्रहण कर लिया॥ ६॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि नाहुषचरिते
पञ्चनवत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १९५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें ययातिचरितविषयक एक सौ पञ्चानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १९५॥