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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,580 pages

अध्याय (पृष्ठ 893)

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⬅ विषय-सूची (TOC)

राजा शिबिका कबूतरकी रक्षाके लिये बाजको अपने शरीरका मांस काटकर देना

राजोवाच

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अनुग्रहमिमं मन्ये श्येन यन्माभियाचसे ।
तस्मात् तेऽद्य प्रदास्यामि स्वमांसं तुलया धृतम् ॥ २५ ॥
राजाने कहा— बाज! तुम जो मेरा मांस माँग रहे हो इसे मैं अपने ऊपर तुम्हारी बहुत बड़ी कृपा मानता हूँ, अतः मैं अभी अपना मांस तराजूपर रखकर तुम्हें दिये देता हूँ ॥ २५ ॥

लोमश उवाच

उत्कृत्य स स्वयं मांसं राजा परमधर्मवित् ।
तोलयामास कौन्तेय कपोतेन समं विभो ॥ २६ ॥
लोमशजी कहते हैं— कुन्तीनन्दन! तत्पश्चात् परम धर्मज्ञ राजा उशीनरने स्वयं अपना मांस काटकर उस कबूतरके साथ तौलना आरम्भ किया ॥ २६ ॥

ध्रियमाणः कपोतस्तु मांसेनात्यतिरिच्यते ।
पुनश्चोत्कृत्य मांसानि राजा प्रादादुशीनरः ॥ २७ ॥
न विद्यते यदा मांसं कपोतेन समं धृतम् ।
तत उत्कृत्तमांसोऽसावारुरोह स्वयं तुलाम् ॥ २८ ॥
किंतु दूसरे पलड़ेमें रखा हुआ कबूतर उस मांसकी अपेक्षा अधिक भारी निकला, तब महाराज उशीनरने पुनः अपना मांस काटकर चढ़ाया। इस प्रकार बार-बार करनेपर भी जब

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वह मांस कबूतरके बराबर न हुआ, तब सारा मांस काट लेनेके पश्चात् वे स्वयं ही तराजूपर चढ़ गये ।। २७-२८ ।।

श्येन उवाच

इन्द्रोऽहमस्मि धर्मज्ञ कपोतो हव्यवाडयम् ।
जिज्ञासमानौ धर्मं त्वां यज्ञवाटमुपागतौ ।। २९ ।।
बाज बोला—धर्मज्ञ नरेश! मैं इन्द्र हूँ और यह कबूतर साक्षात् अग्निदेव हैं। हम दोनों आपके धर्मकी परीक्षा लेनेके लिये इस यज्ञशालामें आपके निकट आये थे ।।
यत् ते मांसानि गात्रेभ्य उत्कृत्तानि विशाम्पते ।
एषा ते भास्वती कीर्तिर्लोकानभिभविष्यति ।। ३० ।।
प्रजानाथ! आपने अपने अंगोंसे जो मांस काटकर चढ़ाये हैं, उससे फैली हुई आपकी प्रकाशमान कीर्ति सम्पूर्ण लोगोंसे बढ़कर होगी ।। ३० ।।
यावल्लोके मनुष्यास्त्वां कथयिष्यन्ति पार्थिव ।
तावत् कीर्तिश्च लोकाश्च स्थास्यन्ति तव शाश्वताः ।। ३१ ।।
राजन्! संसारके मनुष्य इस जगत्में जबतक आपकी चर्चा करेंगे, तबतक आपकी कीर्ति और सनातन लोक स्थिर रहेंगे ।। ३१ ।।
इत्येवमुक्त्वा राजानमारुरोह दिवं पुनः ।
उशीनरोऽपि धर्मात्मा धर्मेणावृत्य रोदसी ।। ३२ ।।
विभ्राजमानो वपुषाप्यारुरोह त्रिविष्टपम् ।
तदेतत् सदनं राजन् राजंस्तस्य महात्मनः ।। ३३ ।।
पश्यस्वैतन्मया सार्धं पुण्यं पापप्रमोचनम् ।
तत्र वै सततं देवा मुनयश्च सनातनाः ।
दृश्यन्ते ब्राह्मणै राजन् पुण्यवद्भिर्महात्मभिः ।। ३४ ।।
राजासे ऐसा कहकर इन्द्र फिर देवलोकमें चले गये तथा धर्मात्मा राजा उशीनर भी अपने धर्मसे पृथ्वी और आकाशको व्याप्त कर देदीप्यमान शरीर धारण करके स्वर्गलोकमें चले गये। राजन्! यही उन महात्मा राजा उशीनरका आश्रम है जो पुण्यजनक होनेके साथ ही समस्त पापोंसे छुटकारा दिलानेवाला है। तुम मेरे साथ इस पवित्र आश्रमका दर्शन करो। महाराज! वहाँ पुण्यात्मा महात्मा ब्राह्मणोंको सदा सनातन देवता तथा मुनियोंका दर्शन होता रहता है ।। ३२-३४ ।।

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां श्येनकपोतीये एकत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १३१ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें श्येनकपोतीयोपाख्यानविषयक एक सौ इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १३१ ।।

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१३२-

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⬅ विषय-सूची (TOC)

द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः

अष्टावक्रके जन्मका वृत्तान्त और उनका राजा जनकके दरबारमें जाना

लोमश उवाच

यः कथ्यते मन्त्रविद्ग्धबुद्धि-
रौद्दालकिः श्वेतकेतुः पृथिव्याम् ।
तस्याश्रमं पश्य नरेन्द्र पुण्यं
सदाफलैरुपपन्नं महीजैः ॥ १ ॥

**लोमशजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! उद्दालकके पुत्र श्वेतकेतु हो गये हैं, जो इस भूतलपर मन्त्र-शास्त्रमें अत्यन्त निपुण कहे जाते थे, देखो यह पवित्र आश्रम उन्हींका है। जो सदा फल देनेवाले वृक्षोंसे हरा-भरा दिखायी देता है ॥ १ ॥

