भारतकोश
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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 754)

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महर्षि कपिलकी क्रोधाग्निमें सगरपुत्रोंका भस्म होना


महर्षि अगस्त्यका समुद्रपान

वासुदेवेति यं प्राहुः कपिलं मुनिपुङ्गवम् । स चक्षुर्विकृतं कृत्वा तेजस्तेषु समुत्सृजन् ।। ३२ ।। ददाह सुमहातेजा मन्दबुद्धीन् स सागरान् । मुनिप्रवर कपिल वे ही भगवान् विष्णु हैं जिन्हें वासुदेव कहते हैं। उन महातेजस्वीने विकराल आँखें करके अपना तेज उनपर छोड़ दिया और मन्दबुद्धि सगरपुत्रोंको जला दिया ।। ३२ ½ ।।

तान् दृष्ट्वा भस्मसाद् भूतान् नारदः सुमहातपाः ।। ३३ ।। सगरान्तिकमागच्छत् तच्च तस्मै न्यवेदयत् । स तच्छ्रुत्वा वचो घोरं राजा मुनिमुखोद्गतम् ।। ३४ ।। मुहूर्तं विमना भूत्वा स्थाणोर्वाक्यमचिन्तयत् । (स पुत्रनिधनोद्भूतदुःखेन समभिप्लुतः । आत्मानमात्मनाऽऽश्वास्य हयमेवान्वचिन्तयत् ।।) अंशुमन्तं समाहूय असमञ्जःसुतं तदा ।। ३५ ।। पौत्रं भरतशार्दूल इदं वचनमब्रवीत् । षष्टिस्तानि सहस्राणि पुत्राणाममितौजसाम् ।। ३६ ।।

कापिलं तेज आसाद्य मत्कृते निधनं गताः ।
तव चापि पिता तात परित्यक्तो मयानघ ।
धर्मं संरक्षमाणेन पौराणां हितमिच्छता ॥ ३७ ॥
उन्हें भस्म हुआ देख महातपस्वी नारदजी राजा सगरके समीप आये और उनसे सब समाचार निवेदित किया। मुनिके मुखसे निकले हुए इस घोर वचनको सुनकर राजा सगर दो घड़ीतक अनमने हो महादेवजीके कथनपर विचार करते रहे। पुत्रकी मृत्युजनित वेदनासे अत्यन्त दुखी हो स्वयं ही अपने-आपको सान्त्वना दे उन्होंने अश्वको ही ढूँढनेका विचार किया। भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर असमञ्जसके पुत्र अपने पौत्र अंशुमान्‌को बुलाकर यह बात कही—'तात! मेरे अमिततेजस्वी साठ हजार पुत्र मेरे ही लिये महर्षि कपिलकी क्रोधाग्निमें पड़कर नष्ट हो गये। अनघ! पुरवासियोंके हितकी रक्षा रखकर धर्मकी रक्षा करते हुए मैंने तुम्हारे पिताको भी त्याग दिया है' ॥ ३३—३७ ॥

युधिष्ठिर उवाच

किमर्थं राजशार्दूलः सगरः पुत्रमात्मजम् ।
त्यक्तवान् दुस्त्यजं वीरं तन्मे ब्रूहि तपोधन ॥ ३८ ॥
युधिष्ठिरने पूछा—तपोधन! नृपश्रेष्ठ सगरने किसलिये अपने दुस्त्यज वीर पुत्रका त्याग किया था, यह मुझे बताइये ॥ ३८ ॥

लोमश उवाच

असमञ्जा इति ख्यातः सगरस्य सुतो ह्यभूत् ।
यं शैब्या जनयामास पौराणां स हि दारकान् ॥ ३९ ॥
(क्रीडतः सहसाऽऽसाद्य तत्र तत्र महीपते ।)
गलेषु क्रोशतो गृह्य नद्यां चिक्षेप दुर्बलान् ।
ततः पौराः समाजग्मुर्भयशोकपरिप्लुताः ॥ ४० ॥
सगरं चाभ्यभाषन्त सर्वे प्राञ्जलयः स्थिताः ।
त्वं नस्त्राता महाराज परचक्रादिभिर्भयात् ॥ ४१ ॥
लोमशजीने कहा—राजन्! सगरका वह पुत्र जिसे रानी शैब्याने उत्पन्न किया था, असमञ्जसके नामसे विख्यात हुआ। वह जहाँ-तहाँ खेल-कूदमें लगे हुए पुरवासियोंके दुर्बल बालकोंके समीप सहसा पहुँच जाता और चीखते-चिल्लाते रहनेपर भी उनका गला पकड़कर उन्हें नदीमें फेंक देता था। तब समस्त पुरवासी भय और शोकमें मग्न हो राजा सगरके पास आये और हाथ जोड़े खड़े हो इस प्रकार कहने लगे—'महाराज! आप शत्रुसेना आदिके भयसे हमारी रक्षा करनेवाले हैं ॥ ३९—४१ ॥
असमञ्जोभयाद् घोरात् ततो नस्त्रातुमर्हसि ।
पौराणां वचनं श्रुत्वा घोरं नृपतिसत्तमः ॥ ४२ ॥

मुहूर्तं विमना भूत्वा सचिवानिदमब्रवीत् । असमञ्जाः पुरादद्य सुतो मे विप्रवास्यताम् ॥ ४३ ॥ ‘अतः असमंजसके घोर भयसे आप हमारी रक्षा करें!’ पुरवासियोंका यह भयंकर वचन सुनकर नृपश्रेष्ठ सगर दो घड़ीतक अनमने होकर बैठे रहे। फिर मन्त्रियोंसे इस प्रकार बोले—‘आज मेरे पुत्र असमंजसको मेरे घरसे बाहर निकाल दो’ ॥ ४२-४३ ॥

यदि वो मत्प्रियं कार्यमेतच्छीघ्रं विधीयताम् । एवमुक्ता नरेन्द्रेण सचिवास्ते नराधिप ॥ ४४ ॥ यथोक्तं त्वरिताश्चक्रुर्यथाऽऽज्ञापितवान् नृपः । एतत् ते सर्वमाख्यातं यथा पुत्रो महात्मना ॥ ४५ ॥ पौराणां हितकामेन सगरेण विवासितः । अंशुमांस्तु महेष्वासो यदुक्तः सगरेण हि । तत् ते सर्वं प्रवक्ष्यामि कीर्त्यमानं निबोध मे ॥ ४६ ॥ ‘यदि तुम्हें मेरा प्रिय कार्य करना है तो मेरी इस आज्ञाका शीघ्र पालन होना चाहिये।’ राजन्! महाराज सगरके ऐसा कहनेपर मन्त्रियोंने शीघ्र वैसा ही किया, जैसा उनका आदेश था। युधिष्ठिर! पुरवासियोंके हित चाहनेवाले महात्मा सगरने जिस प्रकार अपने पुत्रको निर्वासित किया था, वह सब प्रसंग मैंने तुमसे कह सुनाया। अब महाधनुर्धर अंशुमान्‌से राजा सगरने जो कुछ कहा, वह सब तुम्हें बता रहा हूँ, मेरे मुखसे सुनो ॥ ४४—४६ ॥

