भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1565

शुद्धात्मानं भवं भीमं शशाङ्ककृतशेखरम् ॥ १६ ॥
तीनों लोकोंके एकमात्र स्रष्टा, त्रिलोकीके आश्रय, शुद्धात्मा, भव, भीम और चन्द्रमाका मुकुट धारण करनेवाले भी वे ही हैं ॥ १६ ॥
शाश्वतं भूधरं देवं सर्ववागीश्वरेश्वरम् ।
सुदुर्जयं जगन्नाथं जन्ममृत्युजरातिगम् ॥ १७ ॥
वे सनातन देव इस पृथ्वीको धारण करनेवाले तथा सम्पूर्ण वागीश्वरोंके भी ईश्वर हैं। उन्हें जीतना असम्भव है। वे जगदीश्वर जन्म, मृत्यु और जरा आदि विकारोंसे परे हैं ॥ १७ ॥
ज्ञानात्मानं ज्ञानगम्यं ज्ञानश्रेष्ठं सुदुर्विदम् ।
दातारं चैव भक्तानां प्रसादविहितान् वरान् ॥ १८ ॥
वे ज्ञानस्वरूप, ज्ञानगम्य तथा ज्ञानमें श्रेष्ठ हैं। उनके स्वरूपको समझ लेना अत्यन्त कठिन है। वे अपने भक्तोंको कृपापूर्वक मनोवांछित उत्तम फल देनेवाले हैं ॥ १८ ॥
तस्य पार्षदा दिव्या रूपैर्नानाविधैर्विभोः ।
वामना जटिला मुण्डा ह्रस्वग्रीवा महोदराः ॥ १९ ॥
महाकाया महोत्साहा महाकर्णास्तथापरे ।
आननैर्विकृतैः पादैः पार्थ वेषैश्च वैकृतैः ॥ २० ॥
भगवान् शंकरके दिव्य पार्षद नाना प्रकारके रूपोंमें दिखायी देते हैं। उनमेंसे कोई वामन (बौने), कोई जटाधारी, कोई मुण्डित मस्तकवाले और कोई छोटी गर्दनवाले हैं। किन्हींके पेट बड़े हैं तो किन्हींके सारे शरीर ही विशाल हैं। कुछ पार्षदोंके कान बहुत बड़े-बड़े हैं। वे सब बड़े उत्साही होते हैं। कितनोंके मुख विकृत हैं और कितनोंके पैर। अर्जुन! उन सबके वेष भी बड़े विकराल हैं ॥ १९-२० ॥
ईदृशैः स महादेवः पूज्यमानो महेश्वरः ।
स शिवस्तात तेजस्वी प्रसादाद् याति तेऽग्रतः ॥ २१ ॥
ऐसे स्वरूपवाले वे सभी पार्षद महान् देवता भगवान् शंकरकी सदा ही पूजा किया करते हैं। तात! उन तेजस्वी पुरुषके रूपमें वे भगवान् शंकर ही कृपा करके तुम्हारे आगे-आगे चलते हैं ॥ २१ ॥
तस्मिन् घोरे सदा पार्थ संग्रामे रोमहर्षणे ।
द्रौणिकर्णकृपैर्गुप्तां महेष्वासैः प्रहारिभिः ॥ २२ ॥
कस्तां सेनां तदा पार्थ मनसापि प्रधर्षयेत् ।
ऋते देवान्महेष्वासाद् बहुरूपान्महेश्वरात् ॥ २३ ॥
कुन्तीनन्दन! उस रोमांचकारी घोर संग्राममें अश्वत्थामा, कर्ण और कृपाचार्य आदि प्रहारकुशल बड़े-बड़े धनुर्धरोंसे सुरक्षित उस कौरव-सेनाको उस समय बहुरूपधारी महाधनुर्धर भगवान् महेश्वरके सिवा दूसरा कौन मनसे भी नष्ट कर सकता था ॥ २२-२३ ॥