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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

३०४-

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चतुरधिकत्रिशततमोऽध्यायः

कुन्तीका पितासे वार्तालाप और ब्राह्मणकी परिचर्या

कुन्त्युवाच

ब्राह्मणं यन्त्रिता राजन्नुपस्थास्यामि पूजया ।
यथाप्रतिज्ञं राजेन्द्र न च मिथ्या ब्रवीम्यहम् ॥ १ ॥
कुन्ती बोली— राजन्! मैं नियमोंमें आबद्ध रहकर आपकी प्रतिज्ञाके अनुसार निरन्तर इन तपस्वी ब्राह्मणकी सेवा-पूजाके लिये उपस्थित रहूँगी। राजेन्द्र! मैं झूठ नहीं बोलती हूँ ॥ १ ॥

एष चैव स्वभावो मे पूजयेयं द्विजानिति ।
तव चैव प्रियं कार्यं श्रेयश्च परमं मम ॥ २ ॥
यह मेरा स्वभाव ही है कि मैं ब्राह्मणोंकी सेवा-पूजा करूँ और आपका प्रिय करना तो मेरे लिये परम कल्याणकी बात है ही ॥ २ ॥

यद्येष्यति सायाह्ने यदि प्रातरथो निशि ।
यद्यर्धरात्रे भगवान् न मे कोपं करिष्यति ॥ ३ ॥
ये पूजनीय ब्राह्मण यदि सायंकाल आवें, प्रातःकाल पधारें अथवा रात या आधीरातमें भी दर्शन दें, ये कभी भी मेरे मनमें क्रोध उत्पन्न नहीं कर सकेंगे—मैं हर समय इनकी समुचित सेवाके लिये प्रस्तुत रहूँगी ॥ ३ ॥

लाभो ममैष राजेन्द्र यद् वै पूजयती द्विजान् ।
आदेशे तव तिष्ठन्ती हितं कुर्यां नरोत्तम ॥ ४ ॥
राजेन्द्र! नरश्रेष्ठ! मेरे लिये महान् लाभकी बात यही है कि मैं आपकी आज्ञाके अधीन रहकर ब्राह्मणोंकी सेवा-पूजा करती हुई सदैव आपका हित-साधन करूँ ॥ ४ ॥

विस्रब्धो भव राजेन्द्र न व्यलीकं द्विजोत्तमः ।
वसन् प्राप्स्यति ते गेहे सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ ५ ॥
महाराज! विश्वास कीजिये। आपके भवनमें निवास करते हुए ये द्विजश्रेष्ठ कभी अपने मनके प्रतिकूल कोई कार्य नहीं देख पायेंगे। यह मैं आपसे सत्य कहती हूँ ॥ ५ ॥

यत् प्रियं च द्विजस्यास्य हितं चैव तवानघ ।
यतिष्यामि तथा राजन् व्येतु ते मानसो ज्वरः ॥ ६ ॥
निष्पाप नरेश! आपकी मानसिक चिन्ता दूर हो जानी चाहिये। मैं वही कार्य करनेका प्रयत्न करूँगी जो इन तपस्वी ब्राह्मणको प्रिय और आपके लिये हितकर हो ॥ ६ ॥

ब्राह्मणा हि महाभागाः पूजिताः पृथिवीपते ।
तारणाय समर्थाः स्युर्विपरीते वधाय च ॥ ७ ॥

क्योंकि पृथ्‍वीपते! महाभाग ब्राह्मण भलीभाँति पूजित होनेपर सेवकको तारनेमें समर्थ होते हैं; और इसके विपरीत अपमानित होनेपर विनाशकारी बन जाते हैं ।। ७ ।।
साहमेतद् विजानन्ती तोषयिष्ये द्विजोत्तमम् ।
न मत्कृते व्यथां राजन् प्राप्स्यसि द्विजसत्तमात् ।। ८ ।।
मैं इस बातको जानती हूँ। अतः इन श्रेष्ठ ब्राह्मणको सब तरहसे संतुष्ट रखूँगी। राजन्! मेरे कारण इन द्विजश्रेष्ठसे आपको कोई कष्ट नहीं प्राप्त होगा ।। ८ ।।
अपराधेऽपि राजेन्द्र राज्ञामश्रेयसे द्विजाः ।
भवन्ति च्यवनो यद्वत् सुकन्यायाः कृते पुरा ।। ९ ।।
राजेन्द्र! किसी बालिकाद्वारा अपराध बन जानेपर भी ब्राह्मणलोग राजाओंका अमंगल करनेको उद्यत हो जाते हैं, जैसे प्राचीनकालमें सुकन्याद्वारा अपराध होनेपर महर्षि च्यवन महाराज शर्यातिको अनिष्ट करनेको उद्यत हो गये थे ।। ९ ।।
नियमेन परेणाहमुपस्थास्ये द्विजोत्तमम् ।
यथा त्वया नरेन्द्रेदं भाषितं ब्राह्मणं प्रति ।। १० ।।
नरेन्द्र! आपने ब्राह्मणके प्रति बर्ताव करनेके विषयमें जो कुछ कहा है, उसके अनुसार मैं उत्तम नियमोंके पालनपूर्वक इन श्रेष्ठ ब्राह्मणकी सेवामें उपस्थित रहूँगी ।।
एवं ब्रुवन्तीं बहुशः परिष्वज्य समर्थ्य च ।
इति चेति च कर्तव्यं राजा सर्वमथादिशत् ।। ११ ।।
इस प्रकार कहती हुई कुन्तीको बारंबार गलेसे लगाकर राजाने उसकी बातोंका समर्थन किया और कैसे-कैसे क्या-क्या करना चाहिये, इसके विषयमें उसे सुनिश्चित आदेश दिया ।। ११ ।।

राजोवाच

एवमेतत् त्वया भद्रे कर्तव्यमविशङ्कया ।
मद्धितार्थं तथाऽऽत्मार्थं कुलार्थं चाप्यनिन्दिते ।। १२ ।।
राजा बोले— भद्रे! अनिन्दिते! मेरे, तुम्हारे तथा कुलके हितके लिये तुम्हें निःशंकभावसे इसी प्रकार यह सब कार्य करना चाहिये ।। १२ ।।
एवमुक्त्वा तु तां कन्यां कुन्तिभोजो महायशाः ।
पृथां परिददौ तस्मै द्विजाय द्विजवत्सलः ।। १३ ।।
ब्राह्मणप्रेमी महायशस्वी राजा कुन्तिभोजने पुत्रीसे ऐसा कहकर उन आये हुए द्विजकी सेवामें पृथाको दे दिया ।। १३ ।।
इयं ब्रह्मन् मम सुता बाला सुखविवर्धिता ।
अपराध्येत यत्र किंचिन्न कार्यं हृदि तत् त्वया ।। १४ ।।