सगर उवाच

पितुश्च तेऽहं त्यागेन पुत्राणां निधनेन च । अलाभेन तथाश्वस्य परितप्यामि पुत्रक ॥ ४७ ॥ **सगर बोले—**बेटा! तुम्हारे पिताको त्याग देनेसे, अन्य पुत्रोंकी मृत्यु हो जानेसे तथा यज्ञसम्बन्धी अश्वके न मिलनेसे मैं सर्वथा संतप्त हो रहा हूँ ॥ ४७ ॥

तस्माद् दुःखाभिसंतप्तं यज्ञविघ्नाच्च मोहितम् । हयस्यानयनात् पौत्र नरकान्मां समुद्धर ॥ ४८ ॥ अतः पौत्र! यज्ञमें विघ्न पड़ जानेसे मैं मोहित और दुःखसे संतप्त हूँ। तुम अश्वको ले आकर नरकसे मेरा उद्धार करो ॥ ४८ ॥

अंशुमानेवमुक्तस्तु सगरेण महात्मना । जगाम दुःखार्त् तं देशं यत्र वै दारिता मही ॥ ४९ ॥ महात्मा सगरके ऐसा कहनेपर अंशुमान् बड़े दुःखसे उस स्थानपर गये जहाँ पृथ्वी विदीर्ण की गयी थी ॥ ४९ ॥

स तु तेनैव मार्गेण समुद्रं प्रविवेश ह । अपश्यच्च महात्मानं कपिलं तुरगं च तम् ॥ ५० ॥

उन्होंने उसी मार्गसे समुद्रमें प्रवेश किया और महात्मा कपिल तथा यज्ञिय अश्वको देखा ।। ५० ।।

स दृष्ट्वा तेजसो राशिं पुराणमृषिसत्तमम् । प्रणम्य शिरसा भूमौ कार्यमस्मै न्यवेदयत् ।। ५१ ।।

तेजोराशि मुनिप्रवर पुराणपुरुष कपिलजीका दर्शन करके अंशुमान्‌ने धरतीपर माथा टेककर प्रणाम किया और उनसे अपना कार्य बताया ।। ५१ ।।

ततः प्रीतो महाराज कपिलोंऽशुमतोऽभवत् । उवाच चैनं धर्मात्मा वरदोऽस्मीति भारत ।। ५२ ।।

भरतवंशी महाराज! इससे धर्मात्मा कपिलजी अंशुमान्‌पर प्रसन्न हो गये और बोले—'मैं तुम्हें वर देनेको उद्यत हूँ' ।। ५२ ।।

स वव्रे तुरगं तत्र प्रथमं यज्ञकारणात् । द्वितीयं वरकं वव्रे पितॄणां पावनेच्छया ।। ५३ ।।

अंशुमान्‌ने पहले तो यज्ञकार्यकी सिद्धिके लिये वहाँ उस अश्वके लिये प्रार्थना की और दूसरा वर अपने पितरोंको पवित्र करनेकी इच्छासे माँगा ।। ५३ ।।

तमुवाच महातेजाः कपिलो मुनिपुङ्गवः । ददानि तव भद्रं ते यद् यत् प्रार्थयसेऽनघ ।। ५४ ।। त्वयि क्षमा च धर्मश्च सत्यं चापि प्रतिष्ठितम् ।

त्वया कृतार्थः सगरः पुत्रवांश्च त्वया पिता ॥ ५५ ॥ तब मुनिश्रेष्ठ महातेजस्वी कपिलने अंशुमान्‌से कहा—'अनघ! तुम्हारा कल्याण हो। तुम जो कुछ माँगते हो वह सब तुम्हें दूँगा। तुममें क्षमा, धर्म और सत्य सब कुछ प्रतिष्ठित है। तुम-जैसे पौत्रको पाकर राजा सगर कृतार्थ हैं और तुम्हारे पिता तुम्हींसे वस्तुतः पुत्रवान् हैं ॥ ५४-५५ ॥

तव चैव प्रभावेण स्वर्गं यास्यन्ति सागराः । (शलभत्वं गता ह्येते मम क्रोधहुताशने ।) पौत्रश्च ते त्रिपथगां त्रिदिवादानयिष्यति ॥ ५६ ॥ पावनार्थं सागराणां तोषयित्वा महेश्वरम् । हयं नयस्व भद्रं ते यज्ञियं नरपुङ्गव ॥ ५७ ॥ 'तुम्हारे ही प्रभावसे सगरके सारे पुत्र जो मेरी क्रोधाग्निमें शलभकी भाँति भस्म हो गये हैं, स्वर्गलोकमें चले जायँगे। तुम्हारा पौत्र भगवान् शंकरको संतुष्ट करके सगरपुत्रोंको पवित्र करनेके लिये स्वर्गलोकसे यहाँ गंगाजीको ले आयेगा। नरश्रेष्ठ! तुम्हारा भला हो। तुम इस यज्ञिय अश्वको ले जाओ ॥ ५६-५७ ॥

यज्ञः समाप्यतां तात सगरस्य महात्मनः । अंशुमानेवमुक्तस्तु कपिलेन महात्मना ॥ ५८ ॥ आजगाम हयं गृह्य यज्ञवाटं महात्मनः । सोऽभिवाद्य ततः पादौ सगरस्य महात्मनः ॥ ५९ ॥ मूर्ध्नि तेनाप्युपाघ्रातस्तस्मै सर्वं न्यवेदयत् । यथा दृष्टं श्रुतं चापि सागराणां क्षयं तथा ॥ ६० ॥ तं चास्मै हयमाचष्ट यज्ञवाटमुपागतम् । तच्छ्रुत्वा सगरो राजा पुत्रजं दुःखमत्यजत् ॥ ६१ ॥ 'तात! महात्मा सगरका यज्ञ पूर्ण करो।' महात्मा कपिलके ऐसा कहनेपर अंशुमान् उस अश्वको लेकर महामना सगरके यज्ञमण्डपमें आये और उनके चरणोंमें प्रणाम करके उनसे सब समाचार निवेदन किया। सगरने भी स्नेहसे अंशुमान्‌का मस्तक सूँघा। अंशुमान्‌ने सगर-पुत्रोंका विनाश जैसा देखा और सुना था, वह सब बताया, साथ ही यह भी कहा कि 'यज्ञिय अश्व यज्ञमण्डपमें आ गया है।' यह सुनकर राजा सगरने पुत्रोंके मरनेका दुःख त्याग दिया ॥ ५८—६१ ॥

