भारतकोश
संग्रह पर लौटें

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 2364)

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षट्त्रिंशोऽध्यायः

उत्तरका अपने लिये सारथि ढूँढ़नेका प्रस्ताव, अर्जुनकी सम्मतिसे द्रौपदीका बृहन्नलाको सारथि बनानेके लिये सुझाव देना

उत्तर उवाच

अद्याहमनुगच्छेयं दृढधन्वा गवां पदम् ।
यदि मे सारथिः कश्चिद् भवेदश्वेषु कोविदः ॥ १ ॥
**उत्तर बोला—**गोपप्रवर! मेरा धनुष तो बहुत मजबूत है। यदि मेरे पास घोड़े हाँकनेकी कलामें कुशल कोई सारथि होता, तो आज मैं अवश्य ही उन गौओंके पदचिह्नोंका अनुसरण करता ॥ १ ॥

तं त्वहं नागवच्छामि यो मे यन्ता भवेन्नरः ।
पश्यध्वं सारथिं क्षिप्रं मम युक्तं प्रयास्यतः ॥ २ ॥
इस समय मुझे ऐसे किसी मनुष्यका पता नहीं है, जो मेरा सारथि बन सके। मैं युद्धके लिये प्रस्थान करूँगा, अतः शीघ्र मेरे लिये किसी योग्य सारथिकी तलाश करो ॥

अष्टाविंशतिरात्रं वा मासं वा नूनमन्ततः ।
यत् तदासीन्महद् युद्धं तत्र मे सारथिर्हतः ॥ ३ ॥
पहले लगातार अट्ठाईस राततक अथवा अन्ततः एक मासतक जो वह महायुद्ध हुआ था, उसमें मेरा सारथि मारा गया था ॥ ३ ॥

स लभेयं यदा त्वन्यं हययानविदं नरम् ।
त्वरावानद्य यात्वाहं समुच्छ्रितमहाध्वजम् ॥ ४ ॥
विगाह्य तत् परानीकं गजवाजिरथाकुलम् ।
शस्त्रप्रतापनिर्वीर्यान् कुरून् जित्वाऽऽनये पशून् ॥ ५ ॥
अतः यदि घोड़े हाँकनेकी कला जाननेवाले किसी दूसरे मनुष्यको भी पा जाऊँ, तो अभी बड़े वेगसे जाकर ऊँची-ऊँची विशाल ध्वजाओंसे विभूषित एवं हाथी, घोड़े तथा रथोंसे भरी हुई शत्रुओंकी सेनामें घुस जाऊँ और अपने आयुधोंके प्रतापसे कौरवोंको निर्वीर्य (पराक्रमशून्य) तथा परास्त करके सम्पूर्ण पशुओंको लौटा लाऊँ ॥ ४-५ ॥

दुर्योधनं शान्तनवं कर्णं वैकर्तनं कृपम् ।
द्रोणं च सह पुत्रेण महेष्वासान् समागतान् ॥ ६ ॥
वित्रासयित्वा संग्रामे दानवानिव वज्रभृत् ।
अनेनैव मुहूर्तेन पुनः प्रत्यानये पशून् ॥ ७ ॥

जैसे वज्रधारी इन्द्र दानवोंको भयभीत कर देते हैं, उसी प्रकार मैं दुर्योधन, शान्तनुनन्दन भीष्म, सूर्यपुत्र कर्ण, कृपाचार्य तथा पुत्र (अश्वत्थामा) सहित द्रोणाचार्य आदि महान् धनुर्धरोंको, जो यहाँ आये हैं, युद्धमें अत्यन्त भय पहुँचाकर इसी मुहूर्तमें अपने पशुओंको वापस ला सकता हूँ ॥ ६-७ ॥

शून्यमासाद्य कुरवः प्रयान्त्यादाय गोधनम् ।
किं नु शक्यं मया कर्तुं यदहं तत्र नाभवम् ॥ ८ ॥
गोष्ठको सूना पाकर कौरवलोग मेरा गोधन लिये जा रहे हैं। परंतु अब मैं यहाँसे क्या कर सकता हूँ? जबकि वहाँ उस समय मैं मौजूद नहीं था ॥ ८ ॥

पश्येयुरद्य मे वीर्यं कुरवस्ते समागताः ।
किं नु पार्थोऽर्जुनः साक्षादयमस्मान् प्रबाधते ॥ ९ ॥
अच्छा, जब कौरवलोग यहाँ आ ही गये हैं, तब आज मेरा पराक्रम देख लें। फिर तो वे कहेंगे—'क्या यह साक्षात् कुन्तीपुत्र अर्जुन ही हमें पीड़ा दे रहा है?' ॥ ९ ॥

वैशम्पायन उवाच

श्रुत्वा तदर्जुनो वाक्यं राज्ञः पुत्रस्य भाषतः ।
अतीतसमये काले प्रियां भार्यामनिन्दिताम् ॥ १० ॥
द्रुपदस्य सुतां तन्वीं पाञ्चालीं पावकात्मजाम् ।
सत्यार्जवगुणोपेतां भर्तुः प्रियहिते रताम् ॥ ११ ॥
उवाच रहसि प्रीतः कृष्णां सर्वार्थकोविदः ।
उत्तरं ब्रूहि कल्याणि क्षिप्रं मद्वचनादिदम् ॥ १२ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! इस प्रकार बोलते हुए राजकुमार उत्तरकी वह बात सुनकर सब बातोंमें कुशल अर्जुन बहुत प्रसन्न हुए। उस समयतक उनके अज्ञातवासकी अवधि पूरी हो गयी थी। अतः उन्होंने अपनी सतीसाध्वी प्यारी पत्नी पांचाल-राजकुमारी द्रौपदीको, जिसका अग्निसे प्रादुर्भाव हुआ था और जो तन्वंगी, सत्य-सरलता आदि सद्गुणोंसे विभूषित तथा पतिके प्रिय एवं हितमें तत्पर रहनेवाली थी, एकान्तमें बुलाकर कहा—'कल्याणि! तुम मेरी बात मानकर राजकुमार उत्तरसे शीघ्र इस प्रकार कहो— ॥ १०—१२ ॥

अयं वै पाण्डवस्यासीत् सारथिः सम्मतो दृढः ।
महायुद्धेषु संसिद्धः स ते यन्ता भविष्यति ॥ १३ ॥
'यह बृहन्नला पाण्डुनन्दन अर्जुनका सुदृढ़ एवं प्रिय सारथि रह चुका है। उसने बड़े-बड़े युद्धोंमें सफलता प्राप्त की है। वह तुम्हारा सारथि हो जायगा' ॥