और कहा—'ब्रह्मन्! यह मेरी पुत्री पृथा अभी बालिका है और सुखमें पली हुई है। यदि आपका कोई अपराध कर बैठे, तो भी आप उसे मनमें नहीं लाइयेगा ।। १४ ।। द्विजातयो महाभागा वृद्धबालतपस्विषु । भवन्त्यक्रोधनाः प्रायो ह्यपराद्धेषु नित्यदा ।। १५ ।। 'वृद्ध, बालक और तपस्वीजन यदि कोई अपराध कर दें, तो भी आप-जैसे महाभाग ब्राह्मण प्रायः कभी उनपर क्रोध नहीं करते ।। १५ ।। सुमहत्यपराधेऽपि क्षान्तिः कार्या द्विजातिभिः । यथाशक्ति यथोत्साहं पूजा ग्राह्या द्विजोत्तम ।। १६ ।। 'विप्रवर! सेवकका महान् अपराध होनेपर भी ब्राह्मणोंको क्षमा करनी चाहिये तथा शक्ति और उत्साहके अनुसार उनके द्वारा की हुई सेवा-पूजा स्वीकार कर लेनी चाहिये' ।। १६ ।। तथेति ब्राह्मणेनोक्तं स राजा प्रीतमानसः । हंसचन्द्रांशुसंकाशं गृहमस्मै न्यवेदयत् ।। १७ ।। ब्राह्मणने 'तथास्तु' कहकर राजाका अनुरोध मान लिया। इससे उनके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने ब्राह्मणको रहनेके लिये हंस और चन्द्रमाकी किरणोंके समान एक उज्ज्वल भवन दे दिया ।। १७ ।। तत्राग्निशरणे क्लृप्तमासनं तस्य भानुमत् । आहारादि च सर्वं तत् तथैव प्रत्यवेदयत् ।। १८ ।। वहाँ अग्निहोत्रगृहमें उनके लिये चमचमाते हुए सुन्दर आसनकी व्यवस्था हो गयी। भोजन आदिकी सब सामग्री भी राजाने वहीं प्रस्तुत कर दी ।। १८ ।। निक्षिप्य राजपुत्री तु तन्द्रीं मानं तथैव च । आतस्थे परमं यत्नं ब्राह्मणस्याभिराधने ।। १९ ।। राजकुमारी कुन्ती आलस्य और अभिमानको दूर भगाकर ब्राह्मणकी आराधनामें बड़े यत्नसे संलग्न हो गयी ।। १९ ।। तत्र सा ब्राह्मणं गत्वा पृथा शौचपरा सती । विधिवत् परिचारार्हं देववत् पर्यतोषयत् ।। २० ।। बाहर-भीतरसे शुद्ध हो सती-साध्वी पृथा उन पूजनीय ब्राह्मणके पास जाकर देवताकी भाँति उनकी विधिवत् आराधना करके उन्हें पूर्णरूपसे संतुष्ट रखने लगी ।। २० ।।

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि कुण्डलाहरणपर्वणि पृथाद्विजपरिचर्यायां चतुरधिकत्रिशततमोऽध्यायः ।। ३०४ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत कुण्डलाहरणपर्वमें कुन्तीके द्वारा ब्राह्मणकी परिचर्याविषयक तीन सौ चारवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ३०४ ।।

३०५-

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पञ्चाधिकत्रिशततमोऽध्यायः

कुन्तीकी सेवासे संतुष्ट होकर तपस्वी ब्राह्मणका उसको मन्त्रका उपदेश देना

वैशम्पायन उवाच

सा तु कन्या महाराज ब्राह्मणं संशितव्रतम् ।
तोषयामास शुद्धेन मनसा संशितव्रता ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—महाराज! इस प्रकार वह कन्या पृथा कठोर व्रतका पालन करती हुई शुद्ध हृदयसे उन उत्तम व्रतधारी ब्राह्मणको अपनी सेवाओंद्वारा संतुष्ट रखने लगी ॥ १ ॥

प्रातरेष्याम्यथेत्युक्त्वा कदाचिद् द्विजसत्तमः ।
तत आयाति राजेन्द्र सायं रात्रावथो पुनः ॥ २ ॥
राजेन्द्र! वे श्रेष्ठ ब्राह्मण कभी यह कहकर कि 'मैं प्रातःकाल लौट आऊँगा' चल देते और सायंकाल अथवा बहुत रात बीतनेपर पुनः वापस आते थे ॥ २ ॥

तं च सर्वासु वेलासु भक्ष्यभोज्यप्रतिश्रयैः ।
पूजयामास सा कन्या वर्धमानैस्तु सर्वदा ॥ ३ ॥
परंतु वह कन्या प्रतिदिन हर समय पहलेकी अपेक्षा अधिक-अधिक परिमाणमें भक्ष्य-भोज्य आदि सामग्री तथा शय्या-आसन आदि प्रस्तुत करके उनका सेवा-सत्कार किया करती थी ॥ ३ ॥

अन्नादिसमुदाचारः शय्यासनकृतस्तथा ।
दिवसे दिवसे तस्य वर्धते न तु हीयते ॥ ४ ॥
नित्यप्रति अन्न आदिके द्वारा उन ब्राह्मणका सत्कार अन्य दिनोंकी अपेक्षा बढ़कर ही होता था। उनके लिये शय्या और आसन आदिकी सुविधा भी पहलेकी अपेक्षा अधिक ही दी जाती थी। किसी बातमें तनिक भी कमी नहीं की जाती थी ॥ ४ ॥

निर्भर्त्सनापवादैश्च तथैवाप्रियया गिरा ।
ब्राह्मणस्य पृथा राजन् न चकाराप्रियं तदा ॥ ५ ॥
राजन्! वे ब्राह्मण कभी धिक्कारते, कभी बात-बातमें दोषारोपण करते और प्रायः कटु वचन भी बोला करते थे, तो भी पृथा उनके प्रति कभी कोई अप्रिय बर्ताव नहीं करती थी ॥ ५ ॥

व्यस्ते काले पुनश्चैति न चैति बहुशो द्विजः ।
सुदुर्लभमपि ह्यन्नं दीयतामिति सोऽब्रवीत् ॥ ६ ॥

वे कभी ऐसे समयमें लौटकर आते थे, जब कि पृथाको दूसरे कामोंसे दम लेनेकी भी फुरसत नहीं होती थी और कभी वे कई दिनोंतक आते ही नहीं थे। आनेपर भी ऐसा भोजन माँग लेते जो अत्यन्त दुर्लभ होता ॥ ६ ॥

कृतमेव च तत् सर्वं यथा तस्मै न्यवेदयत् । शिष्यवत् पुत्रवच्चैव स्वसृवच्च सुसंयता ॥ ७ ॥

परंतु कुन्ती उन्हें उनकी माँगी हुई सब वस्तुएँ इस प्रकार प्रस्तुत कर देती थी, मानो उनको पहलेसे ही तैयार करके रखा हो। वह अत्यन्त संयत होकर शिष्य, पुत्र तथा छोटी बहिनकी भाँति सदा उनकी सेवामें लगी रहती थी ॥ ७ ॥

यथोपजोषं राजेन्द्र द्विजातिप्रवरस्य सा । प्रीतिमुत्पादयामास कन्यारत्नमनिन्दिता ॥ ८ ॥