अंशुमन्तं च सम्पूज्य समापयत तं क्रतुम् । समाप्तयज्ञः सगरो देवैः सर्वैः सभाजितः ॥ ६२ ॥ और अंशुमान्‌की प्रशंसा करते हुए अपने उस यज्ञको पूर्ण किया। यज्ञ पूर्ण हो जानेपर सब देवताओंने सगरका बड़ा सत्कार किया ॥ ६२ ॥

पुत्रत्वे कल्पयामास समुद्रं वरुणालयम् ।

प्रशास्य सुचिरं कालं राज्यं राजीवलोचनः ॥ ६३ ॥
पौत्रे भारं समावेश्य जगाम त्रिदिवं तदा ।
अंशुमानपि धर्मात्मा महीं सागरमेखलाम् ॥ ६४ ॥
प्रशशास महाराज यथैवास्य पितामहः ।
तस्य पुत्रः समभवद् दिलीपो नाम धर्मवित् ॥ ६५ ॥
कमलके समान नेत्रोंवाले सगरने वरुणालय समुद्रको अपना पुत्र माना और दीर्घकालतक राज्यशासन करके अन्तमें अपने पौत्र अंशुमान्पर राज्यका सारा भार रखकर वे स्वर्गलोकको चले गये। महाराज! धर्मात्मा अंशुमान् भी अपने पितामहसगरके समान ही समुद्रसे घिरी हुई इस वसुधाका पालन करते रहे। उनके एक पुत्र हुआ जिसका नाम दिलीप था। वह भी धर्मका ज्ञाता था ॥ ६३-६५ ॥

तस्मै राज्यं समाधाय अंशुमानपि संस्थितः ।
दिलीपस्तु ततः श्रुत्वा पितॄणां निधनं महत् ॥ ६६ ॥
पर्यतप्यत दुःखेन तेषां गतिमचिन्तयत् ।
गङ्गावतरणे यत्नं सुमहच्चाकरोन्नृपः ॥ ६७ ॥
दिलीपको राज्य देकर अंशुमान् भी परलोक-वासी हुए। दिलीपके जब अपने पितरोंके महान् संहारका समाचार सुना, तब वे दुःखसे संतप्त हो उठे और उनकी सद्गतिका उपाय सोचने लगे। राजा दिलीपने गङ्गाजीको इस भूतलपर उतारनेके लिये महान् प्रयत्न किया ॥ ६६-६७ ॥

न चावतारयामास चेष्टमानो यथाबलम् ।
तस्य पुत्रः समभवच्छ्रीमान् धर्मपरायणः ॥ ६८ ॥
भगीरथ इति ख्यातः सत्यवागनसूयकः ।
अभिषिच्य तु तं राज्ये दिलीपो वनमाश्रितः ॥ ६९ ॥
(भगीरथं महात्मानं सत्यधर्मपरायणम् ।)
यथाशक्ति चेष्टा करनेपर भी वे गंगाको पृथ्वीपर उतार न सके। दिलीपके भगीरथ नामसे विख्यात एक पुत्र हुआ जो परम कान्तिमान्, धर्मपरायण, सत्यवादी और अदोषदर्शी था। सत्यधर्मपरायण महात्मा भगीरथका राज्याभिषेक करके दिलीप वनमें चले गये ॥ ६८-६९ ॥

तपःसिद्धिसमायोगात् स राजा भरतर्षभ ।
वनाज्जगाम त्रिदिवं कालयोगेन भारत ॥ ७० ॥
भरतश्रेष्ठ! राजा दिलीप तपस्याजनक सिद्धिसे संयुक्त हो अन्तकाल आनेपर वनसे स्वर्गलोकको चले गये ॥ ७० ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि
लोमशतीर्थयात्रायामगस्त्यमाहात्म्यकथने सप्ताधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०७ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें
अगस्त्यमाहात्म्यवर्णनविषयक एक सौ सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०७ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ७३ १/३ श्लोक हैं)

१०८-

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अष्टाधिकशततमोऽध्यायः

भगीरथका हिमालयपर तपस्याद्वारा गंगा और महादेवजीको प्रसन्न करके उनसे वर प्राप्त करना

लोमश उवाच

स तु राजा महेष्वासश्चक्रवर्ती महारथः ।
बभूव सर्वलोकस्य मनोनयननन्दनः ॥ १ ॥
**लोमशजी कहते हैं—**राजन्! महान् धनुर्धर महारथी राजा भगीरथ चक्रवर्ती नरेश थे। वे सब लोगोंके मन और नेत्रोंको आनन्द प्रदान करनेवाले थे ॥ १ ॥

स शुश्राव महाबाहुः कपिलेन महात्मना ।
पितॄणां निधनं घोरमप्राप्तिं त्रिदिवस्य च ॥ २ ॥
स राज्यं सचिवे न्यस्य हृदयेन विदूयता ।
जगाम हिमवत्पार्श्वं तपस्तप्तुं नरेश्वर ॥ ३ ॥
नरेश्वर! उन महाबाहुने जब यह सुना कि महात्मा कपिलद्वारा हमारे (साठ हजार) पितरोंकी भयंकर मृत्यु हुई है और वे स्वर्गप्राप्तिसे वंचित रह गये हैं तब उन्होंने व्यथित हृदयसे अपना राज्य मन्त्रीको सौंप दिया और स्वयं हिमालयके शिखरपर तपस्या करनेके लिये प्रस्थान किया ॥ २-३ ॥

आरिराधयिषुर्गङ्गां तपसा दग्धकिल्बिषः ।
सोऽपश्यत नरश्रेष्ठ हिमवन्तं नगोत्तमम् ॥ ४ ॥
शृङ्गैर्बहुविधाकारैर्धातुमद्भिरलंकृतम् ।
पवनालम्बिभिर्मेघैः परिषिक्तं समन्ततः ॥ ५ ॥
नरेश्वर! तपस्यासे सारा पाप नष्ट करके वे गंगाजीकी आराधना करना चाहते थे। उन्होंने देखा कि गिरिराज हिमालय विविध धातुओंसे विभूषित नाना प्रकारके शिखरोंसे अलंकृत है। वायुके आधारपर उड़नेवाले मेघ चारों ओरसे उसका अभिषेक कर रहे हैं ॥ ४-५ ॥

