महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअर्जुनका बाणद्वारा पृथ्वीसे जल प्रकट करके भीष्मजीको पिलाना
तब रथियोंमें श्रेष्ठ पाण्डुपुत्र अर्जुनने शरशय्यापर सोये हुए सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें उत्तम भरतशिरोमणि भीष्मकी रथद्वारा ही परिक्रमा करके अपने धनुषपर एक तेजस्वी बाणका संधान किया और सब लोगोंके देखते-देखते मन्त्रोच्चारणपूर्वक उस बाणको पर्जन्यास्त्रसे संयुक्त करके भीष्मके दाहिने पार्श्वमें पृथ्वीपर उसे चलाया ।। २२-२३ १/२ ।। उत्पपात ततो धारा वारिणो विमला शुभा ।। २४ ।। शीतस्यामृतकल्पस्य दिव्यगन्धरसस्य च । अतर्पयत् ततः पार्थः शीतया जलधारया ।। २५ ।। भीष्मं कुरूणामृषभं दिव्यकर्मपराक्रमम् । फिर तो शीतल, अमृतके समान मधुर तथा दिव्य सुगन्ध एवं दिव्यरससे संयुक्त जलकी सुन्दर स्वच्छ धारा ऊपरकी ओर उठ-(कर भीष्मके मुखमें पड़)-ने लगी। उस शीतल जलधारासे अर्जुनने दिव्यकर्म एवं पराक्रमवाले कुरुश्रेष्ठ भीष्मको तृप्त कर दिया ।। २४-२५ १/२ ।। कर्मणा तेन पार्थस्य शक्रस्येव विकुर्वतः ।। २६ ।।