राजेन्द्र! उस अनिन्द्य कन्यारत्न कुन्तीने उन श्रेष्ठ ब्राह्मणको उनकी रुचिके अनुसार सेवा करके अत्यन्त प्रसन्न कर लिया ॥ ८ ॥

तस्यास्तु शीलवृत्तेन तुतोष द्विजसत्तमः । अवधानेन भूयोऽस्याः परं यत्नमथाकरोत् ॥ ९ ॥

उसके शील, सदाचार तथा सावधानीसे उन द्विजश्रेष्ठको बड़ा संतोष हुआ। उन्होंने कुन्तीका हित करनेका पूरा प्रयत्न किया ॥ ९ ॥

तां प्रभाते च सायं च पिता पप्रच्छ भारत । अपि तुष्यति ते पुत्रि ब्राह्मणः परिचर्यया ॥ १० ॥

जनमेजय! पिता कुन्तिभोज प्रतिदिन प्रातःकाल और सायंकालमें पूछते थे—'बेटी! तुम्हारी सेवासे ब्राह्मणको संतोष तो है न?' ॥ १० ॥

तं सा परममित्येव प्रत्युवाच यशस्विनी । ततः प्रीतिमवापाग्र्यां कुन्तिभोजो महामनाः ॥ ११ ॥

वह यशस्विनी कन्या उन्हें उत्तर देती—'हाँ पिताजी! वे बहुत प्रसन्न हैं।' यह सुनकर महामना कुन्तिभोजको बड़ा हर्ष प्राप्त होता था ॥ ११ ॥

ततः संवत्सरे पूर्णे यदासौ जपतां वरः । नापश्यद् दुष्कृतं किंचित् पृथायाः सौहृदे रतः ॥ १२ ॥ ततः प्रीतमना भूत्वा स एनां ब्राह्मणोऽब्रवीत् । प्रीतोऽस्मि परमं भद्रे परिचारेण ते शुभे ॥ १३ ॥ वरान् वृणीष्व कल्याणि दुरापान् मानुषैरिह । यैस्त्वं सीमन्तिनीः सर्वा यशसाभिभविष्यसि ॥ १४ ॥

तदनन्तर जब एक वर्ष पूरा हो गया और पृथाके प्रति वात्सल्य स्नेह रखनेवाले जपकर्ताओंमें श्रेष्ठ ब्राह्मण दुर्वासाजीने उसकी सेवामें कोई त्रुटि नहीं देखी, तब वे प्रसन्नचित्त होकर पृथासे इस प्रकार बोले—'भद्रे! मैं तुम्हारी सेवासे बहुत प्रसन्न हूँ। शुभे!

कल्याणि! तुम मुझसे ऐसे वर माँगो, जो यहाँ दूसरे मनुष्योंके लिये दुर्लभ हों और जिनके कारण तुम संसारकी समस्त सुन्दरियोंको अपने सुयशसे पराजित कर सको' ।। १२—१४ ।।

कुन्त्युवाच

कृतानि मम सर्वाणि यस्या मे वेदवित्तम ।
त्वं प्रसन्नः पिता चैव कृतं विप्र वरैर्मम ।। १५ ।।
कुन्ती बोली—वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ! जब मुझ सेविकाके ऊपर आप और पिताजी प्रसन्न हो गये तब मेरी सब कामनाएँ पूर्ण हो गयीं। विप्रवर! मुझे वर लेनेकी आवश्यकता नहीं है ।। १५ ।।

ब्राह्मण उवाच

यदि नेच्छसि मत्तस्त्वं वरं भद्रे शुचिस्मिते ।
इमं मन्त्रं गृहाण त्वमाह्वानाय दिवौकसाम् ।। १६ ।।
ब्राह्मणने कहा—भद्रे! पवित्र मुसकानवाली पृथे! यदि तुम मुझसे वर नहीं लेना चाहती हो तो देवताओंका आवाहन करनेके लिये यह एक मन्त्र ही ग्रहण कर लो ।। १६ ।।

यं यं देवं त्वमेतेन मन्त्रेणावाहयिष्यसि ।
तेन तेन वशे भद्रे स्थातव्यं ते भविष्यति ।। १७ ।।
भद्रे! तुम इस मन्त्रके द्वारा जिस-जिस देवताका आवाहन करोगी वह-वह तुम्हारे अधीन हो जानेके लिये बाध्य होगा ।। १७ ।।

अकामो वा सकामो वा स समेष्यति ते वशे ।
विबुधो मन्त्रसंशान्तो भवेद् भृत्य इवानतः ।। १८ ।।
वह देवता कामनारहित हो या कामनायुक्त, मन्त्रके प्रभावसे शान्तचित्त हो विनीत सेवककी भाँति तुम्हारे पास आकर तुम्हारे अधीन हो जायगा ।। १८ ।।

वैशम्पायन उवाच

न शशाक द्वितीयं सा प्रत्याख्यातुमनिन्दिता ।
तं वै द्विजातिप्रवरं तदा शापभयान्नृप ।। १९ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! साध्वी पृथा दूसरी बार उन श्रेष्ठ ब्राह्मणकी बात न टाल सकी; क्योंकि वैसा करनेपर उसे उनके शापका भय था ।। १९ ।।

ततस्तामनवद्याङ्गीं ग्राहयामास स द्विजः ।
मन्त्रग्रामं तदा राजन्नथर्वशिरसि श्रुतम् ।। २० ।।
राजन्! तब ब्राह्मणने निर्दोष अंगोंवाली कुन्तीको उस मन्त्रसमूहका उपदेश दिया जो अथर्ववेदीय उपनिषदमें प्रसिद्ध है ।। २० ।।

तं प्रदाय तु राजेन्द्र कुन्तिभोजमुवाच ह । उषितोऽस्मि सुखं राजन् कन्यया परितोषितः ॥ २१ ॥ तव गेहेषु विहितः सदा सुप्रतिपूजितः । साधयिष्यामहे तावदित्युक्त्वान्तरधीयत ॥ २२ ॥ राजेन्द्र! पृथाको वह मन्त्र देकर ब्राह्मणने राजा कुन्तिभोजसे कहा—'राजन्! मैं तुम्हारे घरमें तुम्हारी कन्याद्वारा सदा समादृत और संतुष्ट होकर बड़े सुखसे रहा हूँ। अब हम अपनी कार्यसिद्धिके लिये यहाँसे जायँगे।' ऐसा कहकर वे ब्राह्मण वहीं अन्तर्धान हो गये ॥ २१-२२ ॥

स तु राजा द्विजं दृष्ट्वा तत्रैवान्तर्हितं तदा । बभूव विस्मयाविष्टः पृथां च समपूजयत् ॥ २३ ॥ ब्राह्मणको अन्तर्हित हुआ देख उस समय राजाको बड़ा विस्मय हुआ और उन्होंने अपनी पुत्री कुन्तीका विशेष आदर-सत्कार किया ॥ २३ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि कुण्डलाहरणपर्वणि पृथाया मन्त्रप्राप्तौ पञ्चाधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३०५ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत कुण्डलाहरणपर्वमें पृथाको मन्त्रकी प्राप्तिविषयक तीन सौ पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३०५ ॥