वैशम्पायन उवाच

तस्य तद् वचनं स्त्रीषु भाषतश्च पुनः पुनः ।

न सामर्षत पाञ्चाली बीभत्सोः परिकीर्तनम् ॥ १४ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! उत्तर स्त्रियोंके बीचमें बैठा था और बार-बार अपनी तुलनामें अर्जुनका नाम ले-लेकर डींग मार रहा था। पांचालराजकुमारी द्रौपदीसे यह सहन न हो सका ॥ १४ ॥ अथैनमुपसंगम्य स्त्रीमध्यात् सा तपस्विनी । व्रीडमानेव शनकैरिदं वचनमब्रवीत् ॥ १५ ॥ वह तपस्विनी स्त्रियोंके बीचसे उठकर उत्तरके समीप आयी और लजाती हुई-सी धीरे-धीरे इस प्रकार बोली— ॥ १५ ॥ योऽसौ बृहद्वारणाभो युवा सुप्रियदर्शनः । बृहन्नलेति विख्यातः पार्थस्यासीत् स सारथिः ॥ १६ ॥ ‘राजकुमार! यह जो विशाल गजराजके समान हृष्ट-पुष्ट, तरुण, सुन्दर और देखनेमें अत्यन्त प्रिय ‘बृहन्नला’ नामसे विख्यात नर्तक है, पहले कुन्तीपुत्र अर्जुनका सारथि था ॥ १६ ॥ धनुष्यनवरश्चासीत् तस्य शिष्यो महात्मनः । दृष्टपूर्वो मया वीर चरन्त्या पाण्डवान् प्रति ॥ १७ ॥ ‘वीर! यह उन्हीं महात्माका शिष्य है, अतः धनुर्विद्यामें भी उनसे कम नहीं है। पहले पाण्डवोंके यहाँ रहते समय मैंने इसे देखा है ॥ १७ ॥ यदा तत् पावको दावमदहत् खाण्डवं महत् । अर्जुनस्य तदानेन संगृहीता हयोत्तमाः ॥ १८ ॥ ‘जिन दिनों अर्जुनकी सहायतासे अग्निदेवने दावानलरूप हो महान् खाण्डववनको जलाया था, उस समय इसीने अर्जुनके श्रेष्ठ घोड़ोंकी बागडोर सँभाली थी ॥ १८ ॥ तेन सारथिना पार्थः सर्वभूतानि सर्वशः । अजयत् खाण्डवप्रस्थे न हि यन्तास्ति तादृशः ॥ १९ ॥ ‘इसी सारथिके सहयोगसे कुन्तीपुत्र अर्जुनने खाण्डवप्रस्थमें सम्पूर्ण प्राणियोंपर विजय पायी थी; अतः इसके समान दूसरा कोई सारथि नहीं है ॥ १९ ॥

उत्तर उवाच

सैरन्ध्रि जानासि तथा युवानं नपुंसको नैव भवेद् यथासौ । अहं न शक्नोमि बृहन्नलां शुभे वक्तुं स्वयं यच्छ हयान् ममेति वै ॥ २० ॥ **उत्तरने कहा—**सैरन्ध्री! वह युवक ऐसे गुणोंसे विभूषित है कि वह नपुंसक नहीं हो सकता; इन बातोंको तुम अच्छी तरह जानती हो; [अतः तुम उससे कह दो, तो ठीक है।]

शुभे! मैं स्वयं बृहन्नलासे नहीं कह सकता कि तुम मेरे घोड़ोंकी रास सँभालो ॥ २० ॥

द्रौपद्युवाच

येयं कुमारी सुश्रोणी भगिनी ते यवीयसी ।
अस्याः स वीर वचनं करिष्यति न संशयः ॥ २१ ॥
द्रौपदीने कहा—वीर! यह जो सुन्दर कटिप्रदेशवाली तुम्हारी छोटी बहिन कुमारी उत्तरा है। इसकी बात वह अवश्य मान लेगा, इसमें संशय नहीं है ॥ २१ ॥

यदि वै सारथिः स स्यात् कुरून् सर्वान् न संशयः ।
जित्वा गाश्च समादाय ध्रुवमागमनं भवेत् ॥ २२ ॥
यदि वह सारथि हो जाय, तो निःसंदेह सम्पूर्ण कौरवोंको जीतकर और गौओंको भी वापस लेकर तुम्हारा इस नगरमें आगमन हो सकता है, यह ध्रुव सत्य है ॥ २२ ॥

एवमुक्तः स सैरन्ध्र्या भगिनीं प्रत्यभाषत ।
गच्छ त्वमनवद्याङ्गि तामानय बृहन्नलाम् ॥ २३ ॥
सैरन्ध्रीके ऐसा कहनेपर उत्तर अपनी बहिनसे बोला—'निर्दोष अंगोंवाली उत्तरे! जाओ, उस बृहन्नलाको बुला ले आओ' ॥ २३ ॥

सा भ्रात्रा प्रेषिता शीघ्रमगच्छन्नर्तनागृहम् ।
यत्रास्ते स महाबाहुश्छन्नः सत्रेण पाण्डवः ॥ २४ ॥
भाईके भेजनेपर कुमारी उत्तरा शीघ्र नृत्यशालामें गयी, जहाँ पाण्डुनन्दन महाबाहु अर्जुन कपटवेषमें छिपकर रहते थे ॥ २४ ॥

इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि गोहरणपर्वणि उत्तरगोग्रहे बृहन्नलासारथ्यकथने षट्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत गोहरणपर्वमें उत्तर दिशाकी ओरसे गौओंके अपहरणके प्रसंगमें बृहन्नलाका सारथ्यकथनसमबन्धी छत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३६ ॥

अध्याय (पृष्ठ 2368)

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सप्तत्रिंशोऽध्यायः

बृहन्नलाको सारथि बनाकर राजकुमार उत्तरका रणभूमिकी ओर प्रस्थान

वैशम्पायन उवाच

सा प्राद्रवत् काञ्चनमाल्यधारिणी ज्येष्ठेन भ्रात्रा प्रहिता यशस्विनी । सुदक्षिणा वेदिविलग्नमध्या सा पद्मपत्राभनिभा शिखण्डिनी ॥ १ ॥ तन्वी शुभाङ्गी मणिचित्रमेखला मत्स्यस्य राज्ञो दुहिता श्रिया वृता । तन्नर्तनागारमरालपक्ष्म शतह्रदा मेघमिवान्वपद्यत ॥ २ ॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! कुमारी उत्तरा सोनेकी माला और मोरपंखका शृंगार धारण किये हुए थी। उसकी अंगकान्ति कमलदलकी-सी आभावाली लक्ष्मीको भी लज्जित कर रही थी। उसकी कमर यज्ञकी वेदीके समान सूक्ष्म थी। शरीरसे भी वह पतली ही थी। उसके सभी अंग शुभ लक्षणोंसे युक्त थे। उसने कटिप्रदेशमें मणियोंकी बनी हुई विचित्र करधनी पहन रखी थी। मत्स्यराजकी वह यशस्विनी कन्या अनुपम शोभासे प्रकाशित हो रही थी। बड़ोंकी आज्ञा माननेवाली कुमारी उत्तरा बड़े भाईके भेजनेसे बड़ी उतावलीके साथ नृत्यशालामें गयी; मानो चपला मेघ-मालामें विलीन हो गयी हो। उसके नेत्रोंकी टेढ़ी-टेढ़ी बरौनियाँ बड़ी भली मालूम होती थीं ॥ १-२ ॥