साक्षादत्र श्वेतकेतुर्ददर्श
सरस्वतीं मानुषदेहरूपाम् ।
वेत्स्यामि वाणीमिति सम्प्रवृत्तां
सरस्वतीं श्वेतकेतुर्बभाषे ॥ २ ॥

इस आश्रममें श्वेतकेतुने मानवरूपधारिणी सरस्वती देवीका प्रत्यक्ष दर्शन किया था और अपने निकट आयी हुई उन सरस्वतीसे यह कहा था कि ‘मैं वाणीस्वरूपा आपके तत्त्वको यथार्थरूपसे जानना चाहता हूँ’ ॥ २ ॥

तस्मिन् युगे ब्रह्मकृतां वरिष्ठा-
वास्तां मुनी मातुलभागिनेयौ ।
अष्टावक्रश्चैव कहोडसूनु-
रौद्दालकिः श्वेतकेतुः पृथिव्याम् ॥ ३ ॥

उस युगमें कहोड मुनिके पुत्र अष्टावक्र और उद्दालकनन्दन श्वेतकेतु ये दोनों महर्षि समस्त भूमण्डलके वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ थे। वे आपसमें मामा और भानजा लगते थे (इनमें श्वेतकेतु ही मामा था) ॥ ३ ॥

विदेहराजस्य महीपतेस्तौ
विप्रावुभौ मातुलभागिनेयौ ।
प्रविश्य यज्ञायतनं विवादे
बन्दिं निजग्राहतुरप्रमेयौ ॥ ४ ॥

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एक समय वे दोनों मामा-भानजे विदेहराजके यज्ञमण्डपमें गये। दोनों ही ब्राह्मण अनुपम विद्वान् थे। वहाँ शास्त्रार्थ होनेपर उन दोनोंने अपने (विपक्षी) बन्दीको जीत लिया ।। ४ ।।

उपास्स्व कौन्तेय सहानुजस्त्वं तस्याश्रमं पुण्यतमं प्रविश्य । अष्टावक्रं यस्य दौहित्रमाहु- र्योऽसौ बन्दिं जनकस्याथ यज्ञे ।। ५ ।। वादी विप्राग्रयो बाल एवाभिगम्य वादे भङ्क्त्वा मज्जयामास नद्याम् ।। ६ ।।

कुन्तीनन्दन! विप्रशिरोमणि अष्टावक्र वाद-विवादमें बड़े निपुण थे। उन्होंने बाल्यावस्थामें ही महाराज जनकके यज्ञमण्डपमें पधारकर अपने प्रतिवादी बन्दीको पराजित करके नदीमें डलवा दिया था। वे अष्टावक्र मुनि जिन महात्मा उद्दालकके दौहित्र (नाती) बताये जाते हैं, उन्हींका यह परम पवित्र आश्रम है। तुम अपने भाइयोंसहित इसमें प्रवेश करके कुछ देरतक उपासना (भगवच्चिन्तन) करो ।। ५-६ ।।

युधिष्ठिर उवाच

कथंप्रभावः स बभूव विप्र- स्तथाभूतं यो निजग्राह बन्दिम् । अष्टावक्रः केन चासौ बभूव तत् सर्वं मे लोमश शंस तत्त्वम् ।। ७ ।।

**युधिष्ठिरने पूछा—**लोमशजी! उन ब्रह्मर्षिका कैसा प्रभाव था, जिन्होंने बन्दी-जैसे सुप्रसिद्ध विद्वान्‌को भी जीत लिया। वे किस कारणसे अष्टावक्र (आठों अङ्गोंसे टेढ़े-मेढ़े) हो गये। ये सब बातें मुझे यथार्थरूपसे बताइये ।। ७ ।।

लोमश उवाच

उद्दालकस्य नियतः शिष्य एको नाम्ना कहोड इति विश्रुतोऽभूत् । शुश्रूषुराचार्यवशानुवर्ती दीर्घं कालं सोऽध्ययनं चकार ।। ८ ।।

**लोमशजीने कहा—**राजन्! महर्षि उद्दालकका कहोड नामसे विख्यात एक शिष्य था जो बड़े संयम-नियमसे रहकर आचार्यकी सेवा किया करता था। उसने गुरुकी आज्ञाके अंदर रहकर दीर्घकालतक अध्ययन किया ।। ८ ।।

तं वै विप्रः पर्यचरत् सशिष्य-

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स्तां च ज्ञात्वा परिचर्यां गुरुः सः ।
तस्मै प्रादात् सद्य एव श्रुतं च
भार्यां च वै दुहितरं स्वां सुजाताम् ॥ ९ ॥
विप्रवर 'कहोड' एक विनीत शिष्यकी भाँति उद्दालक मुनिकी परिचर्यामें संलग्न रहते थे। गुरुने शिष्यकी उस सेवाके महत्त्वको समझकर शीघ्र ही उन्हें सम्पूर्ण वेद-शास्त्रोंका ज्ञान करा दिया और अपनी पुत्री सुजाताको भी उन्हें पत्नीरूपसे समर्पित कर दिया ॥ ९ ॥

तस्या गर्भः सम्भवदग्निकल्पः
सोऽधीयानं पितरं चाप्युवाच ।
सर्वां रात्रिमध्ययनं करोषि
नेदं पितः सम्यगिवोपवर्तते ॥ १० ॥*
कुछ कालके बाद सुजाता गर्भवती हुई, उसका वह गर्भ अग्निके समान तेजस्वी था। एक दिन स्वाध्यायमें लगे हुए अपने पिता कहोड मुनिसे उस गर्भस्थ बालकने कहा, 'पिताजी! आप रातभर वेदपाठ करते हैं तो भी आपका वह अध्ययन अच्छी प्रकारसे शुद्ध उच्चारणपूर्वक नहीं हो पाता' ॥ १० ॥