नदीकुञ्जनितम्बैश्च प्रासादैरुपशोभितम् ।
गुहाकन्दरसंलीनसिंहव्याघ्रनिषेवितम् ॥ ६ ॥
अनेकानेक नदियों, निकुञ्जों, घाटियों और प्रासादों (मन्दिरों)-से इसकी बड़ी शोभा हो रही है। गुफाओं और कन्दराओंमें छिपे हुए सिंह तथा व्याघ्रोंसे यह पर्वत सदा सेवित होता है ॥ ६ ॥

शकुनैश्च विचित्राङ्गैः कूजद्भिर्विविधा गिरः ।

भृङ्गराजैस्तथा हंसैर्दात्यूहैर्जलकुक्कुटैः ॥ ७ ॥
मयूरैः शतपत्रैश्च जीवं जीवककोकिलैः ।
चकोरैरसितापाङ्गैस्तथा पुत्रप्रियैरपि ॥ ८ ॥
भाँति-भाँतिके कलरव करते हुए विचित्र अंगोंवाले पक्षी, भृंगराज, हंस, चातक, जलमुर्ग, मोर, शतपत्र नामक पक्षी, चक्रवाक, कोकिल, चकोर, असितापांग और पुत्रप्रिय आदि इस पर्वतकी शोभा बढ़ाते हैं ॥ ७-८ ॥
जलस्थानेषु रम्येषु पद्मिनीभिश्च संकुलम् ।
सारसानां च मधुरैर्व्याहृतैः समलंकृतम् ॥ ९ ॥
किन्नरैरप्सरोभिश्च निषेवितशिलातलम् ।
दिग्वारणविषाणाग्रैः समन्ताद् धृष्टपादपम् ॥ १० ॥
विद्याधरानुचरितं नानारत्नसमाकुलम् ।
विषोल्बणभुजंगैश्च दीप्तजिह्वैर्निषेवितम् ॥ ११ ॥
क्वचित् कनकसंकाशं क्वचिद् रजतसंनिभम् ।
क्वचिदञ्जनपुञ्जाभं हिमवन्तमुपागमत् ॥ १२ ॥
स तु तत्र नरश्रेष्ठस्तपो घोरं समाश्रितः ।
फलमूलाम्बुसम्भक्षः सहस्रपरिवत्सरान् ॥ १३ ॥
संवत्सरसहस्रे तु गते दिव्ये महानदी ।
दर्शयामास तं गङ्गा तदा मूर्तिमती स्वयम् ॥ १४ ॥
वहाँके रमणीय जलाशयोंमें पद्मसमूह भरे हुए हैं। सारसोंके मधुर कलरव उस पर्वतीय प्रदेशको सुशोभित कर रहे हैं। हिमालयकी शिलाओंपर किन्नर और अप्सराएँ बैठी हैं। वहाँके वृक्षोंपर चारों ओरसे दिग्गजोंके दाँतोंकी रगड़ दिखायी देती है। हिमालयके इन शिखरोंपर विद्याधरगण विचर रहे हैं। नाना प्रकारके रत्न सब ओर व्याप्त हैं। प्रज्वलित जिह्वावाले भयंकर विषधर सर्प इस गिरिप्रदेशका सेवन करते हैं। यह शैलराज कहीं तो सुवर्णके समान उद्भासित होता है, कहीं चाँदीके समान चमकता है और कहीं कज्जलराशिके समान काला दिखायी देता है। नरश्रेष्ठ भगीरथ उस हिमवान् पर्वतपर गये और घोर तपस्यामें लग गये। उन्होंने सहस्र वर्षोंतक फल, मूल और जलका आहार किया। एक हजार दिव्य वर्ष बीत जानेपर महानदी गंगाने स्वयं साकार होकर उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिया ॥ ९—१४ ॥

गङ्गोवाच
किमिच्छसि महाराज मत्तः किं च ददानि ते ।
तद् ब्रवीहि नरश्रेष्ठ करिष्यामि वचस्तव ॥ १५ ॥

गंगाजीने कहा—महाराज! तुम मुझसे क्या चाहते हो, मैं तुम्हें क्या दूँ? नरश्रेष्ठ! बताओ, मैं तुम्हारी याचना पूर्ण करूँगी ॥ १५ ॥ एवमुक्तः प्रत्युवाच राजा हैमवतीं तदा । (नदीं भगीरथो राजन् प्रणिपत्य कृताञ्जलिः ।) पितामहा मे वरदे कपिलेन महानदि ॥ १६ ॥ अन्वेषमाणास्तुरगं नीता वैवस्वतक्षयम् । षष्टिस्तानि सहस्राणि सागराणां महात्मनाम् ॥ १७ ॥ कपिलं देवमासाद्य क्षणेन निधनं गताः । तेषामेवं विनष्टानां स्वर्गे वासो न विद्यते ॥ १८ ॥ यावत् तानि शरीराणि त्वं जलैर्नाभिषिञ्चसि । तावत् तेषां गतिर्नास्ति सागराणां महानदि ॥ १९ ॥ स्वर्गं नय महाभागे मत्पितॄन् सगरात्मजान् । तेषामर्थेन याचामि त्वामहं वै महानदि ॥ २० ॥

राजन्! उनके ऐसा कहनेपर राजा भगीरथने हिमालयनन्दिनी गंगाको हाथ जोड़कर प्रणाम किया और इस प्रकार कहा—‘वरदायिनी महानदी! मेरे पितामह यज्ञसम्बन्धी अश्वका पता लगाते हुए कपिलके कोपसे यमलोकको जा पहुँचे हैं। वे सब महात्मा सगरके पुत्र थे और उनकी संख्या साठ हजार थी। भगवान् कपिलके निकट जाकर वे सब-के-सब क्षणभरमें भस्म हो गये। इस प्रकार दुर्मृत्युसे मरनेके कारण उन्हें स्वर्गमें निवास नहीं प्राप्त हुआ है। महानदी! जबतक तुम अपने जलसे उनके भस्म हुए शरीरोंको सींच न दोगी तबतक उन सगरपुत्रोंकी सद्गति नहीं हो सकती। महाभागे! मेरे पितामह सगरकुमारोंको स्वर्गमें पहुँचा दो। महानदी! मैं उन्हींके उद्धारके लिये तुमसे याचना करता हूँ’ ॥ १६—२० ॥