सा हस्तिहस्तोपमसंहितोरूः स्वनिन्दिता चारुदती सुमध्यमा । आसाद्य तं वै वरमाल्यधारिणी पार्थं शुभा नागवधूरिव द्विपम् ॥ ३ ॥

उसकी परस्पर सटी हुई जाँघें हाथीकी सूँड़के समान सुशोभित होती थीं, दाँत चमकीले और मनोहर थे। शरीरका मध्यभाग बड़ा सुहावना था। वह अनिन्द्य-सुन्दरी सुन्दर हार धारण किये उन कुन्तीनन्दन अर्जुनके पास पहुँचकर गजराजके समीप गयी हुई हथिनीके समान शोभा पा रही थी ॥ ३ ॥

सा रत्नभूता मनसः प्रियार्चिता सुता विराटस्य यथेन्द्रलक्ष्मीः ।

सुदर्शनीया प्रमुखे यशस्विनी प्रीत्याब्रवीदर्जुनमायतेक्षणा ॥ ४ ॥ विराटकुमारी उत्तरा स्त्रियोंमें रत्नस्वरूपा और मनको प्रिय लगनेवाली थी। वह उस राजभवनमें इन्द्रकी साम्राज्यलक्ष्मीके समान सम्मानित थी। उसके नेत्र बड़े-बड़े थे। वह यशस्विनी बाला सामनेसे देखने ही योग्य थी। वह अर्जुनसे प्रेमपूर्वक बोली— ॥ ४ ॥

सुसंहतोरुं कनकोज्ज्वलत्वचं पार्थः कुमारीं स तदाभ्यभाषत । किमागमः काञ्चनमाल्यधारिणि मृगाक्षि किं त्वं त्वरितेव भामिनि ॥ किं ते मुखं सुन्दरि न प्रसन्न- माचक्ष्व तत्त्वं मम शीघ्रमङ्गने ॥ ५ ॥ सुवर्णके समान सुन्दर एवं गौर त्वचा तथा सटी जाँघोंवाली कुमारी उत्तराको देखकर अर्जुनने पूछा—‘सुवर्णकी माला धारण करनेवाली मृगलोचने! भामिनि! तुम क्यों उतावली-सी चली आ रही हो? सुन्दरि! आज तुम्हारा मुख प्रसन्न क्यों नहीं है? अंगने! मुझे शीघ्र सब बातें ठीक-ठीक बताओ’ ॥ ५ ॥

वैशम्पायन उवाच

स तां दृष्ट्वा विशालाक्षीं राजपुत्रीं सखीं तथा । प्रहसन्नब्रवीद् राजन् किमागमनमित्युत ॥ ६ ॥ तमब्रवीद् राजपुत्री समुपेत्य नरर्षभम् । प्रणयं भावयन्ती सा सखीमध्य इदं वचः ॥ ७ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! विशाल नेत्रोंवाली अपनी सखी राजकुमारी उत्तराकी ओर देखकर अर्जुनने हँसते हुए जब उससे अपने पास आनेका कारण पूछा, तब वह राजपुत्री नरश्रेष्ठ अर्जुनके समीप जा अपना प्रेम प्रकट करती हुई सखियोंके बीचमें इस प्रकार बोली— ॥ ६-७ ॥

गावो राष्ट्रस्य कुरुभिः काल्यन्ते नो बृहन्नले । ता विजेतुं मम भ्राता प्रयास्यति धनुर्धरः ॥ ८ ॥ ‘बृहन्नले! हमारे राष्ट्रकी गौओंको कौरव हाँककर लिये जाते हैं; अतः उन्हें जीतनेके लिये मेरे भैया धनुष धारण करके जानेवाले हैं ॥ ८ ॥ नाचिरं निहतस्तस्य संग्रामे रथसारथिः । तेन नास्ति समः सूतो योऽस्य सारथ्यमाचरेत् ॥ ९ ॥ ‘थोड़े ही दिन हुए, उनके रथका सारथि एक युद्धमें मारा गया। इस कारण कोई ऐसा योग्य सूत नहीं है, जो उनके सारथिका काम सँभाल सके ॥ ९ ॥ तस्मै प्रयतमानाय सारथ्यर्थं बृहन्नले । आचचक्षे हयज्ञाने सैरन्ध्री कौशलं तव ॥ १० ॥ ‘बृहन्नले! वे सारथि ढूँढ़नेका प्रयत्न कर रहे थे, इतनेमें ही सैरन्ध्रीने पहुँचकर यह बताया कि तुम अश्वविद्यामें कुशल हो ॥ १० ॥ अर्जुनस्य किलासीस्त्वं सारथिर्दयितः पुरा । त्वयाजयत् सहायेन पृथिवीं पाण्डवर्षभः ॥ ११ ॥ ‘पहले तुम अर्जुनका प्रिय सारथि रह चुकी हो। तुम्हारी सहायतासे उन पाण्डवशिरोमणिने समूची पृथ्वीपर विजय पायी है ॥ ११ ॥

सा सारथ्यं मम भ्रातुः कुरु साधु बृहन्नले ।
पुरा दूरतरं गावो ह्रियन्त कुरुभिर्हि नः ॥ १२ ॥
‘अतः बृहन्नले! इसके पहले कि कौरवलोग हमारी गौओंको बहुत दूर लेकर चले जायँ, तुम मेरे भाईके सारथिका कार्य अच्छी तरह कर दो ॥ १२ ॥

अथैतद् वचनं मेऽद्य नियुक्ता न करिष्यसि ।
प्रणयादुच्यमाना त्वं परित्यक्ष्यामि जीवितम् ॥ १३ ॥
‘सखी! मैं बड़े प्रेमसे यह बात कहती हूँ। यदि आज इतना अनुरोध करनेपर भी तुम मेरी बात नहीं मानोगी, तो मैं प्राण त्याग दूँगी’ ॥ १३ ॥

एवमुक्तस्तु सुश्रोण्या तया सख्या परंतपः ।
जगाम राजपुत्रस्य सकाशममितौजसः ॥ १४ ॥
तमाव्रजन्तं त्वरितं प्रभिन्नमिव कुञ्जरम् ।
अन्वगच्छद् विशालाक्षी गजं गजवधूरिव ॥ १५ ॥
सुन्दर कटिप्रदेशवाली सखी उत्तराके ऐसा कहनेपर शत्रुओंको संताप देनेवाले अर्जुन अमितपराक्रमी राजकुमार उत्तरके समीप गये। मद टपकानेवाले गजराजकी भाँति शीघ्रतापूर्वक आते हुए अर्जुनके पीछे-पीछे विशाल नेत्रोंवाली उत्तरा भी आयी; ठीक उसी तरह, जैसे हथिनी हाथीके पीछे-पीछे जाती है ॥ १४-१५ ॥