कुन्तीके द्वारा सूर्यदेवताका आवाहन तथा कुन्ती-सूर्य-संवाद

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षडधिकत्रिशततमोऽध्यायः

कुन्तीके द्वारा सूर्यदेवताका आवाहन तथा कुन्ती-सूर्य-संवाद

वैशम्पायन उवाच

गते तस्मिन् द्विजश्रेष्ठे कस्मिंश्चित् कारणान्तरे ।
चिन्तयामास सा कन्या मन्त्रग्रामबलाबलम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! उन श्रेष्ठ ब्राह्मणके चले जानेपर किसी कारणवश* राजकन्या कुन्तीने मन-ही-मन सोचा; 'इस मन्त्रसमूहमें कोई बल है या नहीं ॥ १ ॥
अयं वै कीदृशस्तेन मम दत्तो महात्मना ।
मन्त्रग्रामो बलं तस्य ज्ञास्ये नातिचिरादिति ॥ २ ॥
'उन महात्मा ब्राह्मणने मुझे यह कैसा मन्त्रसमूह प्रदान किया है? उसके बलको मैं शीघ्र ही (परीक्षाद्वारा) जानूँगी' ॥ २ ॥
एवं संचिन्तयन्ती सा ददर्शर्तुं यदृच्छया ।
व्रीडिता साभवद् बाला कन्याभावे रजस्वला ॥ ३ ॥
इस प्रकार सोच-विचारमें पड़ी हुई कुन्तीने अकस्मात् अपने शरीरमें ऋतुका प्रादुर्भाव हुआ देखा। कन्यावस्थामें ही अपनेको रजस्वला पाकर उस बालिकाने लज्जाका अनुभव किया ॥ ३ ॥
ततो हर्म्यतलस्था सा महार्हशयनोचिता ।
प्राच्यां दिशि समुद्यन्तं ददर्शादित्यमण्डलम् ॥ ४ ॥
तदनन्तर एक दिन कुन्ती अपने महलके भीतर एक बहुमूल्य पलंगपर लेटी हुई थी। उसी समय उसने (खिड़कीसे) पूर्वदिशामें उदित होते हुए सूर्यमण्डलकी ओर दृष्टिपात किया ॥ ४ ॥
तत्र बद्धमनोदृष्टिर्भवत् सा सुमध्यमा ।
न चातप्यत रूपेण भानोः संध्यागतस्य सा ॥ ५ ॥
प्रातःसंध्याके समय उगते हुए सूर्यकी ओर देखनेमें सुमध्यमा कुन्तीको तनिक भी तापका अनुभव नहीं हुआ। उसके मन और नेत्र उन्हींमें आसक्त हो गये ॥
तस्या दृष्टिर्भूद् दिव्या सापश्यद् दिव्यदर्शनम् ।
आमुक्तकवचं देवं कुण्डलाभ्यां विभूषितम् ॥ ६ ॥

उस समय उसकी दृष्टि दिव्य हो गयी। उसने दिव्यरूपमें दिखायी देनेवाले भगवान् सूर्यकी ओर देखा। वे कवच धारण किये एवं कुण्डलोंसे विभूषित थे ।। ६ ।।
तस्याः कौतूहलं त्वासीन्मन्त्रं प्रति नराधिप ।
आह्वानमकरोत् साथ तस्य देवस्य भाविनी ।। ७ ।।
नरेश्वर! उन्हें देखकर कुन्तीके मनमें अपने मन्त्रकी शक्तिकी परीक्षा करनेके लिये कौतूहल पैदा हुआ। तब उस सुन्दरी राजकन्याने सूर्यदेवका आवाहन किया ।। ७ ।।
प्राणानुपस्पृश्य तदा ह्याजुहाव दिवाकरम् ।
आजगाम ततो राजंस्त्वरमाणो दिवाकरः ।। ८ ।।
उसने विधिपूर्वक आचमन और प्राणायाम करके भगवान् दिवाकरका आवाहन किया। राजन्! तब भगवान् सूर्य बड़ी उतावलीके साथ वहाँ आये ।। ८ ।।
मधुपिङ्गो महाबाहुः कम्बुग्रीवो हसन्निव ।
अङ्गदी बद्धमुकुटो दिशः प्रज्वालयन्निव ।। ९ ।।
उनकी अंगकान्ति मधुके समान पिंगलवर्णकी थी। भुजाएँ बड़ी-बड़ी और ग्रीवा शंखके समान थी। वे हँसते हुए-से जान पड़ते थे। उनकी भुजाओंमें अंगद (बाजूबंद) चमक रहे थे और मस्तकपर बँधा हुआ मुकुट शोभा पाता था। वे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रज्वलित-सी कर रहे थे ।। ९ ।।
योगात् कृत्वा द्विधाऽऽत्मानमाजगाम तताप च ।
आबभाषे ततः कुन्तीं साम्ना परमवल्गुना ।। १० ।।
वे योगशक्तिसे अपने दो स्वरूप बनाकर एकसे वहाँ आये और दूसरेसे आकाशमें तपते रहे। उन्होंने कुन्तीको समझाते हुए परम मधुर वाणीमें कहा— ।। १० ।।
आगतोऽस्मि वशं भद्रे तव मन्त्रबलात्कृतः ।
किं करोमि वशो राज्ञि ब्रूहि कर्ता तदस्मि ते ।। ११ ।।
‘भद्रे! मैं तुम्हारे मन्त्रके बलसे आकृष्ट होकर तुम्हारे वशमें आ गया हूँ। राजकुमारी! बताओ, तुम्हारे अधीन रहकर मैं कौन-सा कार्य करूँ? तुम जो कहोगी, वही करूँगा’ ।। ११ ।।

कुन्त्युवाच
गम्यतां भगवंस्तत्र यत एवागतो ह्यसि ।
कौतूहलात् समाहूतः प्रसीद भगवन्निति ।। १२ ।।
कुन्ती बोली—भगवन्! आप जहाँसे आये हैं वहीं पधारिये। मैंने आपको कौतूहलवश ही बुलाया था। प्रभो! प्रसन्न होइये ।। १२ ।।

सूर्य उवाच
गमिष्येऽहं यथा मां त्वं ब्रवीषि तनुमध्यमे ।

न तु देवं समाहूय न्याय्यं प्रेषयितुं वृथा ॥ १३ ॥
**सूर्यने कहा—**तनुमध्यमे! जैसा तुम कह रही हो उसके अनुसार मैं चला तो जाऊँगा ही; परंतु किसी देवताको बुलाकर उसे व्यर्थ लौटा देना न्यायकी बात नहीं है ॥ १३ ॥

तवाभिसंधिः सुभगे सूर्यात् पुत्रो भवेदिति ।
वीर्येणाप्रतिमो लोके कवची कुण्डलीति च ॥ १४ ॥
सुभगे! तुम्हारे मनमें यह संकल्प उठा था कि ‘सूर्यदेवसे मुझे एक ऐसा पुत्र प्राप्त हो, जो संसारमें अनुपम पराक्रमी तथा जन्मसे ही दिव्य कवच एवं कुण्डलोंसे सुशोभित हो’ ॥ १४ ॥

