भारतकोश
संग्रह पर लौटें

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 1334)

⬅ विषय-सूची (TOC)

तपस्वीके वेशमें मण्डूकराजका राजाको आश्वासन


ययातिसे ब्राह्मणकी याचना

‘तब पिता मण्डूकराजने अपनी पुत्री सुशोभना महाराज परीक्षित्‌को समर्पित कर दी और उससे कहा—‘बेटी! सदा राजाकी सेवा करती रहना।’ ऐसा कहकर मण्डूकराजने जब अपनी पुत्रीके अपराधको याद किया, तब उसे क्रोध हो आया और उसने उसे शाप देते हुए कहा—‘अरी! तूने बहुत-से राजाओंको धोखा दिया है, इसलिये तेरी संतानें ब्राह्मणविरोधी होंगी; क्योंकि तू बड़ी झूठी है’ ।। ३४-३५ ।।

स च राजा तामुपलभ्य तस्यां सुरतगुण-निबद्धहृदयो लोकत्रयैश्वर्यमिवोपलभ्य हर्षेण बाष्प-कलया वाचा प्रणिपत्याभिपूज्य मण्डूकराजमब्रवीद-नुगृहीतोऽस्मीति ।। ३६ ।।

‘सुशोभनाके रतिकलासम्बन्धी गुणोंने राजाके मनको बाँध लिया था। वे उसे पाकर ऐसे प्रसन्न हुए, मानो उन्हें तीनों लोकोंका राज्य मिल गया हो। उन्होंने आनन्दके आँसू बहाते हुए मण्डूकराजको प्रणाम किया और उसका यथोचित सत्कार करते हुए हर्षगदगद वाणीमें कहा—‘मण्डूकराज! तुमने मुझपर बड़ी कृपा की है’ ।।

स च मण्डूकराजो दुहितरमनुज्ञाप्य यथागतमगच्छत् ।। ३७ ।।

‘तत्पश्चात् कन्यासे विदा लेकर मण्डूकराज जैसे आया था, वैसे ही अपने स्थानको चला गया ।। ३७ ।।

अथ कस्यचित् कालस्य तस्यां कुमारास्त्रय-स्तस्य राज्ञः सम्बभूवुः शलो दलो बलश्चेति । तत-स्तेषां ज्येष्ठं शलं समये पिता राज्येऽभिषिच्य तपसि धृतात्मा वनं जगाम ।। ३८ ।।

‘कुछ कालके पश्चात् सुशोभनाके गर्भसे राजा परीक्षित्‌के तीन पुत्र हुए—शल, दल और बल। इनमें शल सबसे बड़ा था। समय आनेपर पिताने शलका राज्याभिषेक करके स्वयं तपस्यामें मन लगाये तपोवनको प्रस्थान किया ।। ३८ ।।

अथ कदाचिच्छलो मृगयामनुचरन् मृगमासाद्य रथेनान्वधावत् ।। ३९ ।।
सूतं चोवाच शीघ्रं मां वहस्वेति स तथोक्तः सूतो राजानमब्रवीत् ।। ४० ।।
न क्रियतामनुबन्धो नैष शक्यस्त्वया मृगोऽयं ग्रहीतुं यद्यपि ते रथे युक्तौ वाम्यौ स्यातामिति । ततोऽब्रवीद् राजा सूतमाचक्ष्व मे वाम्यौ हन्मि च त्वामिति । स एवमुक्तो राजभयभीतः सूतो वामदेव-शापभीतश्च सन् नाचख्यौ राज्ञे । ततः पुनः स राजा खड्गमुद्यम्य शीघ्रं कथयस्वेति तमाह हनिष्ये त्वामिति । स तदाऽऽह राजभयभीतः सूतो वामदेवस्याश्वौ वाम्यौ मनोजवाविति ।। ४१ ।।

‘तदनन्तर एक दिन महाराज शल शिकार खेलनेके लिये वनको गये। वहाँ उन्होंने एक हिंसक पशुको सामने पाकर रथके द्वारा ही उसका पीछा किया और सारथिसे कहा—‘शीघ्र मुझे मृगके निकट पहुँचाओ’। उनके ऐसा कहनेपर सारथि बोला—‘महाराज! आप इस पशुको पकड़नेका आग्रह न करें। यह आपकी पकड़में नहीं आ सकता। यदि आपके रथमें दोनों वाम्य घोड़े जुते होते, तब आप इसे पकड़ लेते।’ यह सुनकर राजाने सूतसे पूछा

—‘सारथे! बताओ, वाम्य घोड़े कौन हैं, अन्यथा मैं तुम्हें अभी मार डालूँगा।’ राजाके ऐसा कहनेपर सारथि भयसे काँप उठा। उधर घोड़ोंका परिचय देनेपर उसे वामदेव ऋषिके शापका भी डर था। अतः उसने राजासे कुछ नहीं कहा। तब राजाने पुनः तलवार उठाकर कहा—‘अरे! शीघ्र बता, नहीं तो तुझे अभी मार डालूँगा।’ तब उसने राजाके भयसे त्रस्त होकर कहा—‘महाराज! वामदेव मुनिके पास दो घोड़े हैं जिन्हें ‘वाम्य’ कहते हैं। वे मनके समान वेगशाली हैं’ ।। ३९—४१ ।।

अथैनमेवं ब्रुवाणमब्रवीद् राजा वामदेवाश्रमं प्रयाहीति स गत्वा वामदेवाश्रमं तमृषिमब्रवीत् ।। ४२ ।।

‘सारथिके ऐसा कहनेपर राजाने उसे आज्ञा दी, ‘चलो वामदेवके आश्रमपर।’ वामदेवके आश्रमपर पहुँचकर राजाने उन महर्षिसे कहा— ।। ४२ ।।

भगवन् मृगो मे विद्धः पलायते सम्भावयितुमर्हसि वाम्यौ दातुमिति । तमब्रवीदृषिर्ददानि ते वाम्यौ कृतकार्येण भवता ममैव वाम्यौ निर्यात्यौ क्षिप्रमिति । स च तावश्वौ प्रतिगृह्यानुज्ञाप्य ऋषिं प्रायाद् वामीप्रयुक्तेन रथेन मृगं प्रतिगच्छंश्चाब्रवीत् सूतमश्वरत्नाविमावयोग्यौ ब्राह्मणानां नैतौ प्रतिदेयौ वामदेवायेत्युक्त्वा मृगमवाप्य स्वनगरमेत्याश्वावन्तःपुरेऽस्थापयत् ।। ४३ ।।

