महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 690, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ें‘भारत! गुरुजनोंके प्रति शिष्य एवं पुत्रोंका जो बर्ताव होना चाहिये, हम आपके प्रति उसीका पालन करते हैं। आप भी हमलोगोंपर गुरुजनोचित स्नेह रखते हुए तदनुरूप बर्ताव कीजिये।। ४५ १/२ ।।
पित्रा स्थापयितव्या हि वयमुत्पथमास्थिताः ॥ ४६ ॥ संस्थापय पथिष्वस्मांस्तिष्ठ धर्मे सुवर्त्मनि । ‘हम पुत्रगण यदि कुमार्गपर जा रहे हों तो पिताके नाते आपका कर्तव्य है कि हमें सन्मार्गमें स्थापित करें। इसलिये आप स्वयं धर्मके सुन्दर मार्गपर स्थित होइये और हमें भी धर्मके मार्गपर ही लाइये’ ॥ ४६ १/२ ॥
आहुश्चैमां परिषदं पुत्रास्ते भरतर्षभ ॥ ४७ ॥ धर्मज्ञेषु सभासत्सु नेह युक्तमसाम्प्रतम् । भरतश्रेष्ठ! आपके पुत्र पाण्डवोंने इस सभाके लिये भी यह संदेश दिया है—‘आप समस्त सभासद्गण धर्मके ज्ञाता हैं। आपके रहते हुए यहाँ कोई अयोग्य कार्य हो, यह उचित नहीं है ॥ ४७ १/२ ॥
यत्र धर्मो ह्यधर्मेण सत्यं यत्रानृतेन च ॥ ४८ ॥ हन्यते प्रेक्षमाणानां हतास्तत्र सभासदः । ‘जहाँ सभासदोंके देखते-देखते अधर्मके द्वारा धर्मका और मिथ्याके द्वारा सत्यका गला घोंटा जाता हो, वहाँ वे सभासद् नष्ट हुए माने जाते हैं ॥ ४८ १/२ ॥
विद्धो धर्मो ह्यधर्मेण सभां यत्र प्रपद्यते ॥ ४९ ॥ न चास्य शल्यं कृन्तन्ति विद्धास्तत्र सभासदः । धर्म एतानारुजति यथा नद्यनुकूलजान् ॥ ५० ॥ ‘जिस सभामें अधर्मसे विद्ध हुआ धर्म प्रवेश करता है और सभासद्गण उस अधर्मरूपी काँटेको काटकर निकाल नहीं देते हैं, वहाँ उस काँटेसे सभासद् ही विद्ध होते हैं (अर्थात् उन्हें ही अधर्मसे लिप्त होना पड़ता है)। जैसे नदी अपने तटपर उगे हुए वृक्षोंको गिराकर नष्ट कर देती है, उसी प्रकार वह अधर्मविद्ध धर्म ही उन सभासदोंका नाश कर डालता है’ ॥ ४९-५० ॥
ये धर्ममनुपश्यन्तस्तूष्णीं ध्यायन्त आसते । ते सत्यमाहुर्धर्म्यं च न्याय्यं च भरतर्षभ ॥ ५१ ॥ भरतश्रेष्ठ! जो पाण्डव सदा धर्मकी ओर ही दृष्टि रखते हैं और उसीका विचार करके चुपचाप बैठे हैं, वे जो आपसे राज्य लौटा देनेका अनुरोध करते हैं, वह सत्य, धर्मसम्मत और न्यायसंगत है ॥ ५१ ॥
शक्यं किमन्यद् वक्तुं ते दानादन्यज्जनेश्वर । ब्रुवन्तु ते महीपालाः सभायां ये समासते ॥ ५२ ॥ धर्मार्थौ सम्प्रधार्यैव यदि सत्यं ब्रवीम्यहम् ।