भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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षट्त्रिंशोऽध्यायः

अभिमन्युका उत्साह तथा उसके द्वारा कौरवोंकी चतुरंगिणी सेनाका संहार

संजय उवाच

सौभद्रस्तद् वचः श्रुत्वा धर्मराजस्य धीमतः ।
अचोदयत यन्तारं द्रोणानीकाय भारत ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**भारत! बुद्धिमान् युधिष्ठिरका पूर्वोक्त वचन सुनकर सुभद्रकुमार अभिमन्युने अपने सारथि-को द्रोणाचार्यकी सेनाकी ओर चलनेका आदेश दिया ॥ १ ॥

तेन संचोद्यमानस्तु याहि याहीति सारथिः ।
प्रत्युवाच ततो राजन्नभिमन्युमिदं वचः ॥ २ ॥
राजन्! ‘चलो, चलो’ ऐसा कहकर अभिमन्युके बारंबार प्रेरित करनेपर सारथिने उससे इस प्रकार कहा— ॥ २ ॥

अतिभारोऽयमायुष्मन्नाहितस्त्वयि पाण्डवैः ।
सम्प्रधार्य क्षणं बुद्ध्या ततस्त्वं योद्धुमर्हसि ॥ ३ ॥
‘आयुष्मन्! पाण्डवोंने आपके ऊपर यह बहुत बड़ा भार रख दिया है। पहले आप क्षणभर रुककर बुद्धिपूर्वक अपने कर्तव्यका निश्चय कर लीजिये। उसके बाद युद्ध कीजिये ॥ ३ ॥

आचार्यो हि कृती द्रोणः परमास्त्रे कृतश्रमः ।
अत्यन्तसुखसंवृद्धस्त्वं चायुद्धविशारदः ॥ ४ ॥
‘द्रोणाचार्य अस्त्रविद्याके विद्वान् हैं और उत्तम अस्त्रोंके अभ्यासके लिये उन्होंने विशेष परिश्रम किया है। इधर आप अत्यन्त सुख एवं लाड़-प्यारमें पले हैं। युद्धकी कलामें आप उनके-जैसे विज्ञ नहीं हैं’ ॥ ४ ॥