लोमश उवाच

एतच्छ्रुत्वा वचो राज्ञो गङ्गा लोकनमस्कृता । भगीरथमिदं वाक्यं सुप्रीता समभाषत ॥ २१ ॥ लोमशजी कहते हैं— राजन्! राजा भगीरथकी यह बात सुनकर विश्ववन्दिता गंगा अत्यन्त प्रसन्न हुईं और उनसे इस प्रकार बोलीं— ॥ २१ ॥ करिष्यामि महाराज वचस्ते नात्र संशयः । वेगं तु मम दुर्धार्यं पतन्त्या गगनाद् भुवम् ॥ २२ ॥ 'महाराज! मैं तुम्हारी बात मानूँगी, इसमें संशय नहीं है; परंतु आकाशसे पृथ्वीपर गिरते समय मेरे वेगको रोकना बहुत कठिन है ॥ २२ ॥ न शक्तस्त्रिषु लोकेषु कश्चिद् धारयितुं नृप । अन्यत्र विबुधश्रेष्ठान्नीलकण्ठान्महेश्वरात् ॥ २३ ॥ 'राजन्! देवश्रेष्ठ महेश्वर नीलकण्ठको छोड़कर तीनों लोकोंमें कोई भी मेरा वेग धारण नहीं कर सकता ॥ २३ ॥ तं तोषय महाबाहो तपसा वरदं हरम् । स तु मां प्रच्युतां देवः शिरसा धारयिष्यति ॥ २४ ॥

‘महाबाहो! तुम तपस्याद्वारा उन्हीं वरदायक भगवान् शिवको संतुष्ट करो। स्वर्गसे गिरते समय वे ही मुझे अपने मस्तकपर धारण करेंगे ॥ २४ ॥ स करिष्यति ते कामं पितॄणां हितकाम्यया ।
(तपसाऽऽराधितः शम्भुर्भगवाँल्लोकभावनः ।)
‘विश्वभावन भगवान् शंकर तपस्याद्वारा आराधना करनेपर तुम्हारे पितरोंके हितकी इच्छासे अवश्य तुम्हारा मनोरथ पूर्ण करेंगे’ ॥ २४ १/२ ॥
एतच्छ्रुत्वा ततो राजन् महाराजो भगीरथः ॥ २५ ॥
कैलासं पर्वतं गत्वा तोषयामास शंकरम् ।
तपस्तीव्रमुपागम्य कालयोगेन केनचित् ॥ २६ ॥
राजन्! यह सुनकर महाराज भगीरथ कैलासपर्वतपर गये और वहाँ उन्होंने तीव्र तपस्या करके कुछ समयके बाद भगवान् शंकरको प्रसन्न किया ॥ २५-२६ ॥
अगृह्णाच्च वरं तस्माद् गङ्गाया धारणे नृप ।
स्वर्गे वासं समुद्दिश्य पितॄणां स नरोत्तमः ॥ २७ ॥
नरेश्वर! तत्पश्चात् गंगाजीकी प्रेरणाके अनुसार नरश्रेष्ठ भगीरथने अपने पितरोंको स्वर्गलोककी प्राप्ति करानेके उद्देश्यसे महादेवजीसे गंगाजीके वेगको धारण करनेके लिये वरकी याचना की ॥ २७ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायामगस्त्योपाख्याने अष्टाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें अगस्त्योपाख्यानविषयक एक सौ आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०८ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल २८ श्लोक हैं)

१०९-

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नवाधिकशततमोऽध्यायः

पृथ्वीपर गंगाजीके उतरने और समुद्रको जलसे भरनेका विवरण तथा सगरपुत्रोंका उद्धार

लोमश उवाच

भगीरथवचः श्रुत्वा प्रियार्थं च दिवौकसाम् ।
एवमस्त्विति राजानं भगवान् प्रत्यभाषत ॥ १ ॥
धारयिष्ये महाभाग गगनात् प्रच्युतां शिवाम् ।
दिव्यां देवनदीं पुण्यां त्वत्कृते नृपसत्तम ॥ २ ॥
लोमशजी कहते हैं—राजन्! राजा भगीरथकी बात सुनकर देवताओंका प्रिय करनेके लिये भगवान् शिवने कहा—'एवमस्तु' महाभाग! मैं तुम्हारे लिये आकाशसे गिरती हुई कल्याणमयी पुण्यस्वरूपा दिव्य देवनदी गंगाको अवश्य धारण करूँगा' ॥ १-२ ॥
एवमुक्त्वा महाबाहो हिमवन्तमुपागमत् ।
वृतः पारिषदैर्घोरैर्नानाप्रहरणोद्यतैः ॥ ३ ॥
महाबाहो! ऐसा कहकर भगवान् शिव भाँति-भाँतिके अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित अपने भयंकर पार्षदोंसे घिरे हुए हिमालयपर आये ॥ ३ ॥
तत्र स्थित्वा नरश्रेष्ठं भगीरथमुवाच ह ।
प्रयाचस्व महाबाहो शैलराजसुतां नदीम् ॥ ४ ॥
(पितॄणां पावनार्थं ते तामहं मनुजाधिप ।)
पतमानां सरिच्छ्रेष्ठां धारयिष्ये त्रिविष्टपात् ।
वहाँ ठहरकर उन्होंने नरश्रेष्ठ भगीरथसे कहा—'महाबाहो! गिरिराजनन्दिनी महानदी गंगासे भूतलपर उतरनेके लिये प्रार्थना करो। नरेश्वर! मैं तुम्हारे पितरोंको पवित्र करनेके लिये स्वर्गसे उतरती हुई सरिताओंमें श्रेष्ठ गङ्गाको सिरपर धारण करूँगा' ॥ ४ १/२ ॥
एतच्छ्रुत्वा वचो राजा शर्वेण समुदाहृतम् ॥ ५ ॥
प्रयतः प्रणतो भूत्वा गङ्गां समनुचिन्तयत् ।
ततः पुण्यजला रम्या राज्ञा समनुचिन्तिता ॥ ६ ॥
ईशानं च स्थितं दृष्ट्वा गगनात् सहसा च्युता ।
तां प्रच्युतामथो दृष्ट्वा देवाः सार्धं महर्षिभिः ॥ ७ ॥
गन्धर्वोरगयक्षाश्च समाजग्मुर्दिदृक्षवः ।
ततः पपात गगनाद् गङ्गा हिमवतः सुता ॥ ८ ॥

भगवान् शंकरकी कही हुई यह बात सुनकर राजा भगीरथने एकाग्रचित्त हो प्रणाम करके गंगाजीका चिन्तन किया। राजाके चिन्तन करनेपर भगवान् शंकरको खड़ा हुआ देख पुण्यसलिला रमणीय नदी गंगा सहसा आकाशसे नीचे गिरीं। उन्हें गिरती देख दर्शनके लिये उत्सुक हो महर्षियोंसहित देवता, गन्धर्व, नाग और यक्ष वहाँ आ गये। तदनन्तर हिमालयनन्दिनी गंगा आकाशसे वहाँ आ गिरीं॥ ५–८॥

