भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1449, कुल 2580 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1449

⬅ विषय-सूची (TOC)

अष्टाधिकद्विशततमोऽध्यायः

धर्मव्याधद्वारा हिंसा और अहिंसाका विवेचन

मार्कण्डेय उवाच

स तु विप्रमथोवाच धर्मव्याधो युधिष्ठिर ।
यदहमाचरे कर्म घोरमेतदसंशयम् ॥ १ ॥
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! तदनन्तर धर्मव्याधने कौशिक ब्राह्मणसे कहा—'मैं जो यह मांस बेचनेका व्यवसाय कर रहा हूँ, वास्तवमें यह अत्यन्त घोर कर्म है, इसमें संशय नहीं है ॥ १ ॥

विधिस्तु बलवान् ब्रह्मन् दुस्तरं हि पुरा कृतम् ।
पुरा कृतस्य पापस्य कर्मदोषो भवत्ययम् ॥ २ ॥
दोषस्यैतस्य वै ब्रह्मन् विघाते यत्नवानहम् ।
'किंतु ब्रह्मन्! दैव बलवान् है। पूर्वजन्ममें किये हुए कर्मका ही नाम दैव है। उससे पार पाना बहुत कठिन है। यह जो कर्मदोषजनित व्याधके घर जन्म हुआ है, यह मेरे पूर्वजन्ममें किये हुए पापका ही फल है। ब्रह्मन्! मैं इस दोषके निवारणके लिये प्रयत्नशील हूँ ॥ २ १/२ ॥

विधिना हि हते पूर्वं निमित्तं घातको भवेत् ॥ ३ ॥
'क्योंकि विधाताके द्वारा पहलेसे ही जीवकी मृत्यु निश्चित की जाती है; किंतु घातक (कसाई अथवा व्याध) उसमें निमित्त बन जाता है अर्थात् जो स्वेच्छासे ज्ञानपूर्वक जीवहिंसा करता है, वह घातक व्यर्थ ही निमित्त बनकर दोषका भागी होता है ॥ ३ ॥

निमित्तभूता हि वयं कर्मणोऽस्य द्विजोत्तम ।
येषां हतानां मांसानि विक्रीणामीह वै द्विज ॥ ४ ॥
तेषामपि भवेद् धर्म उपयोगे न भक्षणे ।
देवतातिथिभृत्यानां पितॄणां चापि पूजनम् ॥ ५ ॥
'द्विजश्रेष्ठ! इस कार्यमें हम निमित्तमात्र हैं। ब्रह्मन्! मैं जिन मारे गये प्राणियोंका मांस बेचता हूँ, उनके जीते-जी यदि उनका सदुपयोग किया जाता तो बड़ा धर्म होता। मांस-भक्षणमें तो धर्मका नाम भी नहीं है (उलटे महान् अधर्म होता है)। देवता, अतिथि, भरणीय कुटुम्बीजन और पितरोंका पूजन (आदर-सत्कार) अवश्य धर्म है ॥ ४-५ ॥

ओषध्यो वीरुधश्चैव पशवो मृगपक्षिणः ।
अनादिभूता भूतानामित्यपि श्रूयते श्रुतिः ॥ ६ ॥
ओषधियाँ, अन्न, तृण, लता, पशु, मृग और पक्षी आदि सभी वस्तुएँ सम्पूर्ण प्राणियोंके अनादि-कालसे उपयोगमें आती रहती हैं—ऐसी श्रुति भी सुनी जाती है ॥ ६ ॥