भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1303

अष्टचक्रसमायुक्तं मेघगम्भीरनिःस्वनम् ।
उसपर सभी प्रकारके श्रेष्ठ आयुध रखे गये थे। उसमें आठ पहिये लगे थे और चलते समय उस रथसे मेघ-गर्जनाके समान गम्भीर ध्वनि होती थी। विशाल ध्वज उस रथकी शोभा बढ़ा रहा था। उसीपर घटोत्कच आरूढ़ था ॥ १२ १/२ ॥
मत्तमातङ्गसंकाशा लोहिताक्षा विभीषणाः ॥ १३ ॥
कामवर्णजवा युक्ता बलवन्तः शतं हयाः ।
मतवाले हाथीके समान प्रतीत होनेवाले सौ बलवान् एवं भयंकर घोड़े उस रथमें जुते हुए थे। जिनकी आँखें लाल थीं तथा जो इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले और मनचाहे वेगसे चलनेवाले थे ॥ १३ १/२ ॥
वहन्तो राक्षसं घोरं वालवन्तो जितश्रमाः ॥ १४ ॥
विपुलाभिः सटाभिस्ते हेषमाणा मुहुर्मुहुः ।
उन घोड़ोंके कंधोंपर लंबे-लंबे बाल थे। वे परिश्रमको जीत चुके थे। वे सभी अपने विशाल केसरों (गर्दनके लंबे बालों)-से सुशोभित थे और उस भयानक राक्षसका भार वहन करते हुए वे बारंबार हिनहिना रहे थे ॥ १४ १/२ ॥

राक्षसोऽस्य विरूपाक्षः सूतो दीप्तास्यकुण्डलः ॥ १५ ॥