दूरादेव तु तां प्रेक्ष्य राजपुत्रोऽभ्यभाषत ।
त्वया सारथिना पार्थः खाण्डवेऽग्निमतर्पयत् ॥ १६ ॥
पृथिवीमजयत् कृत्स्नां कुन्तीपुत्रो धनंजयः ।
सैरन्ध्री त्वां समाचष्टे सा हि जानाति पाण्डवान् ॥ १७ ॥
राजकुमार उत्तरने बृहन्नलाको दूरसे ही देखकर इस प्रकार कहा—‘बृहन्नले! अर्जुनने तुम्हें सारथि बनाकर खाण्डववनमें अग्निको तृप्त किया था। इतना ही नहीं, कुन्तीपुत्र धनंजयने तुम-जैसे सारथिके सहयोगसे ही समूची पृथिवीपर विजय पायी है।’ तुम्हारे विषयमें यह बात सैरन्ध्री कह रही थी, क्योंकि वह पाण्डवोंको अच्छी तरह जानती है ॥ १६-१७ ॥

संयच्छ मामकांश्वांस्तथैव त्वं बृहन्नले ।
कुरुभिर्योत्स्यमानस्य गोधनानि परीप्सतः ॥ १८ ॥
‘बृहन्नले! तुम अर्जुनकी ही भाँति मेरे घोड़ोंको भी काबूमें रखना, क्योंकि मैं अपना गोधन वापस लेनेके लिये कौरवोंके साथ युद्ध करनेवाला हूँ ॥ १८ ॥

अर्जुनस्य किलासीस्त्वं सारथिर्दयितः पुरा ।
त्वयाजयत् सहायेन पृथिवीं पाण्डवर्षभः ॥ १९ ॥
‘पहले तुम अर्जुनका प्रिय सारथि रह चुकी हो और तुम्हारी ही सहायतासे उन पाण्डवशिरोमणिने समूची पृथिवीपर विजय पायी है’ ॥ १९ ॥

एवमुक्ता प्रत्युवाच राजपुत्रं बृहन्नला ।

का शक्तिर्मम सारथ्यं कर्तुं संग्राममूर्धनि ॥ २० ॥ उसके ऐसा कहनेपर बृहन्नला राजकुमारसे बोली—‘भला, मेरी क्या शक्ति है कि मैं युद्धके मुहानेपर सारथिका काम सँभाल सकूँ? ॥ २० ॥ गीतं वा यदि वा नृत्यं वादित्रं वा पृथग्विधम् । तत् करिष्यामि भद्रं ते सारथ्यं तु कुतो मम ॥ २१ ॥ ‘राजकुमार! आपका कल्याण हो। यदि गाना हो, नृत्य करना हो अथवा विभिन्न प्रकारके बाजे बजाने हों, तो वह कर लूँगी। सारथिका काम मुझसे कैसे हो सकता है? ॥ २१ ॥

उत्तर उवाच

बृहन्नले गायनो वा नर्तनो वा पुनर्भव । क्षिप्रं मे रथमास्थाय निगृह्णीष्व हयोत्तमान् ॥ २२ ॥ **उत्तर बोला—**बृहन्नले! तुम पुनः लौटकर गायक या नर्तक जो चाहो, बन जाना। इस समय तो शीघ्र ही मेरे रथपर बैठकर श्रेष्ठ घोड़ोंको काबूमें करो ॥ २२ ॥

वैशम्पायन उवाच

स तत्र नर्मसंयुक्तमकरोत् पाण्डवो बहु । उत्तरायाः प्रमुखतः सर्वं जानन्नरिंदमः ॥ २३ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! शत्रुओंका दमन करनेवाले पाण्डुनन्दन अर्जुनने सब कुछ जानते हुए भी उत्तराके सामने हँसीके लिये बहुत-से अनभिज्ञतासूचक कार्य किये ॥ २३ ॥ ऊर्ध्वमुत्क्षिप्य कवचं शरीरे प्रत्यमुञ्चत । कुमार्यस्तत्र तं दृष्ट्वा प्राहसन् पृथुलोचनाः ॥ २४ ॥ वे कवचको ऊपर उठाकर शरीरमें डालने लगे। यह देखकर वहाँ खड़ी हुई बड़े-बड़े नेत्रोंवाली राजकुमारियाँ हँसने लगीं ॥ २४ ॥ स तु दृष्ट्वा विमुह्यन्तं स्वयमेवोत्तरस्ततः । कवचेन महार्हेण समनह्यद् बृहन्नलाम् ॥ २५ ॥ बृहन्नलाको (कवच धारणके समय) भूल करती देख राजकुमार उत्तरने स्वयं ही उसे बहुमूल्य कवच धारण कराया ॥ २५ ॥ स बिभ्रत् कवचं चाग्र्यं स्वयमप्यंशुमत्प्रभम् । ध्वजं च सिंहमुच्छ्रित्य सारथ्ये समकल्पयत् ॥ २६ ॥ फिर उसने स्वयं भी सूर्यके समान कान्तिमान् सुन्दर कवच धारण किया और रथपर सिंहध्वज फहराकर बृहन्नलाको सारथिके कार्यमें नियुक्त कर दिया ॥ २६ ॥ धनूंषि च महार्हाणि बाणांश्च रुचिरान् बहून् ।

आदाय प्रययौ वीरः स बृहन्नलसारथिः ॥ २७ ॥
तदनन्तर बहुत-से बहुमूल्य धनुष और सुन्दर बाण लेकर वीर उत्तर बृहन्नला सारथिके साथ युद्धके लिये प्रस्थित हुआ ॥ २७ ॥
अथोत्तरा च कन्याश्च सख्यस्तामब्रुवंस्तदा ।
बृहन्नले आनयेथा वासांसि रुचिराणि च ॥ २८ ॥
पाञ्चालिकार्थं चित्राणि सूक्ष्माणि च मृदूनि च ।
विजित्य संग्रामगतान् भीष्मद्रोणमुखान् कुरून् ॥ २९ ॥
उस समय उत्तरा और उसकी सखीरूपा दूसरी राजकन्याओंने कहा—'बृहन्नले! तुम युद्धभूमिमें आये हुए भीष्म, द्रोण आदि प्रमुख कौरववीरोंको जीतकर हमारी गुड़ियोंके लिये उनके महीन, कोमल और विचित्र रंगके सुन्दर-सुन्दर वस्त्र ले आना' ॥ २८-२९ ॥
एवं ता ब्रुवतीः कन्याः सहिताः पाण्डुनन्दनः ।
प्रत्युवाच हसन् पार्थो मेघदुन्दुभिनिःस्वनः ॥ ३० ॥
ऐसा कहती हुई उन सब कन्याओंसे पाण्डुनन्दन अर्जुनने हँसते हुए मेघ और दुन्दुभिके समान गम्भीर वाणीमें कहा ॥ ३० ॥

बृहन्नलोवाच
यद्युत्तरोऽयं संग्रामे विजेष्यति महारथान् ।
अथाहरिष्ये वासांसि दिव्यानि रुचिराणि च ॥ ३१ ॥
बृहन्नला बोली—यदि ये राजकुमार उत्तर रणभूमिमें उन महारथियोंको परास्त कर देंगे, तो मैं अवश्य उनके दिव्य और सुन्दर वस्त्र ले आऊँगी ॥ ३१ ॥

वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा तु बीभत्सुस्ततः प्राचोदयद्धयान् ।
कुरूनभिमुखः शूरो नानाध्वजपताकिनः ॥ ३२ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! ऐसा कहकर शूरवीर अर्जुनने भाँति-भाँतिकी ध्वजा-पताकाओंसे सुशोभित कौरवोंकी ओर जानेके लिये घोड़ोंको हाँक दिया ॥ ३२ ॥
तमुत्तरं वीक्ष्य रथोत्तमे स्थितं
बृहन्नलायाः सहितं महाभुजम् ।
स्त्रियश्च कन्याश्च द्विजाश्च सुव्रताः
प्रदक्षिणं चक्रुरथोचुरङ्गनाः ॥ ३३ ॥
बृहन्नलाके साथ उत्तम रथपर बैठे हुए महाबाहु उत्तरको जाते देख स्त्रियों, कन्याओं तथा उत्तम व्रतका पालन करनेवाले ब्राह्मणोंने उसकी दक्षिणावर्त परिक्रमा की। तत्पश्चात् स्त्रियाँ और कन्याएँ बोलीं— ॥ ३३ ॥
यदर्जुनस्यर्षभतुल्यगामिनः

पुराभवत् खाण्डवदाहमङ्गलम् । कुरून् समासाद्य रणे बृहन्नले सहोत्तरेणाद्य तदस्तु मङ्गलम् ॥ ३४ ॥

‘बृहन्नले! वृषभके समान गतिवाले अर्जुनको पहले खाण्डववनदाहके समय जैसा मंगल प्राप्त हुआ था, आज युद्धमें कौरवोंके पास पहुँचनेपर राजकुमार उत्तरके साथ तुम्हें वैसा ही मंगल प्राप्त हो’ ॥ ३४ ॥

इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि गोहरणपर्वणि उत्तरगोग्रहे उत्तरनिर्याणं नाम सप्तत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३७ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत गोहरणपर्वमें उत्तर दिशाकी ओरसे गौओंके अपहरणके प्रसंगमें राजकुमार उत्तरका युद्धके लिये प्रस्थानविषयक सैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३७ ॥

अध्याय (पृष्ठ 2375)

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अष्टात्रिंशोऽध्यायः

उत्तरकुमारका भय और अर्जुनका उसे आश्वासन देकर रथपर चढ़ाना

वैशम्पायन उवाच

स राजधान्या निर्याय वैराटिरकुतोभयः ।
प्रयाहीत्यब्रवीत् सूतं यत्र ते कुरवो गताः ॥ १ ॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! राजधानीसे निकलकर विराटकुमार उत्तरने सर्वथा निर्भय हो सारथिसे कहा—'बृहन्नले! जहाँ कौरव गये हैं, उधर ही रथ ले चलो ॥ १ ॥

समवेतान् कुरून् सर्वान् जिगीषूनवजित्य वै ।
गास्तेषां क्षिप्रमादाय पुनरेष्याम्यहं पुरम् ॥ २ ॥

‘मैं यहाँ विजयकी आशासे एकत्र होनेवाले समस्त कौरवोंको परास्त करके उनसे अपनी गौएँ वापस ले शीघ्र अपने नगरमें लौट आऊँगा’ ॥ २ ॥

ततस्तांश्चोदयामास सदश्वान् पाण्डुनन्दनः ।
ते हया नरसिंहेन नोदिता वातरंहसः ।

आलिखन्त इवाकाशमूहूः काञ्चनमालिनः ॥ ३ ॥ तब पाण्डुनन्दन अर्जुनने उत्तरके उत्तम जातिके घोड़ोंको हाँका और उनकी बाग ढीली कर दी। नरश्रेष्ठ अर्जुनके हाँकनेपर सोनेकी माला पहने हुए वे घोड़े हवाके समान वेगसे चलने लगे, मानो आकाशमें अपनी टाप अड़ाते हुए रथ लिये उड़े जा रहे हों ॥ ३ ॥

नातिदूरमथो गत्वा मत्स्यपुत्रधनंजयौ । अवेक्षेताममित्रघ्नौ कुरूणां बलिनां बलम् ॥ ४ ॥ थोड़ी ही दूर जानेपर शत्रुहन्ता विराटपुत्र उत्तर और धनंजयने महाबली कौरवोंकी विशाल सेना देखी ॥ ४ ॥

श्मशानमभितो गत्वा आससाद कुरूनथ । तां शमीमन्ववीक्षेतां व्यूढानीकांश्च सर्वशः ॥ ५ ॥ श्मशानभूमिके समीप जाकर उन्होंने कौरवोंको पा लिया। वे दोनों उस शमीवृक्षके आसपास सब ओर सेनाका व्यूह बनाकर खड़े हुए कौरव-सैनिकोंकी ओर देखने लगे ॥ ५ ॥

तदनीकं महत् तेषां विबभौ सागरोपमम् । सर्पमाणमिवाकाशे वनं बहुलपादपम् ॥ ६ ॥ उनकी वह विशालवाहिनी समुद्रके समान जान पड़ती थी। जब वह चलती, तब ऐसा जान पड़ता था, मानो आकाशमें असंख्य वृक्षोंसे भरा हुआ वन चल रहा हो ॥ ६ ॥

ददृशे पार्थिवो रेणुर्जनितस्तेन सर्पता । दृष्टिप्रणाशो भूतानां दिवस्पृक् कुरुसत्तम ॥ ७ ॥ कुरुश्रेष्ठ जनमेजय! कौरव-सेनाके चलनेसे ऊपर उठी हुई धरतीकी धूल अन्तरिक्षको छूती-सी दिखायी देती थी। उसके कारण समस्त प्राणियोंकी दृष्टिका लोप-सा हो गया था—किसीको कुछ सूझ नहीं पड़ता था ॥ ७ ॥

तदनीकं महद् दृष्ट्वा गजाश्वरथसंकुलम् । कर्णदुर्योधनकृपैर्गुप्तं शान्तनवेन च ॥ ८ ॥ द्रोणेन च सपुत्रेण महेष्वासेन धीमता । हृष्टरोमा भयोद्विग्नः पार्थं वैराटिरब्रवीत् ॥ ९ ॥ वह भारी सेना हाथी, घोड़ों एवं रथोंसे भरी हुई थी। कर्ण, दुर्योधन, कृपाचार्य, भीष्म, अश्वत्थामा और महान् धनुर्धर एवं परम बुद्धिमान् द्रोण उसकी रक्षा कर रहे थे। उसे देखकर विराटपुत्र उत्तरके रोंगटे खड़े हो गये। उसने भयसे व्याकुल होकर अर्जुनसे कहा ॥ ८-९ ॥

उत्तर उवाच

नोत्सहे कुरुभिर्योद्धुं रोमहर्षं हि पश्य मे । बहुप्रवीरमत्युग्रं देवैरपि दुरासदम् ॥ १० ॥

उत्तर बोला—बृहन्नले! मुझमें कौरवोंके साथ युद्ध करनेका साहस नहीं है; क्योंकि

देखो, भयके कारण मेरे रोएँ खड़े हो गये हैं। इस सेनाके भीतर बहुतेरे बड़े-बड़े वीर हैं। यह