समुद्धृतमहावर्ता मीनग्राहसमाकुला ।
तां दधार हरो राजन् गङ्गां गगनमेखलाम् ॥ ९ ॥
ललाटदेशे पतितां मालां मुक्तामयीमिव ।

उस समय उनके जलमें बड़ी-बड़ी भँवरें और तरंगे उठ रही थीं। मत्स्य और ग्राह भरे हुए थे। राजन्! आकाशकी मेखलारूप गंगाको भगवान् शिवने अपने ललाटदेशमें पड़ी हुई मोतियोंकी मालाकी भाँति धारण कर लिया॥ ९ १/२॥

सा बभूव विसर्पन्ती त्रिधा राजन् समुद्रगा ॥ १० ॥
फेनपुञ्जाकुलजला हंसानामिव पङ्क्तयः ।
क्वचिदाभोगकुटिला प्रस्खलन्ती क्वचित् क्वचित् ॥ ११ ॥
सा फेनपटसंवीता मत्तेव प्रमदाव्रजत् ।
क्वचित् सा तोयनिर्नैर्दन्दन्ती नादमुत्तमम् ॥ १२ ॥
एवंप्रकारान् सुबहून् कुर्वती गगनाच्च्युता ।
पृथिवीतलमासाद्य भगीरथमथाब्रवीत् ॥ १३ ॥

महाराज! नीचे गिरती हुई फेनपुञ्जसे व्याप्त हुए जलवाली समुद्रगामिनी गंगा तीन धाराओंमें बँटकर हंसोंकी पंक्तियोंके समान सुशोभित होने लगी। वह मतवाली स्त्रीकी भाँति इस प्रकार आयी कि कहीं तो सर्प-शरीरकी भाँति कुटिल गतिसे बहती थी और कहीं-कहीं ऊँचेसे नीचे गिरकर चट्टानोंसे टकराती जाती थी एवं श्वेत वस्त्रोंके समान प्रतीत होनेवाले फेनपुंज उसे आच्छादित किये हुए थे। कहीं-कहीं वह जलके कल-कल नादसे उत्तम संगीत-सा गा रही थी। इस प्रकार अनेक रूप धारण करनेवाली गंगा आकाशसे गिरी और भूतलपर पहुँचकर राजा भगीरथसे बोली— ॥ १०—१३ ॥

दर्शयस्व महाराज मार्गं केन व्रजाम्यहम् ।
त्वदर्थमवतीर्णास्मि पृथिवीं पृथिवीपते ॥ १४ ॥

‘महाराज! रास्ता दिखाओ मैं किस मार्गसे चलूँ? पृथिवीपते! तुम्हारे लिये ही मैं इस भूतलपर उतरी हूँ’ ॥ १४ ॥

एतच्छ्रुत्वा वचो राजा प्रतिष्ठत भगीरथः ।
यत्र तानि शरीराणि सागराणां महात्मनाम् ॥ १५ ॥
प्लावनार्थं नरश्रेष्ठ पुण्येन सलिलेन च।

यह सुनकर राजा भगीरथ जहाँ महात्मा सगरपुत्रोंके शरीर पड़े थे, वहाँ गंगाजीके पावन जलसे उन शरीरोंको प्लावित करनेके लिये उस स्थानसे प्रस्थित हुए ।। १५ १/२ ।।
गङ्गाया धारणं कृत्वा हरो लोकनमस्कृतः ।। १६ ।।
कैलासं पर्वतश्रेष्ठं जगाम त्रिदशैः सह ।
समासाद्य समुद्रं च गङ्गया सहितो नृपः ।। १७ ।।
पूरयामास वेगेन समुद्रं वरुणालयम् ।
दुहितृत्वे च नृपतिर्गङ्गां समनुकल्पयत् ।। १८ ।।
विश्ववन्दित भगवान् शंकर गंगाजीको सिरपर धारण करके देवताओंके साथ पर्वतश्रेष्ठ कैलासको चले गये। राजा भगीरथने गंगाजीके साथ समुद्रतटपर जाकर वरुणालय समुद्रको बड़े वेगसे भर दिया और गंगाजीको अपनी पुत्री बना लिया ।। १६—१८ ।।
पितॄणां चोदकं तत्र ददौ पूर्णमनोरथः ।
एतत् ते सर्वमाख्यातं गङ्गा त्रिपथगा यथा ।। १९ ।।
तत्पश्चात् वहाँ उन्होंने पितरोंके लिये जलदान किया और पितरोंका उद्धार होनेसे वे सफल मनोरथ हो गये। युधिष्ठिर! जिस प्रकार गंगा त्रिपथगा (स्वर्ग, पाताल और पृथ्वीपर गमन करनेवाली) हुई, वह सब प्रसंग मैंने तुम्हें सुना दिया ।। १९ ।।
पूरणार्थं समुद्रस्य पृथिवीमवतारिता ।
(कालेयाश्च यथा राजंस्त्रिदशैर्विनिपातिताः)
समुद्रश्च यथा पीतः कारणार्थं महात्मना ।। २० ।।
वातापिश्च यथा नीतः क्षयं स ब्रह्महा प्रभो ।
अगस्त्येन महाराज यन्मां त्वं परिपृच्छसि ।। २१ ।।
महाराज! समुद्रको भरनेके लिये ही गंगा पृथ्वीपर उतारी गयी थी। राजन्! देवताओंने कालेय नामक दैत्योंको जिस प्रकार मार गिराया और कारणवश महात्मा अगस्त्यने जिस प्रकार समुद्र पी लिया तथा उन्होंने ब्राह्मणोंकी हत्या करनेवाले वातापि नामक दैत्यको जिस प्रकार नष्ट किया, वह सब प्रसंग, जिसके विषयमें तुमने पूछा था, मैंने बता दिया ।। २०-२१ ।।

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायामगस्त्यमाहात्म्यकथने नवाधिकशततमोऽध्यायः ।। १०९ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें अगस्त्यमाहात्म्यकथनविषयक एक सौ नवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १०९ ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल २२ श्लोक हैं)

नन्दा तथा कौशिकीका माहात्म्य, ऋष्यशृंग मुनिका उपाख्यान और उनको अपने राज्यमें लानेके लिये राजा लोमपादका प्रयत्न