सा त्वमात्मप्रदानं वै कुरुष्व गजगामिनि ।
उत्पत्स्यति हि पुत्रस्ते यथासंकल्पमङ्गने ॥ १५ ॥
अतः गजगामिनि! तुम मुझे अपना शरीर समर्पित कर दो। अंगने! ऐसा करनेसे तुम्हें अपने संकल्पके अनुसार तेजस्वी पुत्र प्राप्त होगा ॥ १५ ॥

अथ गच्छाम्यहं भद्रे त्वया संगम्य सुस्मिते ।
यदि त्वं वचनं नाद्य करिष्यसि मम प्रियम् ॥ १६ ॥
शपिष्ये त्वामहं क्रुद्धो ब्राह्मणं पितरं च ते ।
त्वत्कृते तान् प्रधक्ष्यामि सर्वानपि न संशयः ॥ १७ ॥
भद्रे! सुन्दर मुसकानवाली पृथे! तुमसे समागम करके मैं पुनः लौट जाऊँगा; परंतु यदि आज तुम मेरा प्रिय वचन नहीं मानोगी तो मैं कुपित होकर तुमको, उस मन्त्रदाता ब्राह्मणको और तुम्हारे पिताको भी शाप दे दूँगा। तुम्हारे कारण मैं उन सबको जलाकर भस्म कर दूँगा; इसमें संशय नहीं है ॥ १६-१७ ॥

पितरं चैव ते मूढं यो न वेत्ति तवानयम् ।
तस्य च ब्राह्मणस्याद्य योऽसौ मन्त्रमदात् तव ॥ १८ ॥
शीलवृत्तमविज्ञाय धास्यामि विनयं परम् ।
तुम्हारे मूर्ख पिताको भी मैं जला दूँगा, जो तुम्हारे इस अन्यायको नहीं जानता है तथा जिसने तुम्हारे शील और सदाचारको जाने बिना ही मन्त्रका उपदेश दिया है, उस ब्राह्मणको भी अच्छी सीख दूँगा ॥ १८ १/२ ॥

एते हि विबुधाः सर्वे पुरन्दरमुखा दिवि ॥ १९ ॥
त्वया प्रलब्धं पश्यन्ति स्मयन्त इव भाविनि ।
पश्य चैनान् सुरगणान् दिव्यं चक्षुरिदं हि ते ।
पूर्वमेव मया दत्तं दृष्टवत्यसि येन माम् ॥ २० ॥
भामिनि! ये इन्द्र आदि समस्त देवता आकाशमें खड़े होकर मुसकराते हुए-से मेरी ओर इस भावसे देख रहे हैं कि मैं तुम्हारे द्वारा कैसा ठगा गया? देखो न, इन देवताओंकी ओर। मैंने तुम्हें पहलेसे ही दिव्य दृष्टि दे दी है, जिससे तुम मुझे देख सकती हो ॥ १९-२० ॥

वैशम्पायन उवाच

ततोऽपश्यत् त्रिदशान् राजपुत्री
सर्वानैव स्वेषु धिष्ण्येषु खस्थान् ।
प्रभावन्तं भानुमन्तं महान्तं
यथाऽऽदित्यं रोचमानांस्तथैव ॥ २१ ॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तब राजकुमारी कुन्तीने आकाशमें अपने-अपने विमानोंपर बैठे हुए सब देवताओंको देखा। जैसे सहस्रों किरणोंसे युक्त भगवान् सूर्य अत्यन्त दीप्तिमान् दिखायी देते हैं, उसी प्रकार वे सब देवता प्रकाशित हो रहे थे ॥ २१ ॥

सा तान् दृष्ट्वा व्रीडमानेव बाला
सूर्य देवी वचनं प्राह भीता ।
गच्छ त्वं वै गोपते स्वं विमानं
कन्याभावाद् दुःख एवापचारः ॥ २२ ॥

उन्हें देखकर बालिका कुन्तीको बड़ी लज्जा हुई। उस देवीने भयभीत होकर सूर्यदेवसे कहा—'किरणोंके स्वामी दिवाकर! आप अपने विमानपर चले जाइये। छोटी बालिका होनेके कारण मेरेद्वारा आपको बुलानेका यह दुःखदायक अपराध बन गया है ॥ २२ ॥

पिता माता गुरवश्चैव येऽन्ये
देहस्यास्य प्रभवन्ति प्रदाने ।
नाहं धर्मं लोपयिष्यामि लोके
स्त्रीणां वृत्तं पूज्यते देहरक्षा ॥ २३ ॥

'मेरे पिता-माता तथा अन्य गुरुजन ही मेरे इस शरीरको देनेका अधिकार रखते हैं। मैं अपने धर्मका लोप नहीं करूँगी। स्त्रियोंके सदाचारमें अपने शरीरकी पवित्रताको बनाये रखना ही प्रधान है और संसारमें उसीकी प्रशंसा की जाती है ॥ २३ ॥

मया मन्त्रबलं ज्ञातुमाहूतस्त्वं विभावसो ।
बाल्याद् बालोति तत् कृत्वा क्षन्तुमर्हसि मे विभो ॥ २४ ॥

'प्रभो! प्रभाकर! मैंने अपने बाल-स्वभावके कारण मन्त्रका बल जाननेके लिये ही आपका आवाहन किया है। एक अनजान बालिका समझकर आप मेरे इस अपराधको क्षमा कर दें' ॥ २४ ॥

सूर्य उवाच

बालेति कृत्वानुनयं तवाहं
ददानि नान्यानुनयं लभेत ।
आत्मप्रदानं कुरु कुन्तिकन्ये
शान्तिस्तवैवं हि भवेच्च भीरु ॥ २५ ॥

**सूर्यदेवने कहा—**कुन्तिभोजकुमारी कुन्ती! बालिका समझकर ही मैं तुमसे इतनी अनुनय-विनय करता हूँ। दूसरी कोई स्त्री मुझसे अनुनयका अवसर नहीं पा सकती। भीरु! तुम मुझे अपना शरीर अर्पण करो। ऐसा करनेसे ही तुम्हें शान्ति प्राप्त हो सकती है ।। २५ ।।

न चापि गन्तुं युक्तं हि मया मिथ्याकृतेन वै ।
असमेत्य त्वया भीरु मन्त्राहूतेन भाविनि ।। २६ ।।
गमिष्याम्यनवद्याङ्गि लोके समवहास्यताम् ।
सर्वेषां विबुधानां च वक्तव्यः स्यां तथा शुभे ।। २७ ।।
निर्दोष अंगोंवाली सुन्दरी! तुमने मन्त्रद्वारा मेरा आवाहन किया है; इस दशामें उस आवाहनको व्यर्थ करके तुमसे मिले बिना ही लौट जाना मेरे लिये उचित न होगा। भीरु! यदि मैं इसी तरह लौटूंगा तो जगत्में मेरा उपहास होगा। शुभे! सम्पूर्ण देवताओंकी दृष्टिमें भी मुझे निन्दनीय बनना पड़ेगा ।। २६-२७ ।।

