भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2861

'यह सारस्वत नामसे विख्यात महातपस्वी होगा। महाभागे! इस संसारमें बारह वर्षोंतक जब वर्षा बंद हो जायगी, उस समय यह सारस्वत ही श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको वेद पढ़ायेगा ।। २२ १/२ ।। पुण्याभ्यश्च सरिद्भ्यस्त्वं सदा पुण्यतमा शुभे ।। २३ ।। भविष्यसि महाभागे मत्प्रसादात् सरस्वति । 'शुभे! महासौभाग्यशालिनी सरस्वति! तुम मेरे प्रसादसे अन्य पवित्र सरिताओंकी अपेक्षा सदा ही अधिक पवित्र बनी रहोगी' ।। २३ १/२ ।। एवं सा संस्तुतानेन वरं लब्ध्वा महानदी ।। २४ ।। पुत्रमादाय मुदिता जगाम भरतर्षभ । भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार उनके द्वारा प्रशंसित हो वर पाकर वह महानदी पुत्रको लेकर प्रसन्नतापूर्वक चली गयी ।। २४ १/२ ।। एतस्मिन्नेव काले तु विरोधे देवदानवैः ।। २५ ।। शक्रः प्रहरणान्वेषी लोकांस्त्रीन् विचचार ह । इसी समय देवताओं और दानवोंमें विरोध होने-पर इन्द्र अस्त्र-शस्त्रोंकी खोजके लिये तीनों लोकोंमें विचरण करने लगे ।। २५ १/२ ।। न चोपलेभे भगवान् शक्रः प्रहरणं तदा ।। २६ ।। यद्धैतेषां भवेद् योग्यं वधाय विबुधद्विषाम् । परंतु भगवान् शक्र उस समय ऐसा कोई हथियार न पा सके, जो उन देवद्रोहियोंके वधके लिये उपयोगी हो सके ।। २६ १/२ ।। ततोऽब्रवीत् सुरान् शक्रो न मे शक्या महासुराः ।। २७ ।। ऋतेऽस्थिभिर्दधीचस्य निहन्तुं त्रिदशद्विषः । तदनन्तर इन्द्रने देवताओंसे कहा—'दधीच मुनिकी अस्थियोंके सिवा और किसी अस्त्र-शस्त्रसे मेरे द्वारा देवद्रोही महान् असुर नहीं मारे जा सकते ।। २७ १/२ ।। तस्माद् गत्वा ऋषिश्रेष्ठो याच्यतां सुरसत्तमाः ।। २८ ।। दधीचास्थीनि देहीति तैर्वधिष्यामहे रिपून् । 'अतः सुरश्रेष्ठगण! तुमलोग जाकर मुनिवर दधीचसे याचना करो कि आप अपनी हड्डियाँ हमें दे दें। हम उन्हींके द्वारा अपने शत्रुओंका वध करेंगे' ।। २८ १/२ ।। स च तैर्याचितोऽस्थीनि यत्नादृषिवरस्तदा ।। २९ ।। प्राणत्यागं कुरुश्रेष्ठ चकारैवाविचारयन् । स लोकानक्षयान् प्राप्तो देवप्रियकरस्तदा ।। ३० ।। कुरुश्रेष्ठ! देवताओंके द्वारा प्रयत्नपूर्वक अस्थियोंके लिये याचना की जानेपर मुनिवर दधीचने बिना कोई विचार किये अपने प्राणोंका परित्याग कर दिया। उस समय देवताओंका