महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2438, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयोऽध्यायः
राजा धृतराष्ट्रका विलाप करना और संजयसे युद्धका वृत्तान्त पूछना
वैशम्पायन उवाच
विसृष्टास्वथ नारीषु धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः ।
विललाप महाराज दुःखाद् दुःखान्तरं गतः ॥ १ ॥
सधूममिव निःश्वस्य करौ धुन्वन् पुनः पुनः ।
विचिन्त्य च महाराज वचनं चेदमब्रवीत् ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—महाराज! स्त्रियोंके बिदा हो जानेपर अम्बिकानन्दन राजा धृतराष्ट्र एक दुःखसे दूसरे दुःखमें पड़कर गरम-गरम उच्छ्वास लेते और बारंबार दोनों हाथ हिलाते हुए विलाप करने लगे और बड़ी देरतक चिन्तामग्न रहकर इस प्रकार बोले ॥ १-२ ॥
धृतराष्ट्र उवाच
अहो बत महद्दुःखं यदहं पाण्डवान् रणे ।
क्षेमिणश्चाव्ययांश्चैव त्वत्तः सूत शृणोमि वै ॥ ३ ॥
धृतराष्ट्रने कहा—सूत! मेरे लिये महान् दुःखकी बात है कि मैं तुम्हारे मुखसे रणभूमिमें पाण्डवोंको सकुशल और विनाशरहित सुन रहा हूँ ॥ ३ ॥
वज्रसारमयं नूनं हृदयं सुदृढं मम ।
यच्छ्रुत्वा निहतान् पुत्रान् दीर्यते न सहस्रधा ॥ ४ ॥
निश्चय ही मेरा यह सुदृढ़ हृदय वज्रके सारतत्त्वका बना हुआ है; क्योंकि अपने पुत्रोंको मारा गया सुनकर भी इसके सहस्रों टुकड़े नहीं हो जाते हैं ॥ ४ ॥
चिन्तयित्वा वयस्तेषां बालक्रीडां च संजय ।
हतान् पुत्रानशेषेण दीर्यते मे भृशं मनः ॥ ५ ॥
संजय! मैं उनकी अवस्था और बाल-क्रीड़ाका चिन्तन करके जब उन सबके मारे जानेकी बात सोचता हूँ, तब मेरा हृदय अत्यन्त विदीर्ण होने लगता है ॥ ५ ॥
अनेत्रत्वाद् यदेतेषां न मे रूपनिदर्शनम् ।
पुत्रस्नेहकृता प्रीतिर्नित्यमेतेषु धारिता ॥ ६ ॥
यद्यपि नेत्रहीन होनेके कारण मैंने उनका रूप कभी नहीं देखा था, तथापि इन सबके प्रति पुत्रस्नेह-जनित प्रेमका भाव सदा ही रखा है ॥ ६ ॥
बालभावमतिक्रम्य यौवनस्थांश्च तानहम् ।