सा त्वं मया समागच्छ लप्स्यसे मादृशं सुतम् ।
विशिष्टा सर्वलोकेषु भविष्यसि न संशयः ।। २८ ।।
अतः तुम मेरे साथ समागम करो। तुम मेरे ही समान पुत्र पाओगी और समस्त संसारमें (अन्य स्त्रियोंसे) विशिष्ट समझी जाओगी; इसमें संशय नहीं है ।। २८ ।।

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि कुण्डलाहरणपर्वणि सूर्याह्वाने
षडधिकत्रिशततमोऽध्यायः ।। ३०६ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत कुण्डलाहरणपर्वमें सूर्यका आवाहनविषयक
तीन सौ छठाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ३०६ ।।


* इसी अध्यायके चौदहवें श्लोकमें सूर्यदेवने उस कारणका स्पष्टीकरण किया है।

३०७-

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सप्ताधिकत्रिशततमोऽध्यायः

सूर्यद्वारा कुन्तीके उदरमें गर्भस्थापन

वैशम्पायन उवाच

सा तु कन्या बहुविधं ब्रुवन्ती मधुरं वचः ।
अनुनेतुं सहस्रांशुं न शशाक मनस्विनी ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! इस प्रकार राजकन्या मनस्विनी कुन्ती नाना प्रकारसे मधुर वचन कहकर अनुनय-विनय करनेपर भी भगवान् सूर्यको मनानेमें सफल न हो सकी ॥ १ ॥

न शशाक यदा बाला प्रत्याख्यातुं तमोनुदम् ।
भीता शापात् ततो राजन् दध्यौ दीर्घमथान्तरम् ॥ २ ॥
राजन्! जब वह बाला अन्धकारनाशक भगवान् सूर्यदेवको टाल न सकी, तब शापसे भयभीत हो दीर्घकालतक मन-ही-मन कुछ सोचने लगी ॥ २ ॥

अनागसः पितुः शापो ब्राह्मणस्य तथैव च ।
मन्निमित्तः कथं न स्यात् क्रुद्धादस्माद् विभावसोः ॥ ३ ॥
उसने सोचा कि 'क्या उपाय करूँ? जिससे मेरे कारण मेरे निरपराध पिता तथा निर्दोष ब्राह्मणको क्रोधमें भरे हुए इन सूर्यदेवसे शाप न प्राप्त हो ॥ ३ ॥

बालेनापि सता मोहाद् भृशं पापकृतान्यपि ।
नाभ्यासादयितव्यानि तेजांसि च तपांसि च ॥ ४ ॥
'सज्जन बालकको भी चाहिये कि वह अत्यन्त मोहके कारण पापशून्य, तेजस्वी तथा तपस्वी पुरुषोंके अत्यन्त निकट न जाय ॥ ४ ॥

साहमद्य भृशं भीता गृहीता च करे भृशम् ।
कथं त्वकार्यं कुर्यां वै प्रदानं ह्यात्मनः स्वयम् ॥ ५ ॥
'परंतु मैं तो आज अत्यन्त भयभीत हो भगवान् सूर्यदेवके हाथमें पड़ गयी हूँ, तो भी स्वयं अपने शरीरको देने-जैसा न करनेयोग्य नीच कर्म कैसे करूँ?' ॥ ५ ॥

वैशम्पायन उवाच

सा वै शापपरित्रस्ता बहु चिन्तयती हृदा ।
मोहेनाभिपरीताङ्गी स्मयमाना पुनः पुनः ॥ ६ ॥
तं देवमब्रवीद् भीता बन्धूनां राजसत्तम ।
व्रीडाविह्वलया वाचा शापत्रस्ता विशाम्पते ॥ ७ ॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**नृपश्रेष्ठ! कुन्ती शापसे अत्यन्त डरकर मन-ही-मन तरह-तरहकी बातें सोच रही थी। उसके सारे अंग मोहसे व्याप्त हो रहे थे। वह बार-बार आश्चर्यचकित हो रही थी। एक ओर तो वह शापसे आतंकित थी, दूसरी ओर उसे भाई-बन्धुओंका भय लगा हुआ था। भूपाल! उस दशामें वह लज्जाके कारण विशृंखल वाणीद्वारा सूर्यदेवसे इस प्रकार बोली ।।

कुन्त्युवाच पिता मे ध्रियते देव माता चान्ये च बान्धवाः । न तेषु ध्रियमाणेषु विधिलोपो भवेदियम् ।। ८ ।। **कुन्तीने कहा—**देव! मेरे पिता, माता तथा अन्य बान्धव जीवित हैं। उन सबके जीते-जी स्वयं आत्मदान करनेपर कहीं शास्त्रीय विधिका लोप न हो जाय? ।। ८ ।। त्वया तु संगमो देव यदि स्याद् विधिवर्जितः । मन्निमित्तं कुलस्यास्य लोके कीर्तिर्नशेत् ततः ।। ९ ।। भगवन्! यदि आपके साथ मेरा वेदोक्त विधिके विपरीत समागम हो तो मेरे ही कारण जगत्‌में इस कुलकी कीर्ति नष्ट हो जायगी ।। ९ ।। अथवा धर्ममेतं त्वं मन्यसे तपतां वर । ऋते प्रदानाद् बन्धुभ्यस्तव कामं करोम्यहम् ।। १० ।। अथवा तपनेवालोंमें श्रेष्ठ दिवाकर! यदि बन्धुजनोंके दिये बिना ही मेरे साथ अपने समागमको आप धर्मयुक्त समझते हों तो मैं आपकी इच्छा पूर्ण कर सकती हूँ ।। १० ।। आत्मप्रदानं दुर्धर्ष तव कृत्वा सती त्वहम् । त्वयि धर्मो यशश्चैव कीर्तिरायुश्च देहिनाम् ।। ११ ।। दुर्धर्ष देव! क्या मैं आपको आत्मदान करके भी सती-साध्वी रह सकती हूँ? आपमें ही देहधारियोंके धर्म, यश, कीर्ति तथा आयु प्रतिष्ठित हैं ।। ११ ।।

सूर्य उवाच न ते पिता न ते माता गुरवो वा शुचिस्मिते । प्रभवन्ति वरारोहे भद्रं ते शृणु मे वचः ।। १२ ।। **भगवान् सूर्यने कहा—**शुचिस्मिते! वरारोहे! तुम्हारा कल्याण हो। तुम मेरी बात सुनो। तुम्हारे पिता, माता अथवा अन्य गुरुजन तुम्हें (इस कामसे रोकनेमें) समर्थ नहीं हैं ।। १२ ।। सर्वान् कामयते यस्मात् कमेर्धातोश्च भाविनि । तस्मात् कन्येह सुश्रोणि स्वतन्त्रा वरवर्णिनि ।। १३ ।। सुन्दर भाववाली कुन्ती! 'कम्' धातुसे कन्या शब्दकी सिद्धि होती है। सुन्दरी! वह (स्वयंवरमें आये हुए) सब वरोंमेंसे किसीको भी स्वतन्त्रतापूर्वक अपनी कामनाका विषय बना सकती है; इसीलिये इस जगत्‌में उसे कन्या कहा गया है ।। १३ ।।