‘भगवन्! मेरे बाणोंसे घायल हुआ हिंसक पशु भागा जा रहा है। आप अपने वाम्य अश्व मुझे देनेकी कृपा करें।’ तब महर्षिने कहा—‘मैं तुम्हें वाम्य अश्व दिये देता हूँ। परंतु जब तुम्हारा कार्य सिद्ध हो जाय, तब तुम शीघ्र ही ये दोनों अश्व मुझे ही लौटा देना।’ राजाने दोनों अश्व पाकर ऋषिकी आज्ञा ले वहाँसे प्रस्थान किया। वामी घोड़ोंसे जुते हुए रथके द्वारा हिंसक पशुका पीछा करते हुए वे सारथिसे बोले—‘सूत! ये दोनों अश्वरत्न ब्राह्मणोंके पास रहने योग्य नहीं। अतः इन्हें वामदेवके पास लौटानेकी आवश्यकता नहीं है।’ ऐसा कहकर राजा हिंसक पशुको साथ ले अपनी राजधानीको चल दिये। वहाँ पहुँचकर उन्होंने उन दोनों अश्वोंको अन्तःपुरमें बाँध दिया ।। ४३ ।।

अथर्षिश्चिन्तयामास तरुणो राजपुत्रः कल्याणं पत्रमासाद्य रमते न प्रतिनिर्यात्यत्यहो कष्टमिति ।। ४४ ।।

उधर वामदेव मुनि मन-ही-मन इस प्रकार चिन्ता करने लगे—‘अहो! वह तरुण राजकुमार मेरे अच्छे घोड़ोंको लेकर मौज कर रहा है, उन्हें लौटानेका नाम ही नहीं लेता है। यह तो बड़े कष्टकी बात है!’ ।। ४४ ।।

स मनसा विचिन्त्य मासि पूर्णे शिष्यमब्रवीत् ।। ४५ ।।

गच्छात्रेय राजानं ब्रूहि यदि पर्याप्तं निर्यात्यो-पाध्यायवाम्याविति । स गत्वैवं तं राजानमब्रवीत् तं राजा प्रत्युवाच राजामेतद्वाहनमनर्हा ब्राह्मणा रत्नानामेवंविधानां किं ब्राह्मणानामश्वैः कार्यं साधु गम्यताम् ।। ४६ ।।

‘मन-ही-मन सोच-विचार करते हुए जब एक मास पूरा हो गया, तब वे अपने शिष्यसे बोले—‘आत्रेय! जाकर राजासे कहो कि यदि काम पूरा हो गया हो तो गुरुजीके दोनों वाम्य अश्व लौटा दीजिये।’ शिष्यने जाकर राजासे यही बात दोहरायी। तब राजाने उसे उत्तर देते हुए कहा—‘यह सवारी राजाओंके योग्य है। ब्राह्मणोंको ऐसे रत्न रखनेका अधिकार नहीं है। भला, ब्राह्मणोंको घोड़े लेकर क्या करना है? अब आप सकुशल पधारिये’ ॥ ४५-४६ ॥

स गत्वैतदुपाध्यायायाचष्ट तच्छ्रुत्वा वचनमप्रियं वामदेवः क्रोधपरीतात्मा स्वयमेव राजानभिगम्या-श्वार्थमचोदयन्न चाददद् राजा ॥ ४७ ॥

‘शिष्यने लौटकर ये सारी बातें उपाध्यायसे कहीं। वह अप्रिय वचन सुनकर वामदेव मन-ही-मन क्रोधसे जल उठे और स्वयं ही उस राजाके पास जाकर उन्हें घोड़े लौटा देनेके लिये कहा। परंतु राजाने वे घोड़े नहीं दिये’ ॥ ४७ ॥

वामदेव उवाच

प्रयच्छ वाम्यौ मम पार्थिव त्वं कृतं हि ते कार्यमाभ्यामशक्यम् । मा त्वा वधीद् वरुणो घोरपाशै- र्ब्रह्मक्षत्रस्यान्तरे वर्तमानम् ॥ ४८ ॥

**तब वामदेवने कहा—**राजन्! मेरे वाम्य अश्वोंको अब मुझे लौटा दो। निश्चय ही उन घोड़ोंद्वारा तुम्हारा असाध्य कार्य पूरा हो गया है। इस समय तुम ब्राह्मण और क्षत्रियके बीचमें विद्यमान हो। कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारी असत्यवादिताके कारण राजा वरुण तुम्हें अपने भयंकर पाशोंसे बाँध लें ॥ ४८ ॥

राजोवाच

अनड्वाहौ सुव्रतौ साधु दान्ता- वेतद् विप्राणां वाहनं वामदेव । ताभ्यां याहि त्वं तत्र कामो महर्षे छन्दांसि वै त्वादृशं संवहन्ति ॥ ४९ ॥

**राजा बोले—**वामदेवजी! ये दो अच्छे स्वभावके सीखे-सिखाये हृष्ट-पुष्ट बैल हैं, जो गाड़ी खींच सकते हैं; ये ही ब्राह्मणोंके लिये उचित वाहन हो सकते हैं। अतः महर्षे! इन्हींको गाड़ीमें जोतकर आप जहाँ चाहें जायें। आप-जैसे महात्माका भार तो वेदमन्त्र ही वहन करते हैं ॥ ४९ ॥

वामदेव उवाच

छन्दांसि वै मादृशं संवहन्ति

लोकेऽमुष्मिन् पार्थिव यानि सन्ति । अस्मिंस्तु लोके मम यानमेत- दस्मद्विधानामपरेषां च राजन् ॥ ५० ॥ वामदेवने कहा— राजन्! इसमें संदेह नहीं कि हम-जैसे लोगोंके लिये वेदके मन्त्र ही वाहनका काम देते हैं। परंतु वे परलोकमें ही उपलब्ध होते हैं। इस लोकमें तो हम-जैसे लोगोंके तथा दूसरोंके लिये भी ये अश्व ही वाहन होते हैं ॥ ५० ॥

राजोवाच

चत्वारस्त्वां वा गर्दभाः संवहन्तु श्रेष्ठाश्वतर्यो हरयो वातरंहाः । तैस्त्वं याहि क्षत्रियस्यैष वाहो ममैव वाम्यौ न तवैतौ हि विद्धि ॥ ५१ ॥ राजाने कहा— ब्रह्मन्! तब चार गधे, अच्छी जातिकी खच्चरियाँ या वायुके समान वेगशाली दूसरे घोड़े आपकी सवारीके लिये प्रस्तुत हो सकते हैं। इन्हीं वाहनोंद्वारा आप यात्रा करें। यह वाहन, जिसे आप माँगने आये हैं, क्षत्रिय नरेशके ही योग्य हैं। इसलिये आप यह समझ लें कि ये वाम्य अश्व मेरे ही हैं, आपके नहीं ॥ ५१ ॥

