भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1555, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 1555

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अष्टाविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

स्कन्दके पार्षदोंका वर्णन

मार्कण्डेय उवाच

स्कन्दपारिषदान् घोराञ्शृणुष्वाद्भुतदर्शनान् ।
वज्रप्रहारात् स्कन्दस्य जज्ञुस्तत्र कुमारकाः ॥ १ ॥
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**राजन्! अब तुम स्कन्दके भयंकर पार्षदोंका वर्णन सुनो, जो देखनेमें बड़े अद्भुत हैं। वज्रका प्रहार होनेपर स्कन्दके शरीरसे वहाँ बहुत-से कुमार ग्रह उत्पन्न हुए ॥ १ ॥

ये हरन्ति शिशूञ्जातान् गर्भस्थांश्चैव दारुणाः ।
वज्रप्रहारात् कन्याश्च जज्ञिरेऽस्य महाबलाः ॥ २ ॥
वे क्रूर स्वभाववाले कुमारग्रह नवजात तथा गर्भस्थ शिशुओंको भी हर ले जाते हैं। इन्द्रके वज्र—प्रहारसे स्कन्दके शरीरसे वहाँ अत्यन्त बलशालिनी कन्याएँ भी उत्पन्न हुई थीं ॥ २ ॥

कुमारास्ते विशाखं च पितृत्वे समकल्पयन् ।
स भूत्वा भगवान् संख्ये रक्षंश्छागमुखस्तदा ॥ ३ ॥
वृतः कन्यागणैः सर्वैरात्मीयैः सह पुत्रकैः ।
मातॄणां प्रेक्षमाणानां भद्रशाखश्च कौसलः ॥ ४ ॥
पूर्वोक्त कुमार-ग्रहोंने विशाख (स्कन्द)-को अपना पिता माना। भगवान् स्कन्द बकरेके समान मुख धारण करके समस्त कन्यागणों और अपने पुत्रोंसे घिरकर मातृकाओंके देखते-देखते युद्धमें अपने पक्षकी रक्षा करते हैं। वे ही ‘भद्रशाख’ तथा ‘कौसल’ नामसे प्रसिद्ध हुए हैं ॥

ततः कुमारपितरं स्कन्दमाहुर्जना भुवि ।
रुद्रमग्निमुमां स्वाहां प्रदेशेषु महाबलाम् ॥ ५ ॥
यजन्ति पुत्रकामाश्च पुत्रिणश्च सदा जनाः ।
इसीलिये भूतलके मनुष्य स्कन्दको कुमार-ग्रहोंका पिता कहते हैं। भिन्न-भिन्न स्थानोंमें पुत्रवान् तथा पुत्रकी इच्छा रखनेवाले मनुष्य अग्निस্বরূপ रुद्र और स्वाहास्वरूपा महाबलवती उमाकी सदा आराधना करते हैं ॥ ५ ½ ॥

यास्तास्त्वजनयत् कन्यास्तपो नाम हुताशनः ॥ ६ ॥
किं करोमीति ताः स्कन्दं सम्प्राप्ताः समभाषयन् ।
तप नामक अग्निने जिन कन्याओंको जन्म दिया, वे सब स्कन्दके पास आयीं और पूछने लगीं—‘हम क्या करें?’ ॥ ६ ½ ॥

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