नाधर्मश्चरितः कश्चित् त्वया भवति भाविनि ।
अधर्मं कुत एवाहं वरेयं लोककाम्यया ॥ १४ ॥
कुन्ती! मेरे साथ समागम करनेसे तुम्हारे द्वारा कोई अधर्म नहीं बन रहा है। भला! मैं लौकिक कामवासनाके वशीभूत होकर अधर्मका वरण कैसे कर सकता हूँ? ॥ १४ ॥
अनावृताः स्त्रियः सर्वा नराश्च वरवर्णिनि ।
स्वभाव एष लोकानां विकारोऽन्य इति स्मृतः ॥ १५ ॥
वरवर्णिनि! मेरे लिये सभी स्त्रियाँ और पुरुष आवरणरहित हैं; क्योंकि मैं सबका साक्षी हूँ। जो अन्य सब विकार हैं, यह तो प्राकृत मनुष्योंका स्वभाव माना गया है ॥ १५ ॥
सा मया सह संगम्य पुनः कन्या भविष्यसि ।
पुत्रश्च ते महाबाहुर्भविष्यति महायशाः ॥ १६ ॥
तुम मेरे साथ समागम करके पुनः कन्या ही बनी रहोगी और तुम्हें महाबाहु एवं महायशस्वी पुत्र प्राप्त होगा ॥ १६ ॥

कुन्त्युवाच
यदि पुत्रो मम भवेत् त्वत्तः सर्वतमोमुद ।
कुण्डली कवची शूरो महाबाहुर्महाबलः ॥ १७ ॥
**कुन्ती बोली—**समस्त अन्धकारको दूर करनेवाले सूर्यदेव! यदि आपसे मुझे पुत्र प्राप्त हो तो वह महाबाहु, महाबली तथा कुण्डल और कवचसे विभूषित शूरवीर हो ॥ १७ ॥

सूर्य उवाच
भविष्यति महाबाहुः कुण्डली दिव्यवर्मभृत् ।
उभयं चामृतमयं तस्य भद्रे भविष्यति ॥ १८ ॥
**सूर्यने कहा—**भद्रे! तुम्हारा पुत्र महाबाहु, कुण्डल-धारी तथा दिव्य कवच धारण करनेवाला होगा। उसके कुण्डल और कवच दोनों अमृतमय होंगे ॥ १८ ॥

कुन्त्युवाच
यद्येतदमृतादस्ति कुण्डले वर्म चोत्तमम् ।
मम पुत्रस्य यं वै त्वं मत्त उत्पादयिष्यसि ॥ १९ ॥
अस्तु मे सङ्गमो देव यथोक्तं भगवंस्त्वया ।
त्वद्वीर्यरूपसत्त्वौजा धर्मयुक्तो भवेत् स च ॥ २० ॥
**कुन्ती बोली—**प्रभो! आप मेरे गर्भसे जिसको जन्म देंगे, उस मेरे पुत्रके कुण्डल और कवच यदि अमृतसे उत्पन्न हुए होंगे; तो भगवन्! आपने जैसा कहा है, उसी रूपमें मेरा आपके साथ समागम हो। आपका वह पुत्र आपके ही समान वीर्य, रूप, धैर्य, ओज तथा धर्मसे युक्त होना चाहिये ॥ १९-२० ॥

सूर्य उवाच अदित्या कुण्डले राज्ञि दत्ते मे मत्तकाशिनि । तेऽस्य दास्यामि वै भीरु वर्म चैवेदमृत्तमम् ॥ २१ ॥ सूर्यदेवने कहा— यौवनके मदसे सुशोभित होनेवाली भीरु राजकुमारी! माता अदितिने मुझे जो कुण्डल दिये हैं, उन्हें मैं तुम्हारे इस पुत्रको दे दूँगा। साथ ही यह उत्तम कवच भी उसे अर्पित करूँगा ॥ २१ ॥

कुन्त्युवाच परमं भगवन्नेवं संगमिष्ये त्वया सह । यदि पुत्रो भवेदेवं यथा वदसि गोपते ॥ २२ ॥ कुन्ती बोली— भगवन्! गोपते! जैसा आप कहते हैं, वैसा ही पुत्र यदि मुझे प्राप्त हो तो मैं आपके साथ उत्तम रीतिसे समागम करूँगी ॥ २२ ॥

वैशम्पायन उवाच तथेत्युक्त्वा तु तां कुन्तीमाविवेश विहङ्गमः । स्वर्भानुशत्रुर्योगात्मा नाभ्यां पस्पर्श चैव ताम् ॥ २३ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! तब 'बहुत अच्छा' कहकर आकाशचारी राहुशत्रु भगवान् सूर्यने योगरूपसे कुन्तीके शरीरमें प्रवेश किया और उसकी नाभिको छू दिया ॥ २३ ॥ ततः सा विह्वलेवासीत् कन्या सूर्यस्य तेजसा । पपात चाथ सा देवी शयने मूढचेतना ॥ २४ ॥ तब वह राजकन्या सूर्यके तेजसे विह्वल और अचेत-सी होकर शय्यापर गिर पड़ी ॥ २४ ॥

सूर्य उवाच साधयिष्यामि सुश्रोणि पुत्रं वै जनयिष्यसि । सर्वशस्त्रभृतां श्रेष्ठं कन्या चैव भविष्यसि ॥ २५ ॥ सूर्यने कहा— सुन्दरी! मैं ऐसी चेष्टा करूँगा, जिससे तुम समस्त शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ पुत्रको जन्म दोगी और कन्या ही बनी रहोगी ॥ २५ ॥ ततः सा व्रीडिता बाला तदा सूर्यमथाब्रवीत् । एवमस्त्विति राजेन्द्र प्रस्थितं भूरिवर्चसम् ॥ २६ ॥ राजेन्द्र! तब संगमके लिये उद्यत हुए महातेजस्वी सूर्यदेवकी ओर देखकर लज्जित हुई उस राजकन्याने उनसे कहा— 'प्रभो! ऐसा ही हो' ॥ २६ ॥

वैशम्पायन उवाच

इति स्मोक्ता कुन्तिराजात्मजा सा
विवस्वन्तं याचमाना सलज्जा ।
तस्मिन् पुण्ये शयनीये पपात
मोहाविष्टा भज्यमाना लतेव ।। २७ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं— ऐसा कहकर कुन्तिनरेशकी कन्या पृथा भगवान् सूर्यसे पुत्रके लिये प्रार्थना करती हुई अत्यन्त लज्जा और मोहके वशीभूत होकर कटी हुई लताकी भाँति उस पवित्र शय्यापर गिर पड़ी ।। २७ ।।
तिग्मांशुस्तां तेजसा मोहयित्वा
योगेनाविश्यात्मसंस्थां चकार ।
न चैवैनां दूषयामास भानुः
संज्ञां लेभे भूय एवाथ बाला ।। २८ ।।
तत्पश्चात् सूर्यदेवने उसे अपने तेजसे मोहित कर दिया और योगशक्तिके द्वारा उसके भीतर प्रवेश करके अपना तेजोमय वीर्य स्थापित कर दिया। उन्होंने कुन्तीको दूषित नहीं किया—उसका कन्याभाव अछूता ही रहा। तदनन्तर वह राजकन्या फिर सचेत हो गयी ।। २८ ।।