उपालब्धः शिष्यमध्ये महर्षिः
स तं कोपादुदरस्थं शशाप ।
यस्मात् कुक्षौ वर्तमानो ब्रवीषि
तस्माद् वक्रो भवितास्यष्टकृत्वः ॥ ११ ॥
शिष्योंके बीचमें बैठे हुए महर्षि कहोड इस प्रकार उलाहना सुनकर अपमानका अनुभव करते हुए कुपित हो उठे और उस गर्भस्थ बालकको शाप देते हुए बोले, 'अरे! तू अभी पेटमें रहकर ऐसी टेढ़ी बातें बोलता है, अतः तू आठों अंगोंसे टेढ़ा हो जायगा' ॥ ११ ॥

स वै तथा वक्र एवाभ्यजाय-
दष्टावक्रः प्रथितो वै महर्षिः ।
अस्यासीद् वै मातुलः श्वेतकेतुः
स तेन तुल्यो वयसा बभूव ॥ १२ ॥
उस शापके अनुसार वे महर्षि आठों अंगोंसे टेढ़े होकर पैदा हुए। इसलिये अष्टावक्र नामसे उनकी प्रसिद्धि हुई। श्वेतकेतु उनके मामा थे, परंतु अवस्थामें उन्हींके बराबर थे ॥ १२ ॥

सम्पीड्यमाना तु तदा सुजाता
सा वर्धमानेन सुतेन कुक्षौ ।
उवाच भर्तारमिदं रहोगता

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प्रसाद्य हीनं वसुना धनार्थिनी ॥ १३ ॥
जब पेटमें गर्भ बढ़ रहा था, उस समय सुजाताने उससे पीड़ित होकर एकान्तमें अपने निर्धन पतिसे धनकी इच्छा रखकर कहा— ॥ १३ ॥

कथं करिष्याम्यधुना महर्षे
मासश्चायं दशमो वर्तते मे ।
नैवास्ति ते वसु किंचित् प्रजाता
येनाहमेतामापदं निस्तरेयम् ॥ १४ ॥

‘महर्षे! यह मेरे गर्भका दसवाँ महीना चल रहा है। मैं धनहीन नारी खर्चकी कैसे व्यवस्था करूँगी। आपके पास थोड़ा-सा भी धन नहीं है जिससे मैं प्रसवकालके इस संकटसे पार हो सकूँ’ ॥ १४ ॥

उक्तस्त्वेवं भार्यया वै कहोडो
वित्तस्यार्थे जनकमथाभ्यगच्छत् ।
स वै तदा वादविदा निगृह्य
निमज्जितो बन्दिनेहाप्सु विप्रः ॥ १५ ॥

पत्नीके ऐसा कहनेपर कहोड मुनि धनके लिये राजा जनकके दरबारमें गये। उस समय शास्त्रार्थी पण्डित बन्दीने उन ब्रह्मर्षिको विवादमें हराकर जलमें डुबो दिया ॥ १५ ॥

उद्दालकस्तं तु तदा निशम्य
सूतेन वादेऽप्सु निमज्जितं तथा ।
उवाच तां तत्र ततः सुजाता-
मष्टावक्रे गूहितव्योऽयमर्थः ॥ १६ ॥

जब उद्दालकको यह समाचार मिला कि ‘कहोड मुनि शास्त्रार्थमें पराजित होनेपर सूत (बन्दी)-के द्वारा जलमें डुबो दिये गये।’ तब उन्होंने सुजातासे सब कुछ बता दिया और कहा, ‘बेटी! अपने बच्चेसे इस वृत्तान्तको सदा ही गुप्त रखना’ ॥ १६ ॥

ररक्ष सा चापि तमस्य मन्त्रं
जातोऽप्यसौ नैव शुश्राव विप्रः ।
उद्दालकं पितृवच्चापि मेने
तथाष्टावक्रो भ्रातृवच्छ्वेतकेतुम् ॥ १७ ॥

सुजाताने भी अपने पुत्रसे उस गोपनीय समाचारको गुप्त ही रखा। इसीसे जन्म लेनेके बाद भी उस ब्राह्मण-बालकको इसके विषयमें कुछ भी पता न लगा। अष्टावक्र अपने नाना उद्दालकको ही पिताके समान मानते थे और श्वेतकेतुको अपने भाईके समान समझते थे ॥ १७ ॥

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ततो वर्षे द्वादशे श्वेतकेतु- रष्टावक्रं पितुरङ्के निषण्णम् । अपाकर्षद् गृह्य पाणौ रुदन्तं नायं तवाङ्कः पितुरित्युक्तवांश्च ॥ १८ ॥ तदनन्तर एक दिन, जब अष्टावक्रकी आयु बारह वर्षकी थी और वे पितृतुल्य उद्दालक मुनिकी गोदमें बैठे हुए थे, उसी समय श्वेतकेतु वहाँ आये और रोते हुए अष्टावक्रका हाथ पकड़कर उन्हें दूर खींच ले गये। इस प्रकार अष्टावक्रको दूर हटाकर श्वेतकेतुने कहा—'यह तेरे बापकी गोदी नहीं है' ॥ १८ ॥

यत् तेनोक्तं दुरुक्तं तत् तदानीं हृदि स्थितं तस्य सुदुःखमासीत् । गृहं गत्वा मातरं सोऽभिगम्य पप्रच्छेदं क्व नु तातो ममेति ॥ १९ ॥ श्वेतकेतुकी उस कटूक्तिने उस समय अष्टावक्रके हृदयमें गहरी चोट पहुँचायी। इससे उन्हें बड़ा दुःख हुआ। उन्होंने घरमें माताके पास जाकर पूछा—'माँ! मेरे पिताजी कहाँ हैं?' ॥ १९ ॥