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दशाधिकशततमोऽध्यायः

नन्दा तथा कौशिकीका माहात्म्य, ऋष्यशृंग मुनिका उपाख्यान और उनको अपने राज्यमें लानेके लिये राजा लोमपादका प्रयत्न

वैशम्पायन उवाच

ततः प्रयातः कौन्तेयः क्रमेण भरतर्षभ ।
नन्दामपरनन्दां च नद्यौ पापभयापहे ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर क्रमशः आगे बढ़ने लगे। उन्होंने पाप और भयका निवारण करनेवाली नन्दा और अपरनन्दा—इन दो नदियोंकी यात्रा की ॥ १ ॥
पर्वतं स समासाद्य हेमकूटमनामयम् ।
अचिन्त्यानद्भुतान् भावान् ददर्श सुबहून् नृपः ॥ २ ॥
तत्पश्चात् रोग-शोकसे रहित हेमकूट पर्वतपर पहुँचकर राजा युधिष्ठिरने वहाँ बहुत-सी अचिन्त्य एवं अद्भुत बातें देखीं ॥ २ ॥
वाताबद्धा भवन्मेघा उपलाश्च सहस्रशः ।
नाशक्नुवंस्तमारोढुं विषण्णमनसो जनाः ॥ ३ ॥
वहाँ वायुका सहारा लिये बिना ही बादल उत्पन्न हो जाते और अपने-आप हजारों पत्थर (ओले) पड़ने लगते थे। जिनके मनमें खेद भरा होता था ऐसे मनुष्य उस पर्वतपर चढ़ नहीं सकते थे ॥ ३ ॥
वायुर्नित्यं ववौ तत्र नित्यं देवश्च वर्षति ।
स्वाध्यायघोषश्च तथा श्रूयते न च दृश्यते ॥ ४ ॥
सायं प्रातश्च भगवान् दृश्यते हव्यवाहनः ।
मक्षिकाश्चादशंस्तत्र तपसः प्रतिघातिकाः ॥ ५ ॥
निर्वेदो जायते तत्र गृहाणि स्मरते जनः ।
एवं बहुविधान् भावानद्भुतान् वीक्ष्य पाण्डवः ।
लोमशं पुनरेवाथ पर्यपृच्छत् तदद्भुतम् ॥ ६ ॥
वहाँ प्रतिदिन हवा चलती और रोज-रोज मेघ वर्षा करता था। वेदोंके स्वाध्यायकी ध्वनि तो सुनायी पड़ती; परंतु स्वाध्याय करनेवालेका दर्शन नहीं होता था। सायंकाल और प्रातःकाल भगवान् अग्निदेव प्रज्वलित दिखायी देते थे। तपस्यामें विघ्न डालनेवाली मक्खियाँ वहाँ लोगोंको डंक मारती रहती थीं, अतः वहाँ विरक्ति होती और लोग घरोंकी

याद करने लगते थे। इस प्रकार बहुत-सी अद्भुत बातें देखकर पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने लोमशजीसे पुनः इस अद्भुत अवस्थाके विषयमें पूछा ।।

(युधिष्ठिर उवाच
यदेतद् भगवंश्चित्रं पर्वतेऽस्मिन् महौजसि ।
एतन्मे सर्वमाचक्ष्व विस्तरेण महाद्युते ॥)
युधिष्ठिरने कहा—महातेजस्वी भगवन्! इस परम तेजोमय पर्वतपर जो ये आश्चर्यजनक बातें होती हैं, इसका क्या रहस्य है? यह सब विस्तारपूर्वक मुझे बताइये।

लोमश उवाच
यथाश्रुतमिदं पूर्वमस्माभिररिकर्शन ।
तदेकाग्रमना राजन् निबोध गदतो मम ॥ ७ ॥
तब लोमशजीने कहा—शत्रुसूदन! हमने पूर्वकालमें जैसा सुन रखा है वैसा बताया जाता है। तुम एकाग्रचित्त हो मेरे मुखसे इसका रहस्य सुनो ॥ ७ ॥
अस्मिन्नृषभकूटेऽभूदृषभो नाम तापसः ।
अनेकशतवर्षायुस्तपस्वी कोपनो भृशम् ॥ ८ ॥
पहलेकी बात है, इस ऋषभकूटपर ऋषभनामसे प्रसिद्ध एक तपस्वी रहते थे। उनकी आयु कई सौ वर्षोंकी थी। वे तपस्वी होनेके साथ ही बड़े क्रोधी थे ॥ ८ ॥
स वै सम्भाष्यमाणोऽन्यैः कोपाद् गिरमुवाच ह ।
य इह व्याहरेत् कश्चिदुपलानुत्सृजेस्तथा ॥ ९ ॥
वातं चाहूय मा शब्दमित्युवाच स तापसः ।
व्याहरंश्चेह पुरुषो मेघशब्देन वार्यते ॥ १० ॥
एवमेतानि कर्माणि राजंस्तेन महर्षिणा ।
कृतानि कानिचित् क्रोधात् प्रतिषिद्धानि कानिचित् ॥ ११ ॥
उन्होंने दूसरोंके बुलानेपर कुपित होकर उस पर्वतसे कहा—'जो कोई यहाँपर बातचीत करे उसपर तू ओले बरसा।' इसी प्रकार वायुको भी बुलाकर उन तपस्वी मुनिने कहा—'देखो, यहाँ किसी प्रकारका शब्द नहीं होना चाहिये।' तबसे जो कोई पुरुष यहाँ बोलता है उसे मेघकी गर्जनाद्वारा रोका जाता है। राजन्! इस प्रकार उन महर्षिने ही ये अद्भुत कार्य किये हैं। उन्होंने क्रोधवश कुछ कार्योंका विधान और कुछ बातोंका निषेध कर दिया है ॥ ९—११ ॥
नन्दां त्वभिगता देवाः पुरा राजन्निति श्रुतिः ।
अन्वपद्यन्त सहसा पुरुषा देवदर्शिनः ॥ १२ ॥
राजन्! यह सुना जाता है कि प्राचीन कालमें देवतालोग नन्दाके तटपर आये थे, उस समय उनके दर्शनकी इच्छासे बहुतेरे मनुष्य सहसा वहाँ आ पहुँचे ॥ १२ ॥

ते दर्शनं त्वनिच्छन्तो देवाः शक्रपुरोगमाः ।
दुर्गं चक्रुरिमं देशं गिरिं प्रत्यूहरूपकम् ॥ १३ ॥
इन्द्र आदि देवता उन्हें दर्शन देना नहीं चाहते थे, अतः विघ्नस्वरूप इस पर्वतीय प्रदेशको उन्होंने जनसाधारणके लिये दुर्गम बना दिया ॥ १३ ॥