बड़ी भयानक जान पड़ती है। इसे परास्त करना तो देवताओंके लिये भी अत्यन्त कठिन

है ॥ १० ॥

प्रतियोद्धुं न शक्ष्यामि कुरुसैन्यमनन्तकम् ।

नाशंसे भारतीं सेनां प्रवेष्टुं भीमकार्मुकाम् ॥ ११ ॥

कौरवोंकी सेनाका कहीं अन्त नहीं है। मैं इसका सामना नहीं कर सकता। भयानक

धनुषवाली भरतवंशियोंकी इस विशाल वाहिनीमें प्रवेश करना तो दूर रहे, मैं उसके

सम्बन्धमें बात भी नहीं कर सकता ॥ ११ ॥

रथनागाश्वकलिलां पत्तिध्वजसमाकुलाम् ।

दृष्ट्वैव हि परानाजौ मनः प्रव्यथतीव मे ॥ १२ ॥

रथ, हाथी और घोड़ोंसे यह कौरवदल खचाखच भरा हुआ है। पैदल सिपाहियों और

असंख्य ध्वजाओंसे व्याप्त है। इसलिये रणभूमिमें इन शत्रुओंको देखकर ही मेरा हृदय

व्यथित-सा हो गया है ॥ १२ ॥

यत्र द्रोणश्च भीष्मश्च कृपः कर्णो विविंशतिः ।

अश्वत्थामा विकर्णश्च सोमदत्तश्च बाह्निकः ॥ १३ ॥

दुर्योधनस्तथा वीरो राजा च रथिनां वरः ।

द्युतिमन्तो महेष्वासाः सर्वे युद्धविशारदाः ॥ १४ ॥

जहाँ द्रोण, भीष्म, कृप, कर्ण, विविंशति, अश्वत्थामा, विकर्ण, सोमदत्त, बाह्निक तथा

रथियोंमें श्रेष्ठ वीर राजा दुर्योधन हैं। जो सबके सब तेजस्वी, महान् धनुर्धर और युद्धकी

कलामें प्रवीण हैं ॥ १३-१४ ॥

(मत्ता इव महानागा युक्तध्वजपताकिनः ।

नीतिमन्तो महेष्वासा सर्वास्त्रकृतनिश्चयाः ॥

दुर्जयाः सर्वसैन्यानां देवैरपि सवासवैः ।

पताकिनश्च मातङ्गाः सध्वजाश्च महारथाः ॥

विप्रकीर्णाः कृतोद्योगा वाजिनश्चित्रभूषिताः ।

तान् जेतुं समरे शूरान् दुर्बुद्धिरहमागतः ॥)

ये कौरववीर मदसे उन्मत्त हुए महान् गजराजोंके समान जान पड़ते हैं। ये सबके सब

ध्वजा-पताकाओंसे युक्त, नीतिनिपुण, महाधनुर्धर तथा सम्पूर्ण अस्त्रविद्याका सुनिश्चित ज्ञान

रखते हैं। इनपर विजय पाना सम्पूर्ण सेनाओंके लिये ही नहीं, इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओंके

लिये भी अत्यन्त कठिन है। इनके हाथियोंपर भी पताकाएँ फहरा रही हैं। बड़े-बड़े रथ

ध्वजाओंसे सुशोभित हो रहे हैं। विचित्र आभूषणोंसे आभूषित घोड़े चारों ओर फैलकर

विजयके लिये उद्योगशील प्रतीत होते हैं। ऐसे शूरवीर कौरवोंको युद्धमें जीतनेके लिये मैं दुर्बुद्धि बालक कहाँ आ गया। दृष्ट्वैव हि कुरूनेतान् व्यूढानीकान् प्रहारिणः । हृषितानि च रोमाणि कश्मलं चागतं मम ॥ १५ ॥ सेनाकी व्यूहरचना करके प्रहारके लिये उद्यत खड़े हुए इन कौरवोंको देखकर ही मेरे रोंगटे खड़े हो गये हैं। मुझे मूर्च्छा-सी आ रही है ॥ १५ ॥

वैशम्पायन उवाच

अविजातो विजातस्य मौर्य्याद् धूर्तस्थ पश्यतः । परिदेवयते मन्दः सकाशे सव्यसाचिनः ॥ १६ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! मूर्ख उत्तर एक साधारण कोटिका मनुष्य था और छद्मवेशधारी सव्यसाची अर्जुन असाधारण वीर थे। अतः उनके प्रभावको न जाननेके कारण वह मूर्खतावश उनके पास रहकर भी उन्हींके देखते-देखते यों विलाप करने लगा — ॥ १६ ॥

त्रिगर्तान् मे पिता यातः शून्ये सम्प्रणिधाय माम् । सर्वां सेनामुपादाय न मे सन्तीह सैनिकाः ॥ १७ ॥ सोऽहमेको बहून् बालः कृतास्त्रानकृतश्रमः । प्रतियोद्धुं न शक्ष्यामि निवर्तस्व बृहन्नले ॥ १८ ॥ ‘बृहन्नले! मेरे पिता सूने नगरमें उसकी रक्षाके लिये मुझे अकेला रखकर स्वयं सारी सेना साथ ले त्रिगर्तोंसे युद्ध करनेके लिये गये हैं। मेरे पास यहाँ कोई सैनिक नहीं है। मैं अकेला बालक हूँ और मैंने अस्त्रविद्यामें अभी अधिक परिश्रम भी नहीं किया है। ऐसी दशामें अस्त्र-शस्त्रोंके ज्ञाता और प्रौढ़ अवस्थावाले इन बहुसंख्यक कौरवोंका सामना मैं नहीं कर सकूँगा। अतः तुम रथ लेकर लौट चलो’ ॥ १७-१८ ॥

बृहन्नलोवाच

भयेन दीनरूपोऽसि द्विषतां हर्षवर्धनः । न च तावत् कृतं कर्म परैः किंचिद् रणाजिरे ॥ १९ ॥ **बृहन्नलाने कहा—**राजकुमार! तुम भयके कारण दीन होकर शत्रुओंका हर्ष बढ़ा रहे हो। अभी तो शत्रुओंने युद्धके मैदानमें कोई पराक्रम भी नहीं प्रकट किया है ॥ १९ ॥

स्वयमेव च मामात्थ वह मां कौरवान् प्रति । सोऽहं त्वां तत्र नेष्यामि यत्रैते बहुला ध्वजाः ॥ २० ॥ तुमने स्वयं ही कहा था कि मुझे कौरवोंके पास ले चलो; अतः जहाँ ये बहुत-सी ध्वजाएँ फहरा रही हैं, वहीं तुम्हें ले चलूँगी ॥ २० ॥

मध्यमामिषगृध्राणां कुरूणामाततायिनाम् ।

नेष्यामि त्वां महाबाहो पृथिव्यामपि युध्यताम् ॥ २१ ॥ महाबाहो! जैसे गीध मांसपर टूट पड़ते हैं, उसी प्रकार जो गौओंको लूटनेके लिये यहाँ आये हैं, उन आततायी कौरवोंके बीच तुम्हें ले चलती हूँ। यदि ये पृथ्‍वीके लिये भी युद्ध ठानेंगे तो उसमें भी मैं तुम्हें ले चलूँगी ॥ २१ ॥