ततः सुजाता परमार्तरूपा शापाद् भीता सर्वमेवाचचक्षे । तद् वै तत्त्वं सर्वमाज्ञाय रात्रा- वित्यब्रवीच्छ्वेतकेतुं स विप्रः ॥ २० ॥ गच्छाव यज्ञं जनकस्य राज्ञो बह्वाश्चर्यः श्रूयते तस्य यज्ञः । श्रोष्यावोऽत्र ब्राह्मणानां विवाद- मर्थं चाग्र्यं तत्र भोक्ष्यावहे च ॥ २१ ॥ बालकके इस प्रश्नसे सुजाताके मनमें बड़ी व्यथा हुई, उसने शापके भयसे घबराकर सब बात बता दी। यह सब रहस्य जानकर उन्होंने रातमें श्वेतकेतुसे इस प्रकार कहा—'हम दोनों राजा जनकके यज्ञमें चलें। सुना जाता है, उस यज्ञमें बड़े आश्चर्यकी बातें देखनेमें आती हैं। हम दोनों वहाँ विद्वान् ब्राह्मणोंका शास्त्रार्थ सुनेंगे और वहीं उत्तम पदार्थ भोजन करेंगे ॥ २०-२१ ॥

विचक्षणत्वं च भविष्यते नौ शिवश्च सौम्यश्च हि ब्रह्मघोषः ॥ २२ ॥ 'वहाँ जानेसे हमलोगोंकी प्रवचनशक्ति एवं जानकारी बढ़ेगी और हमें सुमधुर स्वरमें वेद-मन्त्रोंका कल्याणकारी घोष सुननेका अवसर

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मिलेगा' ।। २२ ।। तौ जग्मतुर्मातुलभागिनेयौ यज्ञं समृद्धं जनकस्य राज्ञः । अष्टावक्रः पथि राज्ञा समेत्य प्रोत्सार्यमाणो वाक्यमिदं जगाद ।। २३ ।।

ऐसा निश्चय करके वे दोनों मामा-भानजे राजा जनकके समृद्धिशाली यज्ञमें गये। अष्टावक्रकी यज्ञ-मण्डपके मार्गमें ही राजासे भेंट हो गयी। उस समय राजसेवक उन्हें रास्तेसे दूर हटाने लगे, तब वे इस प्रकार बोले ।। २३ ।।

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायामष्टावक्रीये द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १३२ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें अष्टावक्रीयोपाख्यानविषयक एक सौ बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १३२ ।।


* किसी-किसी पुस्तकमें यहाँ एक श्लोक अधिक मिलता है, जो इस प्रकार है— वेदान् साङ्गान् सर्वशास्त्रैरुपेतानधीतवानस्मि तव प्रसादात् । इहैव गर्भे तेन पितर्ब्रवीमि नेदं त्वत्तः सम्यगिवोपवर्तते ।।

१३३-

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⬅ विषय-सूची (TOC)

त्रयस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः

अष्टावक्रका द्वारपाल तथा राजा जनकसे वार्तालाप

अष्टावक्र उवाच

अन्धस्य पन्था बधिरस्य पन्थाः
स्त्रियः पन्था भारवाहस्य पन्थाः ।
राज्ञः पन्था ब्राह्मणेनासमेत्य
समेत्य तु ब्राह्मणस्यैव पन्थाः ॥ १ ॥

**अष्टावक्र बोले—**राजन्! जबतक ब्राह्मणसे सामना न हो तबतक अंधेका मार्ग, बहिरेका मार्ग, स्त्रीका मार्ग, बोझ ढोनेवालेका मार्ग तथा राजाका मार्ग उस-उसके जानेके लिये छोड़ देना चाहिये; परंतु यदि ब्राह्मण सामने मिल जाय तो सबसे पहले उसीको मार्ग देना चाहिये ॥ १ ॥

राजोवाच

पन्था अयं तेऽद्य मयातिदिष्टो
येनेच्छसि तेन कामं व्रजस्व ।
न पावको विद्यते वै लघीया-
निन्द्रोऽपि नित्यं नमते ब्राह्मणानाम् ॥ २ ॥

**राजाने कहा—**ब्राह्मणकुमार! लो मैंने तुम्हारे लिये आज यह मार्ग दे दिया है। तुम जिससे जाना चाहो उसी मार्गसे इच्छानुसार चले जाओ। आग कभी छोटी नहीं होती। देवराज इन्द्र भी सदा ब्राह्मणोंके आगे मस्तक झुकाते हैं ॥ २ ॥

अष्टावक्र उवाच

प्राप्तौ स्व यज्ञं नृप संदिदृक्षू
कौतूहलं नौ बलवन्नरेन्द्र ।
प्राप्ताविहावामतिथी प्रवेशं
काङ्क्षावहे द्वारपतेस्तवाज्ञाम् ॥ ३ ॥

**अष्टावक्र बोले—**राजन्! हम दोनों आपका यज्ञ देखनेके लिये आये हैं। नरेन्द्र! इसके लिये हम दोनोंके हृदयमें प्रबल उत्कण्ठा है। हम दोनों यहाँ अतिथिके रूपमें उपस्थित हैं और इस यज्ञमें प्रवेश करनेके लिये हम तुम्हारे द्वारपालकी आज्ञा चाहते हैं ॥ ३ ॥

ऐन्द्रद्युम्ने यज्ञदृशाविहावां
विवक्षू वै जनकेन्द्रं दिदृक्षू ।
तौ वै क्रोधव्याधिना दह्यमाना-

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वयं च नौ द्वारपालो रुणद्धि ॥ ४ ॥
इन्द्रद्युम्नकुमार जनक! हम दोनों यहाँ यज्ञ देखनेके लिये आये हैं और आप जनकराजसे मिलना तथा बात करना चाहते हैं, परंतु यह द्वारपाल हमें रोकता है; अतः हम क्रोधरूप व्याधिसे दग्ध हो रहे हैं ॥ ४ ॥