वामदेव उवाच

घोरं व्रतं ब्राह्मणस्यैतदाहु- रेतद् राजन् यदिहाजीवमानः । अयस्मया घोररूपा महान्त- श्चत्वारो वा यातुधानाः सुरौद्राः । मया प्रयुक्तास्त्वद्वधमीप्समाना वहन्तु त्वां शितशूलाश्चतुर्धा ॥ ५२ ॥ वामदेव बोले— राजन्! तुम ब्राह्मणोंके इस धनको हड़पकर जो अपने उपयोगमें लाना चाहते हो, यह बड़ा भयंकर कर्म कहा गया है। यदि मेरे घोड़े वापस न दोगे तो मेरी आज्ञा पाकर विकराल रूपधारी तथा लौह-शरीरवाले अत्यन्त भयंकर चार बड़े-बड़े राक्षस हाथोंमें तीखे त्रिशूल लिये तुम्हारे वधकी इच्छासे टूट पड़ेंगे और तुम्हारे शरीरके चार टुकड़े करके उठा ले जायँगे ॥ ५२ ॥

राजोवाच

ये त्वां विदुर्ब्राह्मणं वामदेव वाचा हन्तुं मनसा कर्मणा वा । ते त्वां सशिष्यमिह पातयन्तु

मद्वाक्यनुन्नाःशितशूलासिहस्ताः ॥ ५३ ॥
राजाने कहा— वामदेवजी! आप ब्राह्मण हैं तो भी मन, वाणी एवं क्रियाद्वारा मुझे मारनेको उद्यत हैं, इसका पता हमारे जिन सेवकोंको चल गया है, वे मेरी आज्ञा पाते ही हाथोंमें तीखे त्रिशूल तथा तलवार लेकर शिष्योंसहित आपको पहले ही यहाँ मार गिरावेंगे ॥ ५३ ॥

वामदेव उवाच

ममैतौ वाम्यौ प्रतिगृह्य राजन्
पुनर्ददानीति प्रपद्य मे त्वम् ।
प्रयच्छ शीघ्रं मम वाम्यौ त्वमश्वौ
यद्यात्मानं जीवितुं ते क्षमं स्यात् ॥ ५४ ॥
वामदेव बोले— राजन्! तुमने जब ये मेरे दोनों घोड़े लिये थे, उस समय यह प्रतिज्ञा की थी मैं इन्हें पुनः लौटा दूँगा। ऐसी दशामें यदि अपने-आपको तुम जीवित रखना चाहते हो तो मेरे दोनों वाम्यसंज्ञक घोड़े वापस दे दो ॥ ५४ ॥

राजोवाच

न ब्राह्मणेभ्यो मृगया प्रसूता
न त्वानुशास्म्यद्यप्रभृति ह्यसत्यम् ।
तवैवाज्ञां सम्प्रणिधाय सर्वां
तथा ब्रह्मन् पुण्यलोकं लभेयम् ॥ ५५ ॥
राजा बोले— ब्रह्मन्! (ये घोड़े शिकारके उपयोग में आने योग्य हैं और) ब्राह्मणोंके लिये शिकार खेलनेकी विधि नहीं है। यद्यपि आप मिथ्यावादी हैं, तो भी मैं आपको दण्ड नहीं दूँगा और आजसे आपके सारे आदेशोंका पालन करूँगा, जिससे मुझे पुण्यलोककी प्राप्ति हो (परन्तु ये घोड़े आपको नहीं मिल सकते) ॥ ५५ ॥

वामदेव उवाच

नानुयोगा ब्राह्मणानां भवन्ति
वाचा राजन् मनसा कर्मणा वा ।
यस्त्वेवं ब्रह्म तपसान्वेति विद्वां-
स्तेन श्रेष्ठो भवति हि जीवमानः ॥ ५६ ॥
वामदेवने कहा— राजन्! मन, वाणी अथवा क्रियाद्वारा कोई भी अनुशासन या दण्ड ब्राह्मणोंपर लागू नहीं हो सकता। जो इस प्रकार जानकर कष्टसहनपूर्वक ब्राह्मणकी सेवा करता है; वह उस ब्राह्मणसेवारूप कर्मसे ही श्रेष्ठ होता और जीवित रहता है ॥ ५६ ॥

मार्कण्डेय उवाच

एवमुक्ते वामदेवेन राजन् समुत्तस्थू राक्षसा घोररूपाः । तैः शूलहस्तैर्वध्यमानः स राजा प्रोवाचेदं वाक्यमुच्चैस्तदानीम् ॥ ५७ ॥ **मार्कण्डेयजी कहते हैं—**राजन्! वामदेवकी यह बात पूर्ण होते ही विकराल रूपधारी चार राक्षस वहाँ प्रकट हो गये। उनके हाथमें त्रिशूल थे। जब वे राजापर चोट करने लगे, तब राजाने उच्च स्वरसे यह बात कही— ॥ ५७ ॥

इक्ष्वाकवो यदि वा मां त्यजेयु- र्विधेया मे यदि चेमे विशोऽपि । नोत्स्रक्ष्येऽहं वामदेवस्य वाम्यौ नैवंविधा धर्मशीला भवन्ति ॥ ५८ ॥ ‘यदि ये इक्ष्वाकुवंशके लोग तथा मेरे आज्ञापालक प्रजावर्गके मनुष्य भी मेरा त्याग कर दें, तो भी मैं वामदेवके इन वाम्य संज्ञक घोड़ोंको कदापि नहीं दूँगा; क्योंकि इनके-जैसे लोग धर्मात्मा नहीं होते हैं’ ॥ ५८ ॥

एवं ब्रुवन्नेव स यातुधानै- र्हतो जगामाशु महीं क्षितीशः । ततो विदित्वा नृपतिं निपातित- मिक्ष्वाकवो वै दलमभ्यषिञ्चन् ॥ ५९ ॥ ऐसा कहते ही राजा शल उन राक्षसोंसे मारे जाकर तुरंत धराशायी हो गये। इक्ष्वाकुवंशी क्षत्रियोंको जब यह मालूम हुआ कि राजा मार गिराये गये, तब उन्होंने उनके छोटे भाई दलका राज्याभिषेक कर दिया ॥ ५९ ॥