तथा स्त्रीषु प्रतिश्रुत्य पौरुषं पुरुषेषु च । कत्थमानोऽभिनिर्याय किमर्थं न युयुत्ससे ॥ २२ ॥ तुम स्त्रियों और पुरुषोंके बीच कौरवोंको हराकर अपने गोधनको वापस लानेकी प्रतिज्ञा करके पुरुषार्थके विषयमें अपनी श्लाघा करते हुए युद्धके लिये निकले थे; फिर अब क्यों युद्ध नहीं करना चाहते? ॥ २२ ॥

न चेद् विजित्य गास्तास्त्वं गृहान् वै प्रतियास्यसि । प्रहसिष्यन्ति वीरास्त्वां नरा नार्यश्च संगताः ॥ २३ ॥ यदि उन गौओंको बिना जीते ही तुम घर लौटोगे, तो वीर पुरुष तुम्हारी हँसी उड़ायेंगे और यत्र-तत्र स्त्रियाँ और पुरुष एकत्र हो तुम्हारा उपहास करेंगे ॥ २३ ॥

अहमप्यत्र सैरन्ध्र्या ख्याता सारथ्यकर्मणि । न च शक्ष्याम्यनिर्जित्य गाः प्रयातुं पुरं प्रति ॥ २४ ॥ मैं भी सैरन्ध्रीके द्वारा सारथ्यके कार्यमें कुशल बतायी गयी हूँ, अतः अब गौओंको जीतकर वापस लिये बिना मैं नगरमें नहीं जा सकूँगी ॥ २४ ॥

स्तोत्रेण चैव सैरन्ध्र्यास्तव वाक्येन तेन च । कथं न युध्येयमहं कुरून् सर्वान् स्थिरो भव ॥ २५ ॥ सैरन्ध्री और तुमने भी बड़ी-बड़ी बातें कहकर मेरी बहुत स्तुति-प्रशंसा की है, फिर सम्पूर्ण कौरवोंके साथ मैं ही क्यों न युद्ध करूँ? तुम दृढ़तापूर्वक डट जाओ ॥

उत्तर उवाच

कामं हरन्तु मत्स्यानां भूयांसः कुरवो धनम् । प्रहसन्तु च मां नार्यो नरा वापि बृहन्नले ॥ २६ ॥ संग्रामे न च कार्यं मे गावो गच्छन्तु चापि मे । शून्यं मे नगरं चापि पितुश्चैव बिभेम्यहम् ॥ २७ ॥ **उत्तर बोला—**बृहन्नले! भारी संख्यामें आये हुए कौरव भले ही मत्स्यदेशका सारा धन इच्छानुसार हर ले जायँ, स्त्रियाँ अथवा पुरुष जितना चाहें, मेरा उपहास करें तथा मेरी गौएँ भी चली जायँ; किंतु इस युद्धमें मेरा कोई काम नहीं है। मेरा नगर सूना पड़ा है। [पिताजी उसकी रक्षाका भार मुझे दे गये थे]। मैं पिताजीसे डरता हूँ [इसलिये यहाँ नहीं ठहर सकता] ॥ २६-२७ ॥

वैशम्पायन उवाच

इत्युक्त्वा प्राद्रवद् भीतो रथात् प्रस्कन्द्य कुण्डली । त्यक्त्वा मानं च दर्पं च विसृज्य सशरं धनुः ॥ २८ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! ऐसा कहकर मान और अभिमानको त्यागकर बाणसहित धनुषको वहीं छोड़कर कुण्डलधारी राजकुमार उत्तर रथसे कूद पड़ा और भयभीत होकर भाग चला ॥ २८ ॥

बृहन्नलोवाच

नैष शूरैः स्मृतो धर्मः क्षत्रियस्य पलायनम् । श्रेयस्तु मरणं युद्धे न भीतस्य पलायनम् ॥ २९ ॥ **तब बृहन्नलाने कहा—**राजकुमार! क्षत्रियका युद्धसे भागना शूरवीरोंकी दृष्टिमें धर्म नहीं है। युद्ध करके मर जाना अच्छा है; किंतु भयभीत होकर भागना कदापि अच्छा नहीं है ॥ २९ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्त्वा तु कौन्तेयः सोऽवप्लुत्य रथोत्तमात् । तमन्वधावद् धावन्तं राजपुत्रं धनंजयः ॥ ३० ॥ दीर्घां वेणीं विधुन्वानः साधु रक्ते च वाससी । विधूय वेणीं धावन्तमजानन्तोऽर्जुनं तदा ॥ ३१ ॥ सैनिकाः प्राहसन् केचित् तथारूपमवेक्ष्य तम् । तं शीघ्रमभिधावन्तं सम्प्रेक्ष्य कुरवोऽब्रुवन् ॥ ३२ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! ऐसा कहकर कुन्तीनन्दन धनंजय भी उस उत्तम रथसे कूद पड़े और भागते हुए राजकुमारको पकड़नेके लिये अपनी लंबी चोटी हिलाते और लाल रंगकी साड़ी एवं दुपट्टेको फहराते हुए उसके पीछे-पीछे दौड़े। उस समय चोटी हिला-हिलाकर दौड़ते हुए अर्जुनको उस रूपमें देखकर उन्हें न जाननेवाले कुछ सैनिक ठहाका मारकर हँसने लगे। उन्हें शीघ्र गतिसे दौड़ते देख कौरव आपसमें कहने लगे— ॥ ३०—३२ ॥

क एष वेषसंच्छन्नो भस्मन्येव हुताशनः ।
किंचिदस्य यथा पुंसः किंचिदस्य यथा स्त्रियः ॥ ३३ ॥
‘यह कौन है जो राखमें छिपी हुई अग्निकी भाँति नारीके वेशमें छिपा है? इसकी कुछ बातें तो पुरुषों-जैसी हैं और कुछ स्त्रियों-जैसी ।। ३३ ।।
सारूप्यमर्जुनस्येव क्लीबरूपं बिभर्ति च ।
तदेवैतच्छिरो ग्रीवं तौ बाहू परिघोपमौ ।
तद्वैवास्य विक्रान्तं नायमन्यो धनंजयात् ॥ ३४ ॥
‘इसका स्वरूप तो अर्जुनसे मिलता-जुलता है; किंतु वेषभूषा इसने नपुंसकों-जैसी बना रखी है। देखो न, वही अर्जुन-जैसा सिर है, वैसी ही ग्रीवा है, वे ही परिघ-जैसी मोटी भुजाएँ हैं और उन्हींके समान इसकी चाल-ढाल है; अतः यह अर्जुनके सिवा दूसरा कोई नहीं है ।।
अमरेष्विव देवेन्द्रो मानुषेषु धनंजयः ।
एकः कोऽस्मानुपायायादन्यो लोके धनंजयात् ॥ ३५ ॥
‘मनुष्योंमें धनंजयका वही स्थान है, जो देवताओंमें इन्द्रका है। संसारमें अर्जुनके सिवा दूसरा कौन वीर है, जो अकेला हमलोगोंका सामना करनेके लिये चला आये? ।। ३५ ।।
एकः पुत्रो विराटस्य शून्ये संनिहितः पुरे ।
स एष किल निर्यातो बालभावान्न पौरुषात् ॥ ३६ ॥