द्वारपाल उवाच

बन्देः समादेशकरा वयं स्म
निबोध वाक्यं च मयेर्यमाणम् ।
न वै बालाः प्रविशन्त्यत्र विप्रा
वृद्धा विदग्धाः प्रविशन्त्यत्र विप्राः ॥ ५ ॥
**द्वारपाल बोला—**ब्राह्मणकुमार! सुनो, हम बंदीके आज्ञापालक हैं। आप हमारी कही हुई बात सुनिये। इस यज्ञशालामें बालक ब्राह्मण नहीं प्रवेश करने पाते हैं। जो बूढ़े और बुद्धिमान् ब्राह्मण हैं, उन्हींका यहाँ प्रवेश होता है ॥

अष्टावक्र उवाच

यद्यत्र वृद्धेषु कृतः प्रवेशो
युक्तं प्रवेष्टुं मम द्वारपाल ।
वयं हि वृद्धाश्चरितव्रताश्च
वेदप्रभावेण समन्विताश्च ॥ ६ ॥
**अष्टावक्र बोले—**द्वारपाल! यदि यहाँ वृद्ध ब्राह्मणोंके लिये प्रवेशका द्वार खुला है, तब तो हमारा प्रवेश होना भी उचित ही है; क्योंकि हमलोग वृद्ध ही हैं, हमने ब्रह्मचर्यव्रतका पालन किया है तथा हम वेदके प्रभावसे भी सम्पन्न हैं ॥ ६ ॥

शुश्रूषवश्चापि जितेन्द्रियाश्च
ज्ञानागमे चापि गताः स्म निष्ठाम् ।
न बाल इत्यवमन्तव्यमाहु-
र्बालोऽप्यग्निर्दहति स्पृश्यमानः ॥ ७ ॥
साथ ही, हम गुरुजनोंके सेवक, जितेन्द्रिय तथा ज्ञानशास्त्रमें परिनिष्ठित भी हैं। अवस्थामें बालक होनेके कारण ही किसी ब्राह्मणको अपमानित करना उचित नहीं बताया गया है; क्योंकि आगकी छोटी-सी चिनगारी भी यदि छू जाय तो वह जला डालती है ॥ ७ ॥

द्वारपाल उवाच

सरस्वतीमीरय वेदजुष्टा-
मेकाक्षरां बहुरूपां विराजम् ।

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अज्ञात्मानं समवेक्षस्व बालं किं श्लाघसे दुर्लभो वै मनीषी ॥ ८ ॥ **द्वारपालने कहा—**ब्राह्मणकुमार! तुम वेद-प्रतिपादित, एकाक्षरब्रह्मका बोध करानेवाली, अनेक रूपवाली, सुन्दर वाणीका उच्चारण करो और अपने-आपको बालक ही समझो, स्वयं ही अपनी प्रशंसा क्यों करते हो? इस जगत्में ज्ञानी दुर्लभ हैं ॥ ८ ॥

अष्टावक्र उवाच

न ज्ञायते कायवृद्ध्या विवृद्धि- र्यथाष्ठीला शाल्मलेः सम्प्रवृद्धा । ह्रस्वोऽल्पकायः फलितो विवृद्धो यश्चाफलस्तस्य न वृद्धभावः ॥ ९ ॥ **अष्टावक्र बोले—**द्वारपाल! केवल शरीर बढ़ जानेसे किसीकी बढ़ती नहीं समझी जाती है। जैसे सेमलके फलकी गाँठ बढ़नेपर भी सारहीन होनेके कारण वह व्यर्थ ही है। छोटा और दुबला-पतला वृक्ष भी यदि फलोंके भारसे लदा है तो उसे ही वृद्ध (बड़ा) जानना चाहिये। जिसमें फल नहीं लगते, उस वृक्षका बढ़ना भी नहीं के बराबर है ॥ ९ ॥

द्वारपाल उवाच

वृद्धेभ्य एवेह मतिं स्म बाला गृह्णन्ति कालेन भवन्ति वृद्धाः । न हि ज्ञानमल्पकालेन शक्यं कस्माद् बालः स्थविर इव प्रभाषसे ॥ १० ॥ **द्वारपालने कहा—**बालक बड़े-बूढ़ोंसे ही ज्ञान प्राप्त करते हैं और समयानुसार वे भी वृद्ध होते हैं। थोड़े समयमें ज्ञानकी प्राप्ति असम्भव है, अतः तुम बालक होकर भी क्यों वृद्धकी-सी बातें करते हो? ॥ १० ॥

अष्टावक्र उवाच

न तेन स्थविरो भवति येनास्य पलितं शिरः । बालोऽपि यः प्रजानाति तं देवाः स्थविरं विदुः ॥ ११ ॥ **अष्टावक्र बोले—**अमुक व्यक्तिके सिरके बाल पक गये हैं, इतने ही मात्रसे वह बूढ़ा नहीं होता है, अवस्थामें बालक होनेपर भी जो ज्ञानमें बढ़ा-चढ़ा है, उसीको देवगण वृद्ध मानते हैं ॥ ११ ॥

न हायनैर्न पलितैर्न वित्तेन न बन्धुभिः । ऋषयश्चक्रिरे धर्मं योऽनूचानः स नो महान् ॥ १२ ॥

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अधिक वर्षोंकी अवस्था होनेसे, बाल पकनेसे, धन बढ़ जानेसे और अधिक भाई-बन्धु हो जानेसे भी कोई बड़ा हो नहीं सकता; ऋषियोंने ऐसा नियम बनाया है कि हम ब्राह्मणोंमें जो अंगोंसहित सम्पूर्ण वेदोंका स्वाध्याय करनेवाला तथा वक्ता है, वही बड़ा है ॥ १२ ॥