राज्ये तदा तत्र गत्वा स विप्रः प्रोवाचेदं वचनं वामदेवः । दलं राजानं ब्राह्मणानां हि देय- मेवं राजन् सर्वधर्मेषु दृष्टम् ॥ ६० ॥ तब पुनः उस राज्यमें जाकर विप्रवर वामदेवने राजा दलसे यह बात कही—‘महाराज! ब्राह्मणोंकी वस्तु उन्हें दे दी जाय, यह बात सभी धर्मोंमें देखी गयी है ॥ ६० ॥

बिभेषि चेत् त्वमधर्मान्नरेन्द्र प्रयच्छ मे शीघ्रमेवाद्य वाम्यौ । एतच्छ्रुत्वा वामदेवस्य वाक्यं स पार्थिवः सूतमुवाच रोषात् ॥ ६१ ॥ ‘नरेन्द्र! यदि तुम अधर्मसे डरते हो तो मुझे अभी शीघ्रतापूर्वक मेरे वाम्य अश्वोंको लौटा दो।’ वामदेवकी यह बात सुनकर राजाने रोषपूर्वक अपने सारथिसे कहा— ॥ ६१ ॥

एकं हि मे सायकं चित्ररूपं दिग्धं विषेणाहर संगृहीतम् । येन विद्धो वामदेवः शयीत संदश्यमानः श्वभिरार्तरूपः ॥ ६२ ॥ ‘सूत! एक अद्भुत बाण ले आओ, जो विषमें बुझाकर रखा गया हो, जिससे घायल होकर यह वामदेव धरतीपर लोट जाय। इसे कुत्ते नोच-नोचकर खायँ और यह पृथ्वीपर पड़ा-पड़ा पीड़ासे छटपटाता रहे’ ॥ ६२ ॥

वामदेव उवाच

जानामि पुत्रं दशवर्षं तवाहं जातं महिष्यां श्येनजितं नरेन्द्र । तं जहि त्वं मद्वचनात् प्रणुन्न- स्तूर्ण प्रियं सायकैर्घोररूपैः ॥ ६३ ॥ वामदेवने कहा—नरेन्द्र! मैं जानता हूँ, तुम्हारी रानीके गर्भसे श्येनजित् नामक एक पुत्र पैदा हुआ है, जो तुम्हें बहुत प्रिय है और जिसकी अवस्था दस वर्षकी हो गयी है। तुम मेरी आज्ञासे प्रेरित होकर इन भयंकर बाणोंद्वारा अपने उसी पुत्रका शीघ्र वध करोगे ॥ ६३ ॥

मार्कण्डेय उवाच

एवमुक्तो वामदेवेन राज- न्नन्तःपुरे राजपुत्रं जघान । स सायकस्तिग्मतेजा विसृष्टः श्रुत्वा दलस्तत्र वाक्यं बभाषे ॥ ६४ ॥ मार्कण्डेयजी कहते हैं—राजन्! वामदेवके ऐसा कहते ही उस प्रचण्ड तेजस्वी बाणने धनुषसे छूटकर रनवासके भीतर जा राजकुमारका वध कर डाला। यह समाचार सुनकर दलने वहाँ पुनः इस प्रकार कहा— ॥ ६४ ॥

राजोवाच

इक्ष्वाकवो हन्त चरामि वः प्रियं निहन्मीमं विप्रमद्य प्रमथ्य । आनीयतामपरस्तिग्मतेजाः पश्यध्वं मे वीर्यमद्य क्षितीशाः ॥ ६५ ॥ राजाने कहा—इक्ष्वाकुवंशी क्षत्रियो! मैं अभी तुम्हारा प्रिय करता हूँ। आज इस ब्राह्मणको रौंदकर मार डालूँगा। एक-दूसरा तेजस्वी बाण ले आओ और आज मेरा पराक्रम

देखो ।। ६५ ।।

वामदेव उवाच

यत् त्वमेनं सायकं घोररूपं विषेण दिग्धं मम संदधासि । न त्वेतं त्वं शरवर्षं विमोक्तुं संधातुं वा शक्यसे मानवेन्द्र ।। ६६ ।। **वामदेवजीने कहा—**नरेश्वर! तुम विषके बुझाये हुए इस विकराल बाणको मुझे मारनेके लिये धनुषपर चढ़ा रहे हो, परंतु मैं कहे देता हूँ 'इस बाणको न तो तुम धनुषपर रख सकोगे और न छोड़ ही सकोगे' ।। ६६ ।।

राजोवाच

इक्ष्वाकवः पश्यत मां गृहीतं न वै शक्नोम्येष शरं विमोक्तुम् । न चास्य कर्तुं नाशमभ्युत्सहामि आयुष्मान् वै जीवतु वामदेवः ।। ६७ ।। **राजा बोले—**इक्ष्वाकुवंशी क्षत्रियो! देखो, मैं फँस गया। अब यह बाण नहीं छोड़ सकूँगा। इसलिये वामदेवको नष्ट करनेका उत्साह जाता रहा। अतः यह महर्षि दीर्घायु होकर जीवित रहे ।। ६७ ।।

वामदेव उवाच

संस्पृश्यैनां महिषीं सायकेन ततस्तस्मादेनसो मोक्ष्यसे त्वम् । ततस्तथा कृतवान् पार्थिवस्तु ततो मुनिं राजपुत्री बभाषे ।। ६८ ।। **वामदेवजीने कहा—**राजन्! तुम इस बाणसे अपनी रानीका स्पर्श कर लेनेपर ब्रह्महत्याके पापसे छूट जाओगे। तब राजाने ऐसा ही किया। तदनन्तर राजपुत्रीने मुनिसे कहा ।। ६८ ।।

राजपुत्र्युवाच

यथा युक्ता वामदेवाहमैनं दिने दिने संदिशन्ती नृशंसम् । ब्राह्मणेभ्यो मृगयती सूनृतानि तथा ब्रह्मन् पुण्यलोकं लभेयम् ।। ६९ ।।

**राजपुत्री बोली—**वामदेवजी! मैं इन कठोर स्वभाववाले अपने स्वामीको प्रतिदिन सावधान रहकर मीठे वचन बोलनेकी सलाह देती रहती हूँ और स्वयं ब्राह्मणोंकी सेवाका अवसर ढूँढ़ती हूँ। ब्रह्मन्! इन सत्कर्मोंके कारण मुझे पुण्यलोककी प्राप्ति हो ॥ ६९ ॥

वामदेव उवाच

त्वया त्रातं राजकुलं शुभेक्षणे
वरं वृणीष्वाप्रतिमं ददानि ते ।
प्रशाधीमं स्वजनं राजपुत्रि
इक्ष्वाकुराज्यं सुमहच्चाप्यनिन्द्ये ॥ ७० ॥