'विराटके सूने नगरमें उनका एक ही पुत्र देख-रेखके लिये रह गया था; सो यह बचपन (मूर्खता) के कारण हमारा सामना करनेके लिये चला आया, अपने पुरुषार्थसे प्रेरित होकर नहीं ।। ३६ ।। सत्रेण नूनं छन्नं हि चरन्तं पार्थमर्जुनम् । उत्तरः सारथिं कृत्वा निर्यातो नगराद् बहिः ।। ३७ ।। 'निश्चय ही कपटवेशमें छिपे हुए कुन्तीपुत्र अर्जुनको अपना सारथि बनाकर उत्तर नगरसे बाहर निकला था ।। ३७ ।। स नो मन्यामहे दृष्ट्वा भीत एष पलायते । तं नूनमेष धावन्तं जिघृक्षति धनंजयः ।। ३८ ।। 'मालूम होता है, हमलोगोंको देखकर यह बहुत डर गया है; इसीलिये भागा जाता है और ये अर्जुन अवश्य ही उस भागते हुए राजकुमारको पकड़ लाना चाहते हैं' ।। ३८ ।।

वैशम्पायन उवाच

इति स्म कुरवः सर्वे विमृशन्तः पृथक् पृथक् । न च व्यवसितुं किंचिदुत्तरं शक्नुवन्ति ते ।। ३९ ।। छन्नं तथा तं सत्रेण पाण्डवं प्रेक्ष्य भारत । **वैशम्पायनजी कहते हैं—**भारत! इस प्रकार सभी कौरव अलग-अलग विचार-विमर्श करते थे, किंतु छद्मवेशमें छिपे हुए पाण्डुनन्दन अर्जुन तथा उत्तरको देखकर भी वे किसी निश्चयपर नहीं पहुँच पाते थे ।। (दुर्योधन उवाचेदं सैनिकान् रथसत्तमान् ।। अर्जुनो वासुदेवो वा रामः प्रद्युम्न एव वा । ते हि नः प्रतिसंधातुं संग्रामे न च शक्नुयुः ।। अन्यो वा क्लीबरूपेण यद्यागच्छेद् गवां पदम् । अर्पयित्वा शरैस्तीक्ष्णैः पातयिष्यामि भूतले ।। कथमेकतरस्तेषां समस्तान् योधयेत् कुरून् । अर्जुनो नेति चेत्येनं न व्यवस्यन्ति ते पुनः । इति स्म कुरवः सर्वे मन्त्रयन्तो महारथाः ।। दृढवेधी महासत्त्वः शक्रतुल्यपराक्रमः । अद्यागच्छति ये योद्धुं सर्वं संशयितं बलम् ।। न चाप्यन्यं नरं तत्र व्यवस्यन्ति धनंजयात् ।) उस समय दुर्योधनने रथियोंमें श्रेष्ठ समस्त सैनिकोंसे इस प्रकार कहा—'अर्जुन, श्रीकृष्ण, बलराम और प्रद्युम्न भी संग्रामभूमिमें हमलोगोंका सामना नहीं कर सकते। यदि कोई दूसरा मनुष्य ही हीजड़ेका रूप धारण करके इन गौओंके स्थानपर आयेगा, तो मैं उसे

अपने तीखे बाणोंसे घायल करके धरतीपर सुला दूँगा। यह उपर्युक्त वीरोंमेंसे ही कोई एक हो, तो भी अकेला समस्त कौरवोंके साथ कैसे युद्ध कर सकता है?' उधर 'यह अर्जुन ही तो नहीं है? नहीं, वे नहीं जान पड़ते।' इस प्रकार आपसमें मन्त्रणा करते हुए समस्त कौरव महारथी अर्जुनके विषयमें कोई निश्चय नहीं कर पाते थे। कई एक कहने लगे कि 'अर्जुनकी शक्ति महान् है। उनका पराक्रम इन्द्रके समान है। वे दृढ़तापूर्वक शत्रुओंका वेधन करनेवाले हैं। यदि वे ही आज युद्ध करनेके लिये आ रहे हैं, तब तो समस्त सैनिकोंका जीवन संशयमें पड़ गया।' वे इस मनुष्यको वहाँ अर्जुनसे भिन्न भी नहीं निश्चित कर पाते थे ।।

उत्तरं तु प्रधावन्तमभिद्रुत्य धनंजयः ।
गत्वा पदशतं तूर्णं केशपक्षे परामृशत् ।। ४० ।।
उधर अर्जुनने भागते हुए उत्तरका पीछा करके सौ कदम दूर जाते-जाते उसके केश पकड़ लिये ।। ४० ।।

सोऽर्जुनेन परामृष्टः पर्यदेवयदार्तवत् ।
बहुलं कृपणं चैव विराटस्य सुतस्तदा ।। ४१ ।।
अर्जुनके द्वारा पकड़ लिये जानेपर विराटपुत्र उत्तर बड़ी दीनताके साथ आर्तकी भाँति विलाप करने लगा ।।

उत्तर उवाच

श‍ृणुयास्त्वं हि कल्याणि बृहन्नले सुमध्यमे ।
निवर्तय रथं क्षिप्रं जीवन् भद्राणि पश्यति ।। ४२ ।।
**उत्तर बोला—**सुन्दर कटिवाली कल्याणमयी बृहन्नले! तुम मेरी बात सुनो। मेरे रथको शीघ्र लौटाओ; क्योंकि मनुष्य जीवित रहे, तो वह अनेक बार मंगल देखता है ।। ४२ ।।

शातकुम्भस्य शुद्धस्य शतं निष्कान् ददामि ते ।
मणीनष्टौ च वैडूर्यान् हेमबद्धान् महाप्रभान् ।। ४३ ।।
मैं तुम्हें शुद्ध सुवर्णकी सौ मोहरें देता हूँ, साथ ही अत्यन्त प्रकाशमान स्वर्णजटित आठ वैदूर्यमणियाँ भेंट करता हूँ ।। ४३ ।।

हेमदण्डप्रतिच्छन्नं रथं युक्तं च सुव्रतैः ।
मत्तांश्च दश मातङ्गान् मुञ्च मां त्वं बृहन्नले ।। ४४ ।।
इतना ही नहीं, उत्तम घोड़ोंसे जुते हुए तथा सुवर्णमय दण्डसे युक्त एक रथ और दस मतवाले हाथी भी दे रहा हूँ। बृहन्नले! यह सब ले लो, किंतु तुम मुझे छोड़ दो ।। ४४ ।।

वैशम्पायन उवाच

एवमादीनि वाक्यानि विलपन्तमचेतसम् ।
प्रहस्य पुरुषव्याघ्रो रथस्यान्तिकमानयत् ।। ४५ ।।