दिदृक्षुरस्मि सम्प्राप्तो बन्दिनं राजसंसदि ।
निवेदयस्व मां द्वाःस्थ राज्ञे पुष्करमालिने ॥ १३ ॥
द्वारपाल! मैं राजसभामें बन्दीसे मिलनेके लिये आया हूँ। तुम कमलपुष्पकी माला धारण किये हुए महाराज जनकको मेरे आगमनकी सूचना दे दो ॥ १३ ॥

द्रष्टास्यद्य वदतोऽस्मान् द्वारपाल मनीषिभिः ।
सह वादे विवृद्धे तु बन्दिनं चापि निर्जितम् ॥ १४ ॥
द्वारपाल! आज तुम हमें विद्वानोंके साथ शास्त्रार्थ करते देखोगे, साथ ही विवाद बढ़ जानेपर बंदीको परास्त हुआ पाओगे ॥ १४ ॥

पश्यन्तु विप्राः परिपूर्णविद्याः
सहैव राज्ञा सपुरोधमुख्याः ।
उताहो वाप्युच्चतां नीचतां वा
तूष्णींभूतेष्वेव सर्वेष्वथाद्य ॥ १५ ॥
आज सम्पूर्ण सभासद् चुपचाप बैठे रहें तथा राजा और उनके प्रधान पुरोहितोंके साथ पूर्णतः विद्वान् ब्राह्मण मेरी लघुता अथवा श्रेष्ठताको प्रत्यक्ष देखें ॥ १५ ॥

द्वारपाल उवाच

कथं यज्ञं दशवर्षो विशेस्त्वं
विनीतानां विदुषां सम्प्रवेशम् ।
उपायतः प्रयतिष्ये तवाहं
प्रवेशने कुरु यत्नं यथावत् ॥ १६ ॥
**द्वारपालने कहा—**जहाँ सुशिक्षित विद्वानोंका प्रवेश होता है; उस यज्ञमण्डपमें तुम-जैसे दस वर्षके बालकका प्रवेश होना कैसे सम्भव है। तथापि मैं किसी उपायसे तुम्हें उसके भीतर प्रवेश करानेका प्रयत्न करूँगा, तुम भी भीतर जानेके लिये यथोचित प्रयत्न करो ॥ १६ ॥

(एष राजा संश्रवणे स्थितस्ते
स्तुह्येनं त्वं वचसा संस्कृतेन ।
स चानुज्ञां दास्यति प्रीतियुक्तः
प्रवेशने यच्च किंचित् तवेष्टम् ॥)
ये नरेश तुम्हारी बात सुन सकें, इतनी ही दूरीपर यज्ञमण्डपमें स्थित हैं, तुम अपने शुद्ध वचनोंद्वारा इनकी स्तुति करो। इससे ये प्रसन्न होकर तुम्हें प्रवेश करनेकी आज्ञा दे देंगे तथा

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तुम्हारी और भी कोई कामना हो तो वे पूरी करेंगे ।। अष्टावक्र उवाच

भो भो राजञ्जनकानां वरिष्ठ त्वं वै सम्राट् त्वयि सर्वं समृद्धम् । त्वं वा कर्ता कर्मणां यज्ञियानां ययातिरेको नृपतिर्वा पुरस्तात् ।। १७ ।। अष्टावक्र बोले— राजन्! आप जनकवंशके श्रेष्ठ पुरुष हैं, सम्राट् हैं। आपके यहाँ सभी प्रकारके ऐश्वर्य परिपूर्ण हैं, वर्तमान समयमें केवल आप ही उत्तम यज्ञकर्मोंका अनुष्ठान करनेवाले हैं; अथवा पूर्वकालमें एकमात्र राजा ययाति ऐसे हो चुके हैं ।। १७ ।।

वृद्धान् बन्दी वादविदो निगृह्य वादे भग्नानप्रतिशङ्कमानः । त्वयाभिसृष्टैः पुरुषैराप्तकृद्भि- र्जले सर्वान् मज्जयतीति नः श्रुतम् ।। १८ ।। हमने सुना है कि आपके यहाँ बन्दी नामसे प्रसिद्ध कोई विद्वान् हैं जो वाद-विवादके मर्मको जाननेवाले कितने ही वृद्ध ब्राह्मणोंको शास्त्रार्थमें हराकर वशमें कर लेते हैं और फिर आपके ही दिये हुए विश्वसनीय पुरुषोंद्वारा उन सबको निःशंक होकर पानीमें डुबवा देते हैं ।। १८ ।।

सोऽहं श्रुत्वा ब्राह्मणानां सकाशाद् ब्रह्माद्वैतं कथयितुमागतोऽस्मि । क्वासौ बन्दी यावदेनं समेत्य नक्षत्राणीव सविता नाशयामि ।। १९ ।। मैं ब्राह्मणोंके समीप यह समाचार सुनकर अद्वैत ब्रह्मके विषयमें वर्णन करनेके लिये यहाँ आया हूँ। वे बन्दी कहाँ हैं? मैं उनसे मिलकर उनके तेजको उसी प्रकार शान्त कर दूँगा, जैसे सूर्य ताराओंकी ज्योतिको विलुप्त कर देते हैं ।। १९ ।।

राजोवाच

आशंससे बन्दिनं वै विजेतु- मविज्ञाय त्वं वाक्यबलं परस्य । विज्ञातवीर्यैः शक्यमेवं प्रवक्तुं दृष्टश्चासौ ब्राह्मणैर्वेदशीलैः ।। २० ।। राजा बोले— ब्राह्मणकुमार! तुम अपने विपक्षीकी प्रवचन-शक्तिको जाने बिना ही बन्दीको जीतनेकी इच्छा रखते हो। जो प्रतिवादीके बलको जानते हों वे ही ऐसी बातें कह

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सकते हैं। वेदोंका अनुशीलन करनेवाले बहुत-से ब्राह्मण बन्दीका प्रभाव देख चुके हैं॥ २० ॥