**वामदेवने कहा—**शुभ दृष्टिवाली अनिन्द्य राजकुमारी! तुमने इस राजकुलको ब्राह्मणके कोपसे बचा लिया। इसके लिये कोई अनुपम वर माँगो। मैं तुम्हें अवश्य दूँगा। तुम इन स्वजनोंके हृदय और विशाल इक्ष्वाकु-राज्यपर शासन करो ॥ ७० ॥

राजपुत्र्युवाच

वरं वृणे भगवंस्त्वेवमेष
विमुच्यतां किल्बिषादद्य भर्ता ।
शिवेन चाध्याहि सपुत्रबान्धवं
वरो वृतो ह्येष मया द्विजाग्र्य ॥ ७१ ॥

**राजकुमारी बोली—**भगवन्! मैं यही चाहती हूँ कि मेरे ये पति आज सब पापोंसे छुटकारा पा जायँ। आप यह आशीर्वाद दें कि ये पुत्र और बन्धु-बान्धवोंसहित सुखसे रहें। विप्रवर! मैंने आपसे यही वर माँगा है ॥ ७१ ॥

मार्कण्डेय उवाच

श्रुत्वा वचः स मुनी राजपुत्र्या-
स्तथास्त्विति प्राह कुरुप्रवीर ।
ततः स राजा मुदितो बभूव
वाम्यौ चास्मै प्रददौ सम्प्रणम्य ॥ ७२ ॥

**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**कुरुकुलके प्रमुख वीर युधिष्ठिर! राजपुत्रीकी यह बात सुनकर वामदेव मुनिने कहा—'ऐसा ही होगा।' तब राजा दल बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने महर्षिको प्रणाम करके वे दोनों वाम्य अश्व उन्हें लौटा दिये ॥ ७२ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि मण्डूकोपाख्याने
द्विनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १९२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें
मण्डूकोपाख्यानविषयक एक सौ बानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १९२ ॥

इन्द्र और बक मुनिका संवाद

⬅ विषय-सूची (TOC)

त्रिनवत्यधिकशततमोऽध्यायः

इन्द्र और बक मुनिका संवाद

वैशम्पायन उवाच

मार्कण्डेयमृषयो ब्राह्मणा युधिष्ठिरश्च पर्यपृच्छन्नृषिः केन दीर्घायुरासीद् बको मार्कण्डेयस्तु तान् सर्वानुवाच ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! एक दिन ऋषियों, ब्राह्मणों तथा युधिष्ठिरने मार्कण्डेय मुनिसे पूछा—'ब्रह्मन्! महर्षि बक कैसे दीर्घायु हुए थे?' तब मार्कण्डेयजीने उन सबसे कहा— ॥ १ ॥

महातपा दीर्घायुश्च बको राजन् नात्र कार्या विचारणा ॥ २ ॥

'राजन्! बक महान् तपस्वी होनेके कारण दीर्घायु हुए थे। इस विषयमें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये' ॥ २ ॥

एतच्छ्रुत्वा तु कौन्तेयो भ्रातृभिः सह भारत ।
मार्कण्डेयं पर्यपृच्छद् धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥ ३ ॥

भरतनन्दन जनमेजय! मार्कण्डेयजीका यह कथन सुनकर भाइयोंसहित कुन्तीकुमार धर्मराज युधिष्ठिरने मार्कण्डेयजीसे पुनः पूछा— ॥ ३ ॥

श्रूयते हि महाभाग बको दाल्भ्यो महातपाः ।
प्रियः सखा च शक्रस्य चिरजीवी च सत्तम ॥ ४ ॥

महाभाग मुनिश्रेष्ठ! दल्भके पुत्र महातपस्वी बक ऋषि चिरजीवी तथा देवराज इन्द्रके प्रिय मित्र सुने जाते हैं ॥ ४ ॥

एतदिच्छामि भगवन् बकशक्रसमागमम् ।
सुखदुःखसमायुक्तं तत्त्वेन कथयस्व मे ॥ ५ ॥

'भगवन्! बक और इन्द्रका यह समागम (चिरजीवी पुरुषोंके) सुख और दुःखकी वार्तासे युक्त कहा गया है। मैं इसे सुनना चाहता हूँ; आप यथार्थरूपसे इसका वर्णन करें' ॥ ५ ॥

मार्कण्डेय उवाच

वृत्ते देवासुरे राजन् संग्रामे लोमहर्षणे ।
त्रयाणामपि लोकानामिन्द्रो लोकाधिपोऽभवत् ॥ ६ ॥

मार्कण्डेयजी बोले— राजन्! जब रोंगटे खड़े कर देनेवाला देवासुर-संग्राम समाप्त हो गया, उस समय लोकपाल इन्द्र तीनों लोकोंके अधिपति बना दिये गये ॥ ६ ॥

सम्यग् वर्षति पर्जन्ये सस्यसम्पद उत्तमाः ।

निरामयाः सुधर्मिष्ठाः प्रजा धर्मपरायणाः ॥ ७ ॥ इन्द्रके शासनकालमें मेघ ठीक समयपर अच्छी वर्षा करते और खेतीकी उपज अच्छी होती थी। सारी प्रजा रोग-व्याधिसे रहित, धर्ममें स्थित तथा धर्मको ही अपना परम आश्रय माननेवाली थी ॥ ७ ॥

मुदितश्च जनः सर्वः स्वधर्मेषु व्यवस्थितः । ताः प्रजा मुदिताः सर्वा दृष्ट्वा बलनिषूदनः ॥ ८ ॥ ततस्तु मुदितो राजन् देवराजः शतक्रतुः । ऐरावतं समास्थाय ताः पश्यन् मुदिताः प्रजाः ॥ ९ ॥ सब लोग बड़ी प्रसन्नताके साथ अपने-अपने धर्मोंमें स्थित रहते थे। अपनी उन सारी प्रजाको आनन्दित देखकर बलासुरके शत्रु देवराज इन्द्र बड़ी प्रसन्नताका अनुभव करते थे। एक दिनकी बात है, इन्द्र ऐरावत हाथीपर आरूढ़ हो चैनसे दिन बिताती हुई अपनी प्रजाको देखनेके लिये भ्रमण करने लगे ॥ ८-९ ॥

