भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 1149

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अशीत्यधिकशततमोऽध्यायः

भीष्म और परशुरामका घोर युद्ध

भीष्म उवाच

आत्मनस्तु ततः सूतो हयानां च विशाम्पते।
मम चापनयामास शल्यान् कुशलसम्मतः॥ १॥
भीष्मजी कहते हैं—राजन्! तदनन्तर अपने कार्यमें कुशल एवं सम्मानित सारथिने अपने घोड़ोंके तथा मेरे भी शरीरमें चुभे हुए बाणोंको निकाला॥ १॥

स्नातापवृत्तैस्तुरगैर्लब्धतोयैर्विह्वलैः।
प्रभाते चोदिते सूर्ये ततो युद्धमवर्तत॥ २॥
घोड़े टहलाये गये और लोट-पोट कर लेनेपर नहलाये गये; फिर उन्हें पानी पिलाया गया, इस प्रकार जब वे स्वस्थ और शान्त हुए, तब प्रातःकाल सूर्योदय होनेपर पुनः युद्ध आरम्भ हुआ॥ २॥

दृष्ट्वा मां तूर्णमायान्तं दंशितं स्यन्दने स्थितम्।
अकरोद् रथमत्यर्थं रामः सज्जं प्रतापवान्॥ ३॥
मुझे रथपर बैठकर कवच धारण किये शीघ्रता-पूर्वक आते देख प्रतापी परशुरामजीने अपने रथको अत्यन्त सुसज्जित किया॥ ३॥

ततोऽहं राममायान्तं दृष्ट्वा समरकाङ्क्षिणम्।
धनुः श्रेष्ठं समुत्सृज्य सहसावतरं रथात्॥ ४॥
तदनन्तर युद्धकी इच्छावाले परशुरामजीको आते देख मैं अपना श्रेष्ठ धनुष छोड़कर सहसा रथसे उतर पड़ा॥ ४॥

अभिवाद्य तथैवाहं रथमारुह्य भारत।
युयुत्सुर्जामदग्न्यस्य प्रमुखे वीतभीः स्थितः॥ ५॥
भारत! पूर्ववत् गुरुको प्रणाम करके अपने रथपर आरूढ़ हो युद्धकी इच्छासे परशुरामजीके सामने मैं निर्भय होकर डट गया॥ ५॥

ततोऽहं शरवर्षेण महता समवाकिरम्।
स च मां शरवर्षेण वर्षन्तं समवाकिरत्॥ ६॥
तदनन्तर मैंने उनपर बाणोंकी भारी वर्षा की। फिर उन्होंने भी बाणोंकी वर्षा करनेवाले मुझ भीष्मपर बहुत-से बाण बरसाये॥ ६॥

संक्रुद्धो जामदग्न्यस्तु पुनरेव सुतेजितान्।
सम्प्रेषिन्मे शरान् घोरान् दीप्तास्यानुरगानिव॥ ७॥