आशंससे त्वं बन्दिनं वै विजेतु- मविज्ञाय तु बलं बन्दिनोऽस्य। समागता ब्राह्मणास्तेन पूर्वं न शोभन्ते भास्करेणेव ताराः॥ २१॥

तुम्हें इस बन्दीकी शक्तिका कुछ भी ज्ञान नहीं है। इसीलिये उसे जीतनेकी इच्छा कर रहे हो। आजसे पहले कितने ही विद्वान् ब्राह्मण बन्दीसे मिले हैं और जैसे सूर्यके सामने ताराओंका प्रकाश फीका पड़ जाता है उसी प्रकार वे बन्दीके सामने हतप्रभ हो गये हैं॥ २१॥

आशंसन्तो बन्दिनं जेतुकामा- स्तस्यान्तिकं प्राप्य विलुप्तशोभाः। विज्ञानमत्ता निःसृताश्चैव तात कथं सदस्यैर्वचनं विस्तरेयुः॥ २२॥

तात! कितने ही ज्ञानोन्मत्त ब्राह्मण बन्दीको जीतनेकी अभिलाषा रखकर शास्त्रार्थकी घोषणा करते हुए आये हैं; किंतु उनके निकट पहुँचते ही उनका प्रभाव नष्ट हो गया है।

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इतना ही नहीं, वे पराजित एवं तिरस्कृत हो चुपचाप राजसभासे निकल गये हैं। फिर वे अन्य सदस्योंके साथ वार्तालाप ही कैसे कर सकते हैं॥ २२॥

अष्टावक्र उवाच

विवादितोऽसौ न हि मादृशैर्हि सिंहीकृतस्तेन वदत्यभीतः। समेत्य मां निहतः शेष्यतेऽद्य मार्गे भग्नं शकटमिवाचलाक्षम्॥ २३॥

**अष्टावक्र बोले—**महाराज! अभी बन्दीको हम-जैसोंके साथ शास्त्रार्थ करनेका अवसर नहीं मिला है, इसीलिये वह सिंह बना हुआ है और निडर होकर बातें करता है। आज मुझसे जब उसकी भेंट होगी, उस समय वह पराजित होकर मुर्देकी भाँति सो जायगा। ठीक उसी तरह, जैसे रास्तेमें टूटा हुआ छकड़ा जहाँ-का-तहाँ पड़ा रह जाता है—उसका पहिया एक पग भी आगे नहीं बढ़ता॥ २३॥

राजोवाच

त्रिंशत्कद्वादशांशस्य चतुर्विंशतिपर्वणः। यस्त्रिषष्टिशतारस्य वेदार्थं स परः कविः॥ २४॥

**तब राजाने परीक्षा लेनेके लिये कहा—**जो पुरुष तीस अवयव, बारह अंश, चौबीस पर्व और तीन सौ साठ अरोंवाले पदार्थको जानता है—उसके प्रयोजनको समझता है, वह उच्चकोटिका ज्ञानी है॥ २४॥

अष्टावक्र उवाच

चतुर्विंशतिपर्व त्वां षण्णाभि द्वादशप्रधि। तत् त्रिषष्टिशतारं वै चक्रं पातु सदागति॥ २५॥

**अष्टावक्र बोले—**राजन्! जिसमें बारह अमावास्या और बारह पूर्णिमारूपी चौबीस पर्व, ऋतुरूप छः नाभि, मासरूप बारह अंश और दिनरूप तीन सौ साठ अरे हैं, वह निरन्तर घूमनेवाला संवत्सररूप कालचक्र आपकी रक्षा करे॥ २५॥

राजोवाच

वडवे इव संयुक्ते श्येनपाते दिवौकसाम्। कस्तयोर्गर्भमाधत्ते गर्भं सुषुवतुश्च कम्॥ २६॥

**राजाने पूछा—**जो दो घोड़ियोंकी भाँति संयुक्त रहती हैं; एवं जो बाज पक्षीकी भाँति हठात् गिरनेवाली हैं उन दोनोंके गर्भको देवताओंमेंसे कौन धारण करता है तथा वे दोनों किस गर्भको उत्पन्न करती हैं?॥ २६॥

अष्टावक्र उवाच

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मा स्म ते ते गृहे राजञ्छात्रावाणामपि ध्रुवम् ।
वातसारथिरागन्ता गर्भं सुषुवतुश्च तम् ॥ २७ ॥
अष्टावक्र बोले— राजन्! वे दोनों तुम्हारे शत्रुओंके घरपर भी कभी न गिरें। वायु जिसका सारथि है वह मेघरूप देव ही इन दोनोंके गर्भको धारण करनेवाला है और ये दोनों उस मेघरूप गर्भको उत्पन्न करनेवाले हैं* ॥ २७ ॥

राजोवाच
किंस्वित् सुप्तं न निमिषति किंस्विज्जातं न चोपति ।
कस्य स्विद्धृदयं नास्ति किं स्विद् वेगेन वर्धते ॥ २८ ॥
राजाने पूछा— सोते समय कौन नेत्र नहीं मूँदता, जन्म लेनेके बाद किसमें गति नहीं होती, किसके हृदय नहीं होता और कौन वेगसे बढ़ता है? ॥ २८ ॥

अष्टावक्र उवाच
मत्स्यः सुप्तो न निमिषत्यण्डं जातं न चोपति ।
अश्मनो हृदयं नास्ति नदी वेगेन वर्धते ॥ २९ ॥
अष्टावक्र बोले— मछली सोते समय भी आँख नहीं मूँदती, अण्डा उत्पन्न होनेपर चेष्टा नहीं करता, पत्थरके हृदय नहीं होता और नदी वेगसे बढ़ती है ॥ २९ ॥