आश्रमांश्च विचित्रांश्च नदींश्च विविधाः शुभाः । नगराणि समृद्धानि खेटान् जनपदांस्तथा ॥ १० ॥ प्रजापालनदक्षांश्च नरेन्द्रान् धर्मचारिणः । उदपानं प्रपा वापी तडागानि सरांसि च ॥ ११ ॥ नाना ब्रह्मसमाचारैः सेवितानि द्विजोत्तमैः । ततोऽवतीर्य रम्यायां पृथ्व्यां राजञ्छतक्रतुः ॥ १२ ॥ राजन्! विचित्र आश्रमों, नाना प्रकारकी कल्याण-कारिणी नदियों, समृद्धिशाली नगरों, गाँवों, जनपदों, प्रजापालन-कुशल धर्मात्मा नरेशों, कुओं, पौसलों, बावलियों, तालाबों तथा ब्रह्मचर्यपरायण श्रेष्ठ ब्राह्मणोंद्वारा सेवित अनेकानेक सरोवरोंका अवलोकन करते हुए शतक्रतु इन्द्र एक रमणीय भूभागमें उतरे ॥ १०—१२ ॥

तत्र रम्ये शिवे देशे बहुवृक्षसमाकुले । पूर्वस्यां दिशि रम्यायां समुद्राभ्याशतो नृप ॥ १३ ॥ तत्राश्रमपदं रम्यं मृगद्विजनिषेवितम् । तत्राश्रमपदे रम्ये बकं पश्यति देवराट् ॥ १४ ॥ राजन्! परम सुन्दर पूर्वदिशामें समुद्रके निकट एक मनोहर एवं सुखद स्थानमें, जो बहुत-से वृक्षोंसे घिरा हुआ था, एक रमणीय आश्रम दिखायी दिया, जहाँ बहुत-से पशु और पक्षी निवास करते थे। देवराज इन्द्रने उस रमणीय आश्रममें जाकर बक मुनिका दर्शन किया ॥

बकस्तु दृष्ट्वा देवेन्द्रं दृढं प्रीतमनाभवत् । पाद्यासनार्घ्यदानेन फलमूलैरथार्चयत् ॥ १५ ॥

देवराज इन्द्रको उपस्थित देख बकके हृदयमें दृढ़ प्रेम उत्पन्न हुआ। उन्होंने पाद्य, आसन, अर्घ्य और फल-मूलादि देकर देवराजका पूजन किया ।। १५ ।। सुखोपविष्टो वरदस्ततस्तु बलसूदनः । ततः प्रश्नं बकं देव उवाच त्रिदशेश्वरः ॥ १६ ॥ सबको वर देनेवाले बलनिषूदन देवेश्वर इन्द्र जब सुखपूर्वक आसनपर बैठ गये, तब वे मुनिवर बकसे इस प्रकार बोले— ।। १६ ।।

शतं वर्षसहस्राणि मुने जातस्य तेऽनघ । समाख्याहि मम ब्रह्मन् किं दुःखं चिरजीविनाम् ॥ १७ ॥ ‘निष्पाप मुने! आपकी अवस्था एक लाख वर्षकी हो गयी। ब्रह्मन्! आप अपने अनुभवके आधारपर यह बताइये कि चिरजीवी मनुष्योंको क्या दुःख होता है’? ।।

बक उवाच

अप्रियैः सह संवासः प्रियैश्चापि विनाभवः । असद्भिः सम्प्रयोगश्च तद् दुःखं चिरजीविनाम् ॥ १८ ॥ **बकने कहा—**देवेश्वर! अप्रिय मनुष्योंके साथ रहना पड़ता है। प्रियजनोंकी मृत्यु हो जानेसे उनके वियोगका दुःख सहते हुए जीवन व्यतीत करना पड़ता है और दुष्ट मनुष्योंका

संग प्राप्त होता है। चिरजीवी मनुष्योंके लिये यही महान् दुःख है ।। १८ ।। पुत्रदारविनाशोऽत्र ज्ञातीनां सुहृदामपि । परेष्वायत्तताकृच्छ्रं किं नु दुःखतरं ततः ।। १९ ।। अपनी आँखोंके सामने स्त्री और पुत्रोंकी मृत्यु होती है। भाई-बन्धु आदि जातिके लोगों और सुहृदोंका सदाके लिये वियोग हो जाता है तथा जीवन-निर्वाहके लिये दूसरोंके अधीन रहकर उनके तिरस्कारका कष्ट भोगना पड़ता है। इससे बढ़कर महान् दुःख और क्या हो सकता है? ।। १९ ।। नान्यद् दुःखतरं किञ्चिल्लोकेषु प्रतिभाति मे । अर्थैर्विहीनः पुरुषः परैः सम्परिभूयते ।। २० ।। निर्धन मनुष्यको जो दूसरोंसे तिरस्कृत होना पड़ता है, इससे बढ़कर महान् कष्टकी बात संसारमें मुझे और कोई नहीं जान पड़ती है ।। २० ।। अकुलानां कुले भावं कुलीनानां कुलक्षयम् । संयोगं विप्रयोगं च पश्यन्ति चिरजीविनः ।। २१ ।। चिरजीवी मनुष्य अकुलीनोंके कुलकी उन्नति, कुलीनोंके कुलका संहार तथा संयोग और वियोग देखते रहते हैं ।। २१ ।। अपि प्रत्यक्षमेवैतत् तव देव शतक्रतो । अकुलानां समृद्धानां कथं कुलविपर्ययः ।। २२ ।। देव शतक्रतो! आप भी तो यह प्रत्यक्ष ही देख रहे हैं कि किस प्रकार समृद्धिशाली अकुलीन मनुष्योंके कुलमें उलट-फेर हो जाता है ।। २२ ।। देवदानवगन्धर्वमनुष्योरगराक्षसाः । प्राप्नुवन्ति विपर्यासं किं नु दुःखतरं ततः ।। २३ ।। देवता, दानव, गन्धर्व, मनुष्य, नाग तथा राक्षस—ये सभी विपरीत अवस्थामें पहुँचकर क्यासे क्या हो जाते हैं? इससे बढ़कर महान् दुःख और क्या होगा? ।। २३ ।। कुले जाताश्च क्लिश्यन्ते दौष्कुलेयवशानुगाः । आढ्यैर्दरिद्राश्चाक्रान्ताः किं नु दुःखतरं ततः ।। २४ ।। कुलीन मनुष्य भी नीच कुलके लोगोंके वशमें पड़कर क्लेश उठा रहे हैं और धनीलोग दरिद्रोंको सताते हैं। इससे बढ़कर दुःखकी बात और क्या हो सकती है? ।। २४ ।। लोके वैधर्म्यमेतत् तु दृश्यते बहुविस्तरम् । हीनज्ञानाश्च हृष्यन्ते क्लिश्यन्ते प्राज्ञकोविदाः ।। २५ ।। बहुदुःखपरिक्लेशं मानुष्यमिह दृश्यते । लोकमें यह विपरीत अवस्था बहुत अधिक दिखायी देती है। ज्ञानहीन मूढ़ मनुष्य तो मौज करते हैं और श्रेष्ठ ज्ञानी मनुष्य क्लेश भोग रहे हैं। यहाँ मानवयोनिमें दुःख और क्लेशकी अधिकता ही दृष्टिगोचर होती है ।। २५ १/२ ।।

