भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2416

तुमने बहुत बार शंख-ध्वनि सुनी होगी। रण-भेरियोंके भयंकर शब्द भी बहुत बार तुम्हारे कानोंमें पड़े होंगे और व्यूहबद्ध सेनाओंमें खड़े हुए चिग्घाड़नेवाले गजराजोंके शब्द भी तुमने सुने ही होंगे ।। १२ ।।

स त्वं कथमिहानेन शङ्खशब्देन भीषितः ।
विवर्णरूपो वित्रस्तः पुरुषः प्राकृतो यथा ।। १३ ।।
फिर यहाँ इस शंखनादसे तुम भयभीत कैसे हो गये? साधारण मनुष्योंके समान अधिक डर जानेके कारण तुम्हारे शरीरका रंग फीका कैसे पड़ गया? ।। १३ ।।

उत्तर उवाच

श्रुता मे शङ्खशब्दाश्च भेरीशब्दाश्च पुष्कलाः ।
कुञ्जराणां निनदतां व्यूढानीकेषु तिष्ठताम् ।। १४ ।।
**उत्तरने कहा—**वीरवर! इसमें संदेह नहीं कि मैंने बहुत बार शंखध्वनि सुनी है। रणभेरियोंके भयंकर शब्द भी बहुत बार मेरे कानोंमें पड़े हैं और व्यूहबद्ध सेनाओंमें खड़े हुए चिग्घाड़नेवाले गजराजोंके शब्द भी मैंने सुने हैं ।। १४ ।।

नैवंविधः शङ्खशब्दः पुरा जातु मया श्रुतः ।
ध्वजस्य चापि रूपं मे दृष्टपूर्वं न हीदृशम् ।। १५ ।।
परंतु आजके पहले कभी ऐसा भयंकर शंखनाद मेरे सुननेमें नहीं आया था और ध्वजका भी ऐसा रूप मैंने कभी नहीं देखा था ।। १५ ।।

धनुषश्चैव निर्घोषः श्रुतपूर्वो न मे क्वचित् ।
अस्य शङ्खस्य शब्देन धनुषो निःस्वनेन च ।। १६ ।।
अमानुषाणां शब्देन भूतानां ध्वजवासिनाम् ।
रथस्य च निनादेन मनो मुह्यति मे भृशम् ।। १७ ।।
धनुषकी ऐसी टंकार भी पहले कभी मैंने नहीं सुनी थी। इस शंखके भयानक शब्दसे, धनुषकी अनुपम टंकारसे, ध्वजामें निवास करनेवाले मानवेतर प्राणियोंके घोर शब्दसे तथा रथकी भारी घर्घराहटसे भी डरकर मेरा हृदय बहुत व्याकुल हो उठा है ।। १६-१७ ।।

व्याकुलाश्च दिशः सर्वा हृदयं व्यथतीव मे ।
ध्वजेन पिहिताः सर्वा दिशो न प्रतिभान्ति मे ।। १८ ।।
सम्पूर्ण दिशाओंमें घबराहट छा गयी है तथा मेरे हृदयमें बड़ी व्यथा हो रही है, इस ध्वजने तो समस्त दिशाओंको ढँक लिया है। अतः मुझे किसी दिशाकी प्रतीति नहीं हो रही है ।। १८ ।।

गाण्डीवस्य च शब्देन कर्णौ मे बधिरीकृतौ ।
स मुहूर्तं प्रयातं तु पार्थो वैराटिमब्रवीत् ।। १९ ।।
गाण्डीव धनुषकी टंकारसे तो मेरे दोनों कान बहरे हो गये हैं।