राजोवाच
न त्वां मन्ये मानुषं देवसत्त्वं
न त्वं बालः स्थविरः सम्मतो मे ।
न ते तुल्यो विद्यते वाक्प्रलापे
तस्माद् द्वारं वितराम्येष बन्दी ॥ ३० ॥
राजाने कहा— ब्रह्मन्! आपकी शक्ति तो देवताओंके समान है, मैं आपको मनुष्य नहीं मानता; आप बालक भी नहीं हैं। मैं तो आपको वृद्ध ही समझता हूँ। वाद-विवाद करनेमें आपके समान दूसरा कोई नहीं है, अतः आपको यज्ञ-मण्डपमें जानेके लिये द्वार प्रदान करता हूँ। यही बन्दी हैं (जिनसे आप मिलना चाहते थे) ॥ ३० ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायामष्टावक्रीये त्रयस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें अष्टावक्रीयोपाख्यानविषयक एक सौ तैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३३ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ३१ श्लोक हैं)

१३४-

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⬅ विषय-सूची (TOC)

चतुस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः

बन्दी और अष्टावक्रका शास्त्रार्थ, बन्दीकी पराजय तथा समङ्गामें स्नानसे अष्टावक्रके अंगोंका सीधा होना

अष्टावक्र उवाच

अत्रोग्रसेन समितेषु राजन्
समागतेष्वप्रतिमेषु राजसु ।
नावैमि बन्दिं वरमत्र वादिनां
महाजले हंसमिवाददामि ॥ १ ॥

अष्टावक्र बोले— भयंकर सेनाओंसे युक्त महाराज जनक! इस सभामें सब ओरसे अप्रतिम प्रभावशाली राजा आकर एकत्र हुए हैं; परंतु मैं इन सबके बीचमें वादियोंमें प्रधान बन्दीको नहीं पहचान पाता हूँ। यदि पहचान लूँ तो अगाध जलमें हंसकी भाँति उन्हें अवश्य पकड़ लूँगा ॥ १ ॥

न मेऽद्य वक्ष्यस्यतिवादिमानिन्
ग्लहं प्रपन्नः सरितामिवागमः ।
हुताशनस्येव समृद्धतेजसः
स्थिरो भवस्वेह ममाद्य बन्दिन् ॥ २ ॥

अपनेको अतिवादी माननेवाले बन्दी! तुमने पराजित हुए पण्डितोंको पानीमें डुबवा देनेका नियम कर रखा है, किंतु आज मेरे सामने तुम्हारी बोली बंद हो जायगी। जैसे प्रलयकालके प्रज्वलित अग्निके समीप नदियोंका प्रवाह सूख जाता है, उसी प्रकार मेरे सामने आनेपर तुम भी सूख जाओगे—तुम्हारी वादशक्ति नष्ट हो जायगी। बन्दी! आज मेरे सामने स्थिर होकर बैठो ॥ २ ॥

बन्द्युवाच

व्याघ्रं शयानं प्रति मा प्रबोधय
आशीविषं सृक्किणी लेलिहानम् ।
पदाहतस्येह शिरोऽभिहत्य
नादष्टो वै मोक्ष्यसे तन्निबोध ॥ ३ ॥

बन्दीने कहा— मुझे सोता हुआ सिंह समझकर न जगाओ (न छेड़ो), अपने जबड़ोंको चाटता हुआ विषैला सर्प मानो। तुमने पैरोंसे ठोकर मारकर मेरे

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मस्तकको कुचल दिया है। अब जबतक तुम डँस लिये नहीं जाते तबतक तुम्हें छुटकारा नहीं मिल सकता, इस बातको अच्छी तरह समझ लो ॥ ३ ॥

यो वै दर्पात् संहननोपपन्नः
सुदुर्बलः पर्वतमाविहन्ति ।
तस्यैव पाणिः सनखो विदीर्यते
न चैव शैलस्य हि दृश्यते व्रणः ॥ ४ ॥

जो देहधारी अत्यन्त दुर्बल होकर भी अहंकारवश अपने हाथसे पर्वतपर चोट करता है, उसीके हाथ और नख विदीर्ण हो जाते हैं। उस चोटसे पर्वतमें घाव होता नहीं देखा जाता है ॥ ४ ॥

अष्टावक्र उवाच

सर्वे राज्ञो मैथिलस्य मैनाकस्येव पर्वताः ।
निकृष्टभूता राजानो वत्सा अनडुहो यथा ॥ ५ ॥
**अष्टावक्र बोले—**जैसे सब पर्वत मैनाकसे छोटे हैं, सारे बछड़े बैलोंसे लघुतर हैं, उसी प्रकार भूमण्डलके समस्त राजा मिथिलानरेश महाराज जनककी अपेक्षा निम्न श्रेणीमें हैं ॥ ५ ॥

यथा महेन्द्रः प्रवरः सुराणां
नदीषु गङ्गा प्रवरा यथैव ।
तथा नृपाणां प्रवरस्त्वमेको
बन्दिं समभ्यानय मत्सकाशम् ॥ ६ ॥
राजन्! जैसे देवताओंमें महेन्द्र श्रेष्ठ हैं और नदियोंमें गंगा श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार सब राजाओंमें एकमात्र आप ही उत्तम हैं। अब बन्दीको मेरे निकट बुलवाइये ॥ ६ ॥

लोमश उवाच

एवमष्टावक्रः समितौ हि गर्जन्-
जातक्रोधो बन्दिनमाह राजन् ।
उक्ते वाक्ये चोत्तरं मे ब्रवीहि
वाक्यस्य चाप्युत्तरं ते ब्रवीमि ॥ ७ ॥
**लोमशजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! (बन्दीके सामने आ जानेपर) राजसभामें गर्जते हुए अष्टावक्रने बन्दीसे कुपित होकर इस प्रकार कहा—'मेरी पूछी हुई बातका उत्तर तुम दो और तुम्हारी बातका उत्तर मैं देता हूँ' ॥ ७ ॥

बन्द्युवाच