इन्द्र उवाच

पुनरेव महाभाग देवर्षिगणसेवित ॥ २६ ॥
समाख्याहि मम ब्रह्मन् किं सुखं चिरजीविनाम् ।
इन्द्रने पूछा— महाभाग! देवता तथा ऋषियोंके समुदाय आपकी सेवामें उपस्थित रहते हैं। ब्रह्मन्! अब मुझसे फिर यह बताइये कि चिरजीवी मनुष्योंको क्या सुख मिलता है? ॥ २६ ½ ॥

बक उवाच

अष्टमे द्वादशे वापि शाकं यः पचते गृहे ॥ २७ ॥
कुमित्रान्यनपाश्रित्य किं वै सुखतरं ततः ।
यत्राहानि न गण्यन्ते नैनमाहुर्महाशनम् ॥ २८ ॥
बकने कहा— जो दिनके आठवें या बारहवें भागमें अपने घरपर भोजनके लिये केवल शाक पका लेता है परंतु कुमित्रोंकी शरणमें नहीं जाता, उस पुरुषको जो सुख प्राप्त है, उससे बढ़कर सुख और क्या हो सकता है? जहाँ दिन नहीं गिने जाते—जहाँ प्रतिदिन अन्नकी प्राप्तिके लिये चिन्ता नहीं करनी पड़ती; वही सुखी है। उसे लोग अधिक खानेवाला अथवा पेटू नहीं कहते हैं ॥ २७-२८ ॥

अपि शाकं पचानस्य सुखं वै मघवन् गृहे ।
अर्जितं स्वेन वीर्येण नाप्यपाश्रित्य कञ्चन ॥ २९ ॥
इन्द्र! जो अपने पराक्रमसे उपार्जन करके घरमें केवल शाक बनाकर खाता है, परंतु दूसरे किसीका सहारा नहीं लेता, उसे ही सुख है ॥ २९ ॥

फलशाकमपि श्रेयो भोक्तुं ह्यकृपणं गृहे ।
परस्य तु गृहे भोक्तुः परिभूतस्य नित्यशः ॥ ३० ॥
सुमृष्टमपि न श्रेयो विकल्पोऽयमतः सताम् ।
श्ववत् कीलालपो यस्तु परान्नं भोक्तुमिच्छति ॥ ३१ ॥
धिगस्तु तस्य तद् भुक्तं कृपणस्य दुरात्मनः ।
दूसरेके सामने दीनता न दिखाकर अपने घरमें फल और शाक खाकर रहना अच्छा है। परंतु दूसरेके घरमें सदा तिरस्कार सहकर मीठे पकवान खाना भी अच्छा नहीं है; अतः दूसरेके आश्रित रहकर जीवन-निर्वाह करनेके सम्बन्धमें साधु पुरुषोंका सदासे ही विरोध रहा है। जो पराया अन्न खाना चाहता है, वह कुत्तेकी भाँति खून चाटता है। उस दुरात्मा और कृपणके वैसे भोजनको धिक्कार है ॥ ३०-३१ ½ ॥

यो दत्त्वातिथिभूतेभ्यः पितृभ्यश्च द्विजोत्तमः ॥ ३२ ॥
शिष्टान्यन्नानि यो भुङ्क्ते किं वै सुखतरं ततः ।
अतो मृष्टतरं नान्यत् पूतं किञ्चिच्छतक्रतो ॥ ३३ ॥

जो श्रेष्ठ द्विज सदा अतिथियों, भूत-प्राणियों तथा पितरोंको अर्पण करके अर्थात् बलिवैश्वदेव करके शेष अन्न स्वयं भोजन करता है, उससे बढ़कर महान् सुख और क्या हो सकता है? देवेन्द्र! इस यज्ञशेष अन्नसे बढ़कर अत्यन्त मधुर और पवित्र दूसरा कोई भोजन नहीं है॥

दत्त्वा यस्त्वतिथिभ्यो वै भुङ्क्ते तेनैव नित्यशः ।
यावतो ह्यन्धसः पिण्डानश्नाति सततं द्विजः ॥ ३४ ॥
तावतां गोसहस्राणां फलं प्राप्नोति दायकः ।
यदेनो यौवनकृतं तत् सर्वं नश्यते ध्रुवम् ॥ ३५ ॥

जो प्रतिदिन अतिथियोंको देकर शेष अन्नसे ही भोजनका काम चलाता है, उसके अन्नके जितने ग्रास अतिथि ब्राह्मण नित्य भोजन करता है, उतने ही हजार गौओंके दानका पुण्य उस दाताको प्राप्त होता है, तथा उसके द्वारा युवावस्थामें जो पाप हुए होते हैं, वे सब निश्चय ही नष्ट हो जाते हैं ॥ ३४-३५ ॥

सदक्षिणस्य भुक्तस्य द्विजस्य तु करे गतम् ।
यद् वारि वारिणा सिञ्चेत् तद्ध्येनस्तरते क्षणात् ॥ ३६ ॥

ब्राह्मणके भोजन कर लेनेपर जो उसे दक्षिणा दी जाती है, उस समय उसके हाथमें जो प्रतिग्रहका जल रहता है, उसे दाता पुनः उत्सर्गके जलसे सींचे। ऐसा करनेसे वह तत्काल सब पापोंसे छूट जाता है ॥ ३६ ॥

एताश्चान्याश्च वै बह्वीः कथयित्वा कथाः शुभाः ।
बकेन सह देवेन्द्र आपृच्छ्य त्रिदिवं गतः ॥ ३७ ॥

इस प्रकार देवराज इन्द्र बकके साथ ये तथा और बहुत-सी उत्तम कथा-वार्ताएँ करके उनसे आज्ञा लेकर स्वर्गलोकको चले गये ॥ ३७ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि ब्राह्मणमहाभाग्ये बकशक्रसंवादे त्रिनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १९३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेय समास्यापर्वमें ब्राह्मणोंके माहात्म्यके सम्बन्धमें बक-इन्द्रसंवादविषयक एक सौ तिरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १९३ ॥

१९४-

⬅ विषय-सूची (TOC)