तदाप्रभृति कौन्तेय नरा गिरिमिमं सदा ।
नाशक्नुवन्नभिद्रष्टुं कुत एवाधिरोहितुम् ॥ १४ ॥
कुन्तीनन्दन! तभीसे साधारण मनुष्य इस पर्वतको देख भी नहीं सकते, चढ़ना तो दूरकी बात है ॥ १४ ॥

नातप्ततपसा शक्यो द्रष्टुमेष महागिरिः ।
आरोढुं वापि कौन्तेय तस्मान्नियतवाग् भव ॥ १५ ॥
कुन्तीकुमार! जिसने तपस्या नहीं की है वह मनुष्य इस महान् पर्वतको न तो देख सकता है और न चढ़ ही सकता है; अतः तुम मौन व्रत धारण करो ॥ १५ ॥

इह देवास्तदा सर्वे यज्ञानाजह्रुरुत्तमान् ।
तेषामेतानि लिङ्गानि दृश्यन्तेद्यापि भारत ॥ १६ ॥
उन दिनों सम्पूर्ण देवताओंने यहाँ आकर उत्तम यज्ञोंका अनुष्ठान किया था। भारत! उनके ये चिह्न आज भी प्रत्यक्ष देखे जाते हैं ॥ १६ ॥

कुशाकारेव दूर्वेयं संस्तीर्णेव च भूरियम् ।
यूपप्रकारा बहवो वृक्षाश्चेमे विशाम्पते ॥ १७ ॥
यह दूर्वा कुशके आकारकी दिखायी देती है और यह भूमि ऐसी लगती है मानो इसपर कुश बिछाये गये हों। महाराज! ये वृक्ष भी यज्ञयूपके समान जान पड़ते हैं ॥ १७ ॥

देवाश्च ऋषयश्चैव वसन्त्यद्यापि भारत ।
तेषां सायं तथा प्रातर्दृश्यते हव्यवाहनः ॥ १८ ॥
भारत! आज भी यहाँ देवता तथा ऋषि निवास करते हैं। सायंकाल और प्रातःकाल यहाँ उनके द्वारा प्रज्वलित की हुई अग्निका दर्शन होता है ॥ १८ ॥

इहाप्लुतानां कौन्तेय सद्यः पाप्माभिहन्यते ।
कुरुश्रेष्ठाभिषेकं वै तस्मात् कुरु सहानुजः ॥ १९ ॥
कुन्तीनन्दन! इस तीर्थमें गोता लगानेवाले मानवोंका सारा पाप तत्काल नष्ट हो जाता है। अतः कुरुश्रेष्ठ! तुम अपने भाइयोंके साथ यहाँ स्नान करो ॥ १९ ॥

ततो नन्दाप्लुताङ्गस्त्वं कौशिकीमभियास्यसि ।
विश्वामित्रेण यत्रोग्रं तपस्तप्तमनुत्तमम् ॥ २० ॥
नन्दामें गोता लगानेके पश्चात् तुम्हें कौशिकीके तटपर चलना होगा जहाँ महर्षि विश्वामित्रजीने उत्तम एवं उग्र तपस्या की थी ॥ २० ॥

वैशम्पायन उवाच

ततस्तत्र समाप्लुत्य गात्राणि सगणो नृपः । जगाम कौशिकीं पुण्यां रम्यां शीतजलां शुभाम् ॥ २१ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**तदनन्तर राजा युधिष्ठिर अपने दल-बलके साथ नन्दामें गोता लगाकर रमणीय एवं शीतल जलवाली शुभ पुण्यमयी कौशिकीके तटपर गये ॥

लोमश उवाच

एषा देवनदी पुण्या कौशिकी भरतर्षभ । विश्वामित्राश्रमो रम्य एष चात्र प्रकाशते ॥ २२ ॥ **वहाँ लोमशजीने कहा—**भरतश्रेष्ठ! यह देवताओंकी नदी पुण्यसलिला कौशिकी है और यह विश्वामित्रका रमणीय आश्रम है, जो यहाँ प्रकाशित हो रहा है ॥ २२ ॥

आश्रमश्चैव पुण्याख्यः काश्यपस्य महात्मनः । ऋष्यशृङ्गः सुतो यस्य तपस्वी संयतेन्द्रियः ॥ २३ ॥ तपसो यः प्रभावेण वर्षयामास वासवम् । अनावृष्ट्यां भयाद् यस्य ववर्ष बलवृत्रहा ॥ २४ ॥ यहीं कश्यपगोत्रीय महात्मा विभाण्डकका ‘पुण्य’ नामक आश्रम है। इन्हींके तपस्वी एवं जितेन्द्रिय पुत्र महात्मा ऋष्यशृंग हैं, जिन्होंने अपनी तपस्याके प्रभावसे इन्द्रद्वारा वर्षा करवायी थी। उन दिनों देशमें घोर अनावृष्टि फैल रही थी, वैसे समयमें ऋष्यशृंग मुनिके भयसे बल और वृत्रासुरके विनाशक देवराज इन्द्रने उस देशमें वर्षा की थी ॥ २३-२४ ॥

मृग्यां जातः स तेजस्वी काश्यपस्य सुतः प्रभुः । विषये लोमपादस्य यश्चकाराद्भुतं महत् ॥ २५ ॥ वे तेजस्वी एवं शक्तिशाली मुनि मृगीके पेटसे पैदा हुए थे और कश्यपनन्दन विभाण्डकके पुत्र थे। उन्होंने राजा लोमपादके राज्यमें अत्यन्त अद्भुत कार्य किया था ॥ २५ ॥

निर्वर्तितेषु सस्येषु यस्मै शान्तां ददौ नृपः । लोमपादो दुहितरं सावित्रीं सविता यथा ॥ २६ ॥ जब वर्षासे खेती अच्छी तरह लहलहा उठी तब राजा लोमपादने अपनी पुत्री शान्ता ऋष्यशृंगको ब्याह दी; ठीक उसी तरह, जैसे सूर्यदेवने अपनी बेटी सावित्रीका ब्रह्माजीके साथ ब्याह किया था ॥ २६ ॥

युधिष्ठिर उवाच

ऋष्यशृङ्गः कथं मृग्यामुत्पन्नः काश्यपात्मजः । विरुद्धे योनिसंसर्गे कथं च तपसा युतः ॥ २७ ॥ किमर्थं च भयाच्छक्रस्तस्य बालस्य धीमतः । अनावृष्ट्यां प्रवृत्तायां ववर्ष बलवृत्रहा ॥ २८ ॥