इति श्रीमन्महाभारते वनपर्वणि कुण्डलाहरणपर्वणि सूर्यकुन्तीसमागमे
सप्ताधिकत्रिशततमोऽध्यायः ।। ३०७ ।।
इस प्रकार श्रीमन्महाभारत वनपर्वके अन्तर्गत कुण्डलाहरणपर्वमें सूर्यकुन्ती-समागमविषयक तीन सौ सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ३०७ ।।

३०८-

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अष्टाधिकत्रिशततमोऽध्यायः

कर्णका जन्म, कुन्तीका उसे पिटारीमें रखकर जलमें बहा देना और विलाप करना

वैशम्पायन उवाच

ततो गर्भः समभवत् पृथायाः पृथिवीपते ।
शुक्ले दशोत्तरे पक्षे तारापतिरिवाम्बरे ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! इस प्रकार आकाशमें जैसे चन्द्रमाका उदय होता है, उसी प्रकार ग्यारहवें मासके* शुक्लपक्षकी प्रतिपदाको कुन्तीके उदरमें भगवान् सूर्यके द्वारा गर्भ स्थापित हुआ ॥ १ ॥

सा बान्धवभयाद् बाला गर्भं तं विनिगूहती ।
धारयामास सुश्रोणी न चैनां बुबुधे जनः ॥ २ ॥
सुन्दर कटिप्रदेशवाली कुन्ती भाई-बन्धुओंके भयसे उस गर्भको छिपाती हुई धारण करने लगी। अतः कोई भी मनुष्य नहीं जान सका कि यह गर्भवती है ॥ २ ॥

न हि तां वेद नार्यन्या काचिद् धात्रेयिकामृते ।
कन्यापुरगतां बालां निपुणां परिरक्षणे ॥ ३ ॥
एक धायके सिवा दूसरी कोई स्त्री भी इसका पता न पा सकी। कुन्ती सदा कन्याओंके अन्तःपुरमें रहती थी एवं अपने रहस्यको छिपानेमें वह अत्यन्त निपुण थी ॥ ३ ॥

ततः कालेन सा गर्भं सुषुवे वरवर्णिनी ।
कन्यैव तस्य देवस्य प्रसादादमरप्रभम् ॥ ४ ॥
तदनन्तर सुन्दरी पृथाने यथासमय भगवान् सूर्यके कृपाप्रसादसे स्वयं कन्या ही बनी रहकर देवताओंके समान तेजस्वी एक पुत्रको जन्म दिया ॥ ४ ॥

तथैवाबद्धकवचं कनकोज्ज्वलकुण्डलम् ।
हर्यक्षं वृषभस्कन्धं यथास्य पितरं तथा ॥ ५ ॥
उसने अपने पिताके ही समान शरीरपर कवच बाँध रखा था और उसके कानोंमें सोनेके बने हुए दो दिव्य कुण्डल जगमगा रहे थे। उस बालककी आँखें सिंहके समान और कंधे वृषभ-जैसे थे ॥ ५ ॥

जातमात्रं च तं गर्भं धात्र्या सम्मन्त्र्य भाविनी ।
मञ्जूषायां समाधाय स्वास्तीर्णायां समन्ततः ॥ ६ ॥
मधूच्छिष्टस्थितायां सा सुखायां रुदती तथा ।
श्लक्ष्णायां सुपिधानायामश्वनद्यामवासृजत् ॥ ७ ॥

उस बालकके पैदा होते ही भामिनी कुन्तीने धायसे सलाह लेकर एक पिटारी मँगवायी और उसमें सब ओर सुन्दर मुलायम बिछौने बिछा दिये। इसके बाद उस पिटारीमें चारों ओर मोम चुपड़ दिया, जिससे उसके भीतर जल न प्रवेश कर सके। जब वह सब तरहसे चिकनी और सुखद हो गयी, तब उसके भीतर उस बालकको सुला दिया और उसका सुन्दर ढक्कन बंद कर दिया तथा रोते-रोते उस पिटारीको अश्वनदीमें छोड़ दिया* ॥ ६-७ ॥ जानती चाप्यकर्तव्यं कन्याया गर्भधारणम् । पुत्रस्नेहेन सा राजन् करुणं पर्यदेवयत् ॥ ८ ॥ राजन्! यद्यपि वह यह जानती थी कि किसी कन्याके लिये गर्भधारण करना सर्वथा निषिद्ध और अनुचित है, तथापि पुत्रस्नेह उमड़ आनेसे कुन्ती वहाँ करुणाजनक विलाप करने लगी ॥ ८ ॥ समुत्सृजन्ती मञ्जूषामश्वनद्यां तदा जले । उवाच रुदती कुन्ती यानि वाक्यानि तच्छृणु ॥ ९ ॥ उस समय अश्वनदीके जलमें उस पिटारीको छोड़ते समय रोती हुई कुन्तीने जो बातें कहीं, उन्हें बताता हूँ; सुनो ॥ ९ ॥ स्वस्ति ते चान्तरिक्षेभ्यः पार्थिवेभ्यश्च पुत्रक । दिव्येभ्यश्चैव भूतेभ्यस्तथा तोयचराश्च ये ॥ १० ॥ वह बोली—'मेरे बच्चे! जलचर, थलचर, आकाशचारी तथा दिव्य प्राणी तेरा मंगल करें ॥ १० ॥ शिवास्ते सन्तु पन्थानो मा च ते परिपन्थिनः । आगताश्च तथा पुत्र भवन्त्वद्रोहचेतसः ॥ ११ ॥ 'तेरा मार्ग मंगलमय हो। बेटा! तेरे पास शत्रु न आयें। जो आ जायँ, उनके मनमें तेरे प्रति द्रोहकी भावना न रहे ॥ ११ ॥ पातु त्वां वरुणो राजा सलिले सलिलेश्वरः । अन्तरिक्षेऽन्तरिक्षस्थः पवनः सर्वगस्तथा ॥ १२ ॥ 'जलमें उसके स्वामी राजा वरुण तेरी रक्षा करें। अन्तरिक्षमें वहाँ रहनेवाले सर्वगामी वायुदेव तेरी रक्षा करें ॥ १२ ॥ पिता त्वां पातु सर्वत्र तपनस्तपतां वरः । येन दत्तोऽसि मे पुत्र दिव्येन विधिना किल ॥ १३ ॥ 'पुत्र! जिन्होंने दिव्य रीतिसे तुझे मेरे गर्भमें स्थापित किया है वे तपनेवालोंमें श्रेष्ठ तेरे पिता भगवान् सूर्य सर्वत्र तेरा पालन करें ॥ १३ ॥ आदित्या वसवो रुद्राः साध्या विश्वे च देवताः । मरुतश्च सहेन्द्रेण दिशश्च सदिगीश्वराः ॥ १४ ॥ रक्षन्तु त्वां सुराः सर्वे समेषु विषमेषु च ।