चतुर्नवत्यधिकशततमोऽध्यायः

क्षत्रिय राजाओंका महत्त्व—सुहोत्र और शिबिकी प्रशंसा

वैशम्पायन उवाच

ततः पाण्डवाः पुनर्मार्कण्डेयमूचुः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर पाण्डवोंने पुनः मार्कण्डेयजीसे प्रश्न किया ॥ १ ॥

कथितं ब्राह्मणमहाभाग्यं राजन्यमहाभाग्यमिदानीं शुश्रूषामह इति तानुवाच मार्कण्डेयो महर्षिः श्रूयता-मिति इदानीं राजन्यानां महाभाग्यमिति । कुरूणामन्य-तमः सुहोत्रो नाम राजा महर्षीनभिगम्य निवृत्य रथस्थमेव राजानमौशीनरं शिबिं ददर्शाभिमुखं तौ समेत्य परस्परेण यथावयः पूजां प्रयुज्य गुणसाम्येन परस्परेण तुल्यात्मानौ विदित्वान्योन्यस्य पन्थानं न ददतुस्तत्र नारदः प्रादुरासीत् किमिदं भवन्तौ परस्परस्य पन्थानमावृत्य तिष्ठत इति ॥ २ ॥
‘मुनिवर! आपने ब्राह्मणोंके माहात्म्यका तो वर्णन किया, अब हम क्षत्रियोंकी महत्ताके विषयमें इस समय कुछ सुनना चाहते हैं।' यह बात सुनकर महर्षि मार्कण्डेयने कहा—‘अच्छा सुनो। अब मैं क्षत्रियोंके माहात्म्यका वर्णन करता हूँ। कुरुवंशी क्षत्रियोंमें सुहोत्र नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं। एक दिन वे महर्षियोंका सत्संग करके जब वहाँसे लौट रहे थे, उस समय उन्होंने अपने सामने ही रथपर बैठे हुए उशीनरपुत्र राजा शिबिको देखा। निकट आनेपर उन दोनोंने अवस्थाके अनुसार एक-दूसरेका सम्मान किया। परंतु गुणमें अपनेको बराबर समझकर एकने दूसरेके लिये राह नहीं दी। इतनेहीमें वहाँ देवर्षि नारदजी प्रकट हो गये और पूछ बैठे ‘यह क्या बात है' जो कि तुम दोनों इस तरह एक-दूसरेका मार्ग रोककर खड़े हो?' ॥ २ ॥

तावूचतुर्नारदं नैतद् भगवन् पूर्वकर्मकर्त्रादिभि-र्विशिष्टस्य पन्था उपदिश्यते समर्थाय वा आवां च सख्यं परस्परेणोपगतौ तच्चावधानतोऽत्युत्कृष्टमधरो-त्तरं परिभ्रष्टं नारदस्त्वेवमुक्तः श्लोकत्रयमपठत्— ॥

‘तब उन दोनोंने नारदजीसे कहा—‘भगवन्! ऐसे बात नहीं है। पहलेके कर्म-कर्ताओं (धर्म-व्यवस्थापकों)-ने यह उपदेश दिया है कि जो अपनेसे सभी बातोंमें बढ़ा-चढ़ा हो या अधिक शक्तिशाली हो, उसीको मार्ग देना चाहिए। हम दोनों एक-दूसरेसे मित्रभाव रखकर मिले हैं। विचार करनेपर हम यह निर्णय नहीं कर पाते कि हम दोनोंमेंसे कौन अत्यन्त श्रेष्ठ है और कौन उसकी अपेक्षा अधिक छोटा?’ उनके ऐसा कहनेपर नारदजीने तीन श्लोक पढ़े ।। ३ ।।

क्रूरः कौरव्य मृदवे
मृदुः क्रूरे च कौरव ।
साधुश्चासाधवे साधुः
साधवे नाप्नुयात् कथम् ।। ४ ।।

‘उनका सारांश इस प्रकार है—कौरव! अपने साथ कोमलताका बर्ताव करनेवालेके लिये क्रूर मनुष्य भी कोमल बन जाता है। क्रूरतापूर्ण बर्ताव तो वह क्रूर मनुष्योंके प्रति ही

करता है, परंतु साधु पुरुष दुष्टोंके प्रति भी साधुताका ही बर्ताव करता है। फिर वह साधु पुरुषोंके साथ साधुताका बर्ताव कैसे नहीं अपनायेगा? ।।
कृतं शतगुणं कुर्या-
न्नास्ति देवेषु निर्णयः ।
औशीनरः साधुशीलो
भवतो वै महीपतिः ।। ५ ।।
‘मनुष्य भी चाहे तो वह अपने ऊपर किये हुए उपकारका बदला सौगुना करके चुका सकता है। देवताओंमें ही यह प्रत्युपकारका भाव होता है, ऐसा कोई नियम नहीं है। सुहोत्र! उशीनरपुत्र शिबिका शील-स्वभाव तुमसे कहीं अच्छा है ।। ५ ।।
जयेत् कदर्यं दानेन
सत्येनानृतवादिनम् ।
क्षमया क्रूरकर्माण-
मसाधुं साधुना जयेत् ।। ६ ।।
‘नीच प्रकृतिवाले मनुष्यको दान देकर वशमें करे। असत्यवादीको सत्य भाषणसे जीते। क्रूरको क्षमासे और दुष्टको उत्तम व्यवहारसे अपने वशमें करे ।। ६ ।।
तदुभावेव भवन्तावुदारौ व इदानीं भवद्भ्यामन्य-तमः सोऽपसर्पतु एतद् वै निदर्शनमित्युक्त्वा तूष्णीं नारदो बभूव । एतच्छ्रुत्वा तु कौरव्यः शिबिं प्रदक्षिणं कृत्वा पन्थानं दत्त्वा बहुकर्मभिः प्रशस्य प्रययौ ।। ७ ।।
‘अतः तुम दोनों ही उदार हो; इस समय तुम दोनोंमें से एक, जो अधिक उदार हो, वह मार्ग छोड़कर हट जाय; यही उदारताका आदर्श है।' ऐसा कहकर नारदजी चुप हो गये। यह सुनकर कुरुवंशी राजा सुहोत्रने शिबिको अपनी दायीं ओर करके मार्ग दे दिया और उनके अनेक सत्कर्मोंका उल्लेख करके उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए वे अपनी राजधानीको चले गये ।। ७ ।।
तदेतद् राज्ञो महाभाग्यमप्युक्तवान् नारदः ।। ८ ।।
‘इस प्रकार साक्षात् नारदजीने राजा शिबिकी महत्ताका अपने मुखसे वर्णन किया’ ।। ८ ।।

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि शिबिचरिते चतुर्नवत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १९४ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें शिबिचरितविषयक एक सौ